कर्क डग्लस: हॉलीवुड के मैकार्थीवाद से लड़ने वाला ‘स्पार्टकस’

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कर्क डग्लस 1950 में आई फिल्म यंग मैन विथ हॉर्न के एक दृश्य में। (तस्वीर- ईबे पब्लिक डोमेन)

 

संदीप मुद्गल

अभिनेता, लेखक, निर्माता व निर्देशक कर्क डग्लस इस 9 दिसंबर को सौ साल के हो गए। हाॅलीवुड के इतिहास में कुछेक और हस्तियों ने भी उम्र का सैंकड़ा जमाया है, लेकिन व्यक्तित्व की जिजीविषा के कारण कर्क डग्लस का जिक्र करना जरूरी हो जाता है। अमेरिका में 1950 के दशक में मैकार्थीवाद की काली छाया हाॅलीवुड पर भी पड़ी थी, जिस कारण उस दौरान कई लेखकों, फिल्मकारों और कुछ अभिनेताओं के करियर बर्बाद हुए थे। फिल्म उद्योग में इससे सबसे पहले जूझने वाले व्यक्ति डग्लस ही थे। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध फिल्म ‘स्पार्टकस’ की पटकथा के लिए डाल्टन ट्रंबो का चुनाव किया था जो सरकारी दबाव में प्रतिबंधित थे। डग्लस ने बड़े-बड़े स्टूडियो मठाधीशों से लेकर सरकारी तंत्र से बहस-मुबाहिसा किया और अंततः ट्रंबो से ही स्पार्टकस की पटकथा लिखवाई। यह हाॅलीवुड में ‘ब्लैक लिस्टिंग’ के अंत की शुरुआत थी और इसका पूरा श्रेय डग्लस को ही जाता है। डाल्टन ट्रंबो के जीवन पर पिछले वर्ष आई फिल्म ‘ट्रंबो’ में यह प्रसंग सविस्तार दिखाए गए हैं। फिल्म में ट्रंबो की भूमिका के लिए ब्रायन क्रेंस्टन अकादमी पुरस्कार के लिए भी नामांकित हुए।

बतौर अभिनेता ‘स्पार्टकस’ कर्क डग्लस की सबसे प्रसिद्ध फिल्म रही है। वह फिल्म के निर्माता भी थे। उनकी कुछ अन्य यादगारी फिल्में हैं ‘चैंपियन’, ‘पाथ्स आॅफ ग्लोरी’, ‘एक्ट आॅफ लव’, ‘द इंडियन फाइटर’, ‘कास्ट ए जाइंट शैडो’, ‘बैड एंड द ब्यूटीफुल’, ‘लोनली आर द ब्रेव’, ‘एस इन द होल’ और चित्रकार विन्सेंट वान गाॅग की जीवनीपरक ‘द लस्ट फाॅर लाइफ’ जिसमें उन्होंने वान गाॅग की भूमिका अदा की थी। यह सब और कई अन्य फिल्में उन्हें सिनेमा प्रेमियों के दिलों में जगह दिलाने के लिए काफी हैं। हालांकि डग्लस को जब-तब स्पार्टकस के लिए ही याद किया जाता है। फिल्म कुछ इतनी प्रसिद्ध हुई कि उसके बाद हाॅवर्ड फास्ट के उपन्यास स्पार्टकस की बिक्री कई गुना बढ़ गई थी। यही नहीं, भारत में कई कथित प्रगतिशील संगठन आज तक स्पार्टकस उपन्यास के साथ-साथ फिल्म का भी नाम जपते हैं।

बहरहाल, कर्क डग्लस के सौ वर्षीय जीवन के अनेक प्रसंग हैं जो यादगार हैं। उनमें से कई प्रसंग उन्होंने अपनी दो आत्मकथाओं में कलमबद्ध भी किए हैं। वह ताउम्र घुमंतू रहे हैं। दर्जनों देशों की यात्राएं की। वह कुछेक बार भारत भी आए। अपनी पहली आत्मकथा ‘द रैगमैन्स सन’ में उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से हुई मुलाकातों का जिक्र भी किया है। उसी दौरान उन्होंने बंबई फिल्म उद्योग की भी यात्रा की थी जहां उनकी मेजबानी देव आनंद ने की थी।स्पार्टकस से जुड़ा एक रोचक प्रसंग उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा है। उनके अनुसार फिल्म निर्माण के शुरुआती चरण में ही किसी बात को लेकर हाॅवर्ड फास्ट की निर्माता वर्ग से तनातनी हो गई थी और वह फिल्म से अलग हो गए थे। फास्ट खुद उस दौरान ब्लैक लिस्टिंग से प्रभावित थे और नाम बदलकर किताबें लिख रहे थे। डग्लस के अनुसार हाॅवर्ड फास्ट बेहद घमंडी तबियत के थे।

इसी तरह ‘लस्ट फाॅर लाइफ’ से जुड़ा एक प्रसंग भी उनकी आत्मकथा में मिलता है। डग्लस बताते हैं जब वह फिल्म बन रही थी, उस समय उनकी उम्र उतनी ही थी जितनी उम्र में विन्सेंट वान गाॅग ने आत्महत्या की थी। लस्ट फाॅर लाइफ में डग्लस की परफाॅरमेंस उनकी सर्वश्रेष्ठ भूमिकाओं में मानी जाती है। हालांकि, डग्लस को ‘लोनली आर द ब्रेव’ को अपनी सबसे प्रिय फिल्म बताते हैं।

कर्क डग्लस का जीवन निजी त्रासदियों से भी भरा रहा है। उन्हें अस्सी साल की उम्र दिल का दौरा पड़ा। उनके सबसे छोटे पुत्र पीटर की अधिक नशा लेने के कारण मृत्यु हुई। 1993 में वह एक हेलिकाॅप्टर दुर्घटना में बाल-बाल बचे थे। इस सबके बावजूद उन्होंने अपने सिने करियर की समाप्ति के बाद बतौर लेखक अपनी पहचान बनाई। उनके सबसे बड़े पुत्र माइकल डग्लस खुद बहुत बड़े अभिनेता और निर्माता हैं। रोचक तथ्य यह है कि कई बार आॅस्कर पुरस्कार के लिए नामांकित होने के बावजूद कर्क डग्लस उसे जीत नहीं पाए थे। अंततः उन्हें लाइफटाइम का पुरस्कार दिया गया था। लेकिन माइकल डग्लस ने लगभग अपने करियर की शुरुआत में ही सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार जीत लिया था।