आज का सिनेमा: कैसा, क्यों और कब तक !

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मार्वेल स्टूडियो की फिल्में ज्यादातर उनके कॉमिक्स कैरेक्टर पर बेस्ड हैं।

कुछ समय पहले जाने-माने अमेरिकी फिल्म निर्देशक मार्टिन स्काॅर्सिस ने मार्वल की सुपरहीरो वाली ‘एवेंजर्स’ फिल्मों पर सवाल खड़ा करते हुए उन्हें सिनेमा से ‘इतर’ की संज्ञा दी थी। इसके जवाब में एवेंजर्स फिल्मों के निर्माताओं और चाहने वालों ने स्काॅर्सिस का पुरजोर विरोध किया। कई लोगों ने तो स्काॅर्सिस की सिनेमा की समझ पर ही सवाल दागे! हालांकि यह तर्क अपने आप में बेहूदा है। पिछले पचास सालों के अमेरिकी सिनेमा के इतिहास में स्काॅर्सिस को कुछ सबसे बेहतरीन सिने छवियों का श्रेय जाता है।

स्काॅर्सिस ‘गंभीर’ सिनेमा के प्रवक्ता और अध्यापक के तौर पर भी जाने जाते हैं। नवोदित फिल्मकारों को सिनेमा ‘सिखाने’ के लिए वह विभिन्न स्तरों पर काम करते रहे हैं। लिहाजा, यह सोचना जरूरी हो जाता है कि आखिर स्काॅर्सिस ने मार्वल फिल्मों पर सवाल क्यों उठाए? इसकी सबसे बड़ी वजह इन फिल्मों का ‘लार्जर दैन लाइफ’ स्वरूप है, जिनमें नायक और खलनायक अद्वितीय ताकत रखते हैं और अकेले दम पर बड़ी जंग जीतते हुए नजर आते हैं। बेशक, ‘नायकत्व’ की जडे़ं मानवीय इतिहास में गहरे से धंसी हैं। इतिहास में हर समय इनसान को नायकों की तलाश रही है। अतीत में जंगी नायकों के अलावा, रूहानी, कलाकार और विभिन्न माध्यमों से मनोरंजन करने वाले नायकों की लंबी सूची रही है।

सच तो यह है कि तारीख के जिस सफ़े पर नायक नहीं मिलते, उसे लगभग भुला दिया जाता है। इसलिए नायक इनसान की जरूरत के साथ-साथ उसकी मजबूरी भी बन चुके हैं। नायक प्रेरणास्रोत होते हैं, परंतु कई स्थानों पर उनका रुख धारा के विपरीत दिखता है और जरूरी नहीं कि अपने इस प्रयास में वह सफल ही साबित हों। ऐसे राजनीतिक क्रांतिकारियों की लंबी सूची है जिनके प्रयास उनके जीते जी असफल रहे, लेकिन बाद को वह नायक कहलाए। ऐसे भी नायक रहे जिन्हें कुछ खास वर्ग ही नायक मानते हैं, बहुसंख्य नहीं – उनमें से भी अधिकांशतः राजनीति की जमीन पर ही दिखते हैं। और आज सोशल मीडिया के दौर में समाज में दूर-दराज सामाजिक कार्य करने वाले ‘नायक’ भी हैं, जिन्हें जब-तब ‘असली नायक’ मानने की दलील दी जाती है। आमजन के इस तर्क से भी इनकार नहीं किया जा सकता। बहरहाल, मार्वल के सिनेमाई नायकत्व का यह पर्दे पर प्रदर्शन अच्छा-खासा दहला देने वाला होता है।

कैप्टन अमेरिका, आयरन मैन, थोर, हल्क जैसे नायक सुदूर ग्रहों से आने वाले ‘एलियंस’ से लड़ते-भिड़ते हैं। वह अपने से दस गुना बड़े खलनायकों को पटखनी देते नजर आते हैं। ऐसा नायकत्व विशेषकर कम आयु के दर्शकों को रोमांचित करता है, लेकिन यह पूरी तरह अमेरिकी नायकत्व है, जो आधुनिक विज्ञान से उपजा है। अमेरिका या पष्चिम आज के विज्ञान का केंद्र है, इसलिए जाहिर है कि उसके नायक भी जीवन से बड़े ही होंगे। इसके बरक्स मार्टिन स्काॅर्सिस जैसे फिल्मकारों की फिल्मों के नायक पूरी तरह से इनसानी हैं। दरअसल, स्कार्सिस के तर्क के पीछे उनकी यही मंशा रही है। बाद में उन्होंने अपनी सफाई में कहा – मेरे लिए, जिन फिल्मकारों की मैं प्यार और इज्जत करता हूं, मेरे मित्र जिन्होंने मेरे साथ ही फिल्म बनानी शुरू की थी, उनके लिए सिनेमा सौंदर्य, संवेदनशील और आध्यात्मिक रहस्योद्घाटन के तौर पर है। वह चरित्रों के बारे में – लोगों की जटिलताओं, उनकी विरोधाभासी और कभी-कभार मिथ्याभासी प्रकृति के बारे में है, जिसमें कभी-कभी एक दूसरे को दुख देते हैं, प्यार करते हैं और अचानक उनका अपने आप से सामना होता है।

मार्टिन स्काॅर्सिस के यह शब्द अपने आप में सिनेमा के सार तत्व को समझाने के लिए काफी हैं। लेकिन यह निर्विवाद सच है कि कला और संप्रेषण के अन्य माध्यमों की तरह अच्छा सिनेमा भी अपने समय का दस्तावेज होता है। इसके बरक्स सिनेमा को मात्र मनोरंजन का माध्यम मानने वाले फिल्मकारों की सोच कुछ अलग दिखती है। इस बहस में न पड़ते हुए हमें यह देखना होगा कि स्काॅर्सिस और उनके जैसे कुछ फिल्मकारों के ऐसा सोचने के पीछे और क्या कारण हैं। वैसे स्काॅर्सिस के हमउम्र स्टीवन स्पीलबर्ग और जाॅर्ज लुकास के नाम विज्ञान फंतासी फिल्मों का पर्याय बन चुके हैं। फिर भी उनकी फिल्मों में ‘मानवीय पक्ष’ काफी हद तक प्रबल रहता है। मार्वल फिल्मों में भी यदा-कदा यह तत्व दिखाई पड़ता है। सबसे हालिया मार्वल फिल्म में आयरनमैन की मृत्यु पर ऐसी ही भावनाएं उभर कर सामने आती हैं।

स्काॅर्सिस ने खुद ‘ह्यूगो’ जैसी फिल्में भी बनाईं जिनमें वीएफएक्स का इस्तेमाल किया गया, लेकिन वहां भी एक प्रबल मानवीय कथावस्तु सबसे पहले है। हालांकि, केवल मानवीय पक्ष की दलील देने भर से इस बहस का अंत नहीं हो जाता। सिनेमा का एक बड़ा पक्ष व्यावसायिक भी है, जो काफी हद तक उसकी रचनात्मक प्रक्रिया के साथ-साथ चलता है। फिल्म निर्माताओं को सबसे पहले यह सोचना पड़ता है कि उनकी बनाई फिल्म बाॅक्स आॅफिस पर कितना दम दिखा सकेगी। वैसे आज इस तथ्य के कुछ और रूप भी सामने आ गए हैं, जिन पर स्काॅर्सिस ने बात की है। वह कहते हैं – पिछले 20 वर्षों में, जैसा कि हम जानते हैं, फिल्म उद्योग के प्रत्येक पक्ष में परिवर्तन आए हैं। लेकिन सबसे अशुभ परिवर्तन छुपकर और रात के अंधेरे में आया है: जोखिम उठाने से जुड़ा धीमा लेकिन स्थायी उन्मूलन। आज बनने वाली कई फिल्में फौरी खुराक के लिए बनती हैं। इनमें से अधिकांश बेहद प्रतिभाशाली व्यक्तियों द्वारा बनाई गई होती हैं। फिर भी, उनमें सिनेमा का सबसे जरूरी तत्व नदारद होता है: एक कलाकार का समावेशी विज़न। चूंकि, जाहिर है, कोई भी एक कलाकार सबसे जोखिम भरा तत्व होता है।

स्काॅर्सिस आगे लिखते हैं – बेशक मैं यह नहीं कह रहा हूं कि फिल्में छूट प्राप्त कलात्मक कृतियां होनी चाहिए, या कभी थीं। जब हाॅलीवुड स्टूडियो सिस्टम जीवित और काम कर रहा था, कलाकारों और व्यवसाय चलाने वालों के बीच तनाव लगातार और गहरा होता था, लेकिन वह तनाव उत्पादक होता था जिसने हमें कुछ सबसे महानतम फिल्में दी हैं।

स्काॅर्सिस ने आगे बताया है कि कैसे उन्हें अपनी हालिया फिल्म ‘द आइरिशमैन’ को बनाने के लिए वित्तीय संकटों से जूझना पड़ा था। बाद को नेटफिल्क्स द्वारा पैसा दिए जाने के बाद यह फिल्म पूरी हुई और बेहद सराही गई। लेकिन उनका अवसाद यहीं समाप्त नहीं होता। वह बताते हैं कि बड़े पर्दे पर फिल्म देखने का सुख अब सिमटता जा रहा है। नेटफ्लिक्स जैसी वेब सेवाओं के आने से अब सीधे छोटे पर्दे के लिए फिल्में बनने लगी हैं। द आइरिशमैन भी सीमित दिनों के लिए बड़े पर्दे पर रिलीज की गई और उसका अधिकांश व्यवसाय नेटफ्लिक्स द्वारा इंटरनेट पर किया गया।

वह आगे बताते हैं – आज कला और व्यवसाय के बीच का पुराना तनाव गायब है और व्यवसाय जगत में ऐसे लोग आ घुसे हैं जिनका रवैया सिनेमा के समूचे इतिहास के प्रति उपेक्षापूर्ण और मालिकाना किस्म का है – यह बेहद खतरनाक जुगलबंदी है। आज दो धड़े बन चुके हैं, एक है दुनिया भर में फैला आॅडियो-विजुअल मनोरंजन माध्यम और दूसरी ओर है सिनेमा। दोनों कभी-कभार एक दूसरे की सीमाएं लांघते नजर आते हैं, लेकिन अब यह भी दुर्लभ होता जा रहा है। और मुझे डर है एक के वित्तीय प्रभुत्व का इस्तेमाल दूसरे को हाशिये पर डालने या उसके अस्तित्व को छोटा करने का काम कर रहा है।

यह बताने की जरूरत नहीं कि मार्टिन स्काॅर्सिस की चिंता सिर्फ अमेरिकी सिनेमा की चिंता नहीं बल्कि समूचे वैश्विक सिनेमा की चिंता है। 
शायद ऐसे ही कुछ कारण थे जब अमेरिकी सिनेमा में बड़े स्टूडियो के मुकाबले वहां ‘इंडिपेंडेंट’ फिल्मों का चलन आरंभ हुआ था। खुद मार्टिन स्काॅर्सिस फिल्म निर्माण के ‘न्यूयाॅर्क स्कूल’ से संबंध रखते हैं और 1970 के दशक की शुरुआत में बनाई उनकी फिल्में इसी स्वतंत्र सिनेमा की झलक प्रस्तुत करती हैं। कम बजट की यह फिल्में न्यूयाॅर्क और अन्य कुछ स्थानों की कड़वे यथार्थ की कहानियां बताती थीं, और अपनी कथावस्तु, अभिनय और निर्देशकीय क्षमता में कुछ इतनी अच्छी रहीं कि आॅस्कर और अन्य पुरस्कार भी इन्होंने प्राप्त किए। यानी ऐसे पुरस्कार जिन पर पहले सिर्फ बड़े स्टूडियो का दबदबा दिखता था। यही वह समय था जब न्यूयाॅर्क स्कूल में अमेरिकी नीग्रोज़ की दुनिया की झलक दिखाने वाली कई स्वतंत्र फिल्में भी बनी थीं।

इंडिपेंडेंट फिल्मों को एक बड़ा सहयोग अभिनेता-निर्देशक राॅबर्ट रेडफोर्ड की तरफ से भी मिला। वह आज भी ‘सनडेंस फिल्म फेस्टिवल’ का आयोजन करते हैं, जहां दुनिया भर से स्वतंत्र फिल्में दिखाई जाती हैं और उनको रिलीज करने में मदद मिलती है।

दरअसल, आज भारत में भी कुछ ऐसे ही हालात हैं। नेटफिल्क्स और अमेजन प्राइम जैसी सेवाएं यहां भी फिल्म और ‘वेब सिरीज’ निर्माण कर रही हैं। इनके माध्यम से नवोदित कलाकारों को काम तो मिल रहा है, लेकिन सिनेमा का बुनियादी काम एक बार फिर अधूरा पड़ा दिखता है, जो है – अपने समय के दस्तावेज के रूप में काम करना। इस मायने में आज का भारतीय टेलिविजन तो बिल्कुल ही उल्टी गंगा बहाता दिखा रहा है। तमाम निजी टीवी चैनलों पर देर रात दिखने वाले धारावाहिकों की कथावस्तु और कलेवर लगभग एक सा दिखता है। इसके बरक्स हम याद करें 1980 के दूरदर्शन के धारावाहिकों को तो उनकी विविधता अचंभित करती है – तमस, नुक्कड़, बुनियाद, हम लोग, मालगुडी डेज़, भारत एक खोज, यात्रा, कक्काजी कहिन, ये जो है जिंदगी, कथा सागर, मुंगेरीलाल के हसीन सपने, मिर्जा गालिब, कब तक पुकारूं, नीम का पेड़, मुजरिम हाजिर, वागले की दुनिया, रजनी एवं मिस्टर योगी आदि। फेहरिस्त अधूरी है, लेकिन इन छवियों में उस समय के भारत की झलकियां जरूर दिखती थीं। 

फिल्म हो या टीवी, फिल्म निर्माण की प्रक्रिया एक सी रहती है, उसका लेखन और अन्य पक्षों पर की जाने वाली मेहनत भी एक सी होती है। कुछेक मायनों में तो टीवी के लिए किया जाने वाला लेखन ज्यादा चुनौतीपूर्ण दिखता है, क्योंकि उसे निश्चित समयसीमा में समेटने की जरूरत होती है। अमेरिका में सुपरहीरो वाली फिल्मों के दबदबे का ही कारण है कि शायद वहां की लेखन प्रतिभाओं ने टीवी का रुख कर लिया। पिछले बीस वर्षों में अमेरिकी टेलिविजन पर प्रसारित होने वाले धारावाहिकों की गुणवत्ता वहां की फिल्मों से इक्कीस ही रही है और इस चलन के जारी रहने की पूरी संभावना है।

इसलिए स्काॅर्सिस की चिंता सिर्फ हाॅलीवुड की नहीं बल्कि भारतीय फिल्म उद्योग पर भी उतनी ही मुफीद बैठती है। अब उम्मीद यह की जानी चाहिए कि बड़े वित्त के दबाव में छटपटा रही प्रतिभाओं के लिए नया रास्ता इसी काॅर्पोरेट ढांचे के बीच से ही निकलेगा क्योंकि किसी भी बड़े तंत्र की सख्ती ही अंततः उसके टूटने का कारण बनती है और उसके बाद नई जमीन सामने दिखती है। जरूरत होती है तो सिर्फ उस जमीन में सही बीज बोने की।