इन्हेरिट द विंडः ईश्वर ने धरती को बनाकर पानी में फेंक दिया…

Inherit the Wind, filmbibo
इन्हेरिट द विंड अमेरिका के एक चर्चित मुकदमे पर आधारित है।

संदीप मुदगल 

 वर्ष 2009 चार्ल्स डार्विन का 200वां शती वर्ष था। आज के समय में जबकि क्लोनिंग में इनसान सफलता के दावे कर रहा है और काफी हद तक उसमें सफलता प्राप्त भी कर चुका है तो डार्विन के शती वर्ष में मानव उत्पत्ति पर जिस तरह के व्यापक बहस-मुबाहिसे की जरूरत थी, वह देखने को नहीं मिला। इन्सान जीनोम गिनती में भी सफलता प्राप्त कर चुका है और हाल में प्रयोगशाला में निर्मित पहले जीन की सफलता से भी जीन इंजीनियरिंग की रफ्तार तेजी से बढ़ती जा रही है। इन सफलताओं के बाद भविष्य में इनसान की विकास प्रक्रिया में जो कयास लगाए जा रहे हैं, उन्हें सुनकर किसी कट्टर नास्तिक के मुंह से भी भगवान का नाम निकले बिना नहीं रह सकता।

बहरहाल, विकास की यह प्रक्रिया किसी के रोके रुकने वाली नहीं है। हां, इसके संबंध में कुछ अवश्य दिशानिर्देश जरूर जारी किए जाएंगे, लेकिन अन्य उद्योगों की तरह अंततः जीन तकनीकी ‘उद्योग’ भी देर-सवेर ब्लैक मार्केट के हत्थे चढ़ेगा और अपनी-अपनी पसंद का इनसान या अपना क्लोन प्रारूप बनाने के जो किस्से आज विज्ञान कथाओं में पढ़ने को मिलते हैं, उनका मूर्त रूप इनसान के सामने आएगा। लेकिन सवाल घूम-फिरकर फिर से इनसान की उत्पत्ति और उसकी प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का उठता है, जिसके बारे में करीब 150 वर्ष पूर्व जीव विज्ञानी चाल्र्स डार्विन को संभवतः दर्ज मानव इतिहास में पहली बार कट्टरपंथियों का कोपभाजन बनना पड़ा था।

इतना ही नहीं, कुछेक स्थानों पर वर्षों बाद डार्विन के विकासवाद के सिद्धांत को पढ़ाने पर भी लोगों को सामूहिक बहिष्कार और राजनीतिक षड्यंत्रों की सामना करना पड़ा था। इसकी सबसे बड़ी मिसाल वर्ष 1925 में अमेरिका के टेन्निसी राज्य में एक स्कूल अध्यापक पर चला मुकदमा थी, जिस दौरान अभियोजन पक्ष की ओर उस समय का एक बड़ा राष्ट्रीय स्तर का राजनेता अदालत में वकील के तौर पर मौजूद था और अपनी दलीलों में उसने बाइबिल में लिखे शब्दों को जस का तस इनसानी उत्पत्ति का बुनियादी नियम बताया था।

मुकदमे को ‘मंकी ट्रायल’ के नाम से प्रसिद्धी मिली थी क्योंकि डार्विन के विकासवाद नियम के अनुसार इंसान की उत्पत्ति एक विशिष्ट प्रजाति के वनमानुषों (आम धारणा के अनुसार साधारण बंदरों से, जो गलत है) से हुई थी। इसके बाद उस स्कूल अध्यापक को बेशक मामूली हर्जाने के बाद बरी कर दिया गया था, लेकिन टेन्निसी राज्य में आज तक डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत पढ़ाने पर मनाही है। अमेरिका जैसे अति विकसित देश में इस तरह का पुरातनपंथी कानून किसी को भी हैरान-परेशान करने के लिए काफी है, लेकिन इसके पीछे की चर्च और राजनीतिक सांठ-गांठ इस मामले में सहज ही समझ में आती है।

मानव उत्पत्ति के सिद्धांत के विषय में आजकल के मशहूर भौतिक विज्ञानी रोजर पेनरोज ने डार्विनवाद को धर्म के ताबूत में ठोंकी गई आखिरी कील बताया है। अगर इन उग्र शब्दों को दरकिनार कर भी दें तो भी सच यही है कि मानव उत्पत्ति के संबंध में डार्विन की थ्योरी आजतक वैज्ञानिक दृष्टि से लगभग त्रुटिहीन नजर आती है। इसके विपरीत ‘इंटेलिजेंट डिजाइन’ और अन्य सिद्धांत जो डार्विनवाद के विरोध से उपजे हैं तार्किक दृष्टि से कमजोर मालूम होते हैं।

बहरहाल, वर्ष 1960 में स्टैनले क्रेमर ने ‘इनामक फिल्म का निर्माण किया था जिसमें मंकी ट्रायल का सिलसिलेवार अन्वेषण किया गया था। फिल्म मुख्यतः एक अदालती ड्रामा है जिसमें पक्ष और विपक्ष का जोरदार टकराव है। एक धड़ा स्कूली अध्यापक के पक्ष में खड़ा दिखता है तो दूसरा विपक्ष में। इनसान ने अपनी मानसिक शांति के लिए कई तरीके अपनाए हैं और धर्म उसमें से एक है। इस विषय में कोई विरोध नहीं हो सकता, और यदि समाज में धर्म का अपना स्थान है तो विज्ञान का भी है।

डार्विनवाद का चर्च से टकराव स्वयं डार्विन के समय में ही शुरू हो गया था। यह सच कमोबेश सभी धर्मों के इतिहास में दिखता है कि वह आधुनिक विज्ञान में जीव उत्पत्ति और अब क्लोनिंग को लेकर रक्षात्मक भूमिका में नजर आते हैं। टेन्निसी के उस अदालती मामले में भी इसी तरह की दलीलें दी गई थीं। हैरानी इस बात पर है कि प्रतिपक्ष की ओर से वकील के तौर पर उस समय अमेरिका के उप-राष्ट्रपति पद के एक सशक्त उम्मीदवार ने हाजिरी दी थी। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि राजनीति (एक विशिष्ट सोच की) और धर्म का गठजोड़ सब जगह रहा है।

अध्यापक का वकील अगर एक ओर डार्विन की खोज के बारे में अपनी दलीलें रखता है तो प्रतिपक्ष बाइबिल की ओर से। दोनों का टकराव नई और पुरानी सोच का टकराव न होकर तर्क और जड़ सोच का है। एक ऐसी सोच जो लिखे हुए शब्द को जस का तस मानती है। इसी जस-का-तस सोच को बचाव पक्ष का वकील अपने सबसे अचूक तर्क के तौर पर करता है।

दरअसल, प्रतिपक्ष के वकील को बचाव पक्ष का वकील बाइबिल के प्रकांड पंडित के तौर पर कठघरे में बुलाता है और कुछ जवाब तलब करता है। इसी सवाल जवाब की श्रृंखला में एक मोड़ पर कठघरे में बैठा वकील गवाह कहता है कि बाइबिल के अनुसार दुनिया मात्र चौबीस घंटे में बन गई थी जिस पर बचाव पक्ष पूछता है कि वह चौबीस घंटे किस घड़ी के अनुसार मापे गए थे, ग्रीनविक टाइम या ईस्टर्न स्टैंडर्ड टाइम! जाहिर है इस सवाल का कोई जवाब नहीं मिलता। इसी चुप्पी को भांपकर बचाव पक्ष दलील देता है कि क्या वह चौबीस घंटे एक वर्ष, सौ वर्ष या हजार वर्ष के नहीं हो सकते! मात्र चौबीस घंटे लिखने का अर्थ किन्हीं विशेष संदर्भों में रहा होगा जिस बारे में आज के इनसान को जानकारी नहीं है! यहां बचाव पक्ष का वकील बाइबिल को एक अच्छी किताब बताता है, पर साथ ही वह कहता है कि वह एकमात्र किताब नहीं है।

इस एक तर्क मात्र से पूरे अदालती खेल का रुख ही पलट जाता है। वही अदालत जिसने पहले बचाव पक्ष की ओर से गवाह के तौर पर हाजिर होने वाले कुछ जीव एवं अन्य वैज्ञानिकों की बात सुनने से इनकार कर दिया था, अध्यापक को मामूली हर्जाने के बाद बरी करती है। यह बेशक मुकदमे का अंत होता है लेकिन उस सोच का नहीं जो हमेशा कुछ नया करने की दिशा में कुलबुलाती रहती है। इस पूरे अदालती खेल में जिस एक चीज को निशाने पर रखा गया था वह थी इन्सानी सोच। वह दिमाग जो हमेशा कुछ नया करना चाहता है।

यहां यह सोचना भी गलत नहीं होगा विश्व की महाशक्तियों के सामाजिक हालात भी कथित तीसरी दुनिया के देशों से कुछ अलग नहीं रहे। इसकी वजह इंसानी उत्पत्ति में धर्म की भूमिका रही है। दुनिया के ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाए तो विभिन्न सभ्यताओं के उत्थान और पतन दोनों में धर्म की भूमिका लगभग एक सी रही है। रोम के उस विशाल पुस्तकालय के जलाए जाने के बाद के एक हजार वर्षों की वैज्ञानिक चुप्पी के बाद कोपरनिकस और गैलीलियो के समय के बाद विज्ञान की दिशा में आई तेजी को भी मठ का विरोध झेलना पड़ा था। डार्विन का समय भी इससे अलग नहीं रहा, लेकिन आधुनिक मानदंड और गणनाओं के आगे जब अतार्किक सोच घुटने टेक देती है तो वह नई सोच की बाहें उमेठने के राजनीतिक तरीके अपनाती है, जैसा कि फिल्म में दिखाया गया है।