सलिल चौधरी के कारण लता मंगेशकर को मिला पहला फिल्मफेयर

मन में कई बार एक सवाल कौंधता है कि आखिर बंगाल की मिट्टी में ऐसा क्या है कि जिसने विज्ञान, कला, साहित्य और सिनेमा के कई ऐसी हस्तियों को जन्म दिया, जिनके नाम और काम पर आज भी पूरा देश गर्व करता है. मसलन अगर हम सिनेमा की ही बात करें तो बंगाल की धरती पर एक से बढ़कर एक फिल्म अभिनेता, निर्देशक, निर्माता, गायक और संगीतकार हुए.

अशोक कुमार गांगुली, प्रदीप, सुचित्रा सेन, शर्मिला टैगोर, विद्या बालन, मौसमी चटर्जी, सत्यजीत रे, मृणाल सेन, रितिक घटक, कुंदन लाल, विमल राय, सुजय घोष, अनुराग बसु, सुजीत सरकार, मन्ना डे, हेमंत कुमार, किशोर कुमार, कुमार सानू, श्रेया घोषाल जैसी शख्सियतों ने सिनेमा को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई.

इसी क्रम में आज हम बात कर रहे हैं जानेमाने संगीतकार सलिल चौधरी की, जिन्हें भाररतीय सिनेमा जगत प्यार से सलिल दा कहता है. सलिल चौधरी का जन्म 19 नवम्बर, 1923 को पश्चिम बंगाल के गाजिपुर में हुआ था. उनके पिता ज्ञानेन्द्र चौधरी आसाम के चाय बागान में डॉक्टर थे, उन्हें संगीत का भी बहुत शौक़ था. बचपन से ही सलिल दा घर में ग्रामोफोन रिकॉर्ड बजते रहते थे और घर के बाहर चाय बागान मज़दूरों के गीत सुनई देते थे. कहते हैं कि 8 साल की उम्र में सलिल दा बेहतरीन बांसुरी बजाने लगे थे.

सलिल दा के बड़े भाई अपना ऑर्केस्ट्रा चलाते थे, जिसकी वजह से सलिल दा कई और वाद्य बजाना सीख गए, जिनमें इसराज, वॉयलिन और पियानो प्रमुख थे. उनके पिता चाय बागानों में काम करने वाले गरीब मजदूरों-कुलियों को साथ लेकर नाटकों का मंचन किया करते थे, जिनमें ब्रिटिश शासकों के अन्याय और शोषण के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी जाती थी. सलिल दा जब 22 साल के हुए तो वो पढ़ाई के लिए कलकत्ता चले आए. सलिल दा ने बंग्बाशी कॉलेज में एडमिशन लिया. छात्र जीवन से ही वो संगीत कंपोज करने लगे थे.

उसी दौरान सलिल चौधरी इंडियन पीपुल थिएटर एसोसिएशन यानी ‘इप्टा’ से भी जुड़ गए. इप्टा के दिनों को याद करे हुए सलिल दा ने एक इंटरव्यू में बताया था कि उस दौर में गीत लिखने वाले, ढोल बजाने वाले और गाने वाले लोग अक्सर किसान होते थे. इप्टा के जरिए सलिल दा कि मुलाकात मजरूह सुल्तानपुरी, साहिर लुधियानवी, कैफी आजमी और बलराज साहनी जैसे नामों से हुई. इप्टा की सोहबत सलिल दा की रचनात्मकता को ऊंची उड़ान दे रहा था.

सलिल दा ने सबसे पहले बंगाली फिल्म में संगीत दिया और फिल्म का नाम था ‘परिबोर्तन’ (परिवर्तन), जो साल 1949 में रिलीज हुई. इसके बाद सलिल दा ने कोलकाता के एक ग़रीब रिक्शावाले पर आधारित एक कहानी लिखी थी, जिस पर इसी नाम से बांग्ला फिल्म बनी. बाद में निर्देशक बिमल रॉय ने सलिल दा की उसी कहानी पर हिंदी में ‘दो बीघा जमीन’ के नाम से फिल्म बनाई. साल था 1953. फिल्म ‘दो बीघा जमीन’ को जबर्दस्त कामयाबी मिली. इस फिल्म को फिल्मफेयर अवॉर्ड से लेकर नेशनल अवॉर्ड तक मिला.

राज कपूर की फ़िल्मों में संगीत की जिम्मेदारी शंकर-जयकिशन की जोड़ी पर ही रहती थी लेकिन जब राज कपूर ने लीक से हटकर फिल्म ‘जागते रहो’ बनाई तो उसके संगीत का ज़िम्मा सलिल दा को सौंपा. इसी फिल्म के क्लाईमैक्स का गीत आरके बैनर से नर्गिस की विदाई का अंतिम गीत है. गीत के बोल हैं ‘जागो मोहन प्यारे’ इसे स्वर दिया लता मंगेशकर ने.

इस गीत की रिकार्डिंग में राज कपूर ने शंकर-जयकिशन को विशेष रूप से बुलाया था कि वे सलिल दा के संगीत से सिख सकें कि गीत के सप्तक में किस तरह से वाद्ययंत्रों का धुन निकलता है. सलिल दा के सिनेमा कॅरियर में गीतकार शैलेन्द्र की कलम का भी बहुत बड़ा योगदान है.

शैलेन्द्र-सलिल की जोड़ी ने अजब तेरी दुनिया हो मोरे रामा.. (दो बीघा ज़मीन, 1953), जागो मोहन प्यारे.. (जागते रहो, 1956), आजा रे मैं तो कब से खड़ी उस पार, टूटे हुए ख्वाबों ने.. (मधुमति, 1958), अहा रिमझिम के प्यारे-प्यारे गीत लिए आई रात सुहानी.. (उसने कहा था, 1960), गोरी बाबुल का घर है अब विदेशवा.. (चार दीवारी, 1961), चांद रात तुम हो साथ.. (हाफ़ टिकट, 1962), ऐ मतवाले दिल जरा झूम ले.. (पिंजरे के पंछी, 1966) जैसी कई सुपरहिट फिल्मों के गीत शामिल हैं. शैलेंद्र के बाद सलिल चौधरी ने गुलज़ार और योगेश से गीत लिखवाए.

साल 1959 से पहले फिल्मफेयर अवॉर्ड गायकों को नहीं देने का चलन था. गायकों को फिल्मफेयर अवॉर्ड दिलाने की लड़ाई लता मंगेशकर ने लड़ी और लता को जब पहला फिल्मफेयर मिला तो तो उस गीत को तैयार करने वाले संगीतकार थे सलिल दा. वो गीत गीत था ‘आ जा रे मैं तो कब से खड़ी इस पार’ और फिल्म का नाम था ‘मधुमती’. गायक मुकेश सलिल दा के पसंदीदा थे. सलिल दा ने मुकेश से कुछ बेहद खूबसूरत गीत गवाए हैं. जैसे ‘कैसे मनाऊं पियवा’, ‘ये दिन क्या आये’, ‘कई बार यूं भी देखा है’, ‘नैन हमारे सांझ सकारे’, ‘कहीं दूर जब दिन ढल जाये’ या फिर मधुमती का गीत ‘सुहाना सफर और ये मौसम हसीं’.

फ़िल्म ‘रजनीगंधा’ में सलिल दा ने ‘कई बार यूं भी देखा है’ गीत को सुरों से सवांरा था, जिसके लिए मुकेश को पहला राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. सलिल दा ने लगभग 75 हिन्दी फिल्मों और 26 मलयालम फिल्मों के अलावा बांग्ला, तमिल, तेलुगु, कन्नड, गुजराती, मराठी, असमिया और ओडिया फिल्मों में भी संगीत दिया था.

गुलजार की ग़ज़ल ‘शाम से आंख में नमी सी है’ को आवाज दी है जगजीत सिंह ने लेकिन कम ही लोगों को पता होगा कि इस ग़ज़ल सबसे पहले संगीतबद्ध सलिल दा किया था और मुकेश ने इसे अपने स्वरों से सजया था.

सलिल दा ने अपने लंबे करियर में कई सुपरहिट फिल्मों में संगीत दिया. जिसमें ‘जागते रहो’, ‘मुसाफिर’, ‘मधुमती’, ‘काबुलीवाला’, ‘सारा आकाश’, ‘आनंद’, ‘रजनीगंधा’, ‘मौसम’ जैसी फिल्में शामिल हैं. सलिल चौधरी ने ज्योति चौधरी से शादी की थी. ज्योति चौधरी से सलिल दा को तीन बेटियां थीं. बाद में सलिल दा ने गायिका सबिता चौधरी से दूसरी शादी की. 5 सितंबर 1995 को महान संगीतकार सलिल चौधरी ने दुनिया को अलविदा कह दिया.