आगंतुक: सत्यजीत रे की आखिरी फिल्म

Agantuk, Satyajit Ray, filmbibo

रंगनाथ

इस फिल्म (आगंतुक) की सबसे खास बात यह है कि यह सत्यजीत रे की आखिरी फिल्म है। उनकी विश्व-विख्यात यथार्थवादी फिल्मों के इतर यह फिल्म एक अति-बौद्धिक बहसतलब विषय पर केन्द्रित है। फिल्म का ज्यादातर हिस्सा एक घर के कुछ कमरों में घटित होता है। मुख्य-गौण दोनों मिलाकर कुछ गिने-चुने पात्र हैं। कहानी में कोई खास उतार-चढ़ाव या नाटकीयता नहीं है। फिर भी यह फिल्म खास है क्योंकि इस फिल्म के माध्यम से रे की एक खास सोच जाहिर होती है। यह महान फिल्मकार अपने आखिरी समय में सख्त बीमार होने के बावजूद इस  फिल्म को बनाता रहा आखिरकार क्यों ?  ऐसा क्या था जो रे इस फिल्म के माध्यम से दुनिया से कहना चाहते थे ? इन प्रश्नों का मुकम्मल जवाब आपको यह फिल्म देखकर ही मिलेगा।

फिल्म की शुरुआत एक चिट्ठी से होती है। अनीला को एक चिट्ठी मिलती है। चिट्ठी लिखने वाला का दावा है कि वह अनीला का छोटा मामा मनमोहन मित्रा है और वह एक हफ्ते अनीला के परिवार के  साथ रहना चाहता है. मनमोहन उस वक्त घर छोड़कर चला गया था जब अनीला की उम्र मात्र 2 साल थी। जाहिर है, अनीला को अपने छोटे मामा की कोई याद नहीं। उसने बस सुना है कि वो जीवन में कभी सेकेंड नहीं आए। वह स्नातक करके घर छोड़कर चले गए थे। घर से जाने के बाद वो उनके एक पारिवारिक मित्र से सम्पर्क में थे। जिसके माध्यम से अनीला और उसके परिवार को पता चला था कि मनमोहन मित्रा किसी पश्चिमी देश में रहते हैं।

अनीला और उसके पति सुधीन्द्र भद्र-लोक के वासी हैं। वर्गीय चरित्र के अनुरूप सुधीन्द्र के मन में एक अनचाहे-अजनबी मेहमान के लिए गहरी शंका है। वहीं अनीला के तर्क-बुद्धि पर बिछड़े हुए मामा से मिलने की खुशी हावी है।

नियत दिन पर चिट्ठी लिखने वाले तथाकथित बिछड़े मामा (उत्पल दत्त) अनीला और सुधीन्द्र के घर आ जाते हैं। इसके बाद एक रहस्य-रोमांच का खेल शुरू होता है। अनीला अपने मामा के सेवा में लिप्त हो जाती है और सुधीन्द्र मामा की असलियत की खुफिया जांच में। अनीला को कथित मामा का ज्ञान,भला स्वभाव प्रभावित करता है। जबकि मामा के हाजिरजवाबी और प्रत्युत्पन्नमति से सुधीन्द्र की आशंका को और बल मिलता है।

फिल्म का बड़ा हिस्सा इसी असली मामा – नकली मामा के बीच डोलता है। इसी बहाने फिल्म यह सवाल भी उठाती है कि प्रमाणपत्र आदमी के बारे में क्या प्रमाणित करते हैं ?

अपने अंत तक पहुंचते-पहुंचते यह फिल्म सभ्यता विमर्श बन जाती है। शुरू से मनोविनोद और कौतुक जगाने वाली यह फिल्म अपनी परिणति से पूर्व अत्यधिक गंभीर हो जाती है। सुधीन्द्र के वकील मित्र उसके घर आते हैं कि वह जिरह करके सच उगलवाने में माहिर होने के नाते मामा का सच बात ही बात में निकलवा लेंगे। वकील साहब और मामा की यह बहस घूम-फिर कर आधुनिक सभ्यता बनाम आदिवासी सभ्यता के आपसी द्वंद्व पर जा टिकती है। वकील साहब आधुनिक सभ्यता को श्रेष्ठ मानते हैं और मामा आदिम सभ्यता को। यह बहस कटु होती जाती है जिसकी परिणति मामा के घर छोड़ने और फिल्म के अंत की तरफ बढ़ने के रूप में होती है।

मामा की असलियत क्या है ? सभ्यता-विमर्श पर इस फिल्म के माध्यम से रे क्या कहना चाहते हैं ? इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए यह फिल्म देखें। इन सवालों का जवाब दे कर मैं इस फिल्म को देखने के प्रथम अनुभव को फीका नहीं करना चाहता। वैसे,सिनेमा के कद्रदानों को  यह फिल्म देखने के लिए एक यही वजह काफी है कि यह सत्यजित रे की आखिरी फिल्म है!