शशि कपूर: पश्चिमी तबीयत का खांटी भारतीय अभिनेता

shush kapoor
शशि कपूर और उनकी पत्नी जेनिफर रंगमंच को समर्पित रहे।

संदीप मुद्गल

जाते हुए कदमों से/आते हुए कदमों से,
भरी रहेगी राहगुज़र/जो हम गए तो कुछ नहीं…

दिवंगत शशि कपूर के फिल्म करियर के कई रूप रहे। हिन्दी मुख्यधारा सिनेमा में आने से पहले उनकी पहचान इस्माइल मर्चेंट और जेम्स आइवरी के साथ मिलकर मर्चेंट-आइवरी फिल्म टीम के संस्थापक सदस्य के तौर पर बन चुकी थी। सिनेजगत के इतिहास में यह बात अपने आप में हैरान करने वाली है कि इस्माइल मर्चेंट और जेम्स आइवरी ने शशि कपूर को अपने साथी के तौर पर क्यों चुना था। हालांकि उस समय तीनों ही फिल्म जगत में नए थे। वैसे सिनेमा के इतिहास पर नजर डालें तो ऐसी कई और शुरुआतें दिखती हैं जहां नए निर्माता-निर्देशक और अभिनेताओं की जोड़ी ने इतिहास रचा हो। बेशक शशि कपूर अपने हाव-भाव और पसंद में ‘पश्चिमी तबीयत’ रखने वाले थे, लेकिन अपने बनाए सिनेमा को उन्होंने खांटी भारतीय जमीन के पास रखा। ‘जुनून’, ‘कलयुग’, ‘उत्सव’ में भारतीय पौराणिक और ऐतिहासिक विषयों के प्रति उनका प्रेम झलकता है। वहीं ‘36 चैरंगी लेन’ और ‘विजेता’ जैसी फिल्मों का निर्माण किसी भी अन्य देशकाल में आसानी के साथ किया जा सकता है। तो कहना न होगा कि शशि कपूर ग्लोबल सोच वाले विशुद्ध भारतीय फिल्मकार थे।

भारत के जिन गिने-चुने सिने कलाकारों को पुख्ता विदेशी पहचान मिली, शशि कपूर का नाम उनमें शायद सबसे ऊपर रखा जाएगा। हालांकि उनसे कुछ पहले आई. एस. जोहर भी अपनी पहचान बना चुके थे। एक भद्र अंग्रेज महिला से शादी करने का शशि कपूर को बड़ा फायदा मिला। जेनिफर खुद असाधारण अभिनेत्री थीं, लेकिन उन्होंने अपने फिल्म करियर को संजीदगी से नहीं लिया। इसके विपरीत, शशि और जेनिफर का रंगमंच प्रेम पृथ्वी थियेटर्स के तौर पर सामने आया, और वहां से खुद सिनेजगत को कितने नए कलाकार मिले, इसकी गिनती आज तक जारी है। इसलिए शशि कपूर को याद करने के एक या दो नहीं बल्कि तीन कारण बनते हैं।

शशि कपूर ऐसे अभिनेता रहे जिन्होंने अपने समय के समांतर सिनेमाकारों के महत्व को बहुत पहले समझ लिया था। गोविंद निहलानी, श्याम बेनेगल, अपर्णा सेन जैसे फिल्मकारों ने उनके लिए फिल्में बनाईं। सत्यजित राय से उनके बहुत अच्छे संबंध थे। ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में वह मुख्य भूमिका निभाना चाहते थे, लेकिन राय ने उन्हें नहीं लिया। एक साक्षात्कार में शशि कपूर ने इस संबंध में बहुत रोचक प्रसंग सुनाया था। सत्यजित राय उनके घर आए और शशि कपूर ने उनसे इस बारे में शिकायत की। सत्यजित राय ने कहा, ‘क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारी बीवी सचमुच तुम्हारे अलावा किसी दूसरे के साथ संबंध रखेगी या असंतुष्ट रहेगी ?’ शशि कपूर ने कहा कि यह सुनकर वह सकते में थे। राय जैसे गंभीर व्यक्ति यह कैसी बात कर रहे थे! सत्यजित राय ने आगे कहा, ‘ऐसा बिल्कुल नहीं हो सकता। इसीलिए मैंने तुम्हें यह भूमिका करने के लिए नहीं दी।’ दरअसल, राय फिल्म के प्रमुख किरदारों की बात कर रहे थे, जिनके साथ ऐसा ही होता है। शशि कपूर ने कहा कि बात समझ आने पर दोनों खुलकर हंसे थे।
हालांकि बाद में टीवी धारावाहिक ‘सत्यजित राय प्रेजेंट्स’ में शशि कपूर ने राय के काल्पनिक किरदार जासूस ‘फेलुदा’ की भूमिका जरूर निभाई थी।

नितांत प्रोफेशनल तौर पर काम करने वाले शशि कपूर का पेशेवराना रूप बिल्कुल विदेशी कलाकारों जैसा था। फिल्म के सेट पर हंसी-मजाक एक बात है, लेकिन निर्माता की तकलीफों को समझने और उनके हिसाब से चलने की ज़हमत बहुत ही कम कलाकार उठाते हैं। बिगड़ैल बाॅलीवुड में बेशक शशि कपूर ऐसे ही गिने-चुने अभिनेताओं में से एक थे। शायद यही कारण था कि उनके द्वारा बनाई गई फिल्मों के निर्माण के दौरान अन्य बड़े कलाकार भी कुछ ऐसे ही अनुशासित नजर आते थे।

कम ही लोगों को पता होगा कि पाकिस्तान में बनी ‘जिन्हा’ शशि कपूर की अंतिम फिल्मों में से थी। इस फिल्म में पर्दे पर ड्रैक्युला की भूमिका में मशहूर हुए क्रिस्टोफर ली ने मोहम्मद अली जिन्हा की भूमिका निभाई थी। शशि कपूर इसमें आर्केंजेल गैब्रियल की भूमिका में थे, जिनके सामने जिन्हा अपने जीवन का लेखा-जोखा करते दिखते हैं। फिल्म को ‘गांधी’ की सफलता को दोहराने की मंशा से बनाया गया था, लेकिन वह इतनी सफल नहीं रही।

मुख्यधारा सिनेमा का शशि कपूर सबका जाना-पहचाना है, फिर भी अपने परिवार के जरिए उन्होंने भारतीय सिनेमा की नींव डलते हुए देखी थी। पृथ्वीराज कपूर ने पहली भारतीय फिल्म ‘आलम आरा’ में अभिनय किया था। कुछ समय के लिए ही सही, राज कपूर के आर. के. स्टूडियोज से उस समय के कुछ बड़े साहित्यकार जुड़े थे। खुद शशि कपूर का साहित्य से गहरा संबंध था। एक समय कई पुस्तक विमोचनों के दौरान भी वह नजर आते थे। सच है, हिन्दी फिल्मों की ‘मेक बिलीव’ दुनिया में रहते हुए भी यदि कोई स्टार खुद को असली दुनिया से जोड़े रखता है, तो यह उसकी समग्र सफलता होती है। अनिता देसाई के उपन्यास ‘इन कस्टडी’ पर मर्चेंट-आइवरी की फिल्म ‘मुहाफिज़’ शशि कपूर के अभिनय जीवन की यादगार भूमिका रही। बेतरतीब बाॅलीवुड में उनका व्यक्तित्व सचमुच संजीदा सिनेमा के मुहाफिज़ का था।