90 के दशक के ‘एंग्री यंगमैन’ थे सनी देओल

‘जब यह ढाई किलो का हाथ किसी पे पड़ता है तो आदमी उठता नहीं, उठ जाता है’. ये मशहूर डायलॉग साल 1993 में आई सुपरहिट फिल्म ‘दामिनी’  का है, जब अभिनेता सनी देओल वकील चड्ढा यानी अमरीश पुरी को धमकाते हैं. पूरा सिनेमा हॉल तालियों से गूंज उठता है,  लोग अपनी सीट से उछलते हुए सीटियां बजाने लगते हैं.

ये जलवा था सनी देओल का. साल 1983 में फिल्म ‘बेताब’ से फिल्म इंडस्ट्री में डेब्यू करने वाले रूमानियत के हीरो सनी देओल धीरे-धीरे 80 और 90 के दशक के एंग्री यंग मैन बन जाते हैं. ‘दामिनी’, ‘घातक’, ‘घायल’, ‘इंतकाम’, ‘सलाखें’, ‘जीत’ और ‘जिद्दी’ जैसी कई फिल्मों में सनी देओल एक आम आदमी की लड़ाई लड़ते दिखाई देते हैं.

सिनेमा के लिहाज से 90 का दशक कई मामलों में दुविधाओं का दशक था. मसलन अमिताभ खुद को फिर से स्थापित करने के लिए निर्देशकों से फिल्म मांग रहे थे. अपने जमाने के सुपरस्टार रहे राजेश खन्ना ‘बी’ ग्रेड की फिल्में करने लगे. वहीं उस दौर में सनी देओल का सिनेमा के पर्दे पर दिखाई देना, फिल्म के हिट होने की गारंटी माना जाता था.

सनी देओल की डायलॉग डिलेवरी इतनी जबरदस्त थी कि दर्शक फिल्म की कहानी को सनी के बोलने की अदा से याद कर लेते थे. फिल्म ‘दामिनी’ में गोविंद यानी सनी देओल कहता है, ‘चिल्लाओ मत, नहीं तो ये केस यहीं रफा-दफा कर दूंगा. न तारीख़ न सुनवाई, सीधा इंसाफ. वो भी ताबड़तोड़’ या फिर साल 1996 में आई फिल्म ‘घातक’ में काशी यानी सनी देओल कात्या यानी डैनी से कहता है, ‘ये मज़दूर का हाथ है कात्या, लोहा पिघलाकर उसका आकार बदल देता है! ये ताकत ख़ून-पसीने से कमाई हुई रोटी की है. मुझे किसी के टुकड़ों पर पलने की जरूरत नहीं’.

इसी क्रम में एक और डायलॉग याद आ रहा है फिल्म ‘जीत’ का, जब करन यानी सनी कहता है ‘नहीं! तुम सिर्फ मेरी हो काजल, और किसी की नहीं हो सकती. हम दोनों के बीच अगर कोई आया तो समझो वो मर गया. काजल! इन हाथों ने सिर्फ हथियार छोड़े हैं, चलाना नहीं भूले’.

90 के दशक की फिल्मों के ऐसे संवाद किसी सलीम-जावेद की कलम से नहीं निकले, न ही किसी अमिताभ ने इनको पर्दे पर बोला. ये साधारण सी कद-काठी वाले सनी देओल ने बोले थे, वे डायलॉग आज भी कहीं सुनाई देते हैं तो उस दशक में जवान हुए हर शख्स को अपने बीते हुए दिन याद आ जाते हैं.

फिल्म में कोई ग्रामर हो या न हो, सनी का डायलॉग जरूर होना चाहिए. धीरे-धीरे सनी फिल्मों में जवान होते रहे. साल 1997 में जेपी दत्ता की फिल्म आई ‘बॉर्डर’.  सनी मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी के किरदार में पाकिस्तान के खिलाफ जंग जीतते हैं. इस फिल्म में मेजर कुलदीप सिंह चांदपुरी यानी सनी भैरव सिंह यानी सुनील शेट्टी को कहते हैं, ‘भैरों सिंह, आज मरने की बात की है, दोबारा मत करना. दुनिया की तारीख़ शाहिद है कि मरकर किसी ने लड़ाई नहीं जीती. लड़ाई जीती जाती है दुश्मन को ख़तम करके’.

इस तरह सनी देओल हिंदी फिल्मों में अपना दबदबा बनाए रखते हैं. साल 2001 में सनी की एक और फिल्म आई, जिसने दर्शकों के बीच जमकर गदर काटा. फिल्म ‘गदर’ में जब सनी देओल हैंडपंप उखाड़ते हैं, तो दर्शक सीटियां बजाते हुए पाकिस्तान को ललकारने लगते हैं. एक्शन, ड्रामा और रोमांस से भरे इस फिल्म में सनी देओल यानी तारा सिंह सकीना के अब्बा यानी अमरीश पुरी से कहते हैं, ‘बाप बनकर बेटी को विदा कर दीजिए, इसी में सबकी भलाई है, वरना अगर आज ये जट बिगड़ गया तो सैकड़ों को ले मरेगा’.

इस तरह की संवाद अदायगी से सनी दर्शकों के बीच एक खास जगह बनाते हैं. फिल्म कि दुनिया में लगभग 3 दशकों से दर्शकों का मनोरंजन कर रहे सनी देओल आज राजनीति में आ गए हैं और बीजेपी के सांसद हैं, लेकिन आज भी लोग सनी देओल को तारा सिंह, देवा, काशी और करन जैसे किरदारों की वजह से याद करते हैं.