इरफान खान के अभिनय को बुनना इतना आसान नहीं

अभिनेता इरफान खान आज मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में इस दुनिया को अलविदा कह गए. वह बीते 2018 से न्यूरोएंडोक्राइन ट्यूमर नामक बेहद दुर्लभ बीमारी के शिकार थे. बीते 25 अप्रैल को इरफान खान की मां का जयपुर में इंतकाल हो गया था. अभी मां का 40वां भी नहीं हो पाया था कि इरफान खुद उनसे मिलने दूसरी दुनिया में जा पहुंचे.

मां ने इरफान को देखकर यह जरूर कहा होगा इतनी भी जल्दी क्या थी, इरफान भी चुप नहीं रहे होंगे जरूर बोले होंगे मां तेरे बगैर क्या खाक रखा था उस दुनिया में, मैं चला आया तेरे पास.

खैर इरफान को अल्फाज में बयां करना एक बड़ा ही मुश्किल काम है. उनके अभिनय में जो सिहरन थी, जो बिल्कुल हमारे-आपके भीतर भी जाने-अनजाने कई बार पनपती है. हम शायद उस सिहरन हो समझ नहीं पाते. इरफान उसी सिहरन को पर्दे पर उतार दिया करते थे.

इरफान को बुन पाना किसी के बस की बात नहीं, अभिनय की दुनिया में जिस तरह से टीवी सीरियल्स से होते हुए फिल्मी पर्दे पहुंचे. उसे बयां कर पाना खासकर आज के दिन तो बड़ा ही मुश्किल भरा काम है. मुझे इरफान की पहली झलक टीवी सीरियल ‘चंद्रकांता’ में याद आती है. जिसमें उन्होंने अय्यार का किरदार अदा किया था. उसके अलावा बात करें तो ‘चाणक्य’, ‘भारत एक खोज’, ‘सारा जहां हमारा’ और ‘श्रीकांत’ जैसे कई सीरियल्स को उस जमाने में लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचाने में इरफान का अपना एक अहम योगदान था, जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकेगा.

अभिनय की भट्टी में तपने के बाद इरफान खान को साल 1987 में फिल्म ‘सलाम बांबे’ में पहली बार एक्टिंग का मौका मिला. फिल्म की डायरेक्टर मीरा नायर जानती थीं कि बड़ी-बड़ी आंखों से झांकने वाला इरफान में अभिनय का वो जज्बा है, जो उन्हें एक नए लड़के में चाहिए था. आपको जानकर हैरत होगी कि इरफान फिल्म ‘सलाम बांबे’ में तब काम कर रहे थे जब वो दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) में अभी पढ़ ही रहे थे. यह फिल्म साल 1988 में सिनेमा घरों में रिलीज हुई और अकादमी पुरस्कार के लिए भारत की ओर से नॉमिनेटेड भी हुई थी.

इस एक फिल्म ने मुबंई सिनेमा जगत को ऐसा अभिनेता दे दिया, जो सभी तरह के रोल एक ही शिद्दत के साथ कर सकता था. लेकिन इरफान खान के असल कल्ट सिनेमा और अभिनय की बात करें तो वह उन्हें दी उन्हीं के एनएसडी के जूनियर रहे तिग्मांशु धूलिया ने. फिल्म का नाम था ‘हासिल’.

तिग्मांशु की यह फिल्म साल 2003 में रिलीज हुई. यह फिल्म इलाहाबाद के छात्र राजनीति पर आधारित थी. इस फिल्म में इरफान के साथ जिमी शेरगिल, ऋषिता भट्ट और आशुतोष राणा भी थे. ‘हासिल’ फिल्म भी अपने आप में अजीब है, दरअसल जब यह रिलीज हुई तो सिनेमाघरों में बुरी तरह से फ्लॉप साबित हुई, लेकिन धीरे-धीरे जब लोगों को इस फिल्म और खासकर इरफान के अभिनय के बारे में पता चला तो लोगों ने सीडी पर कई बार इसे देखा. देखने वाले इरफान की एक्टिंग देखकर हैरान थे कि भला सच में ये सिनेमा में हो रहा है. इस फिल्म के लिए इरफान को बेस्ट निगेटिव रोल का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला था. ‘हासिल’ की सफलता के बाद इरफान कभी वापस नहीं लौटे.

इसके बाद तो इरफान ने हिंदी सिनेमा को ‘मकबूल’, ‘लाइफ इन ए मेट्रो’, ‘द लंचबॉक्स’, ‘आन’, ‘चमकू’, ‘डी- डे’, ‘सात खून माफ’, ‘रोग’, ‘सलाम बॉम्बे’, ‘रोग कसूर’, ‘धुंध’, ‘स्लमडॉग मिलियनर’, ‘क़रीब क़रीब सिंगल’, ‘हैदर’, ‘हिंदी मीडियम’, ‘अंग्रेजी मीडियम’ और पान सिंह तोमर जैसी सार्थक फिल्में दीं. इरफान केवल मुंबई फिल्म तक ही सीमित नहीं रहे, उन्होंने हॉलीवुड में भी लाइफ ऑफ पाई, ज्योरासिक वर्ल्ड और अमेजिंग स्पाइडर मैन जैसी फिल्मों में भी अपने दमदार अभिनय का लोहा मनवाया.

तिग्मांशु धूलिया की फिल्म पान सिंह तोमर में उनकी भूमिका ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार दिलाया. इसके अलावा साल 2011 में भारत सरकार ने सिनेमा में इरफान के योगदान के लिए पद्म श्री से भी सम्मानित किया था.

आज इरफान खान हमेशा के लिए खामोश हो गए, लेकिन उनका एक डायलॉग पूरे जीवन दिमाग में कौंधता रहेगा. पान सिंह तोमर में इरफान खान कहते हैं, ‘बिहड़ में तो बागी होत हैं साहब, डाकू तो पार्लियामेंट में पाए जात हैं’.