मैं एक अच्छा शायर नहीं, एक अच्छा गृहस्थ होना चाहता था: फिराक गोरखपुरी

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उर्दू का अजीम शायर और लेखक फिराक़ गोरखपुरी का असली नाम रघुपति सहाय था। (तस्वीर- द क्विंट से साभार)

फ़िराक़ गोरखपुरी (१८९६१८८२) को बीसवीं सदी की उर्दू शायरी के सबसे बड़े हस्ताक्षरों में एक माना जाता है. उनका असल नाम रघुपति सहाय था. पेशे से इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर थे. तबीयत से हाजिरजवाब शायर. फ़िराक़ को जितनी ख़्याति अपनी शायरी से मिली उतनी ही उनसे जुड़े क़िस्सों से. वो इलाहाबाद के बौद्धिक तबके समेत समस्त हिन्दीउर्दू जगत में एक लीजेंड बन चुके हैं. इस इंटरव्यू में आपको उनके मिज़ाज का थोड़ा अंदाज ज़रूर हो जाएगा.

उमाकांत मालवीय : आपके शायर की उम्र कम से कम साठ-बासठ साल की हो गयी, अब आप जहाँ जिस मुकाम पर हैं, वहाँ से मुड़ कर जब आप पीछे देखते हैं तो अपने कृतित्व पर आपको कृतार्थता का बोध या यह कहें कि सेन्स ऑफ़ फुलफिलमेंट महसूस होता है?

फिराक़ गोरखपुरी : नहीं भाई बिलकुल नहीं, कृतार्थता का आँचल तो मेरे हाथ से बहुत पहले ही फिसल गया था. मैं एक अच्छा शायर नहीं, एक अच्छा गृहस्थ होना चाहता था. जहाँ तक मुझे मालूम है, मेरी जानकारी जात्ती है, आदमी की सर्वोत्तम समुन्नत स्टेज अच्छा गृहस्थ होने की है. इससे ऊपर की किसी स्टेज की जानकारी मुझे तो नहीं है, तुम्हें या और किसी को हो तो मुझे बतलाये.

उमाकांत मालवीय: क्या आपने कभी अपने विचारों को पूरी-पूरी सही अभिव्यक्ति देने के लिए अपनी भाषा को नाकाफी महसूस किया है?

फिराक़ गोरखपुरी: मैं उस विचार को बड़ा नहीं मानता जिसके लिए भाषा में शब्द न हों जिसकी अभिव्यक्ति के लिए अल्फ़ाज़ की तलाश में कसरत करनी पड़े. क्रोचे कहता है शब्दों में ढलने के क्रम में ही विचारों के बड़े होने की यात्रा शुरू होती है. रचनाकार का सामर्थ्य उसकी क्षमता की बात है. टू सी ए वर्ल्ड इन ग्रेन ऑव सैंड / ए हेवन इन ए वाइल्ड फ्लावर…….मौला की देखना है तो बन्दे को देख लो / दरिया को देखना है तो कतरे को देख लो……मेरी तो बारहा यह कोशिश रही है कि उर्दू में लोग बाग मेरे साहित्य को समझें उसमें हिन्दुस्तान का कल्चर अपनी टोटैलिटी में बोले.

उमाकांत मालवीय: आप अपनी रचना प्रक्रिया या क्रिएटिव प्रोसेस के नितांत आत्मीय घनीभूत अथवा मोस्ट इंटिमेट मोमेंट्स की कोई एक झलक दे सकें.

फिराक़ गोरखपुरी : ये साहब, यह रचना प्रक्रिया यह क्रिएटिव प्रोसेस यह क्या कहते हैं आप घनीभूत आत्मीयता के क्षण यह मोस्ट इंटिमेट मोमेंट्स, जनाब यह सब चोंचले हैं चोंचले! मेरी रचना प्रक्रिया में ऐसा कुछ महत्वपूर्ण नहीं घटता जिसे मैं अहमियत दे सकूँ …मैं तो आदमी में और रचना में भी महानता और गहनता का कायल हूँ बस…इससे ज्यादा कुछ नहीं…इससे कम कुछ नहीं.

उमाकांत मालवीय: एक लम्बी जिंदगी जीने के क्रम में हमारे अनजाने ही हमारी आदतों में रूढ़ियाँ पूर्वाग्रह प्रिजुडिसेज अथवा कॉमप्लेक्स ग्रंथियां बनती रहती हैं एक जागरूक रचनाकार होने के नाते क्या आप बराबर इस सन्दर्भ में स्वयं को रिव्यू  करते रहते हैं.

फ़िराक़ गोरखपुरी : कैसा कॉमप्लेक्स कैसे प्रिजुडिसेज यह रूढ़ियाँ बूढ़ियाँ यह पूर्वाग्रह दुर्वाग्रह मैं यह सब नहीं मानता ..साहब दुनिया में, बिना अंग्रेजी जाने कोई भारतीय बड़ा नहीं बन सकता….अंग्रेजी न जानने की वजह से दयानंद में कुछ छोटायियाँ आ गयीं थी….भारतीयता के ये दुश्मन ..यह मैथिली शरण गुप्त… यह भारतेंदु …यह महावीर प्रसाद द्विवेदी.

उमाकांत मालवीय : आपकी दृष्टि में आज धर्म की प्रासंगिकता क्या है?

फ़िराक़ गोरखपुरी: कोई प्रासंगिकता नहीं है साहब ! आज विज्ञान का युग है…धर्म केमिस्ट्री फिजिक्स बॉट्नी में क्या कंट्रीब्यूट कर सकता है. महज हिंदुत्व के बल पर कुछ नहीं बनेगा हिन्दू शक्तिशाली होगा सुदृढ़ होगा अगर वह अंग्रेजियत और इस्लाम की सांस्कृतिक सम्पन्नता से समन्वित रूप से लाभ उठाये.

उमाकांत मालवीय: आप उन रचनाकारों में हैं जो अपने जीवन काल में ही किम्वदंती बन गए हैं…आपके विट्स और रिपोर्ताज तथा अन्य ढेर सारे सन्दर्भों में कुछ सच कुछ झूठ नमक मिर्च मिली किम्वदंतियाँ प्रचलित हैं उन पर आपकी क्या प्रतिक्रिया होती है?

फ़िराक़ गोरखपुरी : मैं खुद को कभी इतनी अहमियत नहीं देता कि उन पर रिएक्ट करूँ. अगर हैं किम्वदंतियाँ या मेरे बारे में ऐसा कुछ प्रचलित हो गया तो मैं कहाँ से कसूरवार ठहरता हूँ. इसका न मुझे श्रेय है न ही दोष …मुझे खूबसूरती अच्छी लगती है….मुझे लड़के ज्यादा अच्छे लगते हैं…मैं बदसूरत लड़के को नौकर के रूप में अपने घर में बर्दाश्त नहीं कर सकता.

उमाकांत मालवीय : उपलब्धियों और उम्र के जिस मुकाम पर आप खड़े हैं, वहां पहुँच कर आपको सूर तुलसी मीरा कबीर सहयात्री या फेलो ट्रेवेलार्स मालूम पड़ते होंगे.

फ़िराक़ गोरखपुरी : अमाँ, कैसी अहमकपने की बातें करते हो, करोड़ों मील आगे हैं ये सब…वहां तो कालिदास , टैगोर, ग़ालिब, इकबाल भी दूर-दूर तक नहीं नज़र आते ..फिर भला फिराक़ की क्या बिसात ! हाँ हिन्दुस्तान के कथा साहित्य में बंकिम को उनका ड्यू नहीं मिला ….

उमाकांत मालवीय  : समसामयिक सन्दर्भों को मद्देनज़र रखते हुए आपको अपने देश का भविष्य कैसा लगता है ?

फिराक़ गोरखपुरी : बड़ी शंका होती है, क्या भारत स्वयं को या दुनिया को कोई नया गिफ्ट दे सकेगा? गांधी जी बड़े थे, मगर वे भी भारत और दुनिया को वैसा कुछ नहीं दे पाए जैसा लेनिन ने रूस को और संसार को दिया है …मैं फिर कहता हूँ ..गांधीजी बेशक बड़े थे मगर जनाब फिर भी…हिन्दुस्तान किसी तरह जीता रहेगा…टाइम पास करेगा मगर दुनिया की तहजीब को संसार के तमद्दुन को कुछ वर्थ वाइल कंट्रीब्यूट कर सकेगा इसमें संदेह है…यह एक बड़ा प्रश्न है…पंडित गंगानाथ झा कहा करते थे इन तीन-चार सौ वर्षों में भारत ने स्वयं को और संसार को कुछ नहीं दिया.

तिलक महाराज का रथ जिन लोगों ने खींचा था उनमें से एक मैं भी था. वे एक महान विद्वान विचारक निडर तेज तर्रार पत्रकार त्यागी और देशभक्त और बलिदानी थे. रियली ही वाज ए सुपर मैन लेकिन शायद मैन होना उनके नसीब में नहीं था. वे इतने बड़े थे कि समाज के वीकेस्ट आदमी में त्याग बलिदान और संघर्ष की कितनी गुंजाइश है इसका अंदाजा ही नहीं था उन्हें. वो सबको एक बटखरे से तौलते थे.

गांधी जी बजात खुद बहुत बड़े आदमी थे ऐसा लगता था कि उनके प्रभाव से सड़े से सड़ा आदमी भी ऊपर उठ जाता था. मगर साहब उनके साथ ही छोटेपन का दौर शुरू हुआ. उफ़ हमारे छोटेपन की कितनी खुशामद की गयी. ग़रीबी को आयडियलाइज और आयडोलाइज किया गया. जब भी इसका ख़्याल आता है तो मैं ग़म में डूब जाता हूँ.

हम कहाँ आ गए हैं विश्व चेतना, इतिहास चेतना, विराट मानवीय सन्दर्भ से कटा हटा अपने कोटर में अपने घोंघे में क्षुद्र स्वार्थों में सड़ता हुआ ओछा हमारा अध्यापक वर्ग है, वह चाहे प्राइमरी स्कूल का हो या विश्वविद्यालय का. उनसे भी ज्यादा खस्ता हाल है वकीलों का. वकील और टीचर मुल्क की इंटलेक्चुअल कम्युनिटी के दो नुमाइंदे……छिः ….

कोई जाति किसी जाति को नहीं मार सकती…जातियां गुलामी में नहीं मरतीं. उन्हें उनके अंतर्विरोध मारते हैं. वह अपने भीतर लगे घुन से मरती हैं. अब देखिये न अब तो अँग्रेज नहीं रहे पर अब भी हमारी नस्ल क्यों मरी जा रही हैं.

प्रेमचंद महान रचनाकार थे. ग़रीबी और भारतीय परेशानियों के अपने ढंग के वे एकमात्र चितेरे थे. रूढ़ियों, जड़ संस्कारों और उदात्त संस्कारों में रचे बसे एक आम हिन्दुस्तानी की आत्मा की पकड़ उनके पास थी लेकिन वे भी जब देह को गैर हाजिर रख कर वासना रहित प्रेम की बात करते हैं तो अपनी ऊंचाई से फिसल जाते हैं और मीडिआकर लगने लगते हैं.

हमारे संस्कृत साहित्य में प्रेम के सन्दर्भ को लेकर खासी अच्छी फ्रैंकनेस से काम लिया गया है. उसमें किसी तरह का दुराव-छुपाव नहीं है, कोई काम्प्लेक्स नहीं है. प्रेम को बहुत ही स्वस्थ धरातल पर ग्रहण किया गया है. देह आकर्षण को माइनस कर दें तो प्रेम-व्रेम सब मीनिंगलेस हो जाता है. प्रेमचंद भले ही प्रेमचंद रहें हों मगर साहब प्रेम को छोड़ कर बाकि सब कुछ उन्होंने अच्छा रचा है . शरीर को निकाल कर जनाब मैं किसी प्रेम का कायल नहीं हूँ . ऐसे में प्रेम का ख्याल तक बड़ा वाहियात होता है. और साहब टैगोर तो लिखते क्या हैं हम गरीबों पर एहसान करते हैं. इसी कारण मुझे काबुलीवाला भी पसंद नहीं आई. अगर हम इस फिसलन के मारे न होते तो भी कुछ है वी कुड हैव बीन दी मेकर्स एंड शेकर्स ओफ सोसायटी बट वी फेल्ड.

(इंटरव्यू राजपाल प्रकाशन से साभार. तस्वीर गूगल से)