साहिर लुधियानवी पुण्यतिथि : गाता जाए बंजारा

‘औरत ने जनम दिया मर्दों को, मर्दों ने उसे बाज़ार दिया जब जी चाहा कुचला मसला, जब जी चाहा दुत्कार दिया’ ये साहिर लुधियानवी की कलम से निकले वो अल्फाज हैं, जो इस मर्दवादी दुनिया पर हथौड़े सरीखा प्रहार करते हैं.

साहिर के गीतों में दयनीय समाज की झलक मिलती है, पता चलता है कि आम आदमी किस तरह रोज मर-मर कर जी रहा है. साहिर जिंदगी के फलसफे, जो एक आम आदमी रोज गुनगुनाता है, उसे बड़ी आसानी से अपने गीतों में बंया कर देते थे. फिल्म ‘प्यासा’ का गीत ‘जिन्हें नाज है हिन्द पर वे कहां हैं’ सुनकर प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरु भी रो दिए थे.

साहिर लफ्जों के असल जादूगर थे, वो कुछ इस अदा से लिखते थे कि हर अल्फाज सीधे दिल में घर कर जाते थे. कलम की बदौलत साहिर ने अपने म्यार को ऊंचा कर लिया है कि आज भी लाखों लोग उनकी शायरी के मुरीद हैं. फिल्म इंडस्ट्री में साहिर की कलम बीना रूके लगभग 3 दशक तक लगातार चलती रही. सैकड़ों ऐसे गीत लिखे साहिर ने जो आज और आने वाले कल की पीढ़ी गुनगुनाएगी और सोचेगी कि कोई साहिर थे, जो इसे लिखकर दुनिया से रूखसत हो लिए.

8 मार्च, 1921 को एक जमींदार मुस्लिम गुज्जर परिवार में पैदा होने वाले साहिर का ताल्लुक पंजाब के लुधियाना से था. इसी का असर था कि साहिर ने अपने नाम में लुधियानवी जोड़ लिया. साहिर के बचपन का नाम अब्दुल हयी था. कहने को साहिर जमींदार परिवार में पैदा हुए लेकिन उनके अय्याश अब्बा फजल मुहम्मद ने सब कुछ बर्बाद कर दिया.

साल 1934 में जब साहिर की उम्र केवल 13 साल की थी, जब साहिर के अब्बा फजल मुहम्मद ने दूसरी शादी कर ली. फजल मोहम्द ने कुल 12 औरतों से निकाह किया. साहिर उनकी 11वीं बेगम सरदार के बेटे थे और खानदान के इकलौते चिराग क्योंकि बाकी बेगमों से फजल मोहम्मद को कोई औलाद नहीं हुई.

फजल मोहम्मद की अय्याश हरकतों से तंग आकर सरदार बेगम ने तलाक ले लिया और अपने भाई के पास रहने लगी क्योंकि वो साहिर की परवरिश वैसे माहौल में नहीं करना चाहती थी. सरदार बेगम ने साहिर के लिए कुछ ख्वाब बुने थे. वो चाहती थीं कि साहिर को मुकम्मल तालीम मिले और बड़े होने तक वो अपने अब्बा फजल महोम्मद के साए से दूर रहें. साहिर अपनी मां सरदार बेगम को बहुत मानते थे और तहे दिल से उनकी इज्जत करते थे. साहिर की कोशिश रहती थी कि कभी मां को कोई दुःख न पहुंचे.

साहिर की तालीम लुधियाना के खालसा हाई स्कुल से हुई. इसके आगे उन्होंने लुधियाना के चंदर धवन शासकीय कॉलेज में दाखिल लिया. यही पर साहिर अपनी शायरी और ग़ज़लो के कारण नाम कमाने लगे. उसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए साहिर लाहौर आ गए. लड़कियां साहिर के कलम की दीवानी हुआ करती थीं. साहिर भी बहुत बड़े इश्कबाज थे. उनका सबसे पहला इश्क़ प्रेम चौधरी से हुआ, प्रेमा हिंदू थी और ऊंचे घराने से ताल्लूक रखती थी. नतीजा यह हुआ कि प्रेमा के पिता ने साहिर को लाहौर कॉलेज से निकलवा दिया.

इसके बाद भी साहिर का इश्क बेकाबू रहा, फिर उनकी जिंदगी में आईं इसर कौर. इसर से बस कुछ ही दिनों का राब्ता रहा और बात यहां भी नहीं बनी. इसके बाद साहिर के करीब आईं अमृता प्रीतम. अमृता खुद अपनी किताब ‘रसीदी टिकट ‘ में साहिर से अपने इश्क़ की रूमानियत को बयां किया है.

साहिर और अमृता दोनों ही शायरी करते थे. साहिर ने अमृता से अपना इश्क़ दुनिया के सामने ज़ाहिर नहीं किया, वहीं अमृता ने साहिर के गुजारे हर पल को कागज पर उतार दिया. अमृता ने बेबाकी से लिखा है, ‘साहिर घंटों बैठा रहता और बस सिगरेटें फूंकता रहता और कुछ न कहता. उसके जाने के बाद में उन बचे हुए सिगरेटों के बटों को संभालकर रख लेती, फिर अकेले में पीती और साहिर के हाथ और होंठ महसूस करती’. एक बार एक इंटरव्यू में अमृता ने साफ कहा, ‘अगर इमरोज़ मेरे सर पर छत है तो साहिर मेरा आसमां.’ अमृता ने साहिर का बहुत इंतज़ार किया पर वे नहीं आए.

इसी दरम्यां साहिर को सिंगर सुधा मल्होत्रा से इश्क़ हो गया. सुधा मलहोत्रा ने 60 के दशक में एक से बढ़कर एक गाने गाए. सुधा ने साहिर का लिखा भी एक गीत गाया, ‘तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक़ है तुमको. मेरी बात और है मैंने तो मोहब्बत की है’. साहिर सुधा से भी दूर हो गए तो इस तरह इश्क के दरिया में कई बार डुबने वाले साहिर सारी उम्र कुवारे रहे.

साहिर कि उम्र उस वक्त 24 साल की थी, जब उनकी किताब ‘तल्ख़ियां’ छपकर बाज़ार में आ चुकी थी. इतनी कम उम्र में ही वो उर्दू अख़बार ‘अदबे-लतीफ़’, ‘शाहकार’ और ‘सवेरा’ के संपादक बन चुके थे. फैज की तरह साहिर की कलम भी पाकिस्तान में आजाद न थी, साहिर को बंदिशें पसंद नहीं थी.

वो हुकूमते-पाकिस्तान के नाकाबिले पाबंदियों से आजीज आकर हिंदुस्तान आ गए. उस दौर में दोनों मुल्क जवान हो रहे थे, साहिर भी कलम से जवान हो रहे थे. वो बात करते थे मजदूरों की, उनके भूख की, उनके तरक्की की. साहिर की कलम ने मज़दूरों और मज़लूमों के लिए लिखा…

‘आज से ऐ मज़दूर किसानो! मेरे राग तुम्हारे हैं

फ़ाक़ाकश इंसानों! मेरे जोग-बिहाग तुम्हारे हैं

आज से मेरे फ़न का मक़सद ज़ंजीरें पिघलाना है

आज से मैं शबनम के बदले अंगारें बरसाऊंगा…’

लेकिन ऐसा नहीं है कि साहिर ने इश्क को नहीं लिखा, रूमानियत को नहीं लिखा. साहिर दोस्तों के दोस्त हुआ करते थे. उन्हें महफ़िलें जमाने का बड़ा शौक था. उनकी महफिलों से मुंबई की रातें गुलजार हुआ करती थीं. रात भर चलते वाली दावतों में महंगी शराब और शेर-ओ-शायरी के दौर चला करते थे.

उनकी महफिल में शामिल होना बड़ी बात माना जाता था. फिल्म इंडस्ट्री में कहाजाता था कि फलां साहब साहिर की सोहबत में रात गुजारते हैं. उनकी महफिल में राजिंदर सिंह बेदी, कृष्ण चन्दर, सरदार जाफ़री और जांनिसार ‘अख़्तर’ जैसे फिल्म इंडस्ट्री के नामी लोग शरीक होते थे.

साहिर को फिल्म इंडस्ट्री में ले आने वाले साहब थे जानेमाने गीतकार प्रेम धवन. साहिर को पहला ब्रेक साल 1951 में एआर कारदार ने अपनी फिल्म ‘नौजवान‘ में दिया. साहिर ने ‘नौजवान’ के सारे गीत लिखे. इसके बाद साहिर के गुरूदत्त की फिल्म ‘प्यासा’ के लिए गीत लिखे.

‘प्यासा’ जितना गुरुदत्त के नाम से जानी जाती है उतना ही साहिर के नाम से भी. इसके बाद तो फिल्म इंडस्ट्री में में लोग कहनेलगे कि साहिर जिस फिल्म में हैं, उसका हिट होना तय है. साहिर ने ‘फिर सुबह होगी’, ‘फंटूश’, ‘बाज़ी’, ‘काग़ज़ के फूल’, ‘चौदहवीं का चांद’, ‘शगुन’, ‘नया दौर’, ‘काजल’, ‘चंद्रलेखा’, ‘कभी-कभी’ और इस तरह की न जाने कितनी फिल्मों के लिए गीत लिखे, जो आज भी अमर हैं.

एक समय तो ऐसा था कि फिल्म के निर्देशक साहिर से पूछकर फिल्म के म्यूजिक डायरेक्टर को रखते थे. बीआर राज और यश चोपड़ा की लगभग सभी फिल्मों में साहिर ने ही गीत लिखे.

साहिर ने जावेद अख़्तर की बेरोज़गारी के दिनों में मददकी और 200 रुपये दिए, बाद में जब साहिर जावेद से मिलते तो मजाक में अपने उस 200 रुपये का तकाजा करते. हालांकि जावेद उनके 200 रुपये लौटा सकते थे, लेकिन साहिर की शख्सीयत को देखते हुए उन्हें मुनासिब न लगा.

उस 200 की कर्जदारी के मजाक का सिलसिला 25 अक्टूबर, 1980 को थम गया, जब साहिर खामोश हो गए. साहिर को सुपुर्द-ए-खाक करने के बाद जावेद क़ब्रिस्तान से निकल रहे थे, तभी एक शख़्स पीछे से आया और बोला, ‘जावेद, मैं ख़ाली हाथ घर से आ गया था क़ब्रिस्तान वाला साहिर को दफ़्नाने के पैसे मांग रहा है.’ जावेद ने पूछा ‘कितने?’ उसने कहा – ‘200’