फिल्म के लिए कहानी कैसे चुनें?

Devendra, Kshama Karo He Vats
"क्षमा करो हे वत्स" देवेंद्र की बहुचर्चित कहानी है। विभिन्न आलोचकों ने इसे नब्बे के बाद लिखी गयी सर्वश्रेष्ठ कहानियों में शुमार किया है।

संजीव कुमार झा

अगर आप लोगों ने फ्रांसिसी फिल्मकार कोस्तागावरास की मशहूर फिल्म मिसिंग देखी हो, तो आपने देखा होगा कि कैसे खेल के मैदान से ग़ायब हो गए अपने बेटे को खोजता हुआ एक पिता भय, आतंक और हत्याओं का गवाह बनता है । अपने समय की क्रूरतम सच्चाईयों का सामना करता हुआ वह अपने बेटे की घर-वापसी के अलावा और कुछ नहीं चाहता । गुमशुदा बेटे की तलाश में फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, हमे पता चलने लगता है कि पुलिस, प्रशासन, ब्यूरोक्रेट्स, खुफिया विभाग, राजनीतिक पार्टियां अथवा ऐसी ही सत्ताएं बाहर से जैसी दिखती हैं, भीतर से वैसी नहीं हुआ करतीं…..

यही वह बिन्दु है जहां पर हिंदी के प्रतिष्ठित कथाकार  देवेन्द्र की कहानी ‘क्षमा करो हे वत्स न सिर्फ अपनी व्यापकता ग्रहण करती है बल्कि कहानी के भीतर छिपी सिनेमाई संभावनाओं को भी उजागर करती है । कहानी में एक बेटे के गुम हो जाने के बाद उसकी तलाश में परेशान पिता को होने वाली दिक्कतों के पीछे लेखक ने लगातार अमानवीय होते जा रहे प्रशासन-तंत्र, व्यवस्था और मनुष्य के चेहरे को बेनकाब किया है । जो अंततः अमानवीय कृत्यों के खि़लाफ खड़ी एक मानवीय कहानी का रूप अख्तियार करती है । और अगर आपने उदय प्रकाश से साक्षात्कार की किताब मेरी उनकी बात पढ़ी हो तो आपने पढ़ा होगा कि देवेन्द्र की इसी कहानी का उल्लेख करते हुए उदय प्रकाश ने यह चिंता ज़ाहिर की थी कि ‘कहीं ऐसा न हो कि हिन्दुस्तान भी हिंसा, रक्तपात, सट्टेबाज़ी और तमाम तरह के अपराधों से भरे हुए देश में या ब्राजील जैसे माफिया तंत्र में बदलता चला जाए !’

यह कहानी दरअसल मनुष्य की ओर से हिंसा के खिलाफ आवाज़ उठाती है, जो भ्रष्ट अफसरशाही और व्यवस्था के नाम पर पनपते हैं । कुछ-कुछ कोस्तागावरास की ही एक दूसरी फिल्म ‘जे़ड’ (Z) के जैसी । कहा जा रहा है कि हिंसा अब साहित्य में अचानक उभार लेती दिख रही है । सर्बिया से लेकर फिलिस्तीन, इराक, चीन, पाकिस्तान और हिन्दुस्तान में भी हिंसक दास्तानें साहित्य में दर्ज हो रही हैं । हिंसा एक ऐसी परिघटना बनके उभरी है कि उसने पूरब-पश्चिम का भेद मिटा कर रख दिया है । आउटलुक को दिए एक इंटरव्यू में उदय प्रकाश कहते हैं- ‘एक बहुत ही सक्रिय सिर एक बहुत ही निष्क्रिय धड़ पर रखा हुआ है।’

किसी भी साहित्यिक रचना के रूपांतरण से पहले हमें एक बात ठीक ढंग से समझ लेनी चाहिए । ‘Adapt’ शब्द (verb) का अर्थ ही है- to transpose from one medium to another । साहित्य और सिनेमा दोनों बिल्कुल अलग-अलग माध्यम हैं और जब हम किसी रचना को एक माध्यम से दूसरे माध्यम में बदलते हैं तो उसमें परिवर्तन आना स्वाभाविक है । फिल्म निर्माण के शुरूआती दिनों में किसी भी साहित्यिक कृति से कथा ग्रहण करके फिल्म बनाने की प्रक्रिया ठीक उसी प्रकार थी जिस प्रकार उसकी कार्बन काॅपी प्रस्तुत कर देना अथवा एक बर्तन का पानी दूसरे बर्तन में उड़ेल देना । लेकिन जैसा कि हाॅलीवुड के मशहूर फिल्मकार आर्सन वेल्स ने कहा था- ‘यदि आप अपने माध्यम के अनुरूप रूपांतरण के लिए चुनी गई रचना में बदलाव नहीं ला रहे हैं, तो एडाप्टेशन की ज़रूरत ही क्या है ।’

अब बात आती है, कहानी के चयन की । फिल्म निर्देशक या लेखक के लिए किसी कहानी का चयन ज्यादातर उसकी पसंद पर निर्भर करता है । लेकिन इससे अलग एक और बात है जो महत्वपूर्ण है । वह यह कि फिल्मांकन की तमाम छूट लेने के बावजूद हर साहित्यिक कृति पर फिल्म बनाना संभव नहीं है । फिल्मों के लिए ऐसी ही कृति का चयन किया जाना चाहिए, जिसमें फिल्मांकन की पूरी संभावना हो । जिसके आधार पर एक सिनेमैटिक स्क्रिप्ट लिखी जा सके । कहानी में यदि सिनेमा की संभावनाएं नहीं हैं, उसके भीतर सिनेमाई अपील नही है तो उसका रूपांतरण किसी भी तरह से लाभदायक नहीं हो सकता । साहित्य की गूढ़ बातें पढ़ने में तो अच्छी लगती हैं लेकिन पर्दे पर वे जितनी सहज और सरल ढंग से आए उतना ही अच्छा है ।

दशकों पहले एक साहित्यकार ने जिस घटनाक्रम को रचा था, आज परदे पर उनकी दर्शनियता अप्रासंगिक लग सकती है । वर्षों पहले की कोई कथा आज के परिवेश में अपनी प्रासंगिकता गंवा सकती है । यहीं से फिल्मकार का काम शुरू होता है । वह पूरे घटनाक्रम को नई दृष्टि से पेश करता है । अपने समय से कथा को जोड़कर उसे जीवंत बनाता है । ओमकारा को अगर आॅथेलो का एडाप्टेशन नहीं भी कहा जाए तो भी वह ओमकारा है । अच्छे एडाप्टेशन के बाद एक फिल्म किसी रचना से ऐसे ही मुक्त हुआ करती है । मक़बूल को मैकबेथ की कार्बन काॅपी कोई नहीं कह सकता । फिल्म एडाप्टेशन को कभी भी कार्बन काॅपी नहीं होनी चाहिए ।

कहानी का चयन करते समय उस तरह के साहित्य की श्रेष्ठतम उपलब्धियों को भी नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता । उसी जाॅनर या विषय की क्लासिक फिल्मों पर बिना निगाह डाले उत्कृष्ट फिल्म की बुनियाद भी नहीं पड़ सकती । रूपांतरण तो फिर भी एक जटिल काम है । रचना को अपने समय से और वास्तविक जीवन-चरित्रों से जोड़ना सबसे अहम होता है । इसके बिना वारेन हेस्टिंग्स का सांड या मोहनदास नहीं लिखी जा सकती । विभूति भूषण बंधोपाध्याय की पाथेर पांचाली को क्या आज उसी टेक्सचर में बनाना संभव होगा ? अब यही आप ज़रा रंग दे बसंती को याद करिए । हालांकि वह कोई एडाप्टेशन नहीं है । फिर भी उसमें इतिहास और वर्तमान की आवाजाही लगातार बनी रहती है । अनुराग कश्यप की देव डी कुछ-कुछ ऐसे ही अर्थों में अपने समय से जुड़ती है । समकालीन हुए बिना कोई गुंजाईश नहीं । या फिर ओमकारा की तरह लोकल होकर ग्लोबल होना पड़ेगा ।

क्षमा करो हे वत्स कहानी की सबसे बड़ी ताकत है उसका विषय । यह कहानी एक ऐसी समस्या को उठाती है जो विश्व-व्यापी है । संवेदनाओं, समस्याओं और मुद्दों को इस कहानी में पाकर पाठक बड़ी आसानी से जुड़ जाता है । उस पर फिल्म सिर्फ इसलिए नहीं बननी चाहिए क्योंकि वह फिल्म मेंकिंग की आकांक्षाओं की कहानी है बल्कि इसलिए कि उसमें कुछ है जो फिल्म बनने से ही स्पष्ट होगी । कहानी में एक बच्चे का अपहरण कर लिया गया है और उसका पिता उसकी खोज में लगातार हताशा और निराशा का शिकार हो रहा है । इतनी फास्ट और लोइंग कहानी है कि आप पढ़ते चले जाते हैं । पिता जो गांव से बाहर रहता है, एक दिन अचानक उसे फोन आता है कि उसके बच्चे का अपहरण कर लिया गया है । कहानी अपने शुरूआत में ही पाठकों का ध्यान पकड़ लेती है । फिर कहानीकार हमें जहां ले जाना चाहता है, हम उसके पीछे-पीछे चलते चले जाते हैं । आखिर में जब तक हमें बच्चे की हत्या के बारे पता चलता है, तब तक पाठक उस बच्चे से भावनात्मक रूप से जुड़ चुके होते है । हिंसा की विभत्स उपस्थिति दिल दहला कर रख देती है । हमें लगने लगता है कि ऐसे बर्बर और हिंस्र समाज में हर व्यक्ति किसी न किसी हिंसा का, ताकत के उन्माद और बर्बरता का ‘विक्टिम’ है ।

एक लेखक अपनी जाति में रहकर हिंसा और दहशत की दास्तन एक बच्चे के माध्यम से पेश करता है । उसी बच्चे के माध्यम से जिसे हम आने वाली पीढ़ी या नस्ल कहते हैं । कोई भी संवेदनशील व्यक्ति एक पूरी सल्तनत को ही लेकर क्या करेगा जिसमें बच्चों का जीवन असुरक्षित है । वर्षों पहले भय, दहशत और आतंक की उपस्थिति को वाॅन गाॅग ने भी अपनी जाति से परे जाकर पेड़-पौधों के भीतर झांका था । जरा ठहर कर, उसकी बनाई उस पेंटिंग को याद करिए जिसमें आकाश में गहराते तूफान की आशंका में किसी खेत में मक्के के पौधे डर कर सिहर गए हैं । पिकासो के बारे में तो कहा ही जाता है कि वह अपने जीवन भर बीसवीं सदी में व्याप्त हिंसा और आतंक को ही चित्रित करता रहा ।

जिन पाठकों ने तारकोवोस्की की फिल्म सेक्रिफाइस देखी हो वे यह जानते होंगे कि हिंसा के विरोध में बनाई गई यह एक ऐसी फिल्म थी जिसमें कोई तोप, टैंक, बम-विस्फोट या कोई युद्ध नहीं है । सेक्रिफाइस एक बच्चे की कहानी है जिसका पिता युद्ध में मारा गया है । क्योंकि तारकोवोस्की जानते थे कि हिंसा और विध्वंस की असली कैजुअल्टी यही जेनेरशन होती है । अपने लेखन कौशल और ईमानदारी के कारण ही देवेन्द्र की यह कहानी कला के श्रेष्ठतम उपलब्धियों के क्रम में मौजूद है ।

(संजीव कुमार झा मुंबई स्थित फिल्म निर्देशक और पटकथा लेखक हैं।)