सिनेमा का जादुई सफर: सिनेमा केवल वही नहीं जो बंबई में बनता है…

सिनेमा का जादुई सफर, किताब, समीक्षा

सबसे पहले अपनी ही एक बात। एक आलिम कलमकार को एक विदेशी कलात्मक फिल्म देखने को दी थी। उन्होंने फिल्म देखी और मात्र एक दृश्य के कारण पूरी फिल्म रद्द कर दी। कारण ? उस दृश्य में एक रईस के घर में कथित क्रांतिकाल में घुस आए कुछ गरीब-गुरबों पर वह व्यक्ति उन्हें कुछ बुरा-भला कहता है। चल रही सिनेकथा के तहत एक सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया के अंतर्गत यह दृश्य आता है जिस पर मूर्धन्य का अजीबोगरीब कथन हैरान कर देने वाला था। उस दिन एक बात को लेकर यकीन और पुख्ता हुआ था कि सिनेमा को राजनीतिक रूझानों के रास्ते नहीं बल्कि सर्वप्रथम उसकी अपनी व्याकरण के अनुसार देखा-परखा जाना चाहिए। दरअसल, ऐसे ही मिलते-जुलते और नासमझी भरे बयान उससे पहले और बाद में भी सुने हैं, लेकिन इस एक कथन में निहित राजनीतिक पोंगापंथी जड़ता कुछ इतनी गहरी थी कि काफी देर को जायका बिगड़ा रहा था।

कोई भी फिल्म, चाहे वह राजनीतिक विषय पर बनी हो या सामाजिक या रूमानी, सबसे पहले बात जहां तक संभव हो उसके कलापक्ष से ही शुरू होनी चाहिए। पटकथा, छायांकन, कैमराग्राफी, संगीत, संवाद, वस्त्रसज्जा, लोकेशन, सेट डिजाइन, अभिनय, संपादन और इन सबके संयोजन में दिखने वाले निर्देशन जैसे गुणों की ही परख सिनेमा की असली परख हो सकती है। इन पक्षों से इतर, उसके राजनीतिक रूझान को काफी हद तक दरकिनार रखा जा सकता है। और यदि फिल्म राजनीतिक विचार प्रधान है तो कथानक में दो-चार विचार (दृश्य) उसकी मूल विचारधारा के खिलाफ भी हो सकते हैं, जिन्हें समग्र दृष्टि में अपना लेने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए, जैसा कि उपरोक्त मूर्धन्य को गवारा न हुआ था। वर्ना तमाम राजनीतिक विषयवस्तुओं पर बनी फिल्में (जो भारत में बहुत कम और विदेशों में कहीं अधिक बनी हैं) ऐसी ही जड़ राजनीतिक सोच के कारण प्रथम दृष्टया खारिज कर दी जाएंगी।

‘सिनेमा का जादुई सफर’ शीर्षक अपने आप में खासा आकर्षक प्रतीत होता है। लेखक का प्रयास भी कुछ ऐसा ही है कि वह पुस्तक को एक विचारधारात्मक आधार दे सके। इसमें किसी को कोई एतराज नहीं हो सकता, लेकिन यह आधार देने के लिए लेखक ने जिन फिल्मों का चुनाव किया है, उन पर एकबारगी सोचना पड़ता है। कारण यह है कि स्वयं सिनेमाई शु़द्धता का कायल होते हुए भी लेखक ने तरजीह बंबइया (या मुंबइया) मुख्यधारा सिनेमा को दी है। माना कि 1940 से 1960 के दशक के बंबइया सिनेमा में कुछ ऐसी हस्तियां काम कर रही थीं जिनके सिनेमा से इतर प्रोफाइल पर शक नहीं किया जा सकता। गुरुदत्त, बिमल राॅय, महबूब खान, ऋषिकेश मुखर्जी, राजिन्दर सिंह बेदी, के. आसिफ, चेतन आनंद और राज कपूर सरीखी कद्दावर शख्सियतें अपनी-अपनी तरह से विशिष्ट सोच-समझ की नुमाइंदगी करती थीं, लेकिन सिनेमा के बाजारीकरण में भी उनमें से एकाध को छोड़ अन्य सभी शुरू से मुबतिला थीं। चलिए इस बात को भी कुछ हद तक नजरअंदाज कर दें, चूंकि अस्तित्व का प्रश्न होता है, तिस पर भी सवाल यह उठता है कि भारतीय सिनेमा (पाॅपुलिस्ट कल्चर से इतर) का संजीदा प्रतिनिधित्व इनमें से लगातार कितने फिल्मकार कर पाए हैं ?

पुस्तक में लेखक ने बहुत करीने से चार खंडों में अपनी बातें गहराई से रखी हैं। सबसे पहले वह बड़े परदे में संवाद और शिल्प, रोमान, खलनायिकी, अकेलेपन और नए तर्जुबों की बात करते हैं। इन शीर्षकों के अंतर्गत उनका चुनाव मुख्यतः बंबइया हिन्दी सिनेमा तक सीमित रहता है। यों वह बीच दमन और अकेलापन शीर्षक में ‘मिर्च-मसाला’, ‘भूमिका’, ‘दस्तक’ और फिर उसके बाद ‘दामुल’, ‘36 चैरंगी लेन’, ‘पार’, ‘अर्धसत्य’, ‘गर्म हवा’ आदि फिल्मों को भी जगह देते हैं, लेकिन उनका सिनेमाई शुद्धता को पूर्णतया अपनी सोच के केंद्र में शामिल रखने का हवाला (पुस्तक भूमिका में) कुछ पीछे रह जाता है।

वैसे लेखक ने अपनी ओर से उपरोक्त एवं अन्य फिल्मों के कलापक्ष को विशेषकर बखूबी उकेरने का प्रयास किया है। वह अगर किसी चलचित्र के कलात्मक पहलू पर बात करते हैं तो उसके निर्माता-निर्देशक की निजी पसंद-नापसंद का भी हवाला देते रहते हैं, इससे उस चित्र की निर्मिति की प्रक्रिया का भी पाठक को ज्ञानार्जन होता है। खुद भूमिका में ही गुरुदत्त के चरित्र की बारीकियों का ब्योरा आंखें खोल देने वाला है। गुरुदत्त अब एक किंवदंतीय नाम बन चुका है, जिनके बारे में कुछ भी नया आज भी उनके चाहने वालों को उद्वेलित करता है। वह संवेदना के पर्याय बन चुके हैं, एक स्कूल और सबसे ऊपर, पागल बंबइया फिल्म जगत में एक संवेदनशील कलाकार की अप्राकृतिक नियति का सबसे बड़ा निशान भी हैं। लेखक ने खुद भूमिका में गुरुदत्त जैसे अतिवादी संवेदना के पर्याय को शामिल करके और उनके बारे में कुछ नई जानकारियां देकर अच्छी शुरुआत की है। इसके बाद वह अडूर गोपालाकृष्णन और फिर अंतर्राष्ट्रीय सिनेमा के कुछ दृष्टांतों पर बात करते हैं।

एक बात और जिसकी कमी यहां खलती है, वह है कुछ सबसे बड़े फिल्मकारों की छवियों का जिक्र न होना। सत्यजित राय, रित्विक घटक, मृणाल सेन, बुद्धदेव दासगुप्ता सरीखे बड़े नाम केवल संदर्भ के तौर पर लिए गए हैं। भारतीय सिनेमा का विवेचन करते हुए अंतर्राष्ट्रीय पटल पर यही कुछ नाम तो याद रह जाते हैं। पुस्तक के पहले खंड में इनका न होना ही, पुस्तक से गुजरते हुए अक्सर एक अड़चन के तौर पर लगता है।

इसके बावजूद, लेखक बदलते समाज के संदर्भ में सिनेमाई वक्त की नब्ज को बखूबी पकड़ता है। मुख्यधारा हिन्दी सिनेमा में आ रहे तीव्र बदलावों पर लेखक का विवेचन सटीक है। वह ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’, ‘तारे जमीन पर’ और ‘श्वास’ पर बात करते हुए कुछ नए बदलावों पर इशारा फेंकते हैं। देश में राजनीतिक विचारधारात्मक सिनेमा का टोटा रहा है, ऐसे में ‘हजारों ख्वाहिशें…’ की बाॅक्स आॅफिस सफलता ने हिन्दी मुख्यधारा सिनेमा के कर्णधारों को बेशक नई राह दिखाई थी। बस इसकी रोशनी में शर्त केवल इतनी थी कि फिल्म का हर पक्ष सधा हुआ हो। वर्ना बाद में राजनीतिक विषयों पर जबरिया बनाए गए चित्र औंधे मुंह गिरे हैं। ‘तारे जमीन पर’ भी नई जमीन तोड़ती नजर आई। नामालूम और अनदेखी मानसिक बीमारी पर विश्व सिनेमा में भी कुछ कम ही काम हुआ है। सिनेमा फाॅर चिल्ड्रन इसके बावजूद हमारे यहां अभी कागजों में ही दिख रहा है। चिल्ड्रन फिल्म सोसाइटी की हालत यह है कि वहां के पुरोधा जब-तब सीमित संसाधनों और नौकरशाही की अड़चनों को कोसते रहते हैं। यह खासी हास्यास्पद स्थिति है, क्योंकि फिल्म निर्माण के ‘फंडामेंटल्स’ पुख्ता रखने पर फिल्म निर्माण से जुड़ा कोई भी काम पूरा कर पाने की बात के प्रबल समर्थक भी सिनेमा के सरकारी तंत्र के इन्हीं कर्णधारों में से आते हैं। संदीप सावंत निर्देशित ‘श्वास’, लेखक के अनुसारं, दर्शकों की सांसों को अपनी संवेदना की नर्म हथेलियों में थामे रखती है। जहां श्वास ने मराठी सिनेमा को वैश्विक पहचान दिलाने का काम किया था, वहीं ‘हजारों ख्वाहिशें…’ और ‘तारे जमीन पर’ ने हिन्दी सिनेमा को फिर से अपने अंदर झांकने को लगभग मजबूर कर दिया है, जहां प्रयोगधर्मिता का भी शुरू से अकाल रहा है। बशर्ते अब कोई फिल्मकार इन तथ्यों से कुछ सबक लेना चाहे या नहीं!

पुस्तक में लेखकीय परख का असली रूप तीसरे खंड ‘बदलता हुआ विश्व सिनेमा’ और चैथे खंड ‘करिश्मा और क्लासिकी’ में सामने आता है। हाॅलीवुड से इतर यूरोपीय और पश्चिम एशिया (मुख्यतः इराक और ईरान) का सिनेमाई जगत किन बदलावों से गुजर रहा है, इस बारे में अंदाजा लगा लेना कुछ कठिन न होगा। लगभग बर्बाद हो चुके इराक में सिनेमा का पुनः लौट आना निस्संदेह हैरान करता है। कठमुल्लाओं की तानाशाही में ईरानी सिनेमा (ब्यूटीफुल सिटी) का औसत रेखा को तोड़कर ऊपर उठना स्वागतयोग्य है। हैरानी नहीं कि लेखक यह भी सूचना देते हैं कि इस सिनेमा को स्वयं फिल्मस्टार आमिर खान ने कथित ‘बाॅलीवुड’ के लिए प्रेरणा-स्रोत बताया है। सांस्कृतिक, राजनीतिक और आत्मिक रूप से फिलवक्त खालीपन से जूझ रहे इराक में सिनेमा का सिर उठाना, वहां के फिल्मकारों की बेचैनी को भी दर्शाता है। जाहिर है वह जल्द से जल्द अपने देश का सच दुनिया के सामने रखना चाहते हैं और अब जबकि विदेशी फौजें इराक को उसकी नियति पर छोड़कर जा चुकी हैं, उम्मीद की जा सकती है कि वहां का नंगा सच सिनेमाई पर्दे पर और ज्यादा मुखर होकर आएगा। हीनेर सलामी की ‘किलोमीटर जीरो’ वहां के कुर्दी समुदाय का जो रूप सामने रखती है, उसे जानकर एक ही बात दिल-दिमाग में आती है कि आज के पश्चिम एशियाई जगत का अपनी समस्याओं से पार पाने का मार्ग अब शायद, चाहे कुछ देर को ही सही, कथित जम्हूरियत के रास्ते ही आ सकता है।

समीरा मखमलबाफ, सिद्दीकी बरमाक, असगर फरहादी जैसे फिल्मकार अपनी सरजमीं के संघर्ष को दिखाने की जद्दोजहद में लगे हैं। उधर अमेरिकी फिल्मकारों ने भी इराक की बर्बादी को सिनेमाई कैमरे में समेटा है, ‘द हर्ट लाॅकर’ जैसी फिल्म बेशक इराक का नंगा सच दिखाती है, लेकिन सिर्फ अमेरिकी नजरिए से। पूरी फिल्म में किसी इराकी किरदार को लंबे समय तक दिखाए जाना या संवेदनीय दृष्टि से देखा गया हो, याद नहीं पड़ता। अब सिर्फ इराकी फिल्मकारों से ही इस दिशा में उम्मीद रखी जा सकती है। लेकिन बमों-मिसाइलों की मार से एक ध्वस्त हो चुकी जमीन पर सिनेमाई जादूगरी के करतब कब तक टिके रह सकेंगे ? कहना न होगा कि लेखक से भविष्य में इराकी-ईरानी और समूचे पश्चिम एशियाई सिनेमा पर एक व्यापक शोधपरक कार्य की आशा की जा सकती है। दरअसल, कुछेक पश्चिम एशियाई और छोटे यूरोपीय देशों की फिल्मों और निर्देशकों पर पुस्तक में जानकारी उसका स्वर्णिम पक्ष है।

साथ ही यह भी उम्मीद की जा सकती है कि सिनेमाई धाराओं के और गहन विवेचन, पूर्णतः विशुद्ध सांस्कृतिक छटा में, हमारे सामने आएंगे। चूंकि इसका एक और प्रमाण पुस्तक में मौजूद है, बिल्कुल अंत में। लेखक ने यहां भारतीय संदर्भ में साहित्य और सिनेमा के गठजोड़ पर कुछ बातें कही हैं। असल में, शब्दों के प्रेमी किसी भी व्यक्ति के लिए यह विषय बहुत लंबी और संवेदनीय बहस का बायस भी बनता है। आंकड़ों की जुबानी बात करना यहां बेमानी होगा, क्योंकि इसमें दोराय नहीं कि विश्व की श्रेष्ठतम सिनेकृतियां साहित्य आधारित ही रही हैं। भारतीय संदर्भ में हालात कुछ भिन्न रहे हैं। सत्यजित राय, रित्विक घटक से शुरुआत की जाए तो सत्तरादि के नई धारा सिनेमा तक की कुछ कृतियां ही साहित्यिक रचनाओं पर आधारित दिखती हैं। उसके बाद गत दशक में कुछ नवयुगीन फिल्मकारों का शरतचंद्र, शेक्सपियर आदि को पर्दे पर उतारना एक बेहद कमजोर ढांचे का अंश ही दिखता है। इसी तरह बांग्ला सिनेमा में रितुपर्णो घोष और कुछ अन्य फिल्मकारों का खुद को साहित्यप्रेमी सिद्ध करना ढकोसले के अतिरिक्त कुछ नहीं लगता। कारण… साहित्यिक कृतियों का सिनेपर्दे पर शीलभंग (बलात्कार) !! उनकी कथा में मनमर्जी के बदलाव और कथानक की मूल आत्मा की चीरफाड़। दरअसल, यह एक ऐसा कड़वा सच है जिस पर कम से कम मुख्यधारा का मीडिया कुछ नहीं बोलता (या वह लोग कुछ जानते ही नहीं… जिस दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य पर सिर्फ हैरानी ही हो सकती है..!!)। ‘देवदास’, ‘परिणिता’, ‘चोखेर बाली’, ‘मकबूल’, ‘ओंकारा’ जैसे लिफाफिया और त्रुटिपूर्ण प्रयोग लेखक की चिंता के दायरे में आते ही क्यों हैं ?

विदेशी फिल्मकारों के दर्जनों की तादाद में गत पांच वर्षों से भारत आगमन के बावजूद ‘गांधी’ जैसा क्या नया आया है ? यह सवाल कुछ राजनीतिक छटा लिए हुए है ! 2005 में जाॅर्ज डब्ल्यू. बुश के न्यूक्लियर डील लाने बाद से दुनिया के धनी कोलम्बसों को आखिरकार भारत का रास्ता मिल ही गया था! इसके बावजूद, ‘दार्जिलिंग एक्सप्रेस’, ‘ईट, प्रे, लव’, ‘द होली स्मोक’ जैसे कितने ही प्रयोग क्या केवल एक नई खोजी गई सभ्यता के अनोखे और अजीबोगरीब (एग्जाॅटिक) पहलुओं को तलाशने की कवायद मात्र नहीं हैं ? यह मुख्यधारा अमेरिकी या यूरोपीय चोंचले हैं, जिनमें कितना सच है और कितनी मिथ्या, कहना कभी आसान नहीं होता। फिर भी धीर-गंभीर भारतीय प्रयोग(!) शुरू से होते रहे हैं, जिन पर निगाह अक्सर कम ठहरती रही है। अगर निर्देशक वारिस हुसैन भारत का पश्चिम को संजीदा फिल्म निर्माण में पहला आयात रहे थे तो पीटर ब्रूक का प्राचीन भारतीय ग्रंथों को खंगालना उनकी अपनी शास्त्रीय परंपरा को नया आधार और विस्तार देना रहा है। पीटर ब्रूक ने महाभारत का नौ घंटे का थियेट्रिकल फिल्मीकरण क्यों और किन मानसिक उद्वेलनों के चलते किया था, इस पर हमारे यहां बिल्कुल बात नहीं हुई। लेखक पुस्तक में यह सवाल उठाते हैं। पीटर ब्रूक का भारतीय दर्शन प्रेम और ‘अपने जीवन के बीस वर्ष महाभारत अध्ययन में लगा चुका हूं’ किस सत्य को विश्लेषित करता है! यह प्रश्न भारतीय दर्शक के लिए आज तक अनुत्तरित हैं, उनके लिए भी जिन्होंने पीटर ब्रूक की ‘महाभारत’ देखी है। पीटर ब्रूक का दुनिया के विभिन्न नस्लों के अभिनेताओं को महाभारत के चरित्रों में पिरोना, समूचे फिल्मांकन को सिनेमाई भव्यता से दूर रखना और मूलतः नाटकीय शैली देकर सत्य (अगर कुछ है!) के निकट रखना, अपनी सादगीपूर्ण ‘एपिकल शास्त्रीयता’ ही नहीं, खुद अपने आप को पहचानने के प्रयास के ही अंश हैं। पीटर ब्रूक महाभारत को सूर्य सरीखा मानते हैं, जिसके प्रकाश में जीवन की तमाम अनुभूतियां आलोकित होती हैं। कहना न होगा कि वह महाभारत पर अपने विचार रखते हुए एक परंपरावादी भारतीय ब्राह्मण की ही तरह बतियाते हैं। फिर भी महाभारत में से मनुष्य की निजी और दुनियावी जकड़नों से पार पाने के उनके ‘फाॅर्मूले’ अवैज्ञानिक नहीं हैं। पीटर ब्रूक शेक्सपियराना शैली के पैरोकार रहे हैं, वह ‘किंग लियर’ के चेहरे में से झांकती विखंडित आत्मा में से मानवीय अवशेषों को तलाशने का काम करते रहे हैं (फिल्म और नाटक दोनों में) शायद यही कारण है कि वह महाभारत को जीवन रूपी रंगमंच का एक महाकाव्यात्मक रूप मानते हैं।

गैरवाजिब नहीं होगा यहां यह कहना भी कि खुद लेखक ने शास्त्रीय शैली की पैरवी अडूर गोपालाकृष्णन पर लिखे आलेखों में की है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि सत्यजित राय के बाद अडूर गोपालाकृष्णन ही भारतीय सिनेजगत में एकमात्र ऐसे व्यक्तित्व हैं जो केवल शास्त्रीय संदर्भों में ही अपनी बात कहना पसंद करते हैं। संभवतः यही कारण है कि 1972 से आज तक उन्होंने मात्र दर्जन भर फीचर फिल्मों का ही निर्माण किया है। अडूर सिनेनिर्माण को एक लंबे और विलंबित आलाप की तरह लेते हैं। स्वयं अडूर फिल्मों में सत्यजित राय की ‘अपराजितो’ को लगभग एक परम सत्य की तरह महसूस करते हैं (इतना भर बता देना जरूरी है कि कई देसी-विदेशी फिल्मकार, मृणाल सेन सहित, और इन पंक्तियों का लेखक भी कुछ ऐसा ही सोचता आया है)। लेखक खुद सत्यजित राय और अडूर गोपालाकृष्णन के बीच की अजीबोगरीब साम्यता पर बात करते हैं। यह साम्यता आंचलिकता या मानवीय संदर्भों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि एक वैश्विक धरातल को भी पाटती है। अडूर की ‘एलिपतायम’ पर आलेख उतना अपील नहीं करता जितना उनकी फिल्म निर्माण पद्धति और राजनीतिक रूझानों पर लिखी पंक्तियां अपनी ओर खींचती हैं। यह लेख उनकी यौवनावस्था और प्रौढ़ निर्मिति का झरोखा है। वह अपनी रफ्तार से चलने वाले व्यक्ति हैं। कहना न होगा कि आज की बेसाख्ता दौड़ती दुनिया में ऐसे किसी भी रचनात्मक व्यक्तित्व का स्वागत करना हमारा धर्म(!) बन जाता है। अडूर आज शास्त्रीयता के पर्याय हैं – स्वयं उनके शब्दों में वह तब सबसे अधिक सुकून पाते हैं जब अच्छा लिखा गद्य पढ़ते हैं – अपने आप में उनके व्यक्तित्व पर हावी इस नैसर्गिक तत्व को विशुद्ध रूप में सामने ले आता है।

अंत में एक संदर्भ और, ‘हिन्दी सिनेमा और साहित्य: बदलते सरोकार’ में शुरुआत में ही लेखक कहते हैं – ‘क्लासिकी’ शुरू से सिनेमा की नजर में रही है पर उसका साहित्य से मन बहलाव का रिश्ता कभी नहीं रहा। तथ्य काफी अर्थों में सटीक है, परंतु मुख्यधारा हिन्दी सिनेमा के लिए ही, विदेशी सिनेमा पर बात करते हुए हमें सिनेमाई दृश्यपटल को इस मामले में रिवाइंड करने की जरूरत पड़ती है। यहीं कुछ आगे वह प्रश्न दागते हैं कि ‘प्यासा’, ‘कागज के फूल’ क्या साहित्यिक-कृतियों के समकक्ष नहीं रखी जा सकतीं, तो जवाब है – पूरी तरह नहीं, या  तीस-चालीस प्रतिशत ही। और कम से कम उस भारतीय सिनेमा की प्रौढ़ावस्था (जिसके पितामह सत्यजित राय रहे हों) के मौजूदा चरण में तो बिल्कुल भी नहीं।

पुस्तकः सिनेमा का जादुई सफरलेखक: प्रताप सिंहप्रकाशक: अनुभव प्रकाशन, गाजियाबाद-5. मूल्य: 160 रुपए