वी शांताराम थियेटर में कर्टेन पुलर का काम करते थे

हिंदी सिनेमा के जनक दादा साहेब फाल्के के बाद वी शांताराम ऐसे पहले शख्स थे, जिन्होंने भारतीय सिनेमा को एक मजबूत नींव प्रदान की. वी शांताराम का नाम ‘राजाराम वांकुडरे शांताराम’ था. इनकी फिल्मों ने न केवल भारत बल्कि पूरे विश्व सिनेमा पर अपनी एक अमिट छाप छोड़ी.

शांताराम उन फिल्म इंडस्ट्री के उन फिल्मकारों में से हैं, जिन्होंने सिनेमा को उद्योग के तौर पर स्थापित किया. महाराष्ट्र के कोल्हापुर के बेहद गरीब और साधारण परिवार से आने वाले वी शांताराम जवानी के दिनों में रेलवे वर्कशॉप के दिहाड़ी मजदूरी हुआ करते थे. कुछ समय के बाद शांताराम ने एक मराठी थियेटर ग्रुप में परदा उठाने-गिराने (कर्टेन पुलर) का काम किया.

शांताराम के मौसेरा भाई बाबूराव पेंढारकर महाराष्ट्र फ़िल्म कंपनी में मैनेजर थे. उन्होंने शाताराम को फिल्म निर्माता और महाराष्ट्र फ़िल्म कंपनी के मालिक बाबूराव पेंटर से मिलवाया. बाबूराव पेंटर शाताराम से प्रभावित हुए और उन्होंने शांताराम को अपने यहां 9 रूपये महीने पर नौकरी पर रख लिया. यहीं पर शाताराम ने पेंटर से फिल्म निर्माण की कला सीखी और उनकी मूक फिल्मों में काम भी किया.

वी शांताराम ने अपने जीवन में कई ऐतिहासिक और पौराणिक विषय पर फिल्में बनाई. शांताराम ने भारत की पहली एनिमेटेड फिल्म भी बनाई, जिसको बच्चों ने बहुत पसंद किया. शांताराम ने अपने जीवन में तीन शादी की थीं. उनकी पहली पत्नी का नाम विमला था, दूसरी पत्नी जिनका नाम जयश्री था और तीसरी पत्नी का नाम संध्या था, जो उनकी फिल्मों में अभिनेत्री हुआ करती थीं.

साल 1929 में वी शांताराम ने विष्णुकांत दामले, बाबुराव पेंढारकर और फत्तेलाल के साथ मिलकर कोल्हापुर में ‘प्रभात फिल्म’ कम्पनी का गठन किया. बाद में साल 1933 में प्रभात स्टूडियो को कोल्हापुर से पुणे शिफ्ट कर दिया गया. मौजूदा समय में यह भारतीय फिल्म एवं टेलिविजन संस्थान (एफटीआईआई) के नाम से जाना जाता है.

कुछ समय के बाद वी शांताराम दामले, पेंढारकर और फत्तेलाल से अगल हो गए और साल 1942 में पुणे के प्रभात स्टूडियो को छोड़कर मुंबई के परेल स्थित वडिआ मूवी टाउन को ख़रीदा और राजकलम स्टूडियो की स्थापना की. वी शांताराम के इस स्टूडियो में सत्यजीत रे, बीआर चोपड़ा, राज कपूर, मनमोहन देसाई, यश चोपड़ा, हृषिकेश मुखर्जी, शक्ति सामंत, सुभाष घई और श्याम बेनेगल जैसे कई दिग्गज निर्देशकों ने अपनी फ़िल्मो की शूटिंग की. इस स्टूडियो के जरिए वी शांताराम ने भारतीय सिनेमा को ‘डॉक्टर कोटनीस की अमर कहानी’, ‘झनक झनक पायल बाजे’, ‘दो आंखें बारह हाथ’ और ‘नवरंग’ जैसी कई ऐतिहासिक फिल्में दीं.

शांताराम की फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ एक लाजवाब फिल्म है. साल 1957 में आई इस फिल्म की कहानी जेल में बंदी 6 अपराधियों पर आधारित थी. इन्हें एक आदर्शवादी जेलर की निगरानी में रखा गया था. फिल्म में जेलर का रोल खुद शांताराम ने निभाया था. जेलर इन अपराधियों को अच्छा इंसान बनने के लिए प्रेरित करता है. इस फिल्म का गीत ‘ऐ मालिक तेरे बंदे हम’ आज कई स्कूलों में बतौर प्रार्थना शामिल है. इसे लता मंगेशकर ने गाया था.

फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ को बर्लिन फिल्म फेस्टिवल का सिल्वर बियर अवॉर्ड मिला. इसके अलावा इस फिल्म को बेस्ट फीचर फिल्म की कैटेगरी में सैमुअल गोल्डविन अवॉर्ड भी मिला. फिल्म ‘दो आंखें बारह हाथ’ का इंपैक्ट इतना गहरा था कि बाद के वर्षों में निर्देशक सुभाष घई ने इसी तरह की फिल्म ‘कर्मा’ बनाई थी.

फिल्म ‘कर्मा’ में जेलर की भूमिका में दिलीप कुमार थे और घई की यह फिल्म सुपरहिट रही. शाताराम की एक क्लासिक फिल्म है ‘डॉ. कोटनिस की अमर कहानी’. यह फिल्म डॉक्टर कोटनिस के जीवन पर आधारित है. इस फिल्म को हिंदी सिनेमा के पहले बायोपिक होने का क्रेडिट दिया जाता है.

इसके अलावा शांताराम की फिल्म ‘झनक झनक पायल बाजे’ भारत की पहली टेक्नीकलर फिल्म थी. एक मेलोड्रामा पर आधारित यह बॉक्स ऑफिस पर जबरदस्त हिट रही. दर्शकों ने इसके डांस और गानों को बहुत पसंद किया.

शांताराम सिर्फ एक फिल्मकार नहीं थे, उन्होंने फिल्म निर्माण से भारतीय सिनेमा को वो दिशा प्रदान की, जिस पर आज की फिल्म इंडस्ट्री चल रही है. एक बार भारतीय सिनेमा के पितामह दादा साहब फाल्के ने वी शांताराम को मिलने का संदेश भेजा. शांताराम फाल्के से मिलने पहुंचे. उन्होंने देखा कि फाल्के एक फटी हुई चादर पर लेटे हैं और उनके घर की हालत भी जर्जर है. फाल्के ने शांताराम से कहा था कि उनके पास इलाज और खाने-पीने तक के पैसे नहीं हैं. उन्होंने शांताराम से कुछ पैसे उधार देने के लिए कहा था. उस मुलाकात के बाद से शांताराम दादा साहेब फाल्के की मृत्यु तक हर महीने एक निश्चित धनराशि भेजते रहे.

वी शांताराम फिल्मों में नई तकनीक के प्रयोग को लेकर बहुत गंभीर थे. भारतीय सिनेमा में प्रयोग में लाई गई कई तकनीकों का श्रेय वी शांताराम को जाता है. उन्होंने साल 1931 में आई फिल्म ‘चंद्रसेना’ की शूटिंग में भारत में पहली बार ट्रॉली कैमरे का प्रयोग किया था. इस ट्राली कैमरे को साइकिल के पहियों और लकड़ी के तख्तों से जोड़कर बनाया गया था.

इसके अलावा भारत की पहली कलर फिल्म भी वी शांताराम ने ही बनाई थी. साल 1933 में वी शांताराम की फिल्म सैरन्ध्री का नाम लिया जाता है लेकिन फिल्म के पोस्ट प्रोडक्शन में तकनीकी गड़बड़ी की वजह से फिल्म के सारे कलर चले गए और इस तरह ‘किसान कन्या’ को भारत की पहली कलर फिल्म माना जाता है.

शांताराम ने साल 1934 में बनी अपनी फिल्म ‘अमृत मंथन’ में पहली बार ‘टेलीफोटो लेंस’ का प्रयोग किया था. जिससे बार-बार कैमरे की जगह बदलने की जरूरत कम हुई. साल 1935 में आई फिल्म ‘जम्बूकाका’ में वी शांताराम ने पहली बार एनिमेशन का प्रयोग किया था और साल 1936 में आई शांताराम की फिल्म ‘अमृत मंथन’ में पहली बार ‘बैक प्रोजेक्शन’ का प्रयोग किया गया था. साल 1957 में वी शांताराम को उनकी फिल्म ‘झनक-झनक पायल बाजे’ के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का फ़िल्मफेयर पुरस्कार मिला. साल 1985 में वी शांताराम को दादा साहेब फाल्के अवार्ड से नवाजा गया.

वी शांताराम ने साल 1957 में ‘दो आंखें बारह हाथ’, साल 1959 में ‘नवरंग’, साल 1967 में ‘गुनाहों का देवता’, साल 1967 में ‘बूंद जो बन गयी मोती’, साल 1964 में ‘गीत गाया पत्थरों ने’, साल 1959 में ‘नवरंग’, साल 1957 में ‘झनक झनक पायल बाजे’, साल 1946 में ‘डॉक्टर कोटनीस की अमर कहानी’, साल 1951 में ‘अमर भूपाली’ जैसी महान फिल्मों की रचना की.