शशि थरूर के जवाहरलाल नेहरू: मोतीलाल नेहरू चाहते थे कि उनका बेटा आरसी मजूमदार जैसा बने…

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भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू (तस्वीर- इंडियन नेशनल कांग्रेस की वेबसाइट)

रंगनाथ सिंह

जवाहरलाल नेहरू (1889-1964), डिप्लोमेट शशि थरूर ने यह किताब तब लिखी जब भाजपा सरकार केंद्र में थी और ख़ुद थरूर अभी कांग्रेस के सांसद नहीं बने थे. किताब की शुरुआत में थरूर ने बहुत सी साफगोई से लिखा है कि यह किताब कोई मौलिक अकादमिक कार्य नहीं है, न ही इसमें किसी नए ऐतिहासिक दस्तावेज का प्रयोग किया गया है.

थरूर ने भूमिका में स्पष्ट किया है कि उनकी किताब भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर पहले से प्रकाशित किताबों और लेखों पर आधारित है. जाहिर है इन किताबों में ख़ुद जवाहरलाल नेहरू की लिखी किताब भी शामिल है. थरूर ने इन ज्ञात दस्तावेजों के सहारे नेहरू के निजी और राजनीतिक जीवन का मूल्यांकन किया है.

नेहरू परिवार के संक्षिप्त परिचय में उन्होंने बताया है कि नेहरू परिवार को मूल उपनाम कौल था. उनके पूर्वज 18वीं सदी में कश्मीर से दिल्ली आकर बसे. उस वक़्त शहर में कौल उपनामवाले कई नामी परिवार थे इसलिए नेहरू के पूर्वजों ने अपने नाम के आगे कौल-नेहरू लिखना शुरू किया क्योंकि उनका परिवार एक नहर के किनारे रहता था. एक अन्य संभावना यह है कि नेहरू उपनाम कश्मीर के बडगाम ज़िले के नारू गाँव से आया हालांकि इस बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं मिलती है.

मोतीलाल नेहरू को यकीन था उनका बेटा एक दिन महान आदमी बनेगा! लेकिन जवाहरलाल बचपन से लेकर कॉलेज में शिक्षा प्राप्त करने तक एक औसत छात्र ही बने रहे. कहीं भी और किसी भी क्षेत्र में उन्होंने उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं किया.

मोतीलाल अंग्रेजों और अंग्रेजी दोनों से बहुत ज़्यादा प्रभावित थे. 1885 में इंडियन कांग्रेस का जन्म हुआ और 1889 में नेहरू का. थरूर के मोतीलाल ने 1890 के दशक में एक बार अपने घर में यह नियम बना दिया कि घर में अंग्रेजी के अलावा कोई भाषा नहीं बोली जाएगी. लेकिन वो भूल गए कि घर के किसी भी महिला  सदस्य को अंग्रेजी शिक्षा नहीं प्राप्त थी! मोतीलाल चाहते थे कि उनका बेटा आरसी मजूमदार जैसा शख्स बने. मजूमदार 1899 में इंडियन कांग्रेस के अध्यक्ष रहे थे और वो उन शुरुआती भारतीयों में एक थे जिन्होंने इंडियन सिविल सर्विस(आईसीएस) की परीक्षा पास की थी.

पेशे से वकील मोतीलाल इलाहाबाद के धनी व्यक्तियों में गिने जाते थे. हर अंग्रेजी और आधुनिक चीज़ से उन्हें प्यार था. आज से करीब 100 साल पहले इलाहाबाद के उनके घर में स्विमिंग पूल, टेनिस कोर्ट, बिजली और नल के पानी जैसी सुविधाएँ उपलब्ध थीं. वो पहले इलाहाबादी थे जिसने कार ख़रीदी थी. जवाहरलाल को लालन-पालन बहुत ही रईसाना माहौल में हुआ. मोतीलाल चाहते थे कि उनका बेटा अंग्रेजों साहबों जैसा ही बने इसलिए उन्होंने उसे ब्रिटेन के प्रसिद्ध हैरो स्कूल और फिर ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पढ़ाया. जवाहरलाल का अकादमिक प्रदर्शन ऐसा नहीं था कि वो आईसीएस की परीक्षा पास कर सकें. 1905 से लेकर 1912 तक ब्रिटेन में रहने के बाद जवाहरलाल नेहरू भारत लौटे और वकालत के काम में अपने पिता का  हाथ बंटाने लगे. लेकिन इस काम में भी वो औसत साबित हुए.

भारत आने के बाद जवाहरलाल के अगले कुछ साल साधारण ही रहे. मोतीलाल इंडियन कांग्रेस के सक्रिय सदस्य थे. कांग्रेस की स्थापना ही  स्कॉटिश एओ ह्यूम ने इसलिए की थी ताकि भारत के अंदर अंग्रेजी शासन के खिलाफ उठ रहे प्रतिरोध के लिए एक सेफ्टी वॉल्व तैयार किया जा सके. ह्यूम की योजना के तहत ही  कांग्रेस में वही भारतीय शामिल हुए जिनके लिए भूरे अंग्रेज विशेषण का प्रयोग किया जाता है. कांग्रेस के शुरुआती सदस्य वही भारतीय थे जो अंग्रेजी शासन के दौरान भी लाभ के पदों पर थे. अपने पिता और गॉडमदर सरीखकी एनी बेसेंट के कांग्रेस से जुड़े होने के कारण जवाहरलाल का कांग्रेस की गतिविधियों में शामिल होना स्वाभाविक था.

जवाहरलाल 1912 में भारत आए थे और मोहनदास करमचंद गांधी 1915 में. मोहनदास भारत आने से पहले दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के ख़िलाफ़ अपने आंदोलन के कारण देश के शिक्षित वर्ग में जाने जाने लगे थे. 1915 में मोहनदास के राजनीतिक गुरु और कांग्रेस के अग्रणी नेता गोपालकृष्ण गोखले का मात्र 48 वर्ष की आयु में निधन हो गया. 1920 में कांग्रेस के एक अन्य बड़े नेता बाल गंगाधर तिलक का देहांत हो गया. इन दो बड़े नेताओं के निधन के बाद कांग्रेस का मुख्य नेतृत्व मोहनदास के हाथ में आ गया. थरूर के दिए ब्योरों से जाहिर होता है कि मोतीलाल नेहरू का मोहनदास गांधी से काफ़ी अच्छे संबंध थे. लेकिन ख़ुद जवाहरलाल का गांधी जी से लव-हेट रिलेशन था. नेहरू एक रूमानी भावुक और अतिउत्साही किस्म के नौजवान थे. उनके जीवन के ब्योरों से लगता है कि वो किसी भी काम में बस कूद पड़ते थे लेकिन निर्णायक मौकों पर अपने पिता मोतीलाल और पिता-तुल्य गांधी जी की बात मान लिया करते थे.

मोतीलाल अपने बेटे के भविष्य को लेकर अतिसचेत थे. जवाहरलाल के उज्जवल भविष्य के लिए वो जो भी कर सकते थे वो करते थे. जवाहरलाल अपने रूमानी भाषणों और युवासुलभ क्रांतिकारी भाषणों के कारण कुछ हद तक लोकप्रियता पाने में भी सफल रहे थे लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व की क़तार में काफ़ी जूनियर थे. लेकिन उनके पिता ने उनके लिए कुछ और ही सोच रखा था. मोतीलाल 1928 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने थे. उन्होंने गांधी जी को इस बात के लिए राजी कर लिया कि 1929 में कांग्रेस के अध्यक्ष जवाहरहाल होंगे. जाहिर है कांग्रेस में बहुमत इसके पक्ष में नहीं था लेकिन कांग्रेस को गांधी जी की इच्छा के आगे झुकना पड़ा और नेहरू कांग्रेस अध्यक्ष बन गए.

नेहरू जब भी अपने जीवन में कांग्रेस अध्यक्ष बने और उन्हें ये पद कांग्रेस में बहुमत के ख़िलाफ़ गांधी जी की हठधर्मी के कारण मिला. 1946 में 15 प्रदेश कांग्रेस कमेटियों में से 12 ने वल्लभभाई पटेल के नाम अध्यक्ष पद के लिए भेजा था. लेकिन गांधी जी नेहरू को अपना उत्तराधिकारी चुना और जिसके फलस्वरूप वो भारत के पहले प्रधानमंत्री बने. थरूर ने प्रधानमंत्री बनने तक के पहले के नेहरू का बहुत ही रोमांटिक खाका खींचा है. वो जवाहरलाल की सीमाओं का जिक्र तो करते हैं लेकिन उनका जोर इस बात पर ज़्यादा रहा है कि वो जवाहरलाल ने होते तो न जाने भारत का क्या हो जाता!! जबकि इस किताब में दिए गए विवरण ही जवाहरहाल की काबिलियत पर सवाल खड़ते नज़र आते हैं.

जवाहरलाल अपनी पीढ़ी के श्रेष्ठ अंग्रेजी लेखकों में एक थे. उनके लेखन और भाषणों में फैली रूमानियत ने बहुतों को उनकी ओर आकर्षित किया. 1929 में पूर्ण स्वराज का नारा देकर उन्होंने देश के हजारों नौजवानों को दिल जीत लिया था. अपने भाषणों से उन्होंने अपनी छवि कांग्रेस में मौजूद एक विद्रोही वामपंथी युवा नेता की बनाई थी लेकिन ज़मीनी स्तर पर वो गांधीवादी थे. व्यावहारिक राजनीति में जवाहरहाल उतने परिपक्व नहीं प्रतीत होते जितने किसी ऐसे नेता के होने की उम्मीद की जाती है जिसके हाथ में 25 करोड़ लोगों का भविष्य हो.

थरूर के अनुसार भारत को चार प्रमुख चीज़ें, धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र, गुट-निरपेक्ष विदेश नीति और समाजवादी आर्थिक नीति जवाहरलाल नेहरू की देन है. थरूर के अनुसार विदेश नीति और समाजवादी आर्थिक नीति के मामले में नेहरू पूरी तरह विफल रहे. उनकी दूरदृष्टि की सीमा के कारण भारत अपेक्षित विकास नहीं कर सका. थरूर लंबे समय तक संयुक्त राष्ट्र में रहे हैं इसलिए विदेश नीति पर उनकी राय ज़्यादा काबिले-गौर है. थरूर ने इशारा किया है कि विदेशी कूटनीति के मामले में पाकिस्तान और चीन ने भारत से बेहतर प्रदर्शन किया. जवाहरलाल नेहरू दुनिया के नेताओं में काफ़ी लोकप्रिय थे लेकिन भारत को उनकी लोकप्रियता का कितना कूटनीति लाभ मिला, यह विवाद का विषय है.

थरूर ने नेहरू की सीमाओं के रूप में इस बात का भी जिक्र किया है कि वो किस तरह ख़ुद बेहत ईमानदार और शुचितावादी होने के बावजूद अपने क़रीबी लोगों के अनुचित कामों के प्रति अनभिज्ञ बने रहते थे. उनके परिवार के सदस्यों समेत उनके करीबी मंत्री और सलाहकार तक बड़े विवादों में घिरे लेकिन नेहरू ने उन्हें कभी अपने से दूर नहीं किया. लाइसेंस-कोटा-परमिट राज में जिस तरह का भाई-भतीजावाद और मठाधीशी फैली उसके लिए भी कहीं न कहीं भारत के पहले प्रधानमंत्री को कुछ हद तक जिम्मेदार माना जा सकता है.

जवाहरलाल नेहरू को भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी की मजबूत नींव रखने वाला नेता माना जाता है. थरूर ने भी नेहरू के इस पक्ष पर  जोर दिया है. थरूर नेहरू को देश को तकनीकी और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में देश को उचित दिशा में ले जाने का श्रेय देते हैं. थरूर मानते है कि नेहरू ने विक्रम साराभाई और होमी भाभा जैसे काबिल वैज्ञानिकों को देश में विज्ञान का भविष्य तय होने के लिए चुना और दोनों ही उनकी उम्मीदों पर खरे उतरे. हालांकि थरूर को इस मामले में भी थोड़ी शिकायत है कि नेहरू के विज्ञानप्रेम और प्रोत्साहन के बावजूद देश की स्थिति ऐसी थी कि आज़ादी के बाद विज्ञान का नोबेल जीतने वाले दो वैज्ञानिकों हरगोविंद खुराना(1968) और एस चंद्रशेखर(1983) को अमरीका में जाकर बसना पड़ा, जहाँ उन्हें नोबेल मिला.

थरूर ने पूरी किताब में नेहरू को एक महान नेता के रूप में चित्रित किया है जिसने आधुनिक भारत की नींव रखी. किताब पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि थरूर भी मानते हैं कि “मानवता का इतिहास कुछ महान मनुष्यों का इतिहास है.”  और आज़ाद भारत का आविष्कार(इनवेंशन) जवाहरलाल नेहरू ने किया है. नेहरू की विदेश नीति और अर्थ नीति की थरूर ने सौम्य आलोचना की है, लेकिन वो भी शायद उसी सीमा तक जहाँ नेहरू का बचाव संभव ही नहीं.