द सब्सटैंस एंड द शैडोः एक असाधारण अभिनेता की साधारण आत्मकथा

Dilip Kumar Autobiography filmbibo

रंगनाथ सिंह

जब आप दिलीप कुमार जैसे लीजेंडरी अभिनेताओं की आत्मकथा पढ़ना शुरू करते हैं तो आपको उससे बहुत ज़्यादा उम्मीद होती है.  ज़्यादा उम्मीद का अर्थ है, उसके पूरा न होने पर निराशा भी काफ़ी ज़्यादा होगी. दिलीप कुमार जिनके बारे में हमने बचपन में ही जान लिया था कि वो फल बेचते थे और एक दिन देविका रानी की उनपर नज़र पड़ी और उन्होंने उन्हें यूसुफ़ ख़ान से दिलीप कुमार बना दिया. हम इस बात पर हैरान होते रहते थे कि कोई फल बेचने वाला, जिसे हम अक्सर अपनी कॉलोनी में आवाज़ देते हुए देखते थे, रातों-रात फ़िल्मी स्टार कैसे बन सकता है!

उसके बाद बढ़ती उम्र के साथ क़िस्से भी बढ़ते गए. मधुबाला जैसी अप्रतिम सुंदरी दिलीप कुमार से प्यार करती थी. मधुबाला के ‘लालची बाप’  के कारण दोनों एक नहीं हो सके. मुगले-आजम के प्रेम दृश्य तब शूट हुए जब दोनों के बीच सामान्य हाय-हैल्लो भी नहीं होती थी.

दिलीप कुमार हो या कोई दूसरा फ़िल्म स्टार आम भारतीय जनता में उनको लेकर हज़ारों सवाल हमेशा कुलबुलाते रहते हैं. पिछले साठ साल-सत्तर सालों में जिस एक चीज़ ने पूरे भारतीय जनमानस को सबसे ज़्यादा प्रभावित किया है वो है सिनेमा.  एक फ़िल्म स्टार इस देश में भाषा, जाति और धर्म की दीवारों से परे अपना रसूख रखता है.  दिलीप कुमार के प्रशंसकों में भी भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर एक आम ग़रीब तक शामिल थे. लेकिन जिस दिलीप कुमार के आम और ख़ास सिनेमाप्रेमी चाहते हैं वो एक सिनेमाई छवि है, न कि सच. वो पर्दे पर निभाया गया एक किरदार है जो बार-बार भेष बदलकर आता है.

फ़िल्मी हीरो यूसुफ़ ख़ान कोई सआदत हसन मंटो या मनोहर श्याम जोशी नहीं जिसने फ़िल्मी दुनिया की भीतरी सतरों जगजाहिर करने के लिए कलम उठाई है. न ही वो रूसो है जो इसलिए आत्मकथा लिख रहा है कि उसके पास ऐसा कोई सच जिसे वो हर क़ीमत पर दुनिया के सामने ले आना चाहता है. यूसुफ़ ख़ान ने इसलिए आत्मकथा लिखवाई है क्योंकि दिलीप कुमार के लाखों चाहने वालों उसके बारे में छोटी से छोटी बात जानना चाहते हैं. लेकिन इस आत्मकथा से दिलीप कुमार ने अपने कट्टर चाहने वालों को भी निराश ही किया होगा. दिलीप साहब की आत्मकथा का शीर्षक ‘द सब्सटैंस एंड द शैडो’ काफ़ी हद तक वाजिब प्रतीत होता है. बस अफ़सोस इस बात का है कि किताब में सब्सटैंस(कथ्य) कम है और शैडो(परछाई) काफ़ी ज्यादा.

किताब का पहला हिस्सा पठनीय है जिसमें दिलीप कुमार ने अविभाजित भारत के पेशावर (वर्तमान पाकिस्तान में) गुज़ारे अपने बचपन का विस्तार से जिक्र किया है. दिलीप कुमार किशोरावस्था में जब अपने फल कारोबारी पिता के साथ फ्रंटियर मेल से पेशावर से मुंबई आए उसी समय से ये किताब पटरी से उतरने लगती है. आम पाठक जिस दिलीप कुमार के बारे में ज़्यादा जानना चाहता है दिलीप कुमार ने उसी के बारे में सबसे कम बताया है. अंग्रेजी के जुमले का प्रयोग करें तो किताब उसके बाद से बहुत स्केची हो जाती है. यह दिलीप कुमार के जीवन के बारे में ऊपर-ऊपर की जानकारियाँ देती हुई एक सफल अभिनेता की विफल आत्मकथा के रूप में ख़त्म हो जाती है.

इस किताब में दिलीप कुमार के बारे में शायद ही ऐसी कोई नई जानकारी हो जो उनके इंटरव्यू या दूसरे हवालों से पहले से सार्वजनिक न हो. अधिक से अधिक इसका प्रयोग किसी मसले पर दिलीप कुमार का आधिकारिक पक्ष जानने के लिए किया जा सकता है. हालांकि उसमें भी थोड़ी दिक्कत पेश आ सकती है, मसलन दिलीप कुमार ने 1970 के दशक में बीबीसी को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि उनके पास फ़िल्मी नाम चुनने के लिए तीन विकल्प दिए गए, दिलीप कुमार, वासुदेव और यूसुफ़ ख़ान तो उन्होंने अपने पिता के डर से कह दिया को चाहे जो नाम रख लो, यूसुफ़ ख़ान छोड़कर. बाद में फ़िल्म के पोस्टरों से उन्हें पता चला कि उनका नाम दिलीप कुमार रखा गया है. वहीं इस किताब में दिलीप साहब ने लिखा है कि बॉम्बे टॉकिज की मालकिन और उन्हें फ़िल्मों में मौक़ा देने वाली देविका रानी ने उन्हें एक दिन अपने दफ़्तर में बुलाकर कहा था कि वो उनका नाम दिलीप कुमार रखना चाहती हैं. तब दिलीप साहब ने देविका रानी से एक दिन बाद सोचकर अपनी राय बताने के लिए कहा. अगले दिन उन्होंने इस नाम को यह सोचकर हामी दे दी कि इससे उनके पिता जी को उनके फ़िल्मों के काम करने के बारे में नहीं पता चलेगा.

दिलीप कुमार की जो मीडिया में छवि है और जो छवि इस किताब से उभरती है, उसके मद्देनज़र ये महसूस होता है कि दिलीप साहब ऐसे आदमी नहीं है जो अपनी निजी जीवन को सार्वजनिक करें. शायद वो भी मानते हों कि एक कलाकार या रचनाकार के निजी जीवन का सबके सामने आना ज़रूरी नहीं है. उसका जो भी जीवन या पहचान है वो उसकी कला या बौद्धिक कर्म में पहले से मौजूद है. उसे वहाँ रेखांकित किया जा सकता है. उसका मूल्यांकन भी उसी के आधार पर करना चाहिए.  लेकिन ऐसे में यह भी याद रखना होगा कि ऐसा जीवन-दर्शन रखने वाले कलाकार आत्मकथाएँ भी नहीं लिखा करते.न एक कलाकार से राजनीतिज्ञों से ज़्यादा नैतिक होने की उम्मीद की जाती है. अफ़सोस है कि ईस्टवुड इस उम्मीद पर खरे नहीं उतरे हैं.

इस फ़िल्म को 87वें एकैडमी अवार्ड में छह वर्गों में नामांकन मिला है. हॉलीवुड के प्यारे ‘अमरीकी हत्यारे’ को कितने ऑस्कर मिलेंगे ये तो अगले कुछ दिनों में पता चलेगा लेकिन अमरीकी जनता और मीडिया का दिल वो पहले ही जीत चुका है क्योंकि वो ‘मोस्ट लेथल स्नाइपर इन अमरीकन मिलिट्री हिस्ट्री’ है. अमरीकी मीडिया और जनता इस वक़्त इस्लामिक स्टेट की आतंकी कार्रवाइयों के प्रति हैरत और ग़ुस्सा जाहिर करने में व्यस्त है. लेकिन थोड़ी फुरसत निकालकर उसे यह भी सोचना चाहिए कि आख़िकार एक ऐसे व्यक्ति, जो घोषित तौर पर अमरीका के सैन्य इतिहास का सबसे जानलेवा हत्यारा कहा जा रहा है, उससे अमरीकी इतना प्यार क्यों करते हैं!