मधुबाला की शोख अदा आज भी जिंदा है, मुस्कुरा रही है

मधुबाला का नाम जैसे ही लिया जाता है, लगता है उपर वाले ने जिंदा संगमरमर के उस नायाब बुत की ताबिर की हो जिसे ये दुनिया सदियों तलक अपने दिल-ओ-दिमाग में जिंदा रखेगी. वैसे तो हिंदी सिनेमा ने कई बेमिसाल अदाकाराओं के फन को निखारा, उन्हें सिनेमा के पर्दे पर उकेरा, लेकिन आज भी ऐसा लगता है कि मधुबाला जैसी अदाकारा न तो हुई और न शायद आगे होगी. ‘वीनस ऑफ इंडियन सिनेमा’ के खिताब ने नवाजे जाने वाली मधुबाला महज 36 साल जिंदा रहीं, लेकिन सिनेमा का पर्दा आज भी मधुबाला की शोख अदा से जिंदा है, मुस्कुरा रहा है, खिलखिला रहा है ठीक वैसे ही जैसे मधुबाला मुस्कुराती थीं.

मधुबाला ने अपनी अदाकारी से ऐसी पहचान बनाई जिसे हिंदी सिनेमा के दीवाने आज भी उसी शिद्दत के साथ याद करते हैं, जैसे कि उस जमाने में किया करते थे. मधुबाला की जिंदगी में उनका फ़िल्मी करियर, लव लाइफ या फिर ट्रैजेडी कहें, शादी और कम उम्र में मौत, यह सब इतना जल्दी हुआ कि अफसोस होता है कि काश वो कुछ दिन और हमारे बीच रहतीं तो बॉलीवुड ही नहीं बल्कि हॉलीवुड भी उनकी एक्टिंग की गर्माहट को याद रखता. मधुबाला की अधूरी जिंदगी, अधूरे ख्वाब 23 फ़रवरी 1969 को अचानक खामोश हो गए.

आज उसी मधुबाला का जन्मदिन है. इंडियन सिनेमा की ‘द ब्यूटी ऑफ ट्रैजेडी’ का जन्म 14 फरवरी 1933 को दिल्ली में हुआ. वालिद अताउल्ला खां ने नाम दिया मुमताज देहलवी. कुल 11 भाई-बहनों में मुमताज पांचवें नंबर पर थीं. अताउल्ला खां पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा के रहने वाले थे और पेशावर के इंपीरियल टुबैको कंपनी में मुलाजिम थे. फैक्ट्री से निकाले जाने के बाद अताउल्ला दिल्ली पहुंचे, जहां मुमताज का जन्म हुआ और उसके बाद वो साल 1942 में बंबई (मुंबई) पहुंचे. परिवार बेहद गरीबी और अभाव में जिंदगी काट रहा था, तभी साल 1944 में एक हादसा हुआ. घर में एक आगजनी में मुमताज की तीन बहन और दो भाई मारे गए.

मुमताज, अताउल्ला खां, उनकी बीवी और दूसरे बच्चे इस हादसे में बच गए क्योंकि हादसे के वक्त वो घर में नहीं थे. कोई काम और रोजगार न होने की वजह से परिवार भुखमरी के कगार पर पहुंच गया तब महज 9 साल की छोटी सी उम्र में मुमताज़ परिवार का पेट पालने के लिए फ़िल्मों में काम करने लगीं. मुमताज को पहली फिल्म मिली साल 1942 में और फिल्म का नाम था ‘बसंत’. फिल्म में मुमताज के अभिनय को देखकर बॉम्बे टॉकीज की मालकिन और अभिनेत्री देविका रानी ने मुमताज का नाम बदला और इस तरह मुमताज हो गईं मधुबाला. देविका रानी ने मधुबाला को बॉम्बे टॉकीज की फिल्म ‘ज्वार-भाटा’ में एक नए लड़के के साथ काम करने को कहा, लेकिन मधुबाला वो फिल्म न कर सकीं. फिल्म ‘ज्वार-भाटा’ हिट रही और इसी फिल्म सिनेमा को मिला एक महान अभिनेता जिसका नाम दिलीप कुमार है.

मधुबाला को फिल्म इंडस्ट्री में पहचान मिली साल 1947 में पंडित केदार शर्मा की फिल्म ‘नील कमल’ से. उस जमाने में केदार शर्मा बड़े फिल्म निर्देशकों में से एक थे. ये वही केदार शर्मा थे जिन्होंने फिल्म के सेट पर ठीक से काम न करने पर राज कपूर को झापड़ तक रसीद कर दिया था. फिल्म ‘नील कमल’ में वही राज कपूर मधुबाला के नायक थे और बतौर अभिनेता यह उनकी पहली फिल्म थी. फिल्म सफल रही. इस सिनेमा की वजह से फिल्म इंडस्ट्री को मधुबाला औऱ राज कपूर के तौर पर बेशकीमती सितारे मिले.

मधुबाला की पहली सफल फिल्म के बारे में बात की जाए तो वो थी फिल्म ‘महल’. साल 1949 में बॉम्बे टॉकीज की यह फिल्म कई मायने में अनोखी है. इस फिल्म के निर्माता थे बॉम्बे टॉकिज के मालिक हिमांशु रॉय के भतीजे अशोक कुमार, जो फिल्म के हीरे भी थे. इसके अलावा इस फिल्म को लिखा था कमाल अमरोही ने और इसी फिल्म से बतौर निर्देशक उन्होंने सिनेमा की दुनिया में कदम रखा. इसी फिल्म का एक गीत ‘आएगा आएगा आएगा…. आएगा आने वाला…. आएगा’ से लता मंगेशकर को भी पहचान मिली. फिल्म में खेमचंद प्रकाश के जादुई संगीत ने ऐसा समां बांधा कि वो गीत आज भी सुनने वालों के दिलों में बसा है. इस फिल्म की अपार सफलता ने मधुबाला को वो मुकाम दिया, जो उनकी मौत तक बरकरार रहा.

50 से 60 के दशक में फिल्म ‘फागुन’, ‘हावड़ा ब्रिज’, ‘कालापानी’ और ‘चलती का नाम गाड़ी’ जैसी सफल फिल्मों में काम करने के बाद मधुबाला की शोहरत हर तरफ फैल गई. 50 के दशक में मधुबाला मद्रास (चेन्नई) में एक फिल्म की शूटिंग कर रही थीं, उसी दौरान उनकी तबियत खराब हुई और पता चला कि उनके दिल में सुराख है. लेकिन मधुबाला ने अपनी बीमारी की बात किसी से नहीं बताई.

इसी दौर में मधुबाला दिलीप कुमार के नजदीक आ रही थीं. दोनों के बीच वो अजब सा इश्क था, जिसे बयां करना बड़ा मुश्किल है. दिलीप कुमार ने भरी अदालत में कहा, ‘हां मैं मधुबाला से इश्क करता हूं’ लेकिन यही बात मधुबाला को नागवार गुजरी कि दिलीप साहब ने जमाने के सामने उन्हें बेपर्दा कर दिया और दोनों दूर हो गए. दरअसल इस इश्क की शुरूआत फिल्म ‘तराना’ के सेट पर शुरू हुई. फिल्म बनने के दौरान ही मधुबाला दिलीप कुमार से मोहब्बत करने लगीं. लेकिन तभी बीआर चोपड़ा की फिल्म ‘नया दौर’ में दिलीप कुमार के साथ पहले से तय हिरोइन मधुबाला को फिल्म की शूटिंग के लिए मुंबई से भोपाल जाना था. मधुबाला के अब्बा अताउल्ला खां को लगा कि दिलीप कुमार ने बीआर चोपड़ा से कहकर शूटिंग लोकेशन भोपाल रखवाया है ताकि वो मधुबाला के साथ कुछ दिन मुंबई से दूर गुजार सकें.

इसी शक की बिना पर अताउल्ला खां ने मधुबाला को भोपाल भेजने से इंकार कर दिया. बाद में बीआर चोपड़ा ने फिल्म से मधुबाला को हटाकर वैजयंतीमाला को लिया और मामला कोर्ट में गया क्योंकि मधुबाला ने फिल्म के लिए पैसे लिए और शूटिंग से इंकार कर दिया था. इसी केस की सुनवाई के दौरान दिलीप कुमार ने भरी अदालत में मधुबाला से अपने इश्क का इजहार किया. दिलीप कुमार ने कोर्ट में कहा, ‘वे मधुबाला से मोहब्बत करते हैं और उनके मरने तक तक मोहब्बत करते रहेंगे’. इसी से बात बिगड़ी, पर बाद में मधुबाला ने दिलीप कुमार से कहा कि वो उनके अब्बा से माफी मांग लें लेकिन दिलीप कुमार ने इससे इंकार कर दिया और दोनों के रास्ते अलग हो गए. मधुबाला ने साल 1960 में किशोर कुमार से शादी कर ली.

मधुबाला से निकाह करने के लिए किशोर कुमार ने इस्लाम धर्म कबूल किया और किशोर कुमार से करीम अब्दुल हो गए. किशोर कुमार यह जानते थे कि मधुबाला ज्यादा दिनों की मेहमान नहीं है, लेकिन उनकी खुशी के लिए उन्होंने निकाह किया. मधुबाला की जिंदगी की सबसे बड़ी फिल्म मानी जाती है डायरेक्टर के आसिफ की ‘मुगल-ए-आजम’, लगभग 10 साल तक इस फिल्म की शूटिंग चली और एक नायाब फिल्म दर्शकों के सामने आई लेकिन बहुत कम लोगों को पता होगा कि यह फिल्म मधुबाला के लिए खुशी का सबब कम था और इस गम का ज्यादा था.

इस फिल्म में उन्हें दिलीप कुमार के सामने एक्टिंग करनी पड़ती थी, जिन्होंने उनके प्यार को ठुकरा दिया था. इसके बावजूद मधुबाला ने दिलीप कुमार के साथ वो फिल्म पूरी की. इस फ़िल्म में मधुबाला ने ‘अनारकली’ की यादगार भूमिका निभाई. साल 1960 में सिनेमा घरों में रिलीज हुई इस फिल्म ने सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए. फ़िल्म ने उस जमाने में सबसे अधिक पैसे कमाने वाली फ़िल्म रिकॉर्ड बनाया जो पूरे 15 सालों तक कायम रहा.

साल 1975 में रमेश सिप्पी की ‘शोले’ ने ‘मुगल-ए-आजम’ का रिकॉर्ड तोड़ा. फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ रिकॉर्ड सफल तो रही लेकिन बदकिस्मती से इस फिल्म के लिए मधुबाला को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का फिल्म फेयर पुरस्कार नहीं मिला. फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला बीना राय को उनकी फिल्म ‘घूंघट’ के लिए. इस अजीब फैसले और चयन के लिए उस समय के फिल्मफेयर अवॉर्ड कमेटी की खूब आलोचना हुई. ये कितनी बड़ी विडंबना है कि मधुबाला को उनके जीवन में कोई अवॉर्ड नहीं मिला. किशोर कुमार से शादी के बाद तो बीमार मधुबाला 9 साल तक ज़िंदा रहीं और 23 फरवरी 1969 को 36 साल की उम्र में हमेशा के लिए खामोश हो गईं.