सआदत हसन मंटो की मौत उसी दिन शुरू हो गई जिस दिन उन्होंने पाकिस्तान की धरती पर कदम रखा

Saadat Hasan Manto, filmbibo

विद्यार्थी चटर्जी ने यह लेख मंटो के जन्मशताब्दी वर्ष में लिखा था. मंटो का जन्म १९१२ में विभाजन पूर्व भारत में हुआ था. आज़ादी के कुछ साल बाद वो पाकिस्तान चले गए थे. १९५५ में लाहौर में उनका निधन हो गया. अंग्रेजी में लिखे गए मूल लेख का अनुवाद अभिषेक श्रीवास्तव ने किया है. 

सआदत हसन मंटो यदि जी रहे होते तो इस साल (2012) वे सौ के हो जाते, यानी उस हिंदुस्तान से 35 साल ज्यादा बुजुर्ग जिसे वे शिद्दत से मोहब्बत करते थे और पाकिस्तान नाम की एक अनजान ज़मीन पर जिसे छोड़ कर नहीं जाना चाहते थे, जो दर्दनाक काम आखिरकार उन्हें करना ही पड़ा।

अप्रैल 1990 में लाहौर की बात है जब मंटो के कुछ साथियों के संग बातचीत के दौरान उनके करीबी दोस्त अहमद राही ने कहा था, ‘‘मेरे खयाल से मंटो की मौत उसी दिन शुरू हो गई जिस दिन उन्होंने पाकिस्तान की धरती पर कदम रखा।’’

कौन मंटो? ये सवाल शायद किसी भी ठीक-ठाक सलाहियत वाले इंसान ने पूछ लिया होता यदि दो दशक पहले आप उससे उनका ज़िक्र करते। अब ऐसा नहीं है। आजकल तो शराब और सिगरेट के धुएं में डूबी एक साहित्यिक शाम में उनका नाम ले लेना फैशन हो चला है।

यही सही, लेकिन पेंगुइन का हमें तहे दिल से शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उसने मंटो की कहानियों के एक से ज्यादा संकलन निकाल कर पाठकों को एक ऐसे लेखक से परिचित करवाने की एक कोशिश की है जिसने तैंतालीस बरस की उतार-चढ़ाव भरी छोटी सी जिंदगी में अपना नाम कृश्न चंदर, इस्मत चुगताई और राजिंदर सिंह बेदी के सिलसिले में बढ़ाते हुए आधुनिक उर्दू फिक्शन के स्तम्भों में जोड़ लिया।

सआदत हसन मंटो पंजाब के लुधियाना ज़िले में 11 मई 1912 को समराला में पैदा हुए थे। वे मूल रूप से कश्मीरी थे, इसका पता उस मज़ाकिया ख़त में चलता है जो उन्होंने जवाहरलाल नेहरू को एक बार लिखा था जिसमें उन्हें ‘‘हमवतन’’ और खुद को ‘‘पंडित’’ के नाम से संबोधित किया था। दो दशक से ज्यादा के अपने साहित्यिक सफ़र में मंटो ने दो सौ से ज्यादा छोटी कहानियां लिखीं। नाटकों और निबंधों में भी उन्होंने हाथ आज़माया, लेकिन उनकी समूची शख्सियत की पहचान उनकी छोटी कहानियों और दर्दनाक दौर में सहमे हुए एक पात्र के तौर पर ही होती है।

हमारे जैसे मुल्क में जहां खुद के बारे में अत्यधिक प्रशंसा करने की परंपरा नहीं रही है, पिछले कुछ वक्त से साहित्यिक लोगों ने मंटो की छोटी कहानियों को दुनिया के बेहतरीन साहित्य में गिना है जो उनके बारे में काफी कुछ कहता है। उनकी तीन कहानियां टोबा टेक सिंह, ठंडा गोश्त और खोल दो तकसीम पर लिखी सर्वश्रेष्ठ रचनाएं हैं जिसने भले ही दोनों ओर कुछ लोगों की किस्मत बुलंद करने में मदद की हो, लेकिन करोड़ों लोग रूहानियत के उस सर्द वीराने का शिकार हो गए जो टोबा टेक सिंह की धरती थी।

अब तक हिंदुस्तान और पाकिस्तान के कुछ तबकों में मंटो जाने जाते थे, लेकिन उनकी मशहूरियत अब धरती पर फैल रही है। मंटो की मौत तैंतालीसवीं सालगिरह से कुछ माह पहले 18 जनवरी 1955 को लाहौर में हुई! उनकी देह टूट चुकी थी, लेकिन उनकी आवाज़ तब भी नहीं डिगी थी और धरती के रहवासियों के प्रति उनका प्यार और उनकी समझ बेहद गहरी थी, जिसमें सबसे पहला वे खुद को मानते थे।

सलमान रुश्दी मंटो को ‘‘आधुनिक हिंदी लघुकथा का निर्विवाद बादशाह’’ मानते हैं। (हो सकता है कि रुश्दी मानिक बंदोपाध्याय या मलयाली कहानीकार वाइकाॅम मोहम्मद बशीर को न जानते हों)। लेकिन यह ध्यान देने वाली बात है कि मंटो और रुश्दी दोनों को ही अलग-अलग तरीकों से और अलग-अलग हालात में समाजी और मज़हबी खयालात के मामले में खुद के प्रति ईमानदार रहने की कीमत चुकानी पड़ी, दंड भुगतना पड़ा और सामाजिक बेदखली का शिकार होना पड़ा।

मंटो मुंबई की तलछट में रहने वाले पात्रों के बारे में बेहद क्रूर और हौलनाक सच्चाई लिखते थे जहां वे हिंदी फिल्मों के लिए कहानियां और डायलाॅग लिखा करते थे। उनके कई किरदार तकसीम के शिकार थे और खुद के उन ठेकेदारों के भी, जिनमें मंटो को शैतान नज़र आता था। मानिक बंदोपाध्याय की ही तरह मंटो के भीतर भी सेक्स, मज़हब और हिंसा के बीच के अजीबोगरीब और क्रूर रिश्तों को बेपर्द कर देने की एक तड़प थी।

इस सिलसिले में मंटो को मज़हबी आधार पर बने पाकिस्तान में राज्य और धार्मिक समूहों दोनों का ही कोपभाजन बनना पड़ा। उनके लिखे को कुफ्ऱ करार दिया गया। मुल्लाओं और मुस्लिम लीग में अपनी बंद किस्मत की चाबी खोजने वाले मंटो की दास्तानों के अपने मतलब निकालते थे, जिनसे मंटो का कोई लना-देना नहीं था। मंटो को जान-बूझ कर गलत समझा गया, समझाया गया और कलंकित किया गया। लेकिन किसी भी तरीके से खुद की नज़र में वे मंटो को गिरा न पाए, या फिर उनके पाठकों से मंटो को दूर कर पाए। गरीबी की मारी उनकी छोटी सी ज़िंदगी के अंत तक मंटो वही लिखते रहे जिसमें उनका भरोसा था। वे न डरे, न डिगे।

इस मोड़ पर एक हलका सा विषयांतर करना चाहूंगा। इस उपमहाद्वीप में रहने वाले हमारे जैसे वे सभी लोग जो मोपासां, बाल्ज़ाॅक, गोगोल, चेखव या एडगर एलेन पो के प्रशंसक हैं, उन्हें अपनी मिट्टी से जन्मे लघुकथा के इस जीनियस के लिए थोड़ा वक्त निकालना चाहिए, जिसे अब तक नज़रअंदाज़ किया गया है। ठीक ही कहा हैः दुनिया को समझना हो तो घर से बाहर देखो। यदि हम अपनी चैखट पर मौज़ूद ज़िंदगी, किरदारों, उनकी दिक्कतों और रंगों को नहीं समझ सकते, तो इतनी बड़ी दुनिया में दिख रहे इनके अक्स को कैसे देख पाएंगे?

मंटो को हमारे वक्त और ऊर्जा की दरकार है क्योंकि आधुनिक उर्द साहित्य में मौलिक काम करने वाले वे दुर्लभ लेखकों में हैं जिनका काम अब अंग्रेज़ी, हिंदी और बांग्ला समेत कई भाषाओं में आ चुका है। मंटो के बेहतरीन अनुवादक खालिद हसन कहते हैं, ‘‘मंटो को भारत और पाकिस्तान के बाहर कम ही लोग जानते हैं, लेकिन किसी भी पैमाने पर दुनिया के अहम लघुकथा लेखकों में उनका नाम नुमाया है।’’

हाशिये पर रहने वाले लोगों की दास्तानों का अपने व्यापक नज़रिये से आवाहन करने में अपनी काबिलियत  पर मंटो का जबरदस्त भरोसा था। ये बात अलग है कि समाज से उन्हें अपने इस काम के लिए बहुत स्वस्थ खुराक नहीं मिलती थी। मंटो को शायद इस बात का संतोष रहा कि वे अपने पीछे इतना सारा पुलिंदा छोड़े जा रहे थे जो वक्त और ज़माने के इम्तिहान में खरा उतरेगा। उनका ये इलहाम इस बात से पता चलता है कि अपनी असमय और दर्दनाक मौत के एक साल पहले उन्होंने खुद अपना ही मर्सिया लिख डाला था जिसे अलग-अलग लोगों ने अपने-अपने तरीके से समझने की कोशिश की हैः ये रहा सआदत हसन मंटो। उसके साथ दफ्न हो गई छोटी कहानियां लिखने की सारी कला, सारा जादू। टनों मिट्टी के तले दबा वह सोच रहा है कि कौन अच्छा दास्तानगो है, वो खुद या खुदा!’’ खानिद हसन ने हमें बताया कि उनकी कब्र पर यह मर्सिया नहीं लिखा गया क्योंकि उनके परिवार को डर था कि इससे मौलवी नाराज़ हो जाएंगे।’’

हम यह भी नहीं जानते कि मंटो ने जो इबादत लिखी थी, से किसी ने भी, खुद उनके समेत कभी भी कहीं पढ़ा हो। खुदाई को हलके-फुलके में लेने वाला कोई भी यह बात समझ सकता है कि यह इबादत मज़ाक में लिखी गई थी। मंटो को कई बार इस बात का अहसास हुआ था कि खुदा या उसके खुदमुख्तार ठेकेदारों का मज़ाक उड़ाना कितना खतरनाक हो सकता है। यह छोटी सी इबादत मज़ाकिया और याद रखने लायक हैः ‘‘या खुदा, इस कायनात के मालिक, रहमदिल और दरियादिलः हम जो बुराई में डूबे हुए लोग हैं, तुम्हारे सामने घुटने टेक कर अर्ज़ करते हैं कि इस दुनिया से सआदत हसन मंटो, वल्द गुलाम हसन मंटो को उठा लो, जो खुदा का नेक बंदा है। उसे उठा ले या खुदा, क्योंकि वो खुशबुओं से दूर गंदगी के पीछे भागता है। उसे सूरज की रोशनी से चिढ़ है, उसे अंधेरी गुफाएं रास आती हैं। शालीनता की वह इज्ज़त नहीं करता, बेशर्म और नंगी चीजें उसे खींचती हैं। मिठास उसे पसंद नहीं, कड़वे फल के लिए वो अपनी जान तक दे सकता है। घरेलू औरतों की ओर वो देखता तक नहीं, वेश्या का संगत उसे सातवें आसमान पर पहुंचा देता है। बहते पानी से दूर रहता है, धूल में लोटना उसे पसंद है। दूसरे रोते हैं तो वह हंसता है। लोग हंसते हैं तो वह रोता है। बुराई की कालिख पुते चेहरों को वो बड़े करीने से धोता है ताकि उनका असली चेहरा सामने आ सके।’’ इबादत का अंत ठीक वैसे ही होता है जैसा कि अकेले मंटो कर सकते थेः ‘‘वो तुम्हारे बारे में कभी नहीं सोचता, हर जगह शैतान के पीछे लगा रहता है, जिसने खुदा की बेकद्री कभी की थी।’’

ज़ाहिर है, तकसीम के वक्त दूसरी ओर जाने से पहले हिंदुस्तान और पाकिस्तान में उसे जितनी चोटें आईं, वे इस महान कलाकार के मज़ाकिया मिजाज को डिगा नहीं पाईं; एक ऐसी भाषा में खुद का मज़ाक उड़ाने की काबिलियत जिसमें घुस पाना अकसर आसान नहीं होता; और इंसानी मूल्यों सरमाएदारी की वो ताकत जो इज़हार के लिए अमूर्त चीज़ों को लिखने का औज़ार बनाती है। नई-नई बनी ‘पाक धरती’’ के न तो मौलवी, न ही सियासतदान उनसे अपने समय और उस दौर के इंसानों की दास्तानों को कलमबद्ध करने के भरोसे को छीन पाए।

लेकिन कुछेक पल ऐसे अते थे जब मंटो खुद को अकेला महसूस करते, मसलन जब कोर्ट में उनके खिलाफ मुकदमों का अंबार लगता जा रहा था। आज़ादी से पहले मंटो को अश्लील कहानियां लिखने के लिए तीन बार मुकदमा झेलना पड़ा था और पाकिस्तान की पैदाइश के बाद भी तीन बार। सभी छह मुकदमों में वे बरी हुए, लेकिन इस दौरान उन्हें इसी धरती पर हर तरह का नरक भोगने को मजबूर होना पड़ा। अगर उस दौर के कुछ उदार तरक्कीपसंद अदीब उनकी मदद को न आए होते, तो तय था कि उनका अकेलापन और गहरा होता।

हालांकि इस बारे में कुछ और कहा जाना चाहिए। मंटो जिस अलगाव का शिकार अकसरहा हो जाते थे, उसकी एक नहीं कई वजह थीं। एक तो दारूखोरी जो उनके शरीर को दीमक की तरह चाट गई, साथ ही जो कुछ उन्होंने लिखने से कमाया वो भी बोतल की भेंट चढ़ गया। दूसरे, उस वक्त के बंददिमाग समाज के ताकतवर अलमबरदारों की ओर से उनके लिखे की मुखालिफत; औश्र आखिर में किसी भी कलाकार या लेखक संगठन का सदस्य बनने से उनका इनकार।

मंटो की पत्नी साफिया की कही बात यहां ध्यान देने लायक है, जो ‘‘अच्छे और बुरे हर दौर में उनके साथ बनी रहीं।’’ उन्होंने 6 अप्रैल 1968 को मंटो के एक भारतीय जीवनीकार को लिखा, ‘‘(मंटो) के साथ किसी ने भी सही बरताव नहीं किया। सच्चाई यही है कि हिंदुस्तान छोड़ने का उनका मन नहीं था, लेकिन तकसीम के कुछ माह पहले फिल्मिस्तान ने उन्हें निकाले जाने का नोटिस दे दिया (जहां वे नौकरी करते थे) और मेरी मानिए, इससे उनका दिल टूट गया। लंबे समय तक उन्होंने इसे मुझसे छुपाए रखा क्योंकि उन्हें मि. मुखर्जी (कंपनी के मालिक) और अशोक कुमार (अभिनेता) से अपनी दोस्ती पर काफी नाज़ था। आखिर कैसे वे मुझे बता देते कि उन्हें नोटिस दे दिया गया है। इसके बाद ही उन्होंने खूब पीना शुरू किया जिसने अंत में उनकी जान ही ले ली। मैं पहले इधर आ गई थी, वे 1948 में अए। बंबई में अकेले रहते हुए उन्होंने पीने की सारी हदे तोड़ दीं। यहां उनकी जिंदगी दिक्कतों से भरी थी। आप खुद सोच सकते हैं कि जिस मुल्क में थे वह किसी भी लिहाज़ से उनके हिसाब से कैसा था। उनकी सेहत भी बिगड़ती चली गई। लेकिन एक काम वे करते रहे। वे रोज़ लिखते, गोया उन पर कोई उधार हो, रोज़ एक कहानी, जब तक कि वे खत्म नहीं हो गए। बस इतना ही जानती हूं मैं।’’

ये सही है कि शराबखोरी ने मंटो को शरीर और जेब दोनों के ग़म दिए, उनकी मौत को करीब ला दिया, लेकिन अजीब बात है कि इसी ने उनके किरदारों और दास्तानों में जान भी भरी, उस हद तक असल हालात रचने की सहूलियत दी जो अंत में नाकाबिले बरदाश्त हो जाए। उनके पास इन चीज़ों को अपनी कहानी में बुननें की वो सलाहियत थी जो बिरले ही मिलती है। उनकी कहानियों में पीना एक मुहावरे की तरह आता है, उस दमघोंटू सामाजिक व्यवस्था की बेड़ियों से आज़ादी के रूप में जो उस हर शख्स का जीना मुहाल कर देती है जो उसके बनाए पैमानों पर नहीं चलता। मंटो के दुश्मन लोगों को यह भरोसा दिलाने में कामयाब हो चुके थे कि वह बदज़ात और बदफ़ैल किस्म का आदमी है जो राष्ट्र का दुश्मन है, लगातार दारू पीता है और बदनाम कहानियां लिखता है। कोर्ट से बरी होने के बाद भी ये सवाल अपनी जगह बना रह गया कि लगातार उसे गाली देते रहने वालों को ऐसा करने से कैसे रोका जाए। मंटो को गाली देने वालों ने बड़ी आसानी से लोगों और किरदारों के प्रति मंटो की ईमानदारी, रहमदिली और उस विश्वास को हवा में उड़ा दिया कि इंसानियत की जीत तभी होगी जब अंधविश्वासों व गरीबों-मजलूमों पर हो रहे जुल्म के खिलाफ लोग लडे़ंगे और इन्हें हराएंगे।

एकबारगी यह खयाल आ सकता है कि मंटो जैसा बराबरी में विश्वास रखने वाला मजलूमों का हमदर्द वामपंथी लेखकों और बुद्धिजीवियों के किसी एक संगठन की आजीवन सदस्यता भी ले सकता था जिनकी चालीस के दशक में मुंबई में खूब चलती थी। उेसा कुछ भी नहीं हुआ, क्योंकि मंटो अपनी मर्जी का मालिक था, उसे और किसी की मिल्कियत मंजूर नहीं थी। तमगों, सियासी विचारधाराओं और मान्यताओं पर उसे भरोसा नहीं था, यही चीज़ उसे तथाकाित प्रगतिशील लेखकों-कलाकारों के करीब आने से रोकती थी। दूसरी ओर माॅस्को की तरफ झुके दिमागों वाले विद्वानों को अपना सदस्य बनाने वाला संगठन भी मंटो जैसे मुक्त चिंतकों से सुरक्षित दूरी बनाए रखता था। मंटो के दौर के कई लेखकों ने लिखा भी है कि कैसे उन्हें अपनी मर्जी का मालिक होना ही मंजूर था, भले वामपंथी लेखकों से उनके संपर्क थे, लेकिन घोषित तौर पर राजनीतिक जीवों से उन्होंने जान-बूझ कर खुद को दूर रखा था। हालांकि, मोटे तौर पर यह बात सही लगती है कि यदि तरक्कीपसंद जमात के साथ वे और करीबी रिश्ते में होते, तो उन्हें उस हद तक अलगाव नहीं झेलना पड़ता जिसमें उन्हें धीरे-धीरे धकेल दिया गया। हालांकि अंत आते-आते अपनी जबरदस्त इच्छाशक्ति और जादुई जीनियस के बल पर वे उस लगाव को भी पार करने में कामयाब हो गए।

मंटो के इस पहलू पर दिल्ली की लेखिका तरन्नुम रियाज़ ने लिखा है, ‘‘मंटो के लिखे में कुछ ऐसे सुराग हैं जो उन्हें अलग पहचान और अलग रंग से नवाज़ते हैं। कभी-कभार उनका लिखा विरोधाभासों का ढेर जान पड़ता है। हालांकि ध्यान से पढ़ने पर लगता है कि हर जगह एक ही फलसफा चला आ रहा है। मंटो पर समाजवाद का काफी असर दिखता है, लेकिन हिंदुस्तान की राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं का नुस्खा वे उसे नहीं मानते। वे किसी खास विचारधारा को भी नहीं मानते। हालांकि उनकी राजनीतिक और सामाजिक चेतना काफी धारदार है जो उन्हें ‘‘उदार’’ बनाती है… भारत में उर्दू साहित्य के इतिहास पर यह एक अफसोसनाक टिप्पणी जैसा है कि मंटो को वह जगह नहीं मिली जो उनका हक था, सिर्फ इसलिए कि कुछ बड़े प्रगतिशील लेखकों ने उन्हें प्रतिक्रियावादी करार देकर खारिज कर दिया।’’

मंटो की जिंदगी और विरासत की इकलौती सबसे अहम बात किसी की प्रभुसत्ता के विचार के प्रति उनका विरोध था, चाहे वह जहां से भी पैदा होता हो- राज्यसत्ता, सामाजिक-मज़हबी सत्ता, राजनीतिक विचारधारा, पार्टियां या फिर बौद्धिक तबके की सत्ता। वे हर चीज़ पर खुले दिमाग से सोचते; खुले दिल से बात करते जिसमें पीठ पीछे छुरा घोंपना और टुच्चई दुश्मन सरीखी बात थी; और खुली ज़बान भी, जो फैसला तो नहीं सुनाती, लेकिन कानों में गुंज रही आवाज़ों को लोगों तक पहुंचाती ज़रूर थी। प्रतिक्रियावादी कहे जाने पर मंटो का जवाब भी मंटोवादी ही था, न कोई खेद, न रहमः ‘‘मुझे तथाकथित कम्युनिस्ट जबरदस्त नापसंद हैं। मैं उन लोगों की सराहना नहीं कर सकता जो आरामकुर्सी में धंस कर ‘‘हंसिए-हथौड़े’’ की बात करते हैं। काॅमरेड सज्जाद ज़हीर जो चांदी के कप में दूध पीते थे, मेरी नज़र में इसीलिए हमेशा विदूषक रहे। कामकाजी मज़दूरों के पसीने में उनका सच्चा मन महकता है। हो सकता है कि इस पसीने का इस्तेमाल कर के पैसा बनाने वाले और इसे स्याही बनाकर लंबे मैनिफेस्टो लिखने वाले गंभीर लोग हों। मुझे माफ करेंगे, लेकिन मैं उन्हें ठग मानता हूं।’’

मंटो के लिए ये ‘‘नीम-हकीम किसी काम के नहीं थे, जो क्रेमलिन के नुस्खे का इस्तेमाल कर के साहित्य और राजनीति का अचार बना रहे थे’’, लेकिन उनके भीतर गहरे बैठा मानवतावादी समाज में फैलते अमेरिकी असर और नवजात पाकिस्तान की सियासत को लेकर बेचैन था। जबरदस्त व्यंग्य और समझदारी के साथ चचा सैम को लिखे अपने नौ में से एक ख़त में मंटो कहते हैं, ‘‘हमारी बसें अमेरिकी औज़ारों से बनी होंगी। हमारे इस्लामिक पाजामा अमेरिकी मशीनों से सिले होंगे। हमारा मिट्टी का ढेला अमेरिकी मिट्टी से बना होगा जिसे ‘‘हाथ से किसी ने नहीं छुआ होगा’’। कुरान को रखने वाले फोल्डिंग स्टैंड अमेरिकी होंगे और नमाज़ पढ़ने की चटाइयां भी अमेरिकी होंगी। देखते जाओ अंकल, सब तुम्हारी शान में कसीदे पढ़ेंगे।’’

प्रगतिशीलों ने जिसे राजनीतिक स्तर पर नासमझ माना था, उस मंटो को माॅस्को और वाॅशिंगटन के खेल बहुत पहले ही दिख गए थे। शीत युद्ध का दौर था और तुरंत आज़ाद हुए दो देश इस राजनीतिक खेल में काफी उपजाऊ साबित हो सकते थे। हो सकता है मंटो जिंदगी के किसी भी पड़ाव पर कभी भी राजनीति में न गए हों, लेकिन उन्हें जानने का दावा करने वाले उनके आलोचकों कीयह बात बिल्कुल अटपटी है कि ज़मीनी हकीकत से वे अनजान थे। एक अर्थ में वे कहीं ज्यादा जानते थे। इसीलिए अपनी रचनात्मकता को उन्होंने बचाए रखा और दूसरों की तरह कुछ समय बाद बेकार हो जाने से वे बचे रहे- जो हश्र उनके दौर के कई लोगों का हुआ भी।

मंटो को चाहने वाले दलील देते हैं कि वे जिस तरह के शख्स थे और बने रहे, उसके पीछे फिल्म इंडस्ट्री के साथ उनका जुड़ाव बड़ी वजह था। मुफलिसी, अंदाज़े बयां की तलाश, रचनात्मकता के इज़हार की बेचैनी, खयालों की अजीबोगरीब उड़ान, नसों को हिला देने वाली असुरक्षा- ये सब चीज़ें जो फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ी हुई हैं, उन्होंने धीरे-धीरे मिल कर मंटो नाम की प्रतिभा को गढ़ा और उनकी सामाजिक चेतना को आकार दिया। इसीलिए मंटो की मौत के कई साल बाद जब मृणाल सेन ने उनकी एक कहानी पर फिल्म बनाना तय किया, तो वे दरअसल ऐसा कर के कलंकित किए गए एक ऐसे जीनियस को श्रद्धांजलि देना चाह रहे थे जो शब्दों की दुनिया में भी उतना ही रमा था जितना चलते फिरते छवियों की दुनिया में। बहरहाल, अंतरीन नाम की यह फिल्म भारी फ्लाप रही, उसकी कहानी हालांकि बिल्कुल अलग है।

अगर मंटो को अपनी राह चुनने दी जाती, तो वे मुंबई छोड़ कर नहीं जाते। अगर वे कुछ और लंबा जी जाते, तो कुछ साल बाद आई फिल्म सीआईडी के उस मशहूर गाने और उसमें ज़ाहिर अहसास का तहे दिल से शुक्रिया करते जिसमें जाॅनी वाकर का किरदार गुनगुना रहा हैः ऐ दिल है मुश्किल जीना यहाँ / जरा हटके जरा बचके ये है बाॅम्बे मेरी जां…