‘रोमांसिंग विद लाइफ’… देवानंद

क्या कोई ऐसा भी अभिनेता हो सकता है जो अपने अंतिम सांस तक केवल हीरो ही रहा हो. क्या कोई ऐसा भी अभिनेता हो सकता है जिसे सदाबहार कहा गया हो. क्या कोई ऐसा भी अभिनेता हो सकता है, जिसने कई ऐसी ब्लॉकबस्टर फिल्में महज इसलिए ठुकरा दी हो क्योंकि रोल उसके पसंद का नहीं था. जी हां, आज हम बात कर रहे हैं हिंदी सिनेमा को ‘गाइड’, ‘पेइंग गेस्ट’, ‘बाजी’, ‘ज्वैल थीफ़’, ‘सीआईडी’, ‘जॉनी मेरा नाम’, ‘अमीर गरीब’, ‘वारंट’, ‘हरे राम हरे कृष्ण’ और ‘देस परदेस’ जैसी कई हिट फिल्में देने वाले एवरग्रीन हीरो देवानंद साहब की.

88 साल की उम्र में 3 दिसंबर, 2011 को लंदन में हार्ट अटैक की वजह से देव साहब हमेशा के लिए खामोश हो गए. आज देव साहब की 8वीं पुण्यतिथि है.

लगभग 6 दशकों तक सिनेमा को पर्दे पर बतौर सदाबहार अभिनेता अपना दखल रखने वाले देवानंद को यह मुकाम पाने के लिए कड़े संघर्ष से गुजरना पड़ा. 26 सितंबर 1923 को पंजाब के गुरदासपुर में देवानंद का जन्म एक मध्यवर्गीय परिवार में हुआ था. बचपन में पिता ने नाम दिया धर्मदेव पिशोरीमल आनंद, जो सिनेमा के इतिहास में देवानंद हो गए.

देवानंद ने साल 1942 में लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में स्नातक किया. पैसे के अभाव में देवानंद आगे की पढ़ाई न कर सके. साल 1943 में कुछ सपने बुनते देवानंद आ पहुंचे सिनेमानगरी मुम्बई. जेब में थे महज 30 रुपये और रहने का कोई ठिकाना नहीं.

देवानंद काम पाने के लिए संघर्ष करते रहे, लेकिन मामला न बनता देख मिलिट्री सेन्सर ऑफिस में क्लर्क की नौकरी पकड़ ली. यहां देव साहब का काम था सैनिकों की चिट्ठियों को पढ़ना. मिलिट्री सेन्सर ऑफिस में देवानंद को 165 रुपये महीने वेतन मिलना था, जिसमें से 45 रुपये वह अपने परिवार के खर्च के लिये भेज देते थे.

लगभग 1 साल के बाद देव साहब ने नौकरी छोड़ दी और अपने बड़े भाई चेतन आनंद के पास पहुंचे, उस समय भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के मेंबर थे. देवानंद भी इप्टा से जुड़ गए. थोड़े दिनों बाद मन न लगा तो देवानंद मुंबई से पुणे आ गए प्रभात स्टूडियो.

यहां पर देव साहब की मुलाकात हुई गुरुदत्त से. गुरुदत्त भी स्ट्रगल कर रहे थे लिहाजा दोनों दोस्त हो गए. लेकिन गुरुदत्त और देवानंद के दोस्ती की नींव भी बड़े मजेदार किस्से से पड़ी. दरअसल हुआ यह कि प्रभात स्टूडियो (आज जिसे फिल्म एवं टेलिविजन संस्थान- एफटीआईआई कहा जाता है) में देवानंद और गुरुदत्त के कपड़े एक ही धोबी धोता था. धोबी ने एकबार ग़लती से धुलाई के बाद गुरुदत्त और देवनंद के शर्ट की अदला-बदली कर दी. दोनों ने ध्यान नहीं दिया और एक दूसरे की शर्ट पहनकर आमने-सामने हुए. अचानक ही गुरुदत्त की नज़र देवानंद के शर्ट पर पड़ी. गुरु ने देव से पूछा, ‘ये शर्ट कहां से ख़रीदी?’ देवानंद ने झेंपते हुए कहा, ‘ये शर्ट मेरे धोबी ने है. लेकिन आपने अपनी शर्ट कहां से ख़रीदी है, जरा ये तो बताएं’ दोनों एक दूसरे की शर्ट का भेद समझ गए और ठहाके मारकर हंसने लगे.

पुणे में गुरुदत्त और देव साहब ने एक-दूसरे से वादा किया कि अगर गुरुदत्त कभी निर्देशक बने तो बतौर हीरो वो देवानंद को अपनी फिल्म में लेंगे और देव साहब ने तय किया कि अगर उन्होंने कभी फिल्म बनाई तो वो गुरुदत्त को बतौर डायरेक्टर रखेंगे. खैर आगे बढ़ते हैं, बड़े भाई चेतन आनंद की वजह से देवानंद और छोटे भाई विजय आनंद को फिल्मों एंट्री मिली. प्रभात स्टूडियो में ही देवानंद को बतौर एक्टर पहला ब्रेक मिला साल 1946 में, फिल्म का नाम था ‘हम एक है’. ये फिल्म बुरी तरह से फ्लॉप रही.

साल 1949 में देवानंद, चेतन आनंद और विजय आनंद ने ‘नवकेतन फिल्म्स’ के नाम से कंपनी बनाई. साल 1950 में देव साहब के बड़े भाई चेतन आनंद ने एक फिल्म का निर्माण किया, फिल्म का नाम था ‘अफसर’. इस फिल्म के लिए देवानंद की हिरोइन थीं सुरैया. यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर फेल हो गई. साल 1951 में देवानंद ने पुणे में गुरुदत्त को किए अपने वादे को निभाया और फिल्म ‘बाजी’ के निर्देशन का दारोमदार सौंपा. इस फिल्म ने देवानंद और गुरुदत्त दोनों की किस्मत बदल दी. फिल्म ‘बाज़ी’ के ही सेट पर गुरुदत्त की मुलाकात मशहूर गायिका गीता रॉय से हुई, जिन्होंने बाद में गुरु दत्त के शादी की और गीता दत्त के नाम से जानी गईं.

फिल्म ‘बाजी’ की सफलता के बाद देवानंद ने ‘मुनीम जी’, ‘दुश्मन’, ‘कालाबाजार’, ‘सीआईडी’, ‘पेइंग गेस्ट’, ‘गैम्बलर’, ‘तेरे घर के सामने’ और ‘काला पानी’ जैसी कई सफल फिल्में दी. देवानंद के फिल्मी सफर की सबसे दमदार फिल्म मानी जाती है साल 1965 में बनी ‘गाइड’. आरके नारायण के उपन्यास पर आधारित फिल्म ‘गाइड’ का निर्देशन देवानंद के छोटे भाई विजय आनंद ने किया था. इस फिल्म में देवानंद के साथ थीं अभिनेत्री वहीदा रहमान.

फिल्म ‘गाइड’ अपने जमाने की कितनी बड़ी हिट फिल्म थी, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इसे ‘टाइम पत्रिका’ द्वारा भारत की चौथी बेस्ट फिल्म करार दिया गया था. इस फिल्म में संगीत एसडी बर्मन का था और गीत शैलेंद्र की कलम से थे. इस फिल्म को रिलीज के 42 साल बाद साल 2007 में कांस फिल्म फेस्टिवल में दिखाया गया. भारत द्वारा यह फिल्म विदेशी भाषा की फिल्म श्रेणी में ऑस्कर अवॉर्ड के लिए भी भेजी गई थी. फिल्म ‘गाइड‘ का एक डायलॉग आज भी लोगों की जुबान पर है. ‘मौत एक खयाल है, जैसे जिंदगी एक खयाल है, न सुख है, न दुख है, न दीन है, न दुनिया, न इंसान, न भगवान.. सिर्फ मैं हूं, मैं हूं, मैं हूं मैं.. सिर्फ मैं’.

अब हम बात करेंगे देवानंद के रोमांस की. देवानंद को अभिनेत्री सुरैया से प्यार था. देवानंद की सुरैया से पहली मुलाकात फिल्म ‘विद्या’ के सेट पर हुई थी. उस वक्त देवानंद ने सुरैया से अपना परिचय देते हुए कहा था, ‘सब लोग मुझे देव कहते हैं. आप मुझे किस नाम से पुकारना पसंद करेंगी?’ सुरैया ने कहा, ‘देव’. देवानंद अपनी आत्मकथा ‘रोमांसिंग विद लाइफ’ में लिखते हैं, ‘फिल्म ‘विद्या’ के सेट पर गाना चला, कैमरा रोल हुआ. सुरैया ने मुझको पीछे से गले लगाया. मैंने उनकी सांसों की गर्माहट महसूस की. मैंने उनके हाथों को चूमा और फिर उनकी तरफ एक फ्लांइग किस उछाला. सुरैया ने उनके हाथ के पीछे का हिस्सा चूम कर उसका जवाब दिया.’

दरअसल देवानंद और सुरैया इसी शॉट में एक-दूसरे को दिल दे बैठे, लेकिन इस पनप रहे प्यार की भनक सुरैया की नानी को लग गई. उन्होंने देवानंद के घर आने पर रोक लगा दी. सुरैया की नानी को दोनों के रिश्ते पर सख्त एतराज था. उनको दूसरे घर्म के लड़के के साथ रिश्ता कतई बर्दाश्त नहीं था. सुरैया की नानी की वजह से दोनों की शादी नहीं हो पाई और सुरैया आजीवन अविवाहित ही रहीं.

वहीं दूसरी ओर साल 1954 में देवानंद ने उस जमाने की मशहूर एक्ट्रेस कल्पना कार्तिक से शादी कर ली. कल्पना के साथ देवानंद ने कई कामयाब फिल्में की. ‘मिस शिमला’ के नाम से फेमस कल्पना कार्तिक देवानंद के बड़े भाई चेतन की पहली पत्नी की बहन थी.

देवानंद को जिस चीज के लिए इंडस्ट्री में लोग हमेशा याद करेंगे, वह है नये लोगों को इंडस्ट्री में ब्रेक देना. टीना मुनीम, जैकी श्रॉफ, ऋचा शर्मा एवं जीनत अमान जैसे सफल अभिनेता-अभिनेत्रियों को देवानंद ने ही बॉलीवुड से परिचय कराया था.

फिल्म के अलावा देवानंद की दिलचस्पी राजनीति में भी थी. देवानंद ने हिंदी फिल्म जगत के पहले अभिनेता थे, जिन्होंने राजनीतिक पार्टी का गठन किया और उनकी पार्टी में कई फिल्मी हस्तियां जुड़ी थीं. इंदिरा गांधी के साल 1975 में लगाए गए आपातकाल का फिल्म इंडस्ट्री में भी बड़ा विरोध हुआ. विरोध करने वालों में देव आनंद और किशोर कुमार सबसे आगे थे. आपातकाल के विरोध में देवानंद ने जनता पार्टी का समर्थन भी किया.

साल 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी लेकिन मोरारजी देसाई से देवानंद सरीखे लोगों का जल्द ही मतभेद हो गया. तब देवानंद ने तय किया कि वह किसी भी राजनीतिक पार्टी का समर्थन करने के बजाय खुद की पार्टी बनाएंगे. अपनी आत्मकथा ‘रोमांसिंग विद लाइफ’ में देवानंद ने लिखा है कि वह आपातकाल के दौरान वे हर वक्त संजय गांधी के करीबियों के रडार पर रहे’.

साल 1979 में देवानंद ने संजीव कुमार, धर्मेंद्र, शत्रुघ्न सिन्हा और हेमा मालिनी के साथ मिलकर एक राजनीतिक पार्टी बनाने की घोषणा कर दी. पार्टी का नाम रखा गया नेशनल पार्टी ऑफ इंडिया (एनपीआई) और इसके अध्यक्ष बने देवानंद. अपनी आत्मकथा में देवानंद लिखते हैं, ‘मैं पार्टी का अध्यक्ष चुना गया था और मैंने वह चुनौती स्वीकार कर ली थी. इस पार्टी का मकसद था लोकसभा चुनाव में उन उम्मीदवारों का समर्थन करना जो अपने-अपने क्षेत्र में सबसे काबिल हैं’.

साल 1979 जब इस राजनीतिक पार्टी की पहली रैली मुंबई के शिवाजी पार्क में हुई तो लोगों का जमघट देखकर राजनीतिक पार्टियों को पसीना आने लगा. इस रैली में देवानंद के साथ संजीव कुमार सहित प्रसिद्ध फिल्म निर्माता एफसी मेहरा और फिल्म ‘शोले’ के निर्माता जीपी सिप्पी भी शामिल हुए थे.

देवानंद की इस पहल से राजनीतिक दल इतने डर गए कि उन्होंने फिल्मी कलाकारों को चुनावों से दूर रहने के लिए परोक्ष धमकी देनी सुरू कर दी. वहीं दूसरी तरफ एनपीआई को राजनीति का कोई अनुभव नहीं था. इन्हीं सब वजहों से साल 1980 में हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी की ओर से कोई दिग्गज कलाकार चुनाव के मैदान में नहीं उतरा. आखिरकार कुछ ही महीनों बाद खुद देवानंद ने एनपीआई को भंग कर दिया था.

देवानंद ने अपने फिल्मी जीवन में दो फिल्मफेयर पुरस्कार जीते. एक साल 1958 में फिल्म ‘काला पानी’ के लिए और दूसरा साल 1966 में फिल्म ‘गाइड’ के लिए. फिल्म ‘गाइड’ को ‘सर्वश्रेष्ठ फिल्म’ और ‘सर्वश्रेष्ठ निर्देशक’ सहित पांच श्रेणियों में फिल्मफेयर पुरस्कार मिला. इसके साथ ही देव साहब को भारत सरकार ने साल 2001 में पद्म भूषण और साल 2002 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से भी सम्मानित किया.

‘शोखियों में घोला जाये फूलों का शबाब, उसमें फिर मिलायी जाये थोड़ी सी शराब, होगा फिर नशा जो तैयार वो प्यार है’ कुछ इसी तरह देवानंद साहब ने जीवन को बखूबी जिया.