अमृता प्रीतम पुण्यतिथि: साहिर के इश्क ने सिगरेट का आदी बना दिया

“कोई भी लड़की, हिंदू हो या मुस्लिम, अपने ठिकाने पहुंच गई तो समझना कि ‘पूरो’ (उपन्यास पिंजर में मुख्य चरित्र) की आत्मा ठिकाने पहुंच गई.” अमृता यह पंक्ति अमृता प्रीतम की भारत-पाकिस्तान विभाजन पर लिखे उनके उपन्यास ‘पिंजर’ की है. वैसे देखा जाए तो विभाजन पर कई उपन्यास और कहानियां लिखी गईं. उसमें एक नाम सआदत हसन मंटो का भी है, जिन्होंने बंटवारे पर ‘खोल दो’ जैसी मार्मिक कहानी लिखी. अमृता प्रीतम ने ‘पिंजर’ को साल 1950 के आस-पास लिखा. अमृता प्रीतम चूंकि खुद भी बंटवारे की शिकार थीं, शायद यही वजह थी कि वो ‘पूरो’ का इतना मजबूत कैरेक्टर कागज पर उतार सकीं.

अमृता प्रीतम का जन्म 31 अगस्त 1919 को पाकिस्तान के पंजाब प्रान्त के गुजरांवाला शहर में हुआ था. अमृता का बचपन लाहौर में बीता और उनकी शिक्षा भी वहीं पर हुई. जब अमृता 11 साल की थीं तो उनकी मां की मौत हो गई. अमृता अपनी आखों के सामने मरती हुई मां के लिए ऊपर वाले से सलामती की दुआ मांगती रहीं.

अमृता की अरदास बेकार जाती है और मां की मौत हो जाती है. 11 साल की उम्र में मां की मौत से दुखी अमृता का विश्वास ईश्वर हट जाता है. अपने विश्वास की टूटने को उन्होंने उपन्यास ‘एक सवाल’ में नायक जगदीप के माध्यम से व्यक्त किया है. जब जगदीप मरती हुई मां की खाट के पास ईश्वर से कहता है, ‘मेरी मां को मत मारो’.

अमृता ने अपने जीवन के बारे में आत्मकथा ‘रसीदी टिकट’ में लिखा है, ‘इन वर्षों की राह में, दो बड़ी घटनायें हुईं. एक जिन्हें मेरे दुःख-सुख से जन्म से ही संबंध था यानी मेरे माता-पिता, उनके हाथों हुई और दूसरी मेरे अपने हाथों. यह एक कि चार वर्ष की आयु में मेरी सगाई और सोलह सत्रह वर्ष की आयु में पिता ने विवाह कर दिया और दूसरी, जो खुद मेरे अपने हाथों हुई, यह कि बीस-इक्कीस वर्ष की आयु में मैंने मुहब्बत की.’

शायर और गीतकार साहिर लुधियानवी से अमृता का प्यार हिंदी और उर्दू साहित्य जगत में सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाला विषय रहा. साहिर के साथ अपने लगाव को अम़ता ने अपनी आत्मकथा में कुछ यूं बयां किया है. अमृता लिखती हैं, ‘ज़िंदगी में तीन समय ऐसे आए हैं, जब मैंने अपने अन्दर की सिर्फ़ औरत को जी भर कर देखा है. उसका रूप इतना भरा पूरा था कि मेरे अन्दर के लेखक का अस्तित्व मेरे ध्यान से विस्मृत हो गया.

दूसरी बार ऐसा ही समय मैंने तब देखा जब एक दिन साहिर आया था तो उसे हल्का सा बुखार चढ़ा हुआ था. उसके गले में दर्द था, सांस खिंचा-खिंचा था. उस दिन उसके गले और छाती पर मैंने ‘विक्स’ मली थी. कितनी ही देर मलती रही थी और तब लगा था कि इसी तरह पैरों पर खड़े खड़े पोरों से, उंगलियों से और हथेली से उसकी छाती को हौले-हौले मलते हुए सारी उम्र गुजार सकती हूं. मेरे अंदर की सिर्फ़ औरत को उस समय दुनिया के किसी कागज़ कलम की आवश्यकता नहीं थी.

लाहौर में जब कभी साहिर मिलने के लिये आता था तो जैसे मेरी ही खामोशी से निकला हुआ खामोशी का एक टुकड़ा कुर्सी पर बैठता था और उसके बाद वो चला जाता था. बैठे रहने के दरम्यां वह चुपचाप सिगरेट पीता रहता था, कोई आधा सिगरेट पीकर राखदानी में बुझा देता था, फिर नया सिगरेट सुलगा लेता था और उसके जाने के बाद केवल सिगरेट के बड़े छोटे टुकड़े कमरे में रह जाते थे. कभी एक बार उसके हाथ छूना चाहती थी, पर मेरे सामने मेरे ही संस्कारों की एक वह दूरी थी, जो तय नहीं होती थी. तब कल्पना की करामात का सहारा लिया था. उसके जाने के बाद, मैं उसके छोड़े हुए सिगरेट को संभाल कर अलमारी में रख लेती थी और फिर एक-एक टुकड़े को अकेले जलाती थी और जब उंगलियों के बीच पकड़ती थी तो बैठकर लगता था जैसे उसका हाथ छू रही हूं’.

साहिर के इसी इश्क ने अमृता को सिगरेट का आदी बना दिया. सिगरेट को लेकर अमृता ने एक कविता लिखी…

यह आग की बात है, तूने यह बात सुनाई है
यह जिंदगी की वही सिगरेट है,जो तूने कभी सुलगाई थी
चिंगारी तूने दी थी, यह दिल सदा जलता रहा
वक्त कलम पकड़ कर, कोई हिसाब लिखता रहा
जिंदगी का अब गम नहीं, इस आग को संभाल ले
तेरे हाथ की खेर मांगती हूं, अब और सिगरेट जला ले

साहिर के लिए अमृता के मन में प्रेम का प्रदर्शन उनकी लेखनी में दिखाई देता है. अम़ता लिखती हैं, ‘देश विभाजन से पहले तक मेरे पास एक चीज़ थी, जिसे मैं संभाल कर रखती थी. यह साहिर की नज़्म ताजमहल थी, जो उसने फ्रेम कराकर मुझे दी थी. देश के विभाजन के बाद, जो मेरे पास धीरे-धीरे जुड़ा है. आज अपनी अलमारी का अन्दर का खाना टटोलने लगी हूं तो दबे हुए खजाने की भांति प्रतीत हो रहा है’.

एक बार साहिर और अमृता एशियन राइटर्स कांफ्रेंस में एक साथ भाग ले रहे थे. दोनों लोगों को उनके नाम का बैज मिला. अमृता ने अपने नाम का बैज अपनी कोट पर लगाया हुआ था और साहिर ने अपने नाम का बैज अपने कोट पर. इसी बीच साहिर अमृता के पास आते हैं और अपना बैज उतारकर अमृता की कोट पर लगा दिया और अमृता का बैज उतारकर अपनी कोट पर लगा लेते हैं.

बाद के जीवन में अमृता चित्रकार इमरोज़ के नजदीक रहीं. अमृता अपनी आत्मकथा में लिखती हैं, ‘मुझ पर उसकी पहली मुलाकात का असर, मेरे शरीर के ताप के रूप में हुआ था. मन में कुछ घिर आया और तेज़ बुखार चढ़ गया. उस दिन उस शाम उसने पहली बार अपने हाथ से मेरा माथा छुआ था. बहुत बुखार है? इन शब्दों के बाद उसके मुंह से केवल एक ही वाक्य निकला था. आज एक दिन में मैं कई साल बड़ा हो गया हूं. कभी-कभी हैरान हो जाती हूं, इमरोज़ ने मुझे कैसा अपनाया है, उस दर्द के समेत जो उसकी अपनी खुशी के मुखालिफ हैं.

एक बार मैंने हंसकर कहा था, ईमू ! अगर मुझे साहिर मिल जाता, तो फिर तू न मिलता और वह मुझे मुझसे भी आगे, अपनाकर कहने लगा कि मैं तो तुझे मिलता ही मिलता, भले ही तुझे साहिर के घर नमाज़ पढ़ते हुए ढूंढ लेता, सोचती हूं क्या खुदा इस जैसे इन्सान से कहीं अलग होता है.’ इमरोज अपनी पूरी जिंदगी अमृता के दर्द को पेंटिंग्स में रंगते रहे. इमरोज ने एक बार एक वाकया सुनाया कि अमृता जब भी कभी इमरोज के साथ उनके स्कूटर पर बैठ कर कहीं जातीं तो वो उनकी पीठ पर अपनी उंगलियों से एक नाम लिखा करती थी. और वो नाम था साहिर’

अमृता प्रीतम ने स्वयं अपनी रचनाओं में व्यक्त अधूरी प्यास के संदर्भ में लिखा है कि ‘गंगाजल से लेकर वोदका तक यह सफ़रनामा है मेरी प्यास का’.

अमृता की रचनाओं में ‘दिल्ली की गलियां’ (उपन्यास), ‘एक थी अनीता’ (उपन्यास), काले अक्षर, कर्मों वाली, केले का छिलका, दो औरतें (सभी कहानियां 1970 के आस-पास) ‘यह हमारा जीवन’ (उपन्यास 1969), ‘आक के पत्ते’ (पंजाबी में बक्क दा बूटा), ‘चक नम्बर छत्तीस’, ‘यात्री’ (उपन्यास 1968), ‘एक सवाल (उपन्यास), ‘पिघलती चट्टान (कहानी 1974), धूप का टुकड़ा (कविता संग्रह), ‘गर्भवती’ (कविता संग्रह) आदि प्रमुख हैं.

अमृता को कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से भी नवाजा गया, जिनमें प्रमुख है 1957 में साहित्य अकादमी पुरस्कार, 1958 में पंजाब सरकार के भाषा विभाग द्वारा पुरस्कार, 1988 में बल्गारिया वैरोव पुरस्कार और 1982 में भारत के सर्वोच्च साहित्यिक पुरस्कार ज्ञानपीठ पुरस्कार. अमृता पहली महिला साहित्यकार थीं, जिन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड मिला. अमृता को साल 1969 में ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया गया.

31 अक्टूबर, 2005 की शाम अमृता की कलम हमेशा के लिए खामोश हो गई.