अमेरिकी वेस्टर्नः काउबाॅय, उसका घोड़ा, उसकी बंदूक और ढेर सारा ‘बीफ’!

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जॉन फोर्ड जैसे निर्देशकों ने अमेरिकी वेस्टर्न फिल्मों के जरिए हॉलीवुड के एक नए छवि दी जिसकी नकल पूरी दुनिया में हुई।

संदीप मुद्गल

पिछले कुछ महीनों से अमेरिका की ‘वेस्टर्न’ शैली की फिल्मों देखने का शौक सवार हो गया। इस शैली की कई अच्छी-बुरी फिल्में देख डालीं। कुछ भारतीय दर्शकों को यह फिल्में एक जैसी ही लग सकती हैं। मसलन, दौड़ते घोड़े पर बैठे बंदूकबाज काउबाॅय या कानून तोड़ते लुटेरे।

मैं यह तो नहीं जानता कि हिन्दी में वेस्टर्न शैली की फिल्मों पर क्या और कितना लिखा गया, लेकिन अपने समूचे कलेवर में यह फिल्में आजादी और उन्मुक्तता के फलसफे की पुरजोर पैरवी करती दिखती हैं। बेशक यह आजादी और उन्मुक्तता बंदूक के जोर पर भी कायम रखी जाती है। फिर भी यहां मानवीय संवेदनाएं अन्य तमाम फिल्मों से कुछ अलग नहीं हैं।

इन फिल्मों में इनसानी संघर्ष शहरी जनजीवन के मुकाबले कहीं ज्यादा क़ड़ा दिखता है। आखिर 19वीं सदी के उत्तरार्ध में अमेरिकी पश्चिम के खुले आकाश के नीचे बसे दूर-दराज के छोटे से कस्बे में रहने वाले गिने-चुने लोगों का जीवन हो भी कैसा सकता था। दरअसल, समूची वेस्टर्न शैली पूर्व से पश्चिमी छोर तक 3000 मील से भी ज्यादा लंबे अमेरिका के बसावट की कहानी कहती है।

किसी अच्छी वेस्टर्न को देखना खुद अमेरिकी समाज की आंतरिक विसंगतियों और उसकी बनावट के बिखरे तिनके बटोरने जैसा ही अनुभव होता है। कई बड़े अमेरिकी अभिनेताओं की सबसे बड़ी पहचान ही वेस्टर्न के मिथकीय ‘काउबाॅय’ या किसी कस्बे की कानून व्यवस्था संभाले बैठे सख्त मिजाज ‘शेरिफ’ की रही है। उन्हें उनकी वेस्टर्न पोशाक के अतिरिक्त अन्य कपड़ों में देखना कई दर्शकों को भाता ही नहीं। इसकी सबसे बड़ी पहचान रहे हैं जाॅन वेन। वह वेस्टर्न के अनन्य पात्र थे। उन्हें आॅस्कर भी वेस्टर्न ‘ट्रू ग्रिट’ के लिए मिला था। हालांकि उनके बराबर ही गैरी कूपर भी खड़े दिखते हैं। दोनों अमेरिकी सिनेमा के ‘स्वर्ण युग’ के सबसे बड़े नायकों में से रहे हैं।

john wayne, the searchers, filmbiboहॉलीवुड की वेस्टर्न फिल्मों को याद करने पर निर्देशक जाॅन फोर्ड का नाम सबसे पहले लेना पड़ेगा। अमेरिकी सिनेमा को कई यादगार छवियां जाॅन फोर्ड ने दी हैं। कई यादगार वेस्टर्न के अलावा ‘हाउ ग्रीन वाज माई वैली’, ‘द इन्फाॅर्मर’ और ‘ग्रेप्स आॅफ राथ’ जैसी फिल्मों ने उन्हें दुनिया भर के निर्देशकों और सिने-प्रेमियों का चहेता बना दिया था। हमारे यहां खुद सत्यजित राय ने फोर्ड के बारे में कहा है – फोर्ड की सबसे नजदीकी तुलना बीथोवन के बीच के समय (जाहिर है सबसे रचनात्मक समय) के साथ की जा सकती है – जाॅन फोर्ड खिलंदड़ी तबीयत के आदमी थे और वेस्टर्न शैली से उनका प्रेम इसलिए भी समझा जा सकता है। उनकी ही फिल्म ‘स्टेजकोच’ ने जाॅन वेन को सुपरस्टार बनाया था।

फिर भी वेस्टर्न को अधिकांश दर्शक रोमांच के लिए देखते हैं। यदा-कदा ही इस शैली की कोई ऐसी फिल्म दिखेगी जिसमें गोलियों की बरसात न दिखती हो। जाहिर है कि पूर्वी तट के गिर्द बसे अमेरिका की सरकार ने 19वीं सदी की शुरुआत में अपने पांव फैलाने शुरू किए और लोगों को पश्चिम जाने की ओर प्रेरित किया था।

अमेरिका का पश्चिमी क्षेत्र रेड इंडियंस का घर था जिनकी इससे पहले बाहरी दुनिया से टकराहट स्पेनिश खोजकर्ताओं के साथ 17वीं सदी में हो चुकी थी। पूर्व से आने वाले यूरोपीय लोगों से रेड इंडियंस की बिल्कुल नहीं पटी। कई बार युद्ध हुए, फिर शांति संधियां हुई और टूटीं, फिर युद्ध हुए और अंतत अपने में ही मस्त रहने वाली रेड इंडियंस की सभ्यता के कुछ नुमाइंदे दक्षिण की ओर पलायन कर गए और कुछ को अमेरिकी सरकार द्वारा स्थापित ‘रिजर्वेशंस’ में रहने को मजबूर होना पड़ा।

दरअसल, वेस्टर्न शैली के सिनेमा में आने वाले यह प्रसंग सबसे मार्मिक हैं। जाॅन फोर्ड की ‘शायेन आॅटम’ इस समस्या पर बनी सबसे मार्मिक फिल्मों में से एक है। यूं फोर्ड की अपनी राजनीति क्या थी, यह बहस का मुद्दा है। यह बता दें कि आज अमेरिका में करीब सवा लाख रेड इंडियंस ही बचे हैं।

बहरहाल, कहना न होगा कि वेस्टर्न शैली को याद करना खुद अमेरिकी समाज की निर्मिति को समझने का सबसे पुख्ता जरिया है। पिछली सदी के अंतिम दशक में एक अमेरिकी विचारक द्वारा ‘सभ्यताओं का संघर्ष’ के फलसफे को उछालने की मंशा की जड़ें कहीं-न-कहीं अमेरिका के ‘पुराने पश्चिम’ यानी ओल्ड वेस्ट से भी जुड़ी हैं। यह वही ‘ओल्ड वेस्ट’ है जहां ‘काउबाॅय और इंडियंस’ के बीच संघर्ष तारी था। जो कालांतर में किस्से-कहानियों और इस शैली की फिल्मों का मुख्य आधार बना।

इसके बावजूद, वेस्टर्न जाॅनर एक खास किस्म की पलायनवादी मानसिकता से भी लबरेज कर देती है। सिनेमा के कुछ पुरोधाओं ने बहुत पहले वेस्टर्न को दोयम दर्जे की कला बताया था। इसके जवाब में जाॅन वेन ने कहा था कि वेस्टर्न अमेरिकी ‘फोकलोर’ है। यह कथन गलत नहीं था। अमेरिकी समाज में आज भी कई ऐसे दृष्टांत दिखते हैं जो वहां के पुराने पश्चिम (करीब 1840-1910 ई. का समय) के मोहपाश में बंधे नजर आते हैं। बाद में अमेरिकी ‘संस्कृति’ के दुनिया पर हावी होने पर वह मिथक हर जगह फैले नजर आए।

जैसा कि पहले कहा गया कि वेस्टर्न खुले आकाश के नीचे की रचनाएं हैं। यहां के संघर्ष का रूप प्रकृति के बीच नई शुरुआत करने वाला है। किसी भी नई शुरुआत के दायरे में बुनियादी इनसानी संघर्ष ही दिखते हैं। यह संघर्ष बाद की सभी खींचतान से ज्यादा जानलेवा भी होते हैं, इसलिए इनका रूप कई बार एक सा ही लगता है। हर जमीन पर ऐसी जद्दोजेहद की दास्तानें मौजूद हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अमेरिकी समाज ने इसे पर्दे पर भी साकार किया।

Dances with wolves, Hollywood, filmbiboखास बात यह है कि कुल 250 वर्षों के अपने ‘लोकतांत्रिक’ इतिहास में अमेरिका ने कागज और पर्दे पर अपनी कमजोरियां दिखाने से परहेज नहीं किया। इसके बरक्स भारत के बंटवारे और अन्य त्रासदियों पर आज तक सिनेमाई पर्दे पर अधिकांशतः खामोशी ही दिखती है। यदा-कदा ही वहां कुछ हरकत दिखी है।

वेस्टर्न का एक अनन्य पात्र है – घोड़ा। 19वीं सदी की शुरुआत में घोड़े की पीठ पर बैठकर ही 3000 मील लंबी अमेरिकी जमीन को पाटा गया था। बाद में आने वाले रेलमार्गों से यह यात्रा सिर्फ दोहराई गई थी।

तो वेस्टर्न शैली को याद क्यों किया जाए? 1970 के बाद से वेस्टर्न शैली के प्रति फिल्मकारों और दर्शकों का रुझान कम हुआ, लेकिन इसके बाद भी कई यादगार वेस्टर्न फिल्में बनीं। ‘बिना नाम वाले’ मिथकीय वेस्टर्न हीरो के तौर पर क्लिंट ईस्टवुड का स्तर इस दौरान वही रहा है जो जाॅन वेन या गैरी कूपर का हुआ करता था। संभवतः ईस्टवुड उनसे भी बड़े साबित हुए हैं। ऐसा उनकी पर्दे की छवि के ही कारण नहीं, बल्कि बतौर निर्देशक उनके स्तर को लेकर भी है।

बहरहाल, अन्य फिल्मों की तरह वेस्टर्न शैली के भी कई ‘शेड’ रहे हैं। 1970 के आसपास निर्देशक सैम पैकिन्पा की कुछ फिल्मों के क्रूर यथार्थवाद ने दर्शकों और समीक्षकों को एक साथ झिंझोड़ कर रख दिया था। पैकिन्पा की ‘द वाइल्ड बंच’ में हिंसा के दृश्य दहला देने वाले हैं। बेशक गोलीबारी और खून-खराबा वेस्टर्न फिल्मों की पहचान रही है, लेकिन सिनेमाई तकनीक के विकसित होने के साथ-साथ अन्य चीजों के अलावा हिंसा दर्शाने वाले दृश्य भी खूंखार होते चले गए हैं।

पैकिन्पा की फिल्मों में यह सच कुछ पहले ही दिखने लगा था। दरअसल, सैम पैकिन्पा ‘पुराने पश्चिम’ के उत्तरार्द्ध या उसके ‘पतन’ को दर्शाने वाले निर्देशक हैं। 20वीं सदी के आ पहुंचने पर टेलिफोन और रेडियो का बड़े पैमाने पर अवतरण हुआ था और इसी समय अमेरिकी पश्चिम के विकास की लहर भी चल निकली थी। पुरानी शैली के काउबाॅय्ज को यह परिवर्तन अरुचिकर लग रहा था। वह अपनी बंदूक के दम पर मिलने वाली आजादी को ही बरकरार रखना चाहते थे। यह सोच पश्चिम में सब ओर गूंज रही थी।

पैकिन्पा और उनके जैसे कुछ निर्देशकों ने पुराने और नये समय के इस टकराव को अपनी कहानियों का आधार बनाया था। 1976 में जाॅन वेन की अंतिम फिल्म ‘द शूटिस्ट’ में भी ऐसा ही समय दिखाया गया है, जहां दूर-दराज के पश्चिमी कस्बों में भी बिजली के तार और टेलिफोन दिखते हैं। ऐसे परिवेश में एक पुराना बंदूकबाज बीमारी की हालत में अपने अंतिम दिन बिता रहा है। ‘द डैथ आॅफ ए गनफाइटर’ भी ऐसे ही समय को दर्शाने वाली फिल्म है। दो सदियों के मिलने और एक खास किस्म की जीवनशैली के समाप्त होने का संघर्ष ऐसी कुछ फिल्मों में पुरजोर तरीके से दिखाया गया है।

इन सभी तथ्यों की रोशनी में वेस्टर्न शैली को याद करना मूलतः काउबाॅय जीवनशैली और उनके ‘रेड इंडियंस’ के साथ संघर्ष को समझते हुए अमेरिकी समाज की निर्मिति को जानना ही कहा जाएगा। 1777 में अमेरिका की कथित आजादी के बाद उसके विशाल पश्चिमी क्षेत्र को पाटने का विचार जब वहां के राजनेताओं के दिमाग में आया होगा, रेड इंडियंस के साथ संघर्षों की दास्तां की शुरुआत तभी से होती है।

1820 के आते-न-आते पश्चिम की ओर कुछ लोग निकल पड़े थे। इन्हें ‘पायनियर्स’ कहा गया, जिनके बाद बारी आई कुछ ऐसे लोगों की जो बाद में बड़े ‘रेंचर्स’ कहलाए थे। इन रेंचरों ने सैंकड़ों हजारों एकड़ जमीनें कब्जाई और वहां गाय-भैंसों, भेड-बकरियों और घोड़ों को पालना शुरू किया। इन्हीं रेंचरों को बाद में पूरब से आने वाले किसान आदि नागवार गुजरे थे।

अमेरिकी गृह युद्ध के बाद के कई दशक अगर गोरे लोगों और रेड इंडियन्स के बीच के संघर्ष की कहानी कहते हैं तो इसी के आसपास का समय रेंचरों और किसानों के बीच संघर्ष का भी है, जिसे वेस्टर्न फिल्मों में बड़े पैमाने पर दिखाया गया है। इसी जद्देजेहद का एक बड़ा रूप बड़े और छोटे रेंचरों के बीच जमीन और मवेशियों को लेकर संघर्ष का भी है।

सिनेमाई दृष्टिकोण बेशक ‘मेक बिलीव’ यानी गढ़ा हुआ या काल्पनिक होता है, लेकिन उसकी बुनियाद में असल जिंदगी के ही अनुभव होते हैं। अन्य सिनेमाशैलियों की तरह वेस्टन्र्स भी समय के साथ-साथ यथार्थ के निकट आती गईं। 1980-90 के दशक में ‘लोनसम डव’ और ‘बार्बरोसा’ कुछ ऐसी ही बेहतरीन फिल्में हैं। यह फिल्में 1940 से 1970 के दौरान की फिल्मों से सर्वथा अलग हैं। यहां यह बताना भी बेमानी नहीं होगा कि हाॅलीवुड में भी 1970 से पहले वेस्टर्न फिल्मों में नायक को ‘सर्वगुण संपन्न’ दिखाने का चलन था।

जाॅन वेन, रेडल्फ स्काॅट, गैरी कूपर, जोएल मक्री, जेम्स स्टीवर्ट जैसे नायकों को यदा-कदा ही नैतिक रूप से गलत दिखाया गया है। वह ऐसे नायक थे जो नैतिक तौर पर सही, सुशिक्षित, मजबूत और बेहतरीन निशानेबाज होते थे, जो अंत में विजयी रहते थे। दरअसल, यह समय की भी मांग थी।

विश्व सिनेमा के इतिहास में नैतिक वर्जनाओं को 1970 के बाद से बड़े पैमाने पर तोड़ा गया। 1970 का दशक, भारत के साथ-साथ पूरी दुनिया के लिए उथल-पुथल और बड़े परिवर्तनों का था। मशीनी क्रांति का बड़े पैमाने पर आगमन उसी दशक की देन है। बची-खुची वर्जनाएं 1980-90 के दशक में उदारीकरण के साथ ध्वस्त हो गई थीं। इसका सीधा असर किस्से-कहानियों के साथ सिनेमा पर दिखता है।

1980 के बाद से वेस्टर्न फिल्मों में नायक और खलनायक के बीच की दीवार गिरने लगी। अमेरिका के पश्चिम के कई कुख्यात अपराधियों के जीवन पर कुछ बड़ी और यादगार फिल्मों इस दौरान आई।

सिनेमाई दृष्टि से बेशक इन फिल्मों का यथार्थवाद पुरानी फिल्मों के यथार्थवाद से अधिक रक्तिम दिखता है। ‘लिंचिंग’ यानी गैरकानूनी तरीके से मृत्युदंड पर 1943 की ‘द आॅक्सबो इंसिडेंट’ यदि अपने समय में यथार्थवादी दृष्टिकोण के लिए सराही गई थी तो कुछ वर्ष पहले आई ‘जेंगो अनचेन्ड’ और ‘12 ईयर्स ए स्लेव’ आज के कैमरा से यथार्थ परोसती हैं, जो बहुरंगी होने के साथ-साथ, कई वर्जनाओं से दूर है। 1952 की ‘द बिग स्काई’ और इस वर्ष की आॅस्कर विजेता ‘द रेवनेंट’ की कथाओं का कालखंड एक है, लेकिन दोनों का यथार्थवाद अपने-अपने समय की सिनेमाई तकनीक का प्रतिनिधित्व करता है।

वेस्टर्न शैली समूचे अमेरिकी महाद्वीप की कहानी कहती है। इसमें फिल्मकारों द्वारा मध्य और दक्षिणी अमेरिका के विशाल क्षेत्र को भी शामिल किया गया। किसी देश या महाद्वीप या दो महाद्वीपों के बनने की लंबी कहानी को इतने विविध रूपों में शायद ही कोई अन्य फिल्मशैली दिखाती है।

वेस्टर्न के शुरुआती दौर में रेड इंडियंस को नकारात्मक रूपों में दिखाया गया, लेकिन 1950 के दशक में कुछ नई प्रगतिवादी सोच के साथ उनके पक्ष में भी कई फिल्में बनीं। ‘अपाची’, ‘स्मोक सिग्नल’, ‘शायेन आॅटम’ और खासतौर पर ‘द डेविल्स डोरवे’। 1990 के दशक की ‘डांसेज विद वुल्व्ज’ और ‘जेरोनिमो, एन अमेरिकन लीजेंड’ अविस्मरणीय फिल्में हैं।

पूर्व से पश्चिम की ओर फैली 3000 मील लंबी अमेरिकी धरती में 18वीं सदी का अमेरिका पूर्वी तट पर ही बसा था। पश्चिम की ओर धीरे-धीरे बढ़ते उसके कदमों का वहां की प्राकृतिक संपदा पर सीधा असर पड़ा था। पश्चिम के विशाल क्षेत्र में रहने वाले रेड इंडियनों की खुराक वहां की जड़ी-बूटियां और जानवर थे। उन जानवरों को गोरी चमड़ी वाले रेंचरों ने सहेजना शुरू किया और खुद उनके व्यवसायी बन बैठे।

जब-तब इन फिल्मों में खाने के लिए ‘बीफस्टेक’ शब्द सुनाई दे जाता है जो और कुछ न होकर गोमांस ही है। यह सांस्कृतिक अंतर वेस्टर्न फिल्मों के कुछ दर्शकों को नागवार भी गुजर सकता है, लेकिन इसे समग्र दृष्टि से अपना लेने में कोई हर्ज नहीं।

प्रसंगवश, हमारे यहां ही एस. एल. भैरप्पा के महाभारत आधारित उपन्यास ‘पर्व’ की शुरुआत भी इसी ‘बीफ’ से की गई है, जिस पर आज तक कोई वाद-विवाद सुना नहीं गया, अलबत्ता घर में गोमांस रखने के ‘अपराध’ में ‘लिंचिंग’ जैसी घटना जरूर सामने आई। ‘सुसंस्कृत पूरब’ में ‘जंगली पश्चिम’ के यह दृष्टांत मन में अजीब सी बेचैनी पैदा करते हैं ! बहरहाल…