हमजाद: दोस्त-मालिक-रकीब के कर्म-कुकर्म ही जिसकी दौलत हैं…

Manohar Shyam Joshi, Bhagwati Joshi, filmbibo
मनोहर श्याम जोशी का पहला उपन्यास कुरु कुरु स्वाहा था। (तस्वीर- भगवती जोशी)

रंगनाथ सिंह

खिलंदड़ गद्य लिखने में मनोहर श्याम जोशी का कोई जोड़ नहीं. गर्हित मुद्दों को बरतने का शऊर भी उन जैसा हिन्दी में दुर्लभ है. जोशी जी की सबसे ख़ास बात है कि वो ख़ुद पर हँस सकते हैं, लेखक होते हुए भी. वरना बाज लेखक तो गंभीरता के लिहाफ से निकलने में कांपने लगते हैं.

हमज़ाद जोशी जी के बम्बई के दिनों के अनुभवों से निकली एक मजेदार रचना है. कहानी का खुलासा हाल यूँ है कि एक फ़िल्म निर्माता का प्रौढ़ अवस्था में देहांत हो जाता है. उसके मरते ही उसके हमसाया यार-चमचा-राज़दार अनाथ हो जाता है. इस अनाथ ने अपने जीवन में कुछ कमाया नहीं. वो बस अपने दोस्त-मालिक-रकीब के करतबों का चश्मदीद है. बाक़ी की ज़िंदगी चलाने के लिए उसके पास एक ही पूँजी है, अपने दोस्त-मालिक-रकीब के कर्म-कुकर्म.

Hamzad, Manohar Shyam Joshi, Book, Review, Rangnath Singh, filmbiboजोशी जी ने फ़िल्मी दुनिया के छिलकों को बड़ी बारीकी से उकीला है. पता नहीं चलता कि कहां सच है और कहाँ गल्प. बस, मनोरंजन हर जगह है. शराब और शबाब में डूबे रहने वाले फ़िल्म निर्माता की क़िस्सों से जोशी जी ने हमारी मध्यवर्गीय नैतिकता को भी तार-तार करते चलते हैं. कौटुम्बिक अनाचार के बारे में इतना मुखर किंतु सहज गद्य हिन्दी में शायद ही किसी और ने लिखा हो.

असमान्य प्रेम संबंधों और देह संबंधों को लेकर उर्दू लेखक जितने मुखर रहे हैं, हिन्दी लेखक नहीं रहे हैं. जोशी जी इसके अपवाद माने जा सकते हैं. हमज़ाद, हरिया हरक्यूलीज़ की हैरानी, कसप, क्याप जैसी किताबें के शिल्प और कथ्य पर विस्तार से बात करने के लिएअलग से एक फुर्सती लेख लिखना होगा.

फ़िलहाल तो यही कहूँगा कि मनोरंजन और ज्ञानरंजन के बीच जैसा संतुलन जोशीजी बनाते हैं वो अद्भुत है. नारायण दत्त तिवारियों के समय में जोशी जी के हमज़ाद और हरिया हरक्यूलीज़ की हैरानी जैसे नॉवेला पढ़ना इस बात की तस्दीक करता है कि हिन्दी समाज में नारायण दत्तों की संख्या बड़ी रही है लेकिन वो लेखकों की कलम से फिसल जाते रहे हैं.