अबरार अल्वी न होते तो शायद आज गुरुदत्त भी न होते

हिंदी सिनेमा में गुरूदत्त का नाम कहीं भी आता है तो उनके साथ एक और नाम खुद-ब-खुद जुड़ जाता है और वो नाम है गुरूदत्त के लेखक और फिल्म निर्देशक अबरार अल्वी का. अबरार गुरूदत्त के सबसे करीबी दोस्त थे. अबरार गुरूदत्त की कई फिल्मों के स्क्रिप्ट राइटर थे साथ अल्वी ने ‘साहब बीबी और गुलाम’ फिल्म का निर्देशन भी किया था.

अबरार अल्वी का जन्म 1 जुलाई 1927 को अयोध्या के फैजाबाद में हुआ था. अल्वी के पिता ब्रिटिश पुलिस में उच्च अधिकारी थे और डीआईजी के पद से रिटायर हुए थे. पिता पुलिस में थे तो अबरार का ज़्यादातर समय होशंगाबाद, अकोला, नागपुर और जबलपुर जैसे छोटे शहरों में बीता.

अबरार अल्वी की पढ़ाई महाराष्ट्र के नागपुर से हुई, जहां से उन्होंने एमए और एलएलबी की डिग्री हासिल की. इसके बाद साल 1951 में अबरार फिल्मों में हीरो के लिए मुम्बई आ गए. मुंबई में मशहूर थियेटर आर्टिस्ट हबीब तनवीर की सलाह पर अबरार इप्टा से जुड़ गए. इसी दौरान अबरार की मुलाकात इरशाद हुसैन से हुई, जो उनके चचेरे भाई थे. इरशाद उन दिनों फिल्मों में ही काम करते थे. इरशाद हुसैन ‘जसवंत’ के नाम से गुरूदत्त के निर्देशन में बन रही फिल्म ‘बाज़’ में एक अहम भूमिका कर रहे थे. इरशाद अबरार को अपने घर ले गए और इस तरह अबरार को मुम्बई में रहने को ठिकाना मिला.

फिल्म ‘बाज़’ साल 1953 में रिलीज हुई. इस फिल्म में गुरूदत्त और गीता बाली थे और फिल्म में संगीत ओ.पी.नैयर ने दिया था. फिल्म का निर्माण गीता दत्त की बहन हरिदर्शन कौर ने किया था, जिन्हें फिल्म ‘बाज़’ की शूटिंग के दौरान जसवंत से मोहब्बत हो गई और जल्द ही दोनों ने शादी कर ली.

अबरार अल्वी को ड्राईविंग का शौक़ था इसलिए वो इरशाद हुसैन यानी जसवंत के साथ बतौर ड्राईवर फिल्म ‘बाज़’ की सेट पर जाने लगे. उसी समय फिल्म के सहायक निर्देशक राज खोसला के साथ अबरार की दोस्ती हो गयी. राज खोसला ने अबरार की सिफारिश गुरूदत्त से की. नतीजा निकला कि गुरू ने अगली फिल्म ‘आरपार’ के संवाद लेखन की जिम्मेदारी अबरार अल्वी को दे दी. साल 1954 में फिल्म ‘आरपार’ सिनेमाघरों में रिलीज हुई. फिल्म सुपरहिट थी और इस तरह अबरार गुरूदत्त की कैंप में शामिल हो गए.

अबरार अल्वी ने अपने कॉलेज के जमाने में एक हास्य नाटक ‘मॉडर्न मैरेज’ लिखा था. इस नाटक को जब गुरूदत्त ने पढ़ा तो वो इतने प्रभावित हुए कि उस नाटक के आधार पर गुरूदत्त ने फिल्म ‘मिस्टर एंड मिसेज़ 55’ बना डाली. यह फिल्म भी कामयाब रही, लेकिन अबरार को डॉयलाग राइटर के क्रेडिट से संतोष करना पड़ा.

अबरार अल्वी को अक्सर यह बात चुभती थी कि लोग उनकी सफलता के पीछे गुरूदत्त का हाथ मानते थे, लेकिन अबरार का कहना था कि हर तस्वीर के दो पहलू होते हैं, मेरी सफलता की तस्वीर के उस दूसरे पहलू को किसी ने कभी नहीं देखा. बकौल अबरार गुरूदत्त ने फिल्म ‘मिस्टर एंड मिसेज़ 55’ की तरह ‘प्यासा’ में भी उन्हें केवल डॉयलाग राइटर के तौर पर क्रेडिट दिया. जबकि फिल्म ‘प्यासा’ की स्टोरी और कैरेक्टर को बुनने में उन्होंने भी बहुत काम किया था.

गुरूदत्त ने पहली बार फिल्म ‘कागज़ के फूल’ में अबरार अल्वी का नाम डॉयलाग के साथ-साथ स्क्रिप्ट राइटर के तौर पर भी दिया लेकिन फिल्म बुरी तरह से फ्लाप हो गई. फिल्म ‘कागज़ के फूल’ की असफलता के बाद गुरूदत्त ने फिल्म निर्देशन से हाथ खीच लिए और ‘चौदहवीं का चांद’ के निर्देशन की ज़िम्मेदारी उस दौर के मशहूर निर्देशक एम.सादिक़ को सौंप दी थी. यह फिल्म सुपरहिट रही.

गुरूदत्त की अगली फिल्म ‘साहब बीबी और गुलाम’ बिमल मित्र के बांग्ला उपन्यास पर बनने जा रही थी. इस फिल्म की स्क्रिप्ट और डॉयलाग अबरार से लिखवाए गए. उन्ही दिनों गुरूदत्त की गीतादत्त के साथ पारिवारिक कलह में उलझे हुए थे. इस वजह से गुरूदत्त ने फिल्म ‘साहब बीबी और गुलाम’ के निर्देशन की ज़िम्मेदारी अबरार को सौंप दी.

अबरार अल्वी के निर्देशन में बनी फिल्म ‘साहब बीबी और गुलाम’ साल 1962 में सिनेमाघरों में रिलीज हुई. इस फिल्म ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म का फिल्मफेयर पुरस्कार भी हासिल किया. इसके अलावा अबरार अल्वी को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का और मीना कुमारी ने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का भी फिल्मफेयर पुरस्कार मिला.

मायानगरी मुंबई में अबरार अल्वी के सबसे करीबी दोस्त थे साहिर लुधियानवी. साहिर से उनकी पहली मुलाक़ात साल 1951 में मुम्बई स्थित प्रोग्रेसिव राईटर्स एसोसिएशन के ऑफिस में हुई. जहां अबरार हबीब तनवीर से मिलने गए थे. साहिर के साथ हुई मुलाक़ात बहुत ही जल्द गहरी दोस्ती में बदल गयी.

अबरार के मुताबिक साहिर बहुत मुंहफट थे. उस समय के म्यूजिक डायरेक्टरों के बारे में साहिर कहते थे कि सभी अंग्रेज़ी के रिकॉर्ड सुनकर हिन्दी गानों की धुनें तैयार करते हैं, जबकि गीतकार हर गीत को दिल से लिखता है और इसीलिये गीतकार का दर्जा संगीतकारों से ऊंचा होता है. अबरार बताते हैं कि एक बार साहिर शराब के नशे में एसडी बर्मन के घर जाकर उन्हें कुछ उल्टा-सीधा बोल आए, जिसकी वजह से बर्मन दा ने तय कर लिया कि वो मरते दम तक साहिर के साथ काम नहीं करेंगे.

उन्ही दिनों फिल्म ‘प्यासा’ बन रही थी और उसका आखिरी गीत लिखा और रिकॉर्ड किया जाना बाकी था. गुरूदत्त और अबरार अल्वी ने बर्मन दा को बहुत समझाया तो वो बोले उससे लिखवा लाओ, मैं धुन बना दूंगा, लेकिन बर्मन दा साहिर के साथ म्यूजिक सिटिंग के लिए तैयार नहीं हुए.

फिल्म का क्लाईमेक्स लिखा जाना था इस बीच अबरार को एक ऑपरेशन के लिए अस्पताल में भर्ती होना पड़ा. अबरार ने अस्पताल जाने से पहले साहिर को विस्तार से क्लाईमेक्स का सिचुएशन समझाया और फिर जाकर अस्पताल के बिस्तर पर लेट गए. तीन हफ्ते बाद अस्पताल से छुट्टी मिली तो पता चला गीत रिकॉर्ड भी हो चुका है.

गीत के बोल थे, ‘ये महलों, ये तख्तों, ये ताजों की दुनिया’ जिन्हें सुनकर अबरार का सिर चकरा गया. अबरार की दलील थी कि हिन्दुस्तान को आज़ाद हुए दस साल हो चुके हैं. अब न रियासतें रहीं, न तख़्त रहा और न ताज रहा. महलों के ज़माने भी लद चुके. ऐसे गीत के लिए क्या डॉयलाग लिखा जाए, चार दिन सोचने के बाद अबरार ने रहमान के लिए लिखा, ‘अगर आज विजय ज़िंदा होते तो हम उन्हें अपने दिलों के तख़्त पर बैठाते, शोहरत के ताज पहनाते, ग़रीबी की गलियों से निकालकर महलों में राज कराते.’

अबरार अल्वी की आख़िरी फिल्म साल 1995 में रिलीज हुई थी. नाम था ‘गुड्डू’. 18 नवम्बर 2009 को 82 साल की उम्र में अबरार अल्वी का मुम्बई
में निधन हो गया.