भुवन शोमः पहली बार पर्दे पर गूंजी थी अमिताभ बच्चन की आवाज

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भवन शोम सुहासिनी मुले की पहली फिल्म थी। इस फिल्म से अमिताभ बच्चन को पहला ब्रेक मिला था। उन्होंने इस फिल्म में सूत्रधार की आवाज दी थी।

रंगनाथ सिंह

भुवन शोम 1969 में रिलीज़ हुई थी. भारतीय सिनेमा के इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण फ़िल्म मानी जाती है. फ़िल्म को तीन राष्ट्रीय पुरस्कार मिले थे. मृणाल सेन को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म के लिए और उत्पल दत्त को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के लिए.

इस फ़िल्म में जिस चीज़ ने सबसे पहले ध्यान खींचा वो है अमिताभ बच्चन की आवाज़. इस फ़िल्म में सूत्रधार की आवाज़ अमिताभ ने दी है. फ़िल्म के टाइटिल में उनका नाम अमिताभ ही दिया गया है. IMDB के अनुसार मृणाल सेन को उनका नाम ज़रूरत से ज़्यादा लम्बा लगा था. इसलिए उन्होंने फ़िल्म की क्रेडिट लाइन में अमिताभ को सिर्फ अमिताभ के रूप में क्रेडिट दिया.

यह अमिताभ की पहली फ़िल्म थी. सुरेश कोहली के अनुसार ख़्वाजा अहमद अब्बास के ऑफिस में भुवन शोम में उदघोषक की भूमिका के लिए आए कई उम्मीदवारों में से एक थे यानी अमिताभ की आवाज उनसे पहले रुपहले पर्दे पर आ चुकी थी ! ख़्वाजा अहमद अब्बास ने ही अमिताभ को उनका पहला सिनेमाई रोल भी दिया था. यह फ़िल्म थी, सात हिन्दुस्तानी.

फ़िल्म में दूसरी जिस ख़ास बात का जिक्र ज़रूरी है वो है फ़िल्म की नायिका, सुहासिनी मुले. आजकल के दर्शकों के लिए सुहासिनी एक जाना-पहचाना चेहरा हैं. लेकिन मैंने उन्हें जब से देखा है उम्रदराज़ रोलों में ही देखा है. इस फ़िल्म में उन्हें देखना दो कारणों से काफी सुखद अनुभव रहा. पहला, इस फ़िल्म में वो बेहद ख़ूबसूरत लगीं हैं. दूसरा, उन्होंने गाँव की भोली लड़का की भूमिका को बख़ूबी निभाया है. उत्पल दत्त जैसे चोटी के अभिनेता का साथ उन्होंने जिस कुशलता से निभाया है वो क़ाबिले-तारिफ़ है. उन्हें देखकर कहीं से नहीं लगता कि यह उनकी पहली फ़िल्म थी. सुहासिनी फ़िल्म में अपनी सहज अदाकारी और मासूमियत से नूतन की याद दिलाती हैं.

हाल से निकलते  वक़्त दिमाग में यह ख़्याल घूम रहा था कि  सुंदरता और अभिनय दोनों मानदण्डों पर खरी उतरने वाली यह नायिका हिन्दी सिनेमा से ग़ायब कैसे हो गई. जवाब की तलाश में गूगल सर्च करने पर पता चला कि सुहासिनी इस फ़िल्म के कुछ ही समय बाद उच्च शिक्षा के लिए कनाडा चली गईं थीं. सुहासिनी कनाडा से 1975 में लौटीं और फिर से फ़िल्मों से जुड़ी. लेकिन अभिनेत्री के रूप में नहीं. सहायक निर्दशक के रूप में. सुहासिनी ने सत्यजीत रे की फ़िल्म जन अरण्य में सहायक निर्देशक के रूप में जुड़ गईं. इस फ़िल्म के सत्यजीत रे को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था.

जन अरणय के बाद सुहासिनी मृणाल सेन की फ़िल्म मृगया में सहायक निर्देशक बन गईं. इस फ़िल्म को भी

सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म और सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (मिथुन चक्रवर्ती) का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था. अभिनेता के रूप में में मिथुन की यह पहली ही फ़िल्म थी.

भुवन शोम की समीक्षा के बहाने सुहासिनी मुले के बारे में दो-एक बातें कर लेना वृथा न होगा. क्योंकि मेरे लिए तो फ़िल्म की सबसे बड़ी उपलब्धी रहीं. सुहासिनी अब तक पाँच राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी हैं. इनमें चार पुरस्कार उन्हें वृत्तचित्र निर्माण के लिए मिले हैं और एक हू-तू-तू फ़िल्म में सहायक अभिनेत्री के लिए. सुनासिनी ने अपने एक साक्षात्कार में बताया है कि उन्होंनो कनाडा में मशहूर वृत्तचित्र निर्माता जॉन ग्रियर्सन से जनसंचार पढ़ा है. और शायद ग्रियर्सन की ही प्रेरणा थी कि सुहासिनी फ़िल्म से ज्यादा वृत्तचित्र बनाने पर केंद्रित रहीं.

सुहासिनी ने 60 साल की उम्र में शादी करके सभी को चौंका दिया था. वो अपने पार्टिकल फिजिसिस्ट पति से फेसबुक पर मिली थीं. उनके इस प्यार की कहानी को आप टाइम्स ऑफ इण्डिया के इस लेख में  विस्तार से पढ़ सकते हैं.

फ़िल्म में कैमरा किया है केके महाजन ने जिनका हिन्दी सिनेमा की समानांतर धारा मानी जानी वाली फ़िल्मों से गहरा नाता रहा है. वे मणि कौल, कुमार साहनी और बासु चटर्जी इत्यादि की प्रमुख फ़िल्मों के कैमरामैन रहे थे.

फ़िल्म की कहानी का सार है कि रेलवे के एक कड़क सरकारी अफ़सर का दिल की गाँव की एक भोली औरत से मिलकर बदल जाता है.  अफ़सर की भूमिका में हैं उत्पल दत्त और सुहासिनी मुले ने भोली महिला का किरदार निभाया है.

मैंने ये फ़िल्म सिरी फ़ोर्ट में किसी फ़ेस्टिवल में देखी. २०१५ में ये एक साधारण मनोरंजक फ़िल्म लगती है. शायद १९६९ के टाइम-स्पेस में ये एक महत्वपूर्ण फ़िल्म रही हो.

फ़िल्म का जॉनर कॉमेडी-सटायर है. फ़िल्म में बंगाली भद्रलोक और उसके पूर्वाग्रहों पर कटाक्ष किया गया है. फ़िल्म में कहीं न कहीं शहर को चालूपन का और गाँव को भोलेपन का प्रतीक माना गया है. आधुनिक शहरीकरण का शिकार होने वाले ज़्यादातर रचनाकारों में ऐसा पूर्वाग्रह था.

फ़िल्म देखते हुए शायद ज़्यादातर दर्शकों को कहानी के अंत का अंदाजा हो जाएगा. फ़िल्म की कहानी में ज़्यादा नाटकीयता या मोड़ नहीं है. फ़िल्म एक तरह से उत्पल्ल दत्त की अदाकारी पर टिकी है. जो रह रह कर आपको गुदगुदाते रहते हैं.