कर्क डग्लस (1916-2020): विद्रोही महानायक

सौ वर्ष से अधिक की आयु, 60 वर्ष से अधिक लंबा फिल्म करियर, 90 फिल्में, तीन ऑस्कर नामांकन, लाइफटाइम ऑस्कर विजेता, 4 उपन्यास, दो आत्मकथाएं, कई अन्य पुस्तकें, अमेरिका के चार राष्ट्रपतियों के ‘गुडविल एम्बेसेडर’ के तौर पर दर्जनों देशों की यात्राएं और सबसे जरूरी, मैकार्थीवाद के समय की हाॅलीवुड ब्लैकलिस्टिंग तोड़कर पटकथा लेखक डाल्टन ट्रम्बो को मुख्यधारा में शामिल करवाना और उनसे अपनी प्रसिद्ध फिल्म ‘स्पार्टकस’ की पटकथा लिखवाना। कर्क डग्लस के जीवन को इन कुछ उपलब्धियों के आधार पर समझा जा सकता है। हाॅलीवुड के ‘स्वर्ण काल’ (1935-55) के अंतिम पुरोधाओं में से एक थे डग्लस। अपने अंतिम दिनों तक वह अपना ब्लाॅग भी अपडेट करते रहे थे। डग्लस में जीवन के प्रति जिजीविषा उनके स्पार्टकस के किरदार सरीखी ही थी। हालांकि उनकी अपनी पसंद – खुद उनके शब्दों में – ‘कमज़र्फ’ किस्म के किरदार होते थे। उनके अनुसार यदि किरदार सीधा-सादा है तो उसमें करने को ज्यादा कुछ नहीं होता। संभवतः यही कारण था कि पर्दे नायक होते हुए भी वह करियर की शुरुआत से ही ‘नेगेटिव’ छवि वाले ईमानदार नायकों की ओर अधिक उन्मुख रहते थे।

1949 में आई फिल्म ‘चैम्पियन’ से वह स्टार बने और उसके बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा। वैसे डग्लस ने अपने जीवन के कई मार्मिक प्रसंग अपनी आत्मकथा ‘द रैगमैन्स सन’ में दर्ज किए हैं। डग्लस के पिता कूड़ा बीनने का काम करते थे। अपने जीवन के आरंभिक वर्षों में डग्लस को गरीबी, भूख और यहूदी होने का दंश झेलना पड़ा था। एक बार डग्लस ने कहा था कि उनकी मां दरवाजे पर किसी भी मांगने वाले खाने को कुछ-न-कुछ दिया करती थीं, जबकि खुद उनके घर में खाने को बहुत कम होता था। उनके पूछने पर उनकी मां ने कहा कि किसी मांगने वाले भी उस व्यक्ति को देना चाहिए जिसके पास उससे भी कम हो। शायद यही कारण थे कि डग्लस ने अपने जीवन में 100 मिलियन डाॅलर्स दान में दिए जिनका इस्तेमाल, बेघरों को बसाने, उन्हें खाना खिलाने, छात्रों की शिक्षा जैसे कार्यों में किया गया।

अपनी बिंदास सिनेमाई छवि और जीवन को खुलकर जीने के डग्लस के अंदाज ने कई विवादों को भी जन्म दिया और वह उनका भी खूब मजा लेते रहे। यों भी, अपने दुख भुलाने के लिए दूसरों के साथ-साथ, खुद पर हंसना भी बेहद जरूरी होता है, सम दशा को प्राप्त करने का यह भी एक तरीका है। जीवन में इसके दृष्टांत हमें जब-तब अपने आसपास फैले मिलते हैं, ये बात अलग है कि दूसरों के उस मर्म को हम पहचान न पाएं।

बहरहाल, डग्लस के इसी खिलंदड़े अंदाज की बदौलत 1960 में ‘स्पार्टकस’ जैसी भव्य फिल्म का निर्माण संभव हो पाया था, जो उन्होंने खुद बनाई थी। स्टेनले क्यूब्रिक के निर्देशन में बनी इस फिल्म के साथ डग्लस की छवि कुछ ऐसी जुड़ी की ताउम्र उन्हें स्पार्टकस के ऐतिहासिक किरदार के साथ जोड़ कर देखा जाता रहा। वैसे उनके पुत्र माइकल डग्लस भी अपने फिल्म करियर और प्रसिद्धि में उनके काफी निकट पहुंचे।

कर्क डग्लस कुछेक बार भारत की यात्रा पर भी आए थे। यहां पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी के साथ मुलाकातों का जिक्र अपनी आत्मकथा में किया है।

सिने प्रेमियों को कर्क डग्लस को याद रखना इसलिए जरूरी है क्योंकि वह अपने करियर को लेकर जितने संजीदा रहे, उतने ही प्रयोगधर्मी भी। ‘लस्ट फाॅर लाइफ’ जैसी फिल्म में विन्सेंट वाॅन गाॅफ जैसे आत्महंता चरित्र को उन्होंने जितनी खूबसूरती से पेश किया, वह एक मिसाल है।

डग्लस ने कहा था कि वॉन गॉघ के चरित्र पर सोचते हुए वह कुछ देर को अवसाद का शिकार हुए थे। उनका यह बयान कितना भी सच हो, लेकिन एक बात तो सच है कि यह फिल्म उनके अभिनय की सबसे बड़ी मिसाल में से है।