नोट्स ऑन चाय: चाय का कप और काजल पेन्सिल का सच

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नोट्स ऑन चाय के एक दृश्य में ज्योति डोगरा (फाइल फोटो आईएफएफए से साभार)

मोनिका कुमार

चाय के बहाने खुद को और कुछ और पढ़ बैठने की यह मेरे जीवन की तीसरी पांचवीं कहानी है, ज्योति डोगरा की सोलो नाटक प्रस्तुति ‘नोट्स ऑन चाय’ के बारे में लिखने ही बैठी हूँ तो कैथरिन मैन्सफील्ड की कहानी ‘चाय का एक कप’ याद आ गई. अब पहले उसकी बात करनी होगी, एक संभ्रांत महिला किसी गरीबड़ी को घर उठा लाई है क्यूंकि उसे लगा यह उसकी और इसी बहाने अपनी जिंदगी को बदल डालने का मौका है, लड़की ठंड और बारिश से सिकुड़ते हुए सिर्फ चाय के कप के पैसे मांग रही है, पर मैडम उसे इससे कहीं ज्यादा देना चाहती है, मैडम की खुशी लड़की की उम्मीद पूरी करने से बढ़कर इस बन-पड़ी सिचुएशन से अपने लिए कोई मकसद हासिल करने की है, अगर वह इस लड़की को घर लिजाकर कर इसे खुशहाल जीवन दे सके और अपनी सोसायटी की महिलायों के बीच, अपनी पति की नज़र में और शायद किसी ठोस उद्देश्य से मरहूम अपने जीवन में एक नई सोच पैदा कर सके.

लड़की घबराई हुई है, थोड़ी हैरान भी कि चाय के एक कप के पैसे देने के बदले यह मैडम उसे गाड़ी में बिठा कर कहाँ लिजा रही है पर वह भी थोड़ा चाय के लालच में और थोड़ा हम सभी को बर्बाद कर देने वाली उत्सुकता की वजह से गाड़ी में बैठ गई है, फिलहाल ना लड़की को पता है और ना मैडम को अनुमान है कि घर में पति है जो ठीक उसी की तरह होशियार है और उसके लिए भी सिचुएशन किसी और तरह बन-पड़ सकती है, वह पति जो ना ठीक से लड़की के घर में होने की वजह जानता है ना पत्नी के जीवन की नीरसता को, उसे वह लड़की सुन्दर, अतिसुन्दर लगती है और यह बात वह अपनी पत्नी रोज़मेरी को बता देता है.

अब कहानी बदल गई है, अब मैडम भी घबराई हुई है, विचलित है, एक पल को वह शायद उस लड़की से अधिक असहाय महसूस करती है और आनन-फानन में उस लड़की को कुछ पैसे देकर विदा कर देती है. फिलिप का यह कन्फैशन रोज़मेरी के नवजात महत्वाकांक्षी जीवन को नष्ट कर देने के लिए पर्याप्त था, इस बीच वह लड़की पहले से अधिक हैरान चाय की मौलिक ज़रूरत से तृप्त और तीन पाउंड का उपहार लेकर वापिस अपनी दुनिया में लौट रही है.

अलबत्ता ज्योति डोगरा की सोलो नाटक प्रस्तुति में जो लड़की है, उसका भाग्य और कर्म भिन्न है, वह चाय के कप के लिए किसी की करुणा पर आश्रित नहीं बल्कि चाय उसे खुद ही बनाना पसंद है, वह एलआईसी के दफ़्तर में काम करती है, शादी से पहले मथुरा से फैशन डिजाइनिंग का कोर्स किया था पर शादी के बाद बड़े शहर में पति की जान-पहचान की वजह से एलआईसी में नौकरी करने लगी क्यूंकि उसके पति को भी असंख्य भद्र पतियों की तरह लगता है कि औरतों के लिए फैशन की ‘लाईन’ ठीक नहीं, खैर ! हम कहीं ऐसा ना सोच बैठें कि इस लड़की का पति तंग-सोच सामंत है, इसलिए लड़की नाटक में ही नाटक में बता देती है कि उनके बीच कोई ‘प्राब्लम’ नहीं है, वह तो बस पता नहीं क्यूँ, ‘बस ऐसे ही’ हर सुबह बालकनी में कुर्सी लगाकर अकेले खाली गली को देखते हुए ‘अपनी तरह’ की चाय पीती है.

बहुत ख़ूबसूरती से ज्योति भारतीय मध्यमवर्गीय स्त्रियों के कहे-अनकहे, ज्ञात-अज्ञात संघर्ष की भंगिमाओं को पकड़ती हैं, इतना छिपाना है बातों में कि इसे सिर्फ भाषा की व्यंजना में नहीं छुपाया जा सकता, इसके लिए एक मुस्कुराहट तैयार करनी पड़ती है जिसमें होंठ सामान्य सहज मुस्कुराहट से कहीं अधिक फैलते हैं, आवाज़ तैयार करनी पड़ती है जिस में भोलापन चमकता है जो परिवारों में और शादी के रिश्ते में सुरक्षित लड़कियों की लज़्ज़त है.

इनकी शादी एकदम मस्त चल रही है बस इतना कि पति आईपीएल देखने में कई बार ऐसे खो जाते हैं कि खाना सामने रख दो तो इन्हें पता ही नहीं चलता. यह लड़की कोई ग़लत सूचना देकर दर्शकों और श्रोताओं को बेवकूफ नहीं बनाती, अपने सुबह उठने का वक़्त बताती है तो कई बार सोचती है, छह बजे, छह पांच, छह दस नहीं नहीं सवा छह बजे तक वह उठ जाती है, ऐसे मैक्सिमम वक़्त बता देने से बंदा ग़लत और झूठा साबित नहीं होता, साढ़े पांच बजे भी पहुँचने की उम्मीद हो तो दूसरे को पौने छह कह देने से ‘सेफ साइड’ हो जाता है और वक़्त का पाबंद नहीं होने की शिकायत नहीं सुननी पड़ती, हमें क्या क्या करना पड़ता है आरोपों शिकायतों और इल्ज़ामों से बचने के लिए, कैसे छूट लेनी पड़ती है पन्द्रह मिनट की – नाटक की इस पात्र ने बहुत सफाई से इस सीक्रेट  ‘एनटीसिपेटरी बेल’ के एक्ट को ठीक उसी क्षण में पकड़ा है जहाँ मनुष्य अपने अभिनय में मंझा हुआ नज़र आता है.

इस स्त्री को लगता है कि दिन चाहे जैसा गुज़रे, जिंदगी में कुछ हो, न हो पर सुबह चाय का कप ‘परफैक्ट’ होना चाहिए, ‘जिसको जैसी चाय चाहिए, बस वैसी चाय चाहिए’, एक ऐसा कालखंड जहाँ जोड़-तोड़ नहीं, समझौता नहीं, हर पल ज़रुरी पर जानलेवा ‘संयम’ नहीं बस सही-सही मनचाहा दूध-पानी-चीनी-चायपत्ती-अदरक-इलायची का अनुपात और अकेली मैं. पति कहते हैं तू अकेली चाय पीती है, मुझे भी उठा लिया कर पर वह नहीं उठाती, उसे सुबह-सुबह अकेले ही चाय पीना अच्छा लगता है, अगर आप इससे यह अंदाज़ा लगाएं कि उनकी शादी में कोई प्राब्लम है तो यह आपकी खुद को ज़्यादा होशियार और चालाक समझने की कोशिश भी हो सकती है.

उसके पास शब्दावली नहीं है कि चक्की-पीस दिनचर्या से कुछ समय आरक्षित करने को स्पेस कहते हैं, या कह लीजिए बालकनी में बिताए क्षण आत्मचिंतन के पर्याय है, वह लड़की  इसे बाक़ी भावनाओं और विचारों की तरह ही कुछ अधिक फैली हुई मुस्कुराहट और भोली आवाज़ में अभिव्यक्त करती है ‘बस ऐसे ही’, रूटीन में बंधी, रिश्तों में खट रही  ज़िंदगी में जो बची हुई ‘ऐश’ की कामना है, नौकरी, दाम्पत्य, समाज को समर्पित हो चुके जीवन में इक अपराध भावना की तरह संग-संग पलती अपनी शर्तों पर जीने की इच्छा का ‘रेलिक’ है जो इस तरह सुबह के ‘परफैक्ट’ चाय के कप में रूपांतरित होता है.

वह एलआईसी में छोटी सी नौकरी करती है, ( विशेष ओहदा होता तो वह ज़रूर बताती ) इसलिए उसकी भाषा में वह संक्षिप्तता नहीं, उसके शब्द अचूक नहीं, वह स्पेस को ‘बस ऐसे ही’ कहती है पर इसी ‘लोच’ के भीतर, इसी झोल में अपनी सी शक़्ल दिखाई पड़ी.

हम अपने चुक चुके जीवन की स्मृतियों को बहुत सेलिब्रेट करते हैं, जीवन में शायद असली जोखिम बहुत कम बचा है, अति आधुनिक औजारों के बीच हाथ, पैर, जिगर और कल्पना शिथिल हो रहे हैं सो उसकी बहाली के लिए कैफीन और निकोटीन की कामना करना कोई अनैतिक नहीं, जो दिन भर कमर-तोड़ मजूरी करते हैं, उन्हें भी चाय चाहिए, जो शीशाबंद और ताज़ा हवा से इम्यून दफ्तरों में काम करते हैं, उन्हें भी चाय चाहिए पर क्या यह दोनों एक ही बात है ? क्या चाय वह असली, स्थाई और  न्युट्रल माध्यम है जो मनुष्यता को नस्ल/जाति/लिंग के भेदों से परे इक कड़ी में संजोता है !

कल्चरल मटीरियलिजम के विद्वान हमारे कान पकड़कर चाय के बगानों में ले जायेंगे जहाँ कम तनख़्वाह और असुरक्षा के बीच श्रमिक चाय की पत्तियां तोड़ कर सर/गर्दन से बाँधी टोकरी में उछाल रहे हैं. चाय पत्ती के ब्रैंड से, कप या गिलास के मटीरियल से हम लोगों को जज करते हैं. जो रोज़ फाइन बोन-चाइना के कप में चाय पीता है, वह दोस्तों सहेलियों के साथ भद्दे मोटे गिलास में जब चाय पीते हुए ज़मीन से जुड़ता है तो बहुत खुश होता है, इस एहसास को ‘ट्वीट’ भी कर सकता है और रोज़ इन्हीं गिलासों में चाय पीने वाले को कभी फाईन बोन-चाइना में पीने को मिले तो आधा डरा और कुछ सहमा उसे जो थ्रिल होता है, शायद वह उसे ‘ट्वीट’ ना करे पर खुशी तो फिर भी खुशी है, जग-जाहिर हो ना हो. जरूरी तो नहीं कि हम ख़ुश होने के लिए कल्चरल क्रिटिक से अनुमति ले. यानी क्या हम रॉबर्ट ब्राउनिंग की बात पर भरोसा कर लें,

“ God is in His Heaven, and all is right with the world’

या फिर मैं एक बार फिर एक दोस्त की बात को दोहरा दूँ,

‘Life is not fair to all, that makes life fair’

या फिर ओरवेल की बात पर भरोसा करना ही सही होगा,

‘All men are equal but some are more equal than others’.

क्या यह बात सच है कि एक उम्र के बाद हमारे शरीर की कोशिकाएं क्षीण पड़ने लगती है, टूटना अधिक और बनना कम, क्या हम अपनी ऊर्जा में निरंतर कम होते जा रहे हैं, क्या एनर्जी संरक्षण के नियम का मतलब मनुष्य के लिए यह है कि उसकी शारीरिक ऊर्जा अधिक होगी तो मानसिक विकास पर ज़ोर होगा और उम्र बढ़ने का अर्थ अनिवार्य रूप से मन प्रबुद्ध होना और शरीर का क्षीण होते जाना है? क्या मृत्यु की ओर बढते हुए मात्र ‘अनुभव’ ही पूँजी होगी हर कमी और कमज़ोरी का मुआवजा बनने के लिए? और हर बार ऐसे यथार्थ का सामने करने के दर्द में चाय का एक कप कितना सहारा देता है !

क्या यही कारण है कि बच्चों को चाय की ज़रूरत नहीं होती बल्कि अच्छे बच्चे तो सुबह-शाम दूध पीते हैं और व्यस्क जीवन में औपचारिक प्रवेश में चाय का कप ज़रूरी रस्म है ? हम बच्चों का ऐसे चाय पीते रहना स्वीकार नहीं कर सकते, उनके स्वास्थ्य और वृद्धि पर इसका बुरा असर पड़ता है, उनके जीवन में विस्मय की कमी नहीं पर क्या विस्मय की कमी और जीवन में क्लांत हुए जाने को चाय पूरी कर सकती है? क्या चाय अपनी अचूक असरदार ताज़गी से हमारे जीवन का सहारा बन गई है ?

‘नोटिंग हिल’ फिल्म में ट्रैवेल बुक स्टोर चलाने वाला जिंदगी से बेज़ार आदमी और एक मशहूर अभिनेत्री में प्रेम हो जाता है, दोस्त और परिवार-जन विस्मयमिश्रित ख़ुश हैं, एक फैमिली डिनर पर इतनी मशहूर अभिनेत्री का चले आना यादगार है, वहीँ पता चलता है अभिनेत्री शाकाहारी है, नायक के जीजा का माथा ठनकता है पर वह चुप रहता है, किसी ग़लतफहमी से नायक नायिका अलग हो जाते हैं, सभी को दुःख होता है, लेकिन नायक के जीजा के पास ऐसा हो जाने की मजेदार व्याख्या है ‘नेवर ट्रस्ट ए वैजिटेरियन. सवाल पैदा होता है क्या हम ऐसे लोगों को  विश्वसनीय मान सकते हैं जो चाय नहीं पीते, क्या ऐसे लोग अध्यात्मिक तौर पर इतने विकसित हो चुके हैं जिन्हे निरंतर कम हो रहे जीवन और ऊर्जा का दुःख नहीं सताता ? क्या कोई मनुष्य आत्महत्या करने से इसलिए भी टल गया होगा क्यूंकि ऐसी इंटेंस घड़ी में उसने कुछ मीठा खा लिया या एक कप मीठी चाय ही पी ली ? कवि आलोक धन्वा की कविता याद आ रही है ,

किसने बचाया मेरी आत्मा को
दो कौड़ी की मोमबत्तियों की रोशनी ने
दोचार उबले हुए आलुओं ने बचाया
और छह दिसम्बर के बाद
फ़रवरी आतेआते
जंगली बेर ने
इन सबने बचाया मेरी आत्मा को

क्या इन सब खाने वाली चीज़ों के साथ चाय का नाम नहीं होना चाहिए ? आत्मा को बचाने वाले कारणों में क्या चाय का कप शुमार नहीं ? क्या हमने चाय के कप को भी विनम्रता  की तरह  टेकन फॉर ग्रांटेड् ले लिया है ?

इस नाटक में एक और लड़की है जिसके दुःख ने मुझे उद्वेलित किया, जन्मदिवस के रोज़ यह बेतहाशा रोती है, उसे भी यह लगता है कि जन्मदिवस पर अपने दोस्तों मित्रों को कुछ खिलाना चाहिए, चाय पिलानी चाहिए, उसकी शादी ठीक है, ‘शी इज़ हैपी’ पर वह दुखी है, उसके पति को उसका जन्मदिन याद नहीं और पता नहीं किन-किन कारणों से वह रोए चली जा रही है लेकिन उसका असली दुःख इससे कहीं बड़ा है, रोते रोते इस लड़की की आँखों का सारा काजल बह गया है, आँखों के नीचे बिखर गया है, वह खुद के और दूसरों के और झूठ सहने के काबिल नहीं रही है !

उसने हज़ार रुपए में यह स्मज-प्रूफ काजल खरीदा था और यह स्मज प्रूफ नहीं है, वह गुस्से में है, उदास है. ‘अगर कोई हमें स्मज-प्रूफ कहकर/लिख कर हज़ार रुपए में काजल पेन्सिल बेचता है तो क्या उसे स्मज-प्रूफ नहीं होना चाहिए?’ वह यह सब व्यथा शेक्सपियर की ‘असाइड’ विधा में कह रही है जिसे सिर्फ दर्शक जानते हैं और यह रोना सहकर्मियों को सुनाने और दिखाने के लिए नहीं है पर यह बेमुर्रवत काजल पेन्सिल ! कोई नज़र का कमज़ोर भी आँखों के नीचे उतर आई कालिख देख कर जान लेगा कि यह रोकर आई है और आप खुद सोचिए “आँखों में कचरा आ गाया, डस्ट पड़ गई” – क्या इन घिसे पिटे और लगभग झूठे बहानों में कोई असर या वजन बचा है आज के जमाने में ? तो क्या यह ज़रूरी नहीं कि कम से कम इतनी महंगी काजल पेन्सिल अपना दावा सिद्ध करे ?

इस छोटे से संवाद से ज्योति डोगरा ने हमारे वक्त की विसंगति की ज़ोरदार आलोचना की है, आदमी (औरतें भी) लगभग नॉन-एसेन्सलिस्ट है, उसका व्यवहार आम तौर पर उस आचार और व्यवहार की संहितायों से, समाज के कोड्स से इधर उधर जाता रहता है, मनोविज्ञान की महत्वपूर्ण प्रबुद्ध चेष्टा ने किसी तरह हमें इस राह पर चला ही दिया है जहाँ हम सोचने लगे हैं कि हम खुद नहीं जानते हम कब, क्यूँ और कैसे कुछ कर डालते हैं, कर गुजरते हैं, हालाकि ऐसा कह देने से मनुष्य की अपने और दूसरों के प्रति ज़िम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती, न्याय का प्रश्न आउट ऑफ डेट नहीं हो जाता, न्यायालय गैर-ज़रुरी नहीं हो जाता पर ऐसा होने लगा है कि हम मानते हैं कि हम सब कुछ नहीं जानते और ना ही जान सकते हैं, आधुनिक मनुष्य हर क्षण चुनौतियों के सम्मुख है, उसके लिए जीने को, भागने को इतनी दुनियाएं हैं कि आत्म की तरलता के साथ तो उसे सामंजस्य बिठाना ही है पर वह उम्मीद करता है कि कम से कम आत्म से इतर जो पदार्थ है, वह वफादार साबित हो, कम से कम काजल पेन्सिल सच साबित हो, फेयरनेस क्रीम से मेरा रंग गोरा हो, फोन का नेटवर्क मेरे लिए हजारों मित्रताएं लाए जिस में हर इक फ्रेंड जरूरी हो, चाय पीकर ‘जागो रे’ हो जाए और सौ रुपए किलो के आम मीठे निकले, अगर सबसे सस्ती चीज़ मनुष्य बचा है कैपिटलिस्ट सोसायटी में तो कम से कम महंगी चीज़ें तो अपनी उत्कृष्टता साबित करें.

कहीं ऐसा तो नहीं हम एक ऐसे दौर में घुस रहे हैं जहाँ हमें ठीक जिस तरह अपने व्यवहार की विसंगतियों को सहन करने की आदत डाल ली है, नेताओं के झूठों के प्रति उदासीनता अपना ली है उसी तरह हमें काजल पेन्सिल के झूठ और पाखंड को भी बिना किसी नाराज़गी के सहन करना होगा ? इस अपार सहनशीलता के परे कैसी दुनिया होगी ? जिन हाथों ने संयम से पत्थर रगड़ कर आग पैदा की होगी, क्या इतना संयम तब भी होगा जब महंगी माचिस की तीली रगड़ने  से भी आग ना निकलेगी? क्या हमारा सारा लोक यान, लोक सियानप और मुहावरे बदल रहे है ? ‘महंगा रोए एक बार सस्ता रोए बार-बार’ पर यहाँ तो महंगा भी रो रहा है, वह भी बार-बार और हर बार. कहीं ऐसा तो नहीं कि हमारी यह डिज़ायर, यह चाहत ही ग़लत  है कि हम खुद को सच्चाई और वफ़ा के प्रश्नों से बेमुख करने के बाद इन सब की उम्मीद काजल पेन्सिल से कर बैठे हैं ? जिस बौद्धिक सिमुलेशन से मैं खुद को और दूसरों को दूसरे मुझे माफ़ करते है क्या मुझे उसी बौद्धिकता की सीमा बढाते हुए काजल पेन्सिल, उसके मैनुफेक्चरर को भी माफ़ करना होगा ?

ज्योति डोगरा के नाटक में एक और पात्र है जिसने जीवन के स्ट्रेस को योग और मेडिटेशन से ‘मैनेज’ करने की कोशिश की है, वह दिल से मानती है ‘योगा इज़ गुड’, ‘इट गिवज़ यु पीस’, वह हर पल इसे दोहराती है, इतना दोहराती है, इतना दोहराती है, इतना दोहराती है, इतना दोहराती है कि चीखने लगती है कि ‘शी इज़ पीसफुल’. समस्या शायद यह नहीं कि योग और मेडिटेशन असरदार नहीं, शायद यह संकेत है कि मात्र पावर योगा  थिरेपिस्ट की फीस दे देने से असर की मांग करने में गड़बड़ी है, ‘प्रॉक्सी’ कारोबार के शायद यही हैज़र्ड हैं.

थिएटर की धारणाओं में महत्वपूर्ण विस्तार करने वाले बर्तोल्त ब्रेष्ट ने हमें ‘एलिएनेशन इफेक्ट’  का महत्वपूर्ण संकल्प दिया जिस में नाटककार/अभिनेता का संकल्प दर्शकों को आत्मविभोर कर देना, अभिभूत कर देना नहीं, उन्हें करुणा और भय में बहा ले जाना नहीं है, उसका संकल्प पात्रों में मात्र आत्म चिन्ह ढूँढना नहीं अपितु दर्शकों को यह याद रखना होगा कि वे नाटक देख रहे हैं और यह सब दृश्य स्वभाविक और सहज दिखते हुए भी नाटक खेलने के प्रयोजन से निर्मित किये गए है, ठीक उसी तरह जैसे स्टेट आइडियोलॉजी कंस्ट्रक्शन को नैचुरल दिखाने की कोशिश करती है जैसे हमें लगता है पैसा खर्च करने वाला मनमर्जी का मालिक है, आज़ाद है, बादशाह है.

ज्योति डोगरा भी नहीं चाहती कि बीच में अब्स्ट्रेक्ट आवाजें निकाल-निकाल कर दर्शकों को प्रभावित कर दें, वह बताती हैं कि यह नाटक कुछ खास एंटरटेन नहीं कर रहा, नाटक का मतलब है ‘फील गुड’ हो, टाइम पास हो, अलग-अलग पात्र हों, साफ़-सुथरी कहानी हो, बंदा ऑफिस से थका हारा इसलिए तो टैगोर थिएटर नहीं जाता ना कि उसे नाटक देखने के लिए इतना ध्यान रखना पड़े कि अब कौन सा पात्र है क्यूंकि एक ही कलाकार सभी पात्रों का रोल निभा रहा है और कलाकार चुपचाप अपना काम नहीं कर रहा बल्कि दर्शकों से बात किये जा रहा है साथ-साथ, लगभग उन्हें अपने नाटक के स्क्रिप्ट में घसीटते हुए. अब उसने तो कई सारी रिहर्सल की होगी और हम सब तो प्ले पहली बार देखने गए थे, काजल पेन्सिल के झूठ से त्रस्त लड़की दर्शकों में से ही आंसू पोंछने के लिए रुमाल मांगती है, अब रुमाल कईयों के पास था पर समझ नहीं आ रहा था कि देना चाहिए सचमुच कि बस डायलॉग है, जब वह बार-बार मांगती रही तो किसी ने हिम्मत करके उसे रुमाल दिया. ज्योति डोगरा का यह एस्ट्रेन्ज्मैन्ट तकनीक, दर्शकों में असहजता पैदा करने का ढंग सराहनीय है.

नाटक खत्म होने के बाद आयोजक के आग्रह पर ज्योति ने संक्षिप्त रूप से दर्शकों को बताया कि वह जिस शहर यह नाटक प्रस्तुत करती है, उसके हिसाब से स्क्रिप्ट में कुछ त्वरित बदलाव कर लेती है ‘फॉर द टच ऑफ द रिअल’ और चंडीगढ़ में चूंकि काफी पंजाबी भाषी लोग हैं तो पंजाबी होने के नाते उसे यहाँ परफोर्म करते हुए विशेष मज़ा आया उन इम्प्रोवाइज्ड संवादों के कारण. हालाकि उसके नाटक में एक पात्र जिस तरह सैक्टर 18 ( जहाँ टैगोर थिएटर स्थित है ) से सैक्टर 34 ( जहाँ प्रसिद्ध गुरुद्वारा है ) का जो रास्ता बताता है, उस में बड़ा झोल था, उस वाले रास्ते से यकीनन वह  खज्जल होता, शायद ज्योति ने ऐसे ही सुबह आयोजकों या स्थानीय किसी से पूछा होगा इस रास्ते के बारे में, अब जब ज्योति इतनी बारीकी से लोगों की भंगिमायों को पकड़ती है, इतनी सुंदरता से, इन्वॉल्वमेन्ट से उसने आसपास के जीवन को देखा होगा, ऐसी स्क्रिप्ट इवॉल्व की ( ऐसा मैं मानती हूँ जबकि ऑफ स्टेज में इसके बारे में और कुछ नहीं जानती) तो सोचा मैं भी इस छोटे से anachronism की तरफ ध्यान दिला दूँ. यह कोई और शहर होता तो ऐसी इम्प्रोवाइजेशन चल जाती पर चंडीगढ़ में ऐसे रास्ता नहीं बताया जा सकता, ‘यहाँ से दायें जायें, वहाँ से मुड़े और फिर सीधा और फिर बाएं…चंडीगढ़ में ऐसे रास्ता नहीं बताया जा सकता’.

यह नाटक देखने के लिए मैं ठीक उसी रास्ते से पहुंची थी, सैक्टर चौंतीस से गुजरते हुए सैक्टर अट्ठारह की ओर सो दर्शक भी कुछ जानकारी रखते हैं पर इस बात को यहाँ लाने का मतलब ज्योति की इम्प्रोवाइजेशन पर टिप्पणी करने से ज़्यादा सबब यह है कि मैं यह संवाद सुनते हुए इस बात के लिए अचानक और सजग हो गई कि चंडीगढ़ के रास्ते ग्रिड जैसे हैं, सीधे और परपैनडीकुलर टू ईच अदर या समानांतर चलती हुई सड़कें, गोलाईयां सिर्फ गोल चक्करों पर है,  उसके बाद तुरंत सीढ़ी और तीखी सड़क, बीच में छोटे शहरों और कस्बों जैसा कोई झोल नहीं, शुरू में अजीब लगता है, थोड़ा गुस्सा भी आता है, शोर्ट कट्स ही नहीं है पर अब ठीक है. कहीं कहीं स्लिप रोड है जो पगडंडी जैसी दिखती है, अगर वह मिल जाये तो ऐसे लगता है जैसे कुछ आसानी हो गई.

पर यह इम्प्रोवाइजेशन आखिर क्या है ? शायद यह कलाकार की बेचैनी है, उसका विद्रोह है जो तमाम अभ्यास के बाद भी मंच पर अपने आप के विरुद्ध करना चाहता है, उसकी जंग है अपने खिलाफ, अपनी होशियारी, अपने हुनर के विरुद्ध और धीरे धीरे ऐसा लगने लगा है जैसे कोई भी कलाकार हर उस ‘ग्रेन’ और ‘सूत्र’ से जूझता रहता है जो उसे तय-शुदा तरीके से परिभाषित करने लगता है लेकिन यह संघर्ष, यह कोशिशें कब मात्र ‘एंग्जाइटी’ लगने लगती है, शायद इसके लिए कलाकार को बहुत ध्यान देना चाहिए.