जानिए फोटोग्राफी का तकनीकी इतिहास

फोटोग्राफी एक कला है, इसे हम और आप कई बार पढ़ चुके हैं. लेकिन इस सुंदर कला का जन्म कैसे हुआ और कौन-कौन से लोग थे, जिन्होंने इस कला को विकसित करने में अपना अहम रोल अदा किया. आज हम उसी के विषय में विस्तार से बात करेंगे.

यह सौ फीसदी सही है कि फोटोग्राफी एक कला है लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस कल में तकनीक का भी प्रमुख रोल है, बगैर तकनीक के आप फोटोग्राफी की कल्पना भी नहीं कर सकते. कैमरे से फोटो निकालने के लिए आपको प्रकाश और तस्वीर बनाने वाली नेगेटिव-फिल्म या फिर इलेक्ट्रॉनिक सेंसर की जरूरी होती है. लिहाजा, फोटोग्राफी के इतिहास को हम फोटोग्राफी के तकनीकी विकास के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे.

अगर हम कैमरे के इतिहास पर नजर डालें तो 16वीं शताब्दी या उससे भी पहले कैमरा का ऑब्स्क्योरा (obscura) का रूप अस्तित्व में आ चुका था. शुरू-शुरू में यह यूरोप के कलाकारों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक डार्क चैंबर या अंधेरा कमरा होता था, इसमें एक छोटा सा छेद होता था और छेद के सामने डार्क चैंबर के अंदर सफेद दीवार या पर्दा होता था.

छेद से होकर बाहर के दृश्य या सब्जेक्ट से रिफ्लेक्ट होकर प्रकाश डार्क चैंबर में प्रवेश करता था और पर्दे पर दृश्य या सब्जेक्ट की छाया कृति (shadow image) बन जाती थी. इसी छाया चित्र की सहायता से डार्क चैंबर में बैठा आर्टिस्ट
पेंटिंग तैयार करता था. यह तस्वीर अस्थायी होती थी और इसका अस्तित्व तभी तक रहता था जब तक डार्क रूम में प्रकाश रहता था.

इसके बाद साल 1694 में पहली बार एक डच वैज्ञानिक विल्हेम होमबर्ग ने अपने प्रयोगों में पाया कि सिल्वर नाइट्रेट और सिल्वर क्लोराइड या सिल्वर ब्रोमाइड जैसे कुछ केमिकल्स का स्वरूप उनके ऊपर प्रकाश पड़ने से बदल जाता है. यानी कि प्रकाश के प्रभाव में उनमें फोटो-केमिकल बदलाव आते हैं.

इसी खोज के परिणाम स्वरूप कैमरा ऑब्सक्योरा में बनने वाली छाया-आकृति को उन केमिकल्स की मदद से स्थायी चित्र में बदलने की शुरूआत हुई. साल 1816 में फ्रांस के जोसफ निसेफर निप्स ने कैमरा ऑब्सक्योरा में बनने वाले चित्र के लिए साधारण कागज की बजाए सिल्वर क्लोराइड (AgCl) की लेप चढ़े कागज का इस्तेमाल किया. सिल्वर क्लोराइड के कारण कागज पर चित्र स्थायी रूप से छपा और इस तरह दुनिया में पहली बार स्थाई फोटोग्राफी के लिए कागज का इजाद हुआ.

सिल्वर क्लोराइड (AgCl) एक फोटो सेंसिटिव केमिकल होता है. जिस पर रोशनी की किरण पड़ने से फोटो-केमिकल
रिएक्शन होता है और हमें स्थाई तस्वीर मिलती है. इस तरह निप्स ने फोटोग्राफी की नींव डाली. उन्होंने अपनी फोटोग्राफिक प्रॉसेस को हीलियोग्राफी (Heliography) नाम दिया.

निप्स के बाद उनके काम को फ्रांस में ही लुई जैक मैंडी डैगियर ने आगे बढ़ाया. लुई डैगियर ने फोटोग्राफी की प्रक्रिया
को और आसान बनाकर उसका व्यावसायिक इस्तेमाल संभव किया. लुई डैगियर की विकसित की हुई फोटोग्राफी प्रक्रिया ‘डैगियरटाइप’ (Daguerreotype) के नाम से प्रसिद्ध हुई और उसके बनाए हुए फोटोग्राफ ‘डैगियरटाइप’ तस्वीरें कहलाईं. इसमें सिल्वर-कोटेड कॉपर प्लेट का स्थाई इस्तेमाल किया जाता था. साल 1839 से साल 1860 तक इसी विधि से फोटो तैयार किए गए.

इसके बाद कोलोडियन (collodion) तकनीक का दौर आया, जिसका आविष्कार इंगलैंड के फ्रेडरिख स्कॉट आर्चर ने किया. इस विधि में फोटो-सेंसिटिव मटीरियल को गीले चिपचिपे रूप में इस्तेमाल किया जाता था. इसलिए इसे ‘collodion wet plate’ प्रॉसेस कहा गया. यह फोटो-नेगेटिव का उस जमाने के हिसाब से सुधरा हुआ रूप था.

फोटोग्राफी में क्रांतिकारी बदलाव 20वीं शताब्दी में आया. जब अमेरिका के जॉर्ज ईस्टमैन ने ईस्टमैन कोडेक (Eastman Kodak) नाम से कंपनी बनाकर छोटे और हल्के फोटोग्राफी रील वाले कोडेक (Kodak) कैमरे बनाने शुरू किए. साल 1900 में कोडेक के Brownie box camera ने फोटोग्राफी की दुनिया में क्रांति ला दी. पुराने फिल्म-रील वाले कैमरों में जो रील (Reel) लगाया जाता था, उसका आविष्कार ईस्टमैन कोडेकने ही किया था. कोडेक के बाद बाजार में ‘लीका’ और ‘आर्गस’ जैसी कैमरा बनाने वाली दूसरी कंपनियां भी आ गईं.

जल्दी ही कोडेक ने ब्लैक एंड व्हाइट फोटो को अलविदा कहते हुए साल 1935 में अपना कलर फिल्म Kodachrome बाजार में उतारा और इसके बाद कलर फोटो युग की शुरुआत हुई. 1980 के दशक में फोटो-रील की जगह डिजिटल इमेज सेंसर वाले डिजिटल कैमरों ने ले लिया. यह सही मायने में फोटोग्राफी की दुनिया में क्रांति थी क्योंकि इसके बाद फोटोग्राफी हर आम आदमी का शौक बन गया. अगले अंक में विश्व के 10 बेहतरीन फोटोज के बारे में बात करेंगे.