देवेन वर्मा जयंती : देवेन की एक्टिंग में हास्य था, भौंडापन नहीं

हिंदी सिनेमा में हास्य का प्रभाव शुरू से ही अपनी अमिट छाप लिए हुए आज भी जिंदा है. बिना हास्य के फिल्म की कल्पना भी बेमानी सा मालूम जान पड़ता है. राजकपूर ने 50 के दशक में अपनी बात कहने के लिए चार्ली चैप्लीन के किरदार को पर्दे पर कॉपी करना शुरू किया था.

यही नहीं महमूद और जॉनी वाकर जैसे कलाकारों ने अपने नैसर्गिक हास्य से सिनेमा को जीवंत बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी. इसी क्रम में एक और नाम जुड़ता है देवेन वर्मा का.

हास्य अभिनेता देवेन वर्मा ने अपने जीवन में 149 फिल्मों में काम किया. इन फिल्मों में गोलमाल, अंगूर, खट्टा मीठा, नास्तिक, रंग बिरंगी, दिल और जुदाई जैसे प्रमुख फिल्में शामिल हैं. उनके सिनेमा हास्य का वो पुट दिखाई देता है, मानो वो नैसर्गिक है. उनके अभिनय में कहीं से कोई भौंड़ापन नहीं दिखाई देता है.

देवेन ऐसे कलाकार थे, जो खुद सिनेमा से रिटायर हो गए क्योंकि उनना मानना था कि सिनेमा के वर्तमान परिस्थितियों के लिए वो फिट नहीं हैं. देवेन ने अपनी जिंदगी के लगभग 40 साल हिंदी सिनेमा को दिए. व्यावसायिकता के दृष्टि से देवेन सफल कलाकार थे, लेकिन मौजूदा दौर की वर्किग स्टाइल को देखकर उन्होंने सिनेमा से तौबा कर ली.

देवेन मूलरूप से गुजरात के रहने वाले थे. इनके पिता बलदेव सिंह वर्मा चांदी के व्यवसाय में थे. देवेन को पहला ब्रेक मिला साल 1961 में, फिल्म थी धर्मपुत्र. इसके लिए उन्हें हर महीने 600 रुपये का भुगतान किया जाता था. फिल्म धर्मपुत्र मिलने की कहानी भी बड़ी रोचक है.

देवेन पढ़ने के बाद मुंबई आ गए और थियेटर करने लगे. एक दिन देवेन थियेटर कर रहे थे, दर्शकों में शामिल बीआर चोपड़ा की नजर देवेन पर पड़ी. चोपड़ा को देवेन की एक्टिंग इतना प्रभावित किया कि उन्होंने तुरंत देवेन को अपनी फिल्म में साइन कर लिया.

धर्मपुत्र में देवेन के साथ शशी कपूर ने भी डेब्यू किया. धर्मपुत्र बुरी तरह से फ्लाप हुई. इसके बाद देवेन को एवीएम स्टूडियो के एवी मयप्पन ने तीन साल के लिए 1500 रुपये महीने के लिए अनुबंध पर रख लिया. मयप्पन ने देवेन को मद्रास (चेन्नई) में भेज दिया. जहां वो लगभग एक साल रहे. इसी दौरान साल 1963 में फिल्म गुमराह रिलीज़ हुई, जिसमें देवेन ने अशोक कुमार के नौकर की भूमिका निभाई. यह एक कॉमिक भूमिका थी और इसे दर्शकों ने बहुत सराहा.

इस फिल्म के बाद मयप्पन ने देवेन से कहा कि वो तय कर लें कि उन्हें मद्रास (चेन्नई) और बंबई (मुंबई) के बीच कहां रहना है. देवेन ने फैसला किया कि उन्हें वापस मुंबई जाना है और इस तरह देवेन एक साल बाद मुंबई के सिनेमाई दुनिया में वापस लौट आए. गुमराह के बाद देवेन ने साल 1964 में एक्ट्रेस मुमताज़ के साथ फिल्म ‘कव्वाली की रात’ की. यह मुमताज की पहली डेब्यू फिल्म थी.इसके बाद देवेन ने साल 1966 में देवर और अनुपमा नाम कि फिल्में की.

देवेन को सफलता तब मिली, जब साल 1975 में उन्होंने ‘चोरी मेरा नाम’ में अभिनय किया. इस फिल्म के लिए देवेन को पहली बार फिल्मफेयर पुरस्कार मिला. यह एक सुपरहिट फिल्म थी. इस सफलता के बाद देवेन के पास प्रोड्यूसरों की लाइन लग गई. आलम ये था कि देवेन एक समय में एक साथ 16 फिल्मों में काम कर रहे थे.

यह बात इस वाकये से समझ आएगी जब देवेन ने खुद बताया कि एक समय ऐसा था जब मैं मुंबई में रात को इस्माईल श्राफ फिल्म ‘अहिस्ता-अहिस्ता कि शूटिंग करता था और तड़के सुबह हैदराबाद कि फ्लाइट पकड़कर जीतेन्द्र की फिल्म प्यासा सावन की शूटिंग के लिए जाता था और उसी शाम को हैदराबाद से दिल्ली के लिए रवाना होता था यश चोपड़ा की फिल्म सिलसिला के लिए उसके बाद फिर इस्माइल श्रॉफ की फिल्म के लिए मुंबई वापस आता था.

देवेन को फिल्मी करियर में कुल तीन बार फिल्मफेयर पुरस्कार मिला. वर्मा को पहला फिल्मफेयर पुरस्कार साल 1976 में फिल्म चोरी मेरा काम के लिए, दूसरा 1979 में फिल्म चोर के घर में चोर और साल 1983 में फिल्म अंगूर के लिए. देवेन की आखिरी फिल्म ‘मेरे यार की शादी’ थी लेकिन कलकत्ता मेल साल 2003 में रिलीज हुई. इसलिए इसे देवेन की आखिरी फिल्म मानी जाती है.

साल 1969 में देवेन फिल्म निर्माण के क्षेत्र में उतर गए. देवेन ने कुल आठ फिल्मों का निर्माण किया. जिनमें साल 1971 में फिल्म नादान, जिसमें आशा पारेख और नवीन निश्चल थे, देवेन ने इस फिल्म का निर्दशन भी किया था. इसके बाद देवेन ने अमिताभ बच्चन और अशोक कुमार के साथ साल 1978 में बेशरम और साल 1989 में मिथुन चक्रवर्ती को लेकर फिल्म दाना पानी का निर्माण किया.

देवेन वर्मा की शादी अभिनेता अशोक कुमार की बेटी रूपा गांगुली के साथ हुई. देवेन की शादी किस्सा भी बड़ा इंट्रेस्टिंग है. फिल्म गुमराह करने के समय अशोक कुमार कभी-कभी देवेन को अपने घर बुलाया करते थे. इसी क्रम में देवेन की मुलाकात अशोक कुमार की बेटी से हुई. धीरे-धीरे देवेन और रूपा एक दूसरे को पसंद करने लगे, जब बात शादी की आई तो देवेन ने इस मामले में अशोक कुमार से बात की.

देवेन का प्रस्ताव सुनने के बाद अशोक कुमार ने उन्हें इंतजार करने को कहा. आखिरकार देवेन को शादी करने में दो साल लग गए. चूंकि अशोक कुमार की बड़ी बेटी की शादी भी डॉ. पटेल से हुई थी और वो भी गुजरात से ताल्लुक रखते थे. इस वजह से अशोक कुमार इस शादी के लिए तैयार नहीं हो रहे थे, लेकिन बाद में मान गए और अशोक कुमार के छोटे भाई किशोर कुमार ने देवेन और रूपा की शादी मुंबई में नेशनल स्पोर्ट्स क्लब ऑफ़ इंडिया में कराई.

अशोक कुमार के निधन के बाद देवेन ने फिल्मों से किनारा कर लिया. साल 1993 में देवेन परिवार के साथ पुणे शिफ्ट हो गए. 2 दिसंबर 2014 को देवेन वर्मा का पुणे में देहांत हो गया.