‘आमीन: एक नन की आत्मकथा’ पढ़कर लगता है कि यौन शोषण और समलैंगिता ही चर्च की सबसे बड़ी समस्या है

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केरल के इस चर्च की तस्वीर का प्रयोग केवल संकेत के तौर पर किया गया है। (तस्वीर-विकीपीडिया)

रंगनाथ सिंह

कैथोलिक धर्मसंघो के लिए सिस्टर जेस्मी की आत्मकथा एक भूचाल बन कर आयी। यह विवादास्पद पुस्तक पहले मलयाली फिर अंग्रेजी और अब हिन्दी में आई है। इस आत्मकथा में जेस्मी ने कान्ग्रीगेशन आफ मदर आफ कार्मेल (सीएमसी) के भीतर घर कर चुकी अनियमितताओं के लेकर अपना व्यक्तिगत अनुभव प्रस्तुत किया है। आम मान्यता है कि धर्मसंघों का गठन सात्विक लोगों द्वारा धार्मिक कार्यों के लिए किया जाता है। इस पुस्तक को पढ़ने के बाद ऐसी मान्यताओं पर गंभीर प्रश्न खड़े होते हैं।

यह पुस्तक परंपरागत रूप में आत्मकथा नहीं प्रतीत होती। क्योंकि आत्मकथा लिखने के पीछे उनका प्राथमिक उद्देश्य एक व्यक्ति के रूप में अपने अनुभव लिखना नहीं रहा। सीएमसी में फैली अनियमितताओं ने ही उन्हें प्रेरित किया। जेस्मी ने अपने जीवन का सबसे कीमती और लम्बा समय सीएमसी के साथ गुजारा है। इसलिए उनकी और सीएमसी की कहानी में आपस में इतनी-घुली मिली है कि इस पुस्तक को दोनों की साझे जीवन की आत्मकथा मानना चाहिए।

आस्था का संस्था से संघर्ष पुराना है। जेस्मी का संघर्ष भी कुछ ऐसा ही है। उन्हें जीजस पूरी आस्था रही है। अब भी है। उनकी विश्वास टूटा है तो उस सीएमसी जैसी संस्था से जिसका उन्हें लम्बा व्यक्तिगत अनुभव रहा है। जेस्मी तैंतीस वर्षों तक इस संस्था से जुड़ी रहीं। इस लम्बे दौर में वह यह महसूस करती रहीं कि जो चल रहा है वह पूरी तरह सही नहीं है। गौरतलब है कि उनके संस्था छोड़ने और इस आत्मकथा लिखने के पीछे संस्था की ज्यादतियाँ ज्यादा जिम्मेदार हैं।

Sister Jesme Amen - The Autobiography of a Nun
सिस्टर जेस्मी की आत्मकथा का हिन्दी रूपांतरण।

सिस्टर जेस्मी ने किशोरावस्था में ही तय कर लिया कि उनका जीवन जीजस की राह पर जाने के लिए है। परिवार की अनिच्छा,रिश्तेदारों के विरोध के बावजूद वह नन ही बनीं। जेस्मी हमेशा ही जीजस को अपने करीब पाती रहीं। अपने तईं वह हर निजी फैसले से पहले जीजस के निर्देश पाती रहीं। इसके बावजूद उनके आस-पास की परिस्थितियाँ कभी नहीं बदलीं। पुस्तक पढ़कर यह स्पष्ट हो जाता है कि जेस्मी एक छलावे को हमेशा ही जीतीं रहीं हैं कि ईश्वर उन्हीं के पक्ष में है। ईश्वर उस लोगों के पक्ष में तो कत्तई नहीं होता जिससे जेस्मी का मतभेद हुआ हो।

जेस्मी की आत्मकथा से यही प्रतीत होता है कि धर्मसंघों की आधारभूत परिकल्पना ही विसंगतीयुक्त है। मनुष्य की स्वाभाविक यौनिकता का बलात निषेध, मनुष्य का असामाजिकरण किसी लिहाज से स्वस्थ नहीं प्रतीत होता। सीएमसी में वर्गीय भेदभाव, रंगभेद, यौन शोषण, समलैंगिकता और आर्थिक भ्रष्टाचार के जिन वास्तविकताओं को जेस्मी ने इस आत्मकथा के जरिए उजागर किया है उसे ध्यान में रखते हुए कहा जा सकता है कि धर्मसंघ उन सभी सामाजिक बुराईयों से अछूते नही रहते जो तात्कालीन समाज में मौजूद हों।

इस आत्मकथा पर यकीन करें तो धर्मसंघों में प्रचलित समलैंगिकता और पादरियों द्वारा ननों के यौन-शोषण संघों की सबसे बड़ी समस्या प्रतीत होगी। कैथोलिक संघों में यौन शोषण और समलैंगिकता हमेशा ही एक विवादास्पद मुद्दा रहा है। विभिन्न देशों में पादरियों पर बाल-शोषण के आरोप लगते रहे हैं। लेकिन कैथोलिक नन पर ऐसे आरोप कम ही लगे हैं। इसलिए जेस्मी की आत्मकथा की इस पहलू को लेकर ही कैथोलिक धर्मसंघों में सर्वाधिक प्रतिक्रिया हुई है। निजी सम्पत्ति के अधिकार समेत दूसरे कई अधिकारों को लेकर पादरियों और ननों के बीच भेदभाव यह स्पष्ट करते हैं कि विभिन्न धर्मसंघों का गठन भी पितृसत्तात्मक सामंती सामाजिक ढांचे के समदृश होता है।

जेस्मी की आत्मकथा में सीएमसी द्वारा संचालित कालेजों में व्याप्त आर्थिक भ्रष्टाचार पर काफी सामाग्री है। स्पष्ट है कि धार्मिक संस्थाओं द्वारा संचालित शिक्षा संस्थाएं भी भ्रष्टाचार के मामले में कमोबेश देश की दूसरी संस्थाओं जैसी ही हैं। संस्था के भीतर सत्ता संघर्ष या वर्चस्व के लिए जोड़तोड़ भी समान ही होती है।

इस पुस्तक में जेस्मी ने अपने बारे में जितना कुछ लिखा है उसे एक केस स्टडी के रूप में पढ़ा जा सकता है। एक प्रतिभाशाली आस्थावान किशोरी के नन बनने की प्रक्रिया के मनोवैज्ञानिक पड़ावों,दुश्वारियों का अध्ययन करने के लिए जेस्मी का केस उपयुक्त ठहरेगा। जेस्मी हमेशा ही एक मेधावी छात्रा रहीं। उन्होने अंग्रेजी साहित्य में शोध किया। प्रतिष्ठित कालेजों में अंग्रेजी साहित्य पढ़ाती रहीं। ऐसी पृष्ठभूमि के बावजूद वह लम्बे समय तक समलैंगिक शोषण की शिकार रहीं। एक भ्रष्ट पादरी द्वारा उनका यौन-शोषण हुआ। जिस संस्था में वह काम करती थीं और जिस संस्था पर वह अत्यधिक विश्वास करती थीं उसने उनका मानसिक शोषण किया। उन्हें पागल करार देने की हर साजिश की। कम उम्र में ही परिवार से अलग हो जाने के कारण जब उन्होंने सामान्य जीवन में वापसी का प्रयास किया तो उनके अपने भी उनको सहजता से स्वीकार नहीं कर पाए। जब जेस्मी ने अपना कटु जीवन अनुभव लिखकर दुनिया के सामने लाना चाहा तो उन्हें इसके लिए कठिनाईयां झेलनी पड़ीं।

जेस्मी की आत्मकथा एक संस्था के पतन और एक लड़की के आत्मसंघर्षों एवम अंतरद्वंद्वों की जटिल उतार-चढ़ाव की कथा के रूप में सामने आती है। संस्थागत धार्मिकता और शुचिता के इस्पाती पर्दों के पीछे छिपे कड़वे सच को सामने लानी वाली यह आत्मकथा बहुत से दूसरे ऐसे भुक्तभोगियों को लिखने के लिए प्रेरित करेगी। आस्था-अनास्था के द्वंद्व से परे नैतिक पार्दर्शिता वाले समाज की स्थापना के लिए ऐसा साहस दिखाना जरूरी भी है।