निर्मल वर्मा पुण्यतिथि : पीड़ा ही प्रेम का मूल है

निर्मल वर्मा हिंदी कहानी में आधुनिकता का बोध लाने वाले कहानीकारों में अग्रणी नाम हैं. हिंदी साहित्य में शब्दांकन का वास्तविक परख निर्मल की साहित्य रचनाओं में ही देखने को मिलता है. शब्द से जोड़कर वाक्य विन्यास बनाना और उनसे उन विचारों को व्यक्त करना, जो मन के अंतरद्वंद की आखिर वेदना को छूती हैं, यह कला केवल निर्मल वर्मा के पास थी.

वो निर्मल ही हैं, जो प्रेम और उससे उपजने वाले दर्द को शब्दों में बांध सकते हैं खासतौर पर स्त्री प्रेम. जब प्रेम प्रेरणा हो तो पूरा संसार ही प्रेममयी हो जाता है. लेकिन जब उसी प्रेम से मिलती है पीड़ा तो प्रेमी संसार में उसी पीड़ा का अक्स खोजने लगता है. प्रेम हमें एकांत की ओर ले जाता है और उस एकांत में प्रेमी को आनंद मिलता है, प्रेम का लोप उस एकांत घरौंदे को उजाड़ देता है. जिसे प्रेमी बड़ी सहजता से बनाता है. जहां प्रेम होगा, वहां ईर्ष्या होगी, भय होगा लेकिन साथ-साथ एक उथला सा आनंद भी होगा. पीड़ा ही प्रेम का मूल है, यह जानते हुए भी प्रेमी हर समय प्रेम और उस उथले आनंद को जीने या जीतने का प्रयास करता रहता है.

3 मई 1929 को शिमला में ब्रिटिश भारत सरकार के रक्षा विभाग में एक उच्च पदाधिकारी श्री नंद कुमार वर्मा के घर जन्म लेने वाले आठ भाई बहनों में से पांचवें निर्मल वर्मा की रचनात्मक बुनावट पर पहाड़ी छाया को दूर से भी पढ़कर पहचाना जा सकता है.

परिंदे, जलती झाड़ी, तीन एकांत, पिछली गरमियों में, कव्वे और काला पानी, बीच बहस में, सूखा तथा अन्य कहानियां आदि कहानी-संग्रह के साथ-साथ वे दिन, लाल टीन की छत, एक चिथड़ा सुख तथा अंतिम अरण्य जैसे उपन्यास लिखने वाले निर्मल ने दिल्ली के सेंट स्टिफेंस कॉलेज से इतिहास की शिक्षा ली.

वहीं पर कुछ दिन अध्यापन करने के बाद निर्मल साल 1951 में प्राग (चेकोस्लोवाकिया) चले गए और वहां के प्राच्य विद्या संस्थान में सात साल तक कई पुस्तकों का अनुवाद और अध्यापन किया. प्राग के बाद निर्मल ने लंदन का रूख किया और वहां रहते हुए उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए कई रिपोर्ताज लिखे. साल 1972 में वो भारत वापस आते हैं.

हिंदी साहित्य में निर्मल को पहली पहचान उनके परिंदे (1958) के कारण मिली. साल 1972 में निर्मल की रचना माया दर्पण पर जानेमाने निर्देशक कुमार साहनी ने माया दर्पण नाम से एक फिल्म बनई, जिसे साल 1973 में सर्वश्रेष्ठ हिन्दी
फिल्म का पुरस्कार मिला.

निर्मल वर्मा को मूर्तिदेवी पुरस्कार (1995), साहित्य अकादमी पुरस्कार (1985) उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान पुरस्कार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके अलावा निर्मल साल 1973 में इंडियन इंस्टीटयूट आफ एडवांस स्टडीज़ (शिमला) के फेलो रहे. साल 1981 से 83 तक निर्मल निराला सृजनपीठ भोपाल के और साल 1989 में शिमला के यशपाल सृजनपीठ के भी अध्यक्ष रहे. निर्मल का निधन 25 अक्टूबर 2005 को दिल्ली में हुआ. जिस साल निर्मल का देहांत हुआ, उस साल वो भारत की तरफ से नोबल साहित्य पुरस्कार के लिए नामित थे.

निर्मल वर्मा के भाई और प्रसिद्ध चित्रकार रामकुमार ने निर्मल के मरने के बाद उन्हें एक पत्र लिखा…

(25.12.2005)

प्रिय निर्मल,

इस बार इतनी लंबी यात्रा पर जाने से पहले तुम अपना पता भी नहीं दे गए.

यह सोच कर मुझे आश्चर्य होता है कि तुम्हारे पैदा होना का दिन भी मुझे बहुत अच्छी तरह से याद है, जब शिमला के हरबर्ट विला के एक कमरे में हम भाई-बहन बैठे थे और पीछे कमरे में से दाई ने आकार हमें सुचना दी कि लड़का हुआ है.तब मेरी उम्र पांच के करीब रही होगी.और 75 वर्ष बाद का वह अन्तिम दिन मेडिकल इन्स्टिटूट एम्बुलेंस में जाते हुए जब मेरे सामने स्ट्रेचर पर तुम आँखे बंद किये लेटे हुए थे, तब विश्वास नहीं हो रहा था कि तुम घर लौटकर वापस नहीं आओगे.एक अरसे बाद बिमारी के सब कष्टों और यातनाओं से मुक्ति पाकर तुम्हारे चेहरे पर ऐसी आलौकिक शान्ति और ठहराव कि छाया दिखाई दे रही थी मानो एक लंबी यात्रा का अन्तिम पड़ाव आ गया हो.

तुम्हे याद होगा कि जब कभी कुछ पीते हुए हम एक लंबे समय के लिए बैठते थे तो प्रायः बातचीत बहुत पुराने बीते हुए समय कि स्मृतियों में खो जाती थी.शिमला कि कोई पुरानी घटना ,या कोई व्यक्ति या परिवार का सदस्य हमारे बीच में उपस्थित हो जाता था.मैं तुमसे कहता था कि भज्जी हाउस,कैथू और शिमला को लेकर तुम्हे एक उपन्यास लिखना चाहिए.तुम मुस्कुराने लगते थे लेकिन कभी लिखने कि हामी नहीं भरी.और भी कितनी बातें अधूरी ही रह गयी.

पिछले एक वर्ष के दौरान तुमसे विभिन्न अस्पतालों में ही भेंट होती थी-विशेषकर मेडिकल इन्स्टिटूट के प्राइवेट वार्डों में.आज भी कभी कभी अचानक यह भ्रम होने लगता है कि तुम अस्पताल के किसी कमरे में लेटे हो और शाम को तुमसे भेंट होगी.

कोई नहीं जानता था कि ये तुम्हारी जिंदगी के अन्तिम 20 दिन थे.वार्ड नंबर दो में कमरा नंबर 12 में तुम्हे देखने के आदी हो गए थे.तुम ऑक्सीजन का मास्क लगाये चारपाई पर लेटे दिखाई देते थे.रोज डॉक्टर तुम्हारी परीक्षा करके कहते थे कि तुम बिलकुल ठीक हो गए हो और जब चाहो तब घर जा सकते हो.इस बार तुम्हारी घर लौटने कि इच्छा नहीं थी.तुम्हारे मन में कहीं डर था.लेकिन अस्पताल में अधिक दिन तक रहना संभव नहीं था.ये अन्तिम दिन देर तक याद रहेंगे.तुम जीवित रहते तो बाद में हम इन दिनों कि चर्चा अवश्य करते.

तुम्हे शायद याद नहीं कि कुछ महीने पूर्व जब वेंटिलेटर लगा हुआ था और तुम बोल नहीं सकते थे तो अचानक एक दिन कॉपी पर तुमने लिखा – “Am I dying?” हम चौंक गए और गर्दन हिला कर इंकार दिया और आश्वाशन दिया.तुम्हे ये विश्वास था कि अभी जाने का समय नहीं आया है और इस बार भी तुम स्वस्थ होकर ही लौटोगे.

उन दिनों अचानक तुम्हे बातें करने में बहुत आनंद आने लगा.शाम को भेंट होने पर तुम ऑक्सीजन का मास्क हटाकर बड़े उत्साह से बातें करने लगते.कुछ अस्वाभाविक भी जान पड़ता था.तब पता नहीं था कि कुछ दवाएं इतनी अधिक मात्रा में दी जा रही थीं जिनकी प्रतिक्रिया इस तरह प्रकट हो रही थी.तुम्हारे इस उत्साह को देखकर हमें भी बहुत खुशी होती थी और यह उम्मीद जगने लगी थी कि तुम स्वस्थ हो रहे हो.तब जान नहीं सके कि एक बहुत कमज़ोर धागे में तुम्हारी जिंदगी बंधी हुए है और यह कभी भी टूट सकता है.

आज तुम्हारे चले जाने के बाद कभी कभी अंधकार में वह धुंधली सी रौशनी में चमकती खाली जगह दिखाई देती है जहाँ हमेशा तुम दिखाई देते थे.अब वह खाली पड़ा है, कभी भरेगा भी नहीं.

यह अन्तिम पत्र लंबा होता जा रहा है

अच्छा –

रामकुमार