सलीम खान ने खामोशी से अपनी कलम को ताखे पर रख दी

आजादी के बाद की फिल्मों में एक रूमानियत हुआ करती थी. नेहरू काल में राजकपूर, देवानंद और दिलीप कुमार जैसे अभिनेता पर्दे पर समाजवाद की बात तो कर रहे थे, लेकिन उसमें रोमांस का पुट भी शामिल था. फिल्म लेखकों में ख्वाजा अहमद अब्बास हों, अबरार अल्वी हों या फिर कमाल अमरोही हों. सभी इप्टा से जुड़े हुए थे, फिल्म लेखन में भी इसकी झलक देखने को मिलती थी, लेकिन रोमांस की चाशनी के बगैर वो कुछ ज्यादा न गढ़ सके.

अगर हम देखें तो कमोबेश 60 के दशक तक फिल्मों में लगभग-लगभग प्रेम ही फिल्मों में मुख्य कथानक रहता था. पर्दे पर जितनी भी कहानियां बुनी जाती थीं उनमें प्रेम प्रधान रहता था, गंभीर सामाजिक मुद्दे उन्हीं में छुपे हुए धीरे से दर्शकों के सामने परोस दिए जाते थे. इसके बाद दर्शकों के सामने ट्रेड यानी रोमांस से इतर कुछ फिल्में आने लगीं. इन फिल्मों के लेखक दो युवाओं की जोड़ी थी. जिसे इंडियन सिनेमा की हिस्ट्री में सलीम-जावेद के नाम से जाना जाता है. सलीम-जावेद ने अपनी लेखनी में प्रेम को एक कोने में धकेल दिया और उनकी बात करने लगे जो समाज के सच से ताल्लूक रखते थे.

यहीं से फिल्मों में जन्म हुआ एंग्रीयंग मैन के अवधारणा की. उनकी फिल्में के डायलॉग मसलन ‘जो डर गया समझो मर गया’, ‘आज ख़ुश तो बहुत होगे तुम. देखो जो आज तक तुम्हारे मन्दिर की सीढियां नहीं चढा, जिसने आज तक तुम्हारे सामने सर नहीं झुकाया’, ‘मेरे पास बैंक-बैलेंस है, बंगला है, गाड़ी है, तु्म्हारे पास क्या है?… मेरे पास मां है’.

इस तरह की फिल्मों के डायलॉग लिखकर सलीम-जावेद ने भारतीय फिल्मों को एक नई दिशा दी. आज उसी जोड़ी के सलीम खान के जन्मदिन है. सलीम खान आज अपना 84वां जन्मदिन मना रहे हैं. 24 नवंबर 1935 को मध्य प्रदेश के इंदौर में जन्मे सलीम खान के पूरखे अफगानी थे. लगभग 150 साल पहले वे अफगानिस्तान से भारत आए थे. सलीम खान के पिता अब्दुल राशिद खान इंदौर पुलिस में डीआईजी थे. सलीम खान की पढ़ाई-लिखाई इंदौर से हुई. इसके बाद 22 साल की उम्र में हीरे बनने के लिए सलीम खान मुंबई की ट्रेन में बैठ गए.

फिल्मों में स्ट्रगल के दौरान ही सलीम को सुशीला चरक से नाम की लड़की से इश्क हो गया. सलीम ने 18 नवंबर 1964 को सुशीला से शादी कर ली. सलीम खान ने अपने जीवन में दो शादियां की. दूसरी शादी सलीम खान ने साल 1981 में एक्ट्रेस हेलेन से की. सुशीला और सलीम खान की तीन संताने हैं. सलमान खान, सोहेल खान और अरबाज खान हैं. सलीम की दो बेटियां भी हैं, जिन्हें सलीम खान ने गोद लिया है.

फिल्मों से स्ट्रगल के दौरान सलीम खान को सुशीला तो मिल गईं लेकिन सलीम का करियर अभी भी मझधार में था. एक दिन सलीम की किस्मत पलटी, वो किसी फिल्मी पार्टी में गए, जहां उनकी मुलाकत फिल्म डायरेक्टर के. अमरनाथ से हुई. सलीम की कद-काठी अमरनाथ को पसंद आ गया. उन्होंने सलीम को 400 रुपये की सैलरी पर रख लिया. इस तरह शुरू हुआ सलीम का फिल्मी सफर.

बतौर एक्टर सलीम खान ने लगभग 14 फिल्मों कीं. जिनमें ‘तीसरी मंजिल’, ‘सरहदी लूटेरा’, ‘दीवाना’ और ‘वफादार’ प्रमुख हैं. लेकिन एक्टिंग में सलीम वो मुकाम नहीं हासिल कर पाए, जिसका सपना लिए वो इंदौर से मुंबई आए थे. स्ट्रगल के इसी जद्दोजहद में सलीम खान की मुलाकत जावेद अख्तर से होती है. जावेद अख्तर, जानेमाने शायर जांनिसार अख्तर के बेटे थे, लेकिन वो भी स्ट्रगल कर रहे थे. जावेद और सलीम ने मिलकर तय किया कि फिल्मों की कहानी लिखेंगे.

सलीम-जावेद को पहला मौका दिया उस जमाने के सुपरस्टार राजेश खन्ना ने और सलीम-जावेद ने उनकी फिल्म ‘हाथी मेरे साथी’ का स्क्रीनप्ले लिखा. यह फिल्म सुपरहिट साबित हुई और इस तरह फिल्म इंडस्ट्री को मिले सलीम-जवोद नाम के दो राइटर, जिन्होंने फिल्म लेखन की दिशा ही बदल दी.

सलीम-जावेद ने लगभग 25 फिल्में साथ लिखीं. इनमें ‘यादों की बारात’, ‘जंजीर’, ‘दीवार’ ‘मजबूर’, ‘हाथ की सफाई’, ‘डॉन’, ‘त्रिशूल’, ‘शान’, ‘शोले’ और ‘शक्ति’ जैसी फिल्में शामिल हैं. फिल्म ‘शोले’ साल साल 1975 में रिलीज हुई. उस वक्त यह फिल्म को किसी भी तरह का पुरस्कार नहीं मिला, बल्कि सलीम-जावेद की लिखी फिल्म ‘दीवार’ को सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार मिला.

सलीम खान और जावेद अख्तर की जोड़ी 70 और 80 की दशक में फिल्म लिखने के लिए सबसे ज्यादा पैसे वाली जोड़ी थी. हालांकि 25 साल साथ काम करने के बाद जावेद अख्तर सलीम खान से अलग हो गए. बॉलीवुड के गोल्डन एरा में सबसे ज्यादा ब्लॉक बस्टर फिल्में देने वाली जोड़ी सलीम-जावेद की मानी जाती है. लेकिन क्यों टूटी यह जोड़ी, इस बात को कम ही लोग जानते हैं.

कहा जाता है कि सलीम खान फिल्म ‘मिस्टर इंडिया’ लिखने के बाद जावेद के साथ अमिताभ बच्चन के पास गए और उन्हें कहानी सुनाई. सलीम खान चाहते थे कि अमिताभ इस फिल्म मे काम करें, लेकिन अमिताभ ने फिल्म में काम करने से मना कर दिया. सलीम खान को इस बात का बहुत दुख पहुंचा, क्योंकि मनमोहन देसाई और प्रकाश मेहरा जैसे फिल्म निर्देशकों से कहकर सलीम खान ने अमिताभ बच्चन को काम दिलवाया था.

सलीम खान ने जावेद अख्तर से कहा कि अब वो आगे से अमिताभ के साथ काम नहीं करेंगे. यहीं से दोनों में खटपट हुई और दोनों की रास्ते अलग हो गए. अलग होने के बाद जावेद अख्तर फिल्मों में गाने लिखने लगे, सलीम खान ने भी एक दो फिल्में लिखी. अलग होने के बाद सलीम खान ने ‘नाम’ जैसी फिल्म लिखी. लेकिन फिर एक दिन सलीम खान ने बड़े ही खामोशी से अपनी कलम को ताखे पर रख दिया.