मन्ना डे पुण्यतिथि : लागा चुनरी में दाग छुपाऊं कैसे

40 के दशक में भारत आजाद होने के लिए अंगड़ाई ले रहा था साथ ही भारतीय सिनेमा भी किशोरावस्था से निकलकर जवानी की दहलीज पर कदम रख रहा था. उस समय की ज्यादातर भारतीय फिल्में संगीत प्रधान होती थीं.

संगीतकार अनिल बिस्वास, खेमचंद प्रकाश, हुस्नलाल-भगतराम, सरस्वती बाई जैसे कई राग और स्वर के माहिर संगीत बुना करते थे और उसे सुरों से संवारा करते थे कुंदन लाल सहगल, सुरेंद्र सागर, हुस्नाबाई, मुकेश, रफी, जोहराबाई, अंबालावाली, अमीरबाई कर्नाटकी, राजकुमारी, सुरैया, पारुल घोष, शमशाद बेगम और मन्ना डे.

आज हम बात कर रहे हैं मन्ना डे की. माता-पिता ने बचपन में नाम दिया था प्रोबोध चंद्र डे. प्रबोध को चाचा केसी डे प्यार से मन्ना कहते थे, तब उन्हें एहसास भी न रहा होगा कि बालक मन्ना विश्व का प्रख्यात गायक बनेगा. मन्ना डे भारतीय सिनेमा और संगीत के एक ऐसी किंवदंती बने कि आज भी संगीत का रियाज करने वाले मन्ना की पूजा करते हैं.

1 मई 1919 को पूर्ण चंद्र डे और महामाया डे के घर जन्म हुआ प्रबोध का. जगह थी उत्तरी कलकत्ता का सिमरेला, 9 मदन घोष लेन. मन्ना पढ़ने-लिखने में तेज थे घरवालों ने इंदु बाबर पाठशाला में दाखिला दिलवा दिया. उसके बाद मन्ना ने इंटरमीडिएट की पढ़ाई स्कॉटिश चर्च कॉलेजिएट स्कूल से और ग्रेजुएशन की पढ़ाई विद्यासागर कॉलेज से की.

पिता पूर्ण चंद डे चाहते थे कि मन्ना वकालत की पढ़ाई करें, लेकिन मन्ना को तो गायक बनना था क्योंकि मन्ना के चाचा केसी डे संगीतकार थे, घर में गीत-संगीत का माहौल था. एक दिन मन्ना घर में कमरे के बाहर कोई गीत गुनगुना रहे थे. चाचा केसी डे और दोस्त दबीर खान ने सुना और मन्ना को बुलाया. दोनों संगीतकारों ने मन्ना से रियाज करने को कहा. उस दिन से मन्ना की विधिवत संगीत शिक्षा शुरू हो गई.

धीरे-धीरे मन्ना के गायन में निखार आने लगा और वो पूर्णता की ओर बढ़ने लगे. इसी दरम्यान साल 1942 में मन्ना के चाचा केसी डे फिल्मों में संगीतकार बनने के लिए बंबई (मुंबई) जाने लगे. चाचा ने मन्ना से कहा, ‘मन्ना तू भी चल, मैं अकेले कैसे रहूंगा. वहां मेरा ख्याल कौन रखेगा’. दरअसल मन्ना के चाचा केसी डे नेत्रहीन थे और मन्ना ही उनकी सेवा करते थे. केसी डे अविवाहित थे और मन्ना को वह अपने बेटे की तरह मानते थे.

इस तरह किस्मत मन्ना को माया नगरी लेकर आई. यहां पर मां-बाप से दूर, घर से दूर मन्ना के लिए केवल संगीत का रियाज और चाचा केसी डे की देखभाल का जिम्मा था. यहां मन्ना को केसी डे के साथ-साथ उनके सहयोगी और मित्र सचिन देव बर्मन से संगीत सिखने का सौभाग्य मिला. इसके अलावा मन्ना ने उस्ताद अमन अली खान और अब्दुल गहमान खान से हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत का भी ज्ञान लिया.

मन्ना को प्लेबैक सिंगिंग में पहला ब्रेक साल 1943 में मिला, फिल्म थी ‘तमन्ना’. इस फिल्म में मन्ना और सुरैया ने गीत गाए थे. हालांकि इससे पहले मन्ना फिल्म ‘रामराज्य’ में कोरस (समूह गायन) के रूप में गा चुके थे. फिल्म ‘तमन्ना’ के बारे में एक दिलचस्प बात यह है कि ‘तमन्ना’ एकमात्र ऐसी फिल्म फिल्म थी, जिसे राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने भी देखा था. इस तरह सिनेमा में मन्ना के गायन की शुरूआत हुई. इस फिल्म में संगीत मन्ना के चाचा केसी डे का था. मन्ना और सुरैया का गाना पूरे देश में हिट हो गया.

इसके बाद बंबई नगरी में मन्ना को सभी पहचानने लगे. लेकिन मन्ना को दूसरा गीत गाने में 7 साल लग गए. साल 1950 में मन्ना ने एकल (सिंगल) गीत गाया. फिल्म थी ‘मशाल’. गीत के बोल थे ‘ऊपर गगन विशाल’ और इसमें संगीत था सचिन देव बर्मन का.

इसके बाद मन्न ने साल 1952 में मन्ना ने एक ऐसी फिल्म के लिए दो अलग-अलग भाषाओं में गाया कि मन्ना फिल्म इंडस्ट्री में पूरी तरह से स्थापित हो गए. फिल्म का नाम था ‘अमर भूपाली’ और यह फिल्म बांग्ला और मराठी में बनी थी.

मन्ना केवल शब्दों को स्वर नहीं देते थे, बल्कि मन्ना के गीतों में भाव और उनके सजीव चित्रण का आभास होता था. शायद यही वजह थी कि छायावाद के आधार स्तंभ और हिंदी साहित्य के कवि हरिवंश राय बच्चन ने अपनी अमर रचना ‘मधुशाला’ को स्वर देने के लिए मन्ना डे को चुना.

मन्ना ने साल 1951 में राज कपूर की फिल्म ‘आवारा’ में ‘तेरे बिना चाँद ये चाँदनी’ गाया. इस फिल्म में संगीत था शंकर-जय किशन का. फिल्म ‘आवारा’ में गाए गीत ने मन्ना को वो शोहरत दी कि उस समय के संगीतकारों की पहली पसंद मन्ना हो गए. हिंदी फ़िल्मों में राग पर आधारित कोई गाना होता, तो उसके लिए संगीतकारों की पहली पसंद मन्ना ही होते थे.

इसके बाद तो फिल्म आवारा, श्री420, झनक-झनक पायल बाजे, दो आखें-बारह हाथ, नरसी भगत, बरसात की रात, जिस देश में गंगा बहती है, काबुलीवाला, चित्रलेखा, वक्त, तीसरी कसम, उपकार, पड़ोसन, नीलकमल, इक फूल दो माली, मेरा नाम जोकर, आनंद, रेशमा और शेरा, बावर्ची, सीता और गीता, शोर, जंजीर, बॉबी, शोले, अमर अकबर एंथनी, मैं तुलसी तेरे आंगन की, सत्यम शिवम सुंदरम और क्रांति जैसी न जाने कितनी फिल्मों में आज भी मन्ना की आवाज हमें उस सुनहरे दौर की याद दिलाती है.

मन्ना ने 18 दिसंबर 1953 को केरल की सुलोचना कुमारन से शादी की. मन्ना की दो बेटियां हैं, बड़ी बेटी का नाम सुरोमा है और छोटी बेटी का नाम सुमिता है.

मन्ना बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. गायन के क्षेत्र में मन्ना की शैली अद्भुत थी. एकबार गायक मोहम्मद रफी से पत्रकारों ने पूछा कि आप अपना गीत सुनते हैं. इसके जवाब में रफी साहब ने कहा, ‘नहीं, मुझे जब भी सुनना होता है तो मैं मन्ना दा के गीत सुनता हूं’.

मन्ना डे रवींद्र संगीत के भी मझे हुए खिलाड़ी थे. बांग्ला के अलावा मन्ना ने भारत की लगभग सभी भाषाओं और क्षेत्रीय बोलियों में भी गीत गाए. मन्ना ने अपने जीवन में 3500 से अधिक गाने रिकॉर्ड कराए. उनके गीत आज भी देश और दुनिया को मंत्रमुग्ध कर रहे हैं.

अगर हम पुरस्कार और सम्मान की बात करें तो मन्ना को साल 1970 में दो नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिले. पहला अवॉर्ड बांग्ला फिल्म ‘निशि पद्मा’ में प्लेबैक सिंगिंग के लिए वहीं दूसरा अवॉर्ड फिल्म ‘मेरे हुज़ूर’ में भी प्लेबैक सिंगिग के लिए. साल 1971 में भारत सरकार ने मन्ना को पद्मश्री से सम्मानित किया.

साल 1972 में मन्ना डे को फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ के गीत ‘ए भाई जरा देख के चलो’ के लिए पहला फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला. साल 2005 में भारत सरकार ने मन्ना को पद्मभूषण से नवाजा और साल 2007 में भारत सरकार ने अपने सर्वोच्च फिल्म पुरस्कार दादा साहब फाल्के सम्मान भी मन्ना को दिया. साल 2011 में मन्ना डे को फिल्म फेयर का लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड दिया गया.

24 अक्तूबर 2013 की सुबह मन्ना डे का 94 साल की उम्र में बंगलुरू के एक अस्पताल में निधन हो गया है.