हम, तुम और वो ट्रकः क्या आपको याद है कि आपने पहली बार ट्रक कब देखा था…

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रंगनाथ सिंह

नोबल पुरस्कार(2012) के विजेता चीनी लेखक मो यान की कोई और किताब हिन्दी में है या नहीं, मुझे पता नहीं. ये किताब ‘हम, तुम और वो ट्रक’ मो यान के अंग्रेजी में अनुवादित नॉवेला ‘चेंज’ से हिन्दी में रूपांतरित की गई है. अनुवाद किया है जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफ़ेसर रह चुके पुष्पेश पंत ने.

मो यान एक विवादित लेखक रहे हैं, जैसा कि प्रोफ़ेसर आशीष नन्दी ने किताब के लोकार्पण के मौके पर बताया. मौजूदा चीन सरकार सेसंरशिप में यकीन रखती है. ट्वीटर और फ़ेसबुक जैसी चीज़ें चीन में प्रतिबंधित हैं. सरकार विरोधी लेखकों और कलाकारों के प्रति चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी काफ़ी निर्ममता से पेश आती रही है.

ऐसी सरकार मो यान की समर्थक है. प्रोफ़ेसर नन्दी ने बताया कि जब मो यान को नोबेल मिला तो चीन की सरकारी मीडिया ने उन्हें साहित्य का नोबेल जीतने वाला पहला चीनी लेखक बताया जो कि ग़लत है. द गार्डियन अख़बार के अनुसार मो यान नोबेल जीतने वाले पहले चीनी नागरिक लेखक हैं. उनके पहले गौ चिंजयान को साहित्य का नोबेल(2000) मिला था लेकिन वो पुरस्कार मिलने से कुछ साल पहले उन्हें फ्रांसीसी नागरिकता मिल गयी थी.

मो यान से दो साल पहले साल 2010 में चीनी लेखक, आलोचक और मानवाधिकार कार्यकर्ता लू श्याबाओ को शांति का नोबेल पुरस्कार मिला था. पुरस्कार मिलते समय और उसके बाद अब तक श्याबाओ चीनी जेल में क़ैद हैं.  श्याबाओ के मामले पर मो यान चुप ही रहे हैं. मो यान का शाब्दिक अर्थ होता है ‘बोलो मत’ और चीन के कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चुप रहने को लेकर उनकी आलोचना का लंबा-चौड़ा ब्योरा उनके विकीपीडिया पेज़ पर मौजूद है.

कोई लेखक किन मुद्दों पर बोले और किन मुद्दों पर चुप रहे, ये उसका निजी चुनाव है. मेरा मानना है कि इस तरह की फ़ौरी नैतिकतावादी आग्रहों वाली बहसों के आधार पर किसी लेखक या कलाकार का मूल्यांकन नहीं किया जा सकता. राजनीतिक कोण से किसी लेखक को परखना उसे परखने का एक तरीका ज़रूर हो सकता है. लेकिन ये एकमात्र और संपूर्ण तरीका नहीं होना चाहिेए.

कुछ साल पहले मैंने निर्णय लिया था कि नोबेल पुरस्कारों का असर मैं अपनी करेंट रीडिंग लिस्ट पर नहीं पड़ने दूँगा. इस किताब से पहले तक मो यान का लिखा मैंने कुछ भी नहीं पढ़ा था. उन पर लिखे गए तमाम लेख ज़रूर पढ़ता रहा हूँ. मो यान पर अंतरराष्ट्रीय मीडिया में जितनी भी रिपोर्टें छपी हैं उनमें शायद ही कहीं उनकी साहित्यिक प्रतिभा पर सवाल उठाया गया हो.

अंतरराष्ट्रीय मीडिया क्या कहता है और चीन की अंदरूनी राजनीति में क्या हो रहा है इसे दरकिनार करते हुए मैंने इस किताब को एक भारतीय हिन्दी बुद्धिजीवी के तौर पर पढ़ा. भारत में अगर कोई चीनी लेखक प्रचलित है तो वो हैं लू शून. ख़ासकर वामपंथी रुझान रखने वाले साहित्य रसिकों उनसे ज़रूर परिचित होंगे. लू शून प्रेमचंद के समकालीन थे. दोनों साल भर आगे-पीछे ही पैदा हुए, एक साल ही मरे. हमें यही बताया-सुनाया-पढ़ाया गया कि वो चीन के प्रेमचंद ही थे.

लू शून के बाद हिन्दी लोकमानस में कोई दूसरा चीन लेखक मक़बूल हुआ हो तो मुझे उसकी जानकारी नहीं है. भारत और चीन कमोबेश एक जैसी समाज रहे हैं. दोनों पूरब सभ्यता के दो बड़े केेंद्र रहे हैं. बौद्ध धर्म एक ऐसी साझा कड़ी है जिससे दोनों देश दो हज़ार साल से अधिक समय से जुड़े हुए हैं. दोनों देश क़रीब क़रीब साथ ही  आज़ाद हुए. समाजवादी अर्थव्यवस्था से पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की तरफ़ भी दोनों लगभग आगे-पीछे ही बढ़े.

चीन ने भले ही दुनिया को काग़ज़ और बारूद दिया हो, जैसे भारत ने शून्य दिया है, आधुनिक तकनीकी  बराहे यूरोप-जापान ही उस तक भी पहुँची. शायद दोनों देशों की पिछली पीढ़ियाँ पश्चिम से आयी तकनीकी चीज़ों को देख देख कर चकित होती रही होंगी. मो यान के इस क़िस्से में एक ट्रक की शुरू से अंत तक कौतुक भरी मौजूदगी से बहुत से भारतीयों को अपने जीवन की पहली स्कूटर, पहली मोटर साइकिल,पहला मोबाइल, पहली हवाई यात्रा जैसी चीज़ों का याद आ सकती है.

क़िस्से का नायक बेहद ग़रीबी से उठकर नामचीन लेखक बनता है.नायक नामी लेखक बनने के बाद  हर उस जगह जाता है जहाँ उसके जीवन के कुछ अहम वाकये घटित हुए थे. वो दोनों दौर की तुलना करता चलता है. हम सब जो अपने मूल शहर से दूर किसी परदेश में बसे हुए हैं, आंतरिक विस्थापन के शिकार हैं उन्हें ये किताब अपने अनुभवों के बहुत क़रीब लगेगी.

जिन जगहों पर हमारा बचपन और किशोरावस्था गुज़री हो वहाँ जाने के बाद आम तौर पर दो ही  तरह के ख़्याल आते हैं, कितना कुछ बदल गया, या फिर, अरे कुछ भी नहीं बदला…याद रखें कि किताब का मूल नाम ही ‘चेंज’ है. शहरों के लैंडस्केप और स्काईलाइन में होना वाला बदलाव तो आसानी से दिख जाता है लेकिन उसके कल्चर में आने वाले चेंज का कम ही नोटिस लिया जाता है. ये काम सृजनात्मक लेखक ही करते हैं. जैसे मो यान ने किया है. पुष्पेश पंत ने किताब के कंटेट के लिहाज से ही बहुत ही सरस भाषा बरती है. इसे पढ़ते हुए आप केवल कहानी का नहीं बल्कि एक क़िस्से का मजा पाएँगे.