जाह्नू बरुआ: मैं सिनेमा क्यों बनाता हूँ

maine gandhi ko nhin mara, filmbibo
जाह्नू बरुआ की हिन्दी फिल्म 'मैंने गाँधी को नहीं मारा' का स्पेशल जूरी का राष्ट्रीय अवार्ड मिला था।

असमिया फिल्मकार जाह्नू बरूआ आधा दर्जन से ज्यादा राष्ट्रीय पुरस्कार और उतने ही अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों के विजेता हैं। उन्हें सार्थक सिनेमा का पुरोधा माना जाता है। हिन्दी में बनाई उनकी फिल्ममैंने गाँधी को नहीं माराकाफी प्रशंसित हुई थी। पढ़ें उनका यह लेख-

जाह्नू बरुआ

सिनेमा अन्य माध्यमों की तुलना में सबसे ताकतवर माध्यम है। हर व्यक्ति समाज और राजनीति से जुड़ा हुआ है। मनुष्य जो कुछ भी करता है उसका समाज और राजनीति से रिश्ता होता है। क्षेत्र चाहे व्यापार हो या सिनेमा। मैंने जो कुछ भी सीखा है वह समाज से ही। समाज के साथ सिनेमा का गहरा संबंध है।

मेरी फिल्में समाज से जुड़ी होती हैं। मेरा विश्लेषण भी समाज से शुरू होता है। मैं अपनी फिल्म के लिए बजाय कहानी चुनने के किसी सामाजिक मुद्दे को अपना विषय बनाता हूँ। वह मुद्दा समसामयिक और डाक्यूमेंट्री महत्व का होता है। मेरी फिल्म का विषय जितना समाज से संबंधित होता है उतना ही राजनीति से भी। लेकिन मेरी फिल्म का राजनीतिक टोन डायरेक्ट नहीं होता। डायरेक्ट राजनीतिक टोन भड़काता है। बात राजनीतिक शोषण की हो तो भी मैं उसका विश्लेषण करके लोगों को दिखाता हूँ। मैं निष्कर्ष नहीं निकालता। यह मैं अपने दर्शकों पर छोड़ देता हूँ। अगर मेरी फिल्म में ऐसा कोई अपराधी है, जिसने हत्या की है, तो मैं उसे अन्तिम दृश्य में सजा नहीं दिलवाता। आज की राजनीति के बारे में निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। अक्सर कोई अपराधी किसी मंत्री से मिलकर अपने को सजा से मुक्त कर लेता है। आवश्यक्ता इसके विश्लेषण की है, और मैं यही करता हूँ।

मेरी फिल्मों में राजनीतिक विचार विश्लेषण अधिक होता है, मगर वह प्रत्यक्ष नहीं होता। वह विचार-विमर्श की प्रक्रिया में दिखता है। मेरा एक मकसद ऐसी बहस को प्रेरित करना भी है। हिन्दी सिनेमा बहस को रोकता है। यहां तक कि गोविंद निहलानी की फिल्में भी। क्योंकि इनके यहां पोलिटिकल टोन्स डायरेक्ट हैं। वे निष्कर्ष भी निकालते हैं जो जनता को भड़काने का काम तो करता है मगर किसी विचार-विमर्श के लिए प्रेरित नहीं करता। जो काम मैं दर्शकों से कराता हूँ वह काम गोविंद स्वयं करते हैं। मैं दर्शकों को शामिल करता हूँ और गोविन्द दर्शकों को माध्यम बनाते हैं।

सिनेमा का एक राजनीतिक दायित्व भी है। राजनीति निर्भर करती है लोगों के चुनाव और खारिज पर। किसी नेता को समझाना मेरा काम नहीं है। नेता ऐसे हैं जान-बूझ कर ऐसा या वैसा काम करते हैं। ऐसे नेताओं को समझाया नहीं जा सकता। लेकिन जब जनता ऐसे किसी नेता को चुनती है उसमें कहीं धोखा नहीं होता है। जनता की यह मासूमियत है कि वह उसका विश्लेषण नहीं करती। जनता को विश्लेषण करने के तैयार करने की जरूरत है। अगर हम राजनीति पर कुछ कर रहे हैं तो हमें यह प्रयास करना चाहिए। मैं अपनी फिल्मों में यह करता हूँ। सिनेमा राजनीतिक दायित्व ऐसे ही निभा सकता है।

एक गंभीर फिल्म भी लोगों को स्वस्थ मनोरंजन दे सकती है। मनोरंजन केवल हास्य नहीं है। या केवल हास्य से ही मनोरंजन उत्पन्न नहीं होता। वह कहीं भी मिल सकता है, मगर ढूढ़ना पड़ता है। आम जनता के लिए मनोरंजन बहुत आवश्यक है। मनोरंजन की कई दिशाएं हैं। ब्ल्यू फिल्में और चार्ली चैपलिन की फिल्में- दोनों मनोरंजन करती हैं। मगर दोनों में अन्तर है। एक कृत्रिम है और दूसरा कलाकार द्वारा सिरजा हुआ है। यह उस कलाकार की सोच और सृजनशीलता का परिणाम है।

हिन्दी सिनेमा वाले हमेशा यह दलील देते हैं कि वे जनता का मनोरंजन के लिए फिल्म करते हैं या बनाते हैं। अमिताभ अभी भी सुपर स्टार है। उसने अपने तरीके से हिन्दी सिनेमा को समृद्ध किया है। वह अच्छा अभिनेता है, उसका अभिनय भी उच्च स्तर का है। वह ऐसा अभिनेता था जो घटिया से घटिया भूमिका को भी अच्छा बना देता था। उसकी अभिनय प्रतिभा ऐसी थी। वह सुपर स्टार ऐसे ही नहीं बन गया। उसमें बहुत कुछ था। लेकिन वह सुपर स्टार बनकर ही रह गया। उसने फिल्म के लिए कुछ नहीं किया। उसमें इतनी क्षमता थी कि वह फिल्म उद्योग में परिवर्तन ला सके। परंतु यह सिर्फ अतिमाभ की समस्या नहीं है। यह दूसरे फिल्मकार, अभिनेता और अभिनेत्रियों की समस्या भी है। दर्शकों को धोखा नहीं देना चाहिए। अमिताभ तथा दूसरे लोगों ने धोखा दिया है। एक तरीके से मणिरत्नम भी धोखा दे रहे हैं,लेकिन उनका तरीका छठे दशक का है। उस काल में स्टारडम और ग्लैमर के साथ विषय भी प्रमुख हुआ करता था। मणिरत्नम की फिल्में देखकर ऐसा लगता है कि वे विषय को बिकने की वस्तु मानते हैं। उनकी फिल्मों में समाज है लेकिन गौण, बाजार ही प्रमुख है। हिन्दी सिनेमा या उद्योग से साफगोई गायब है,क्योंकि वहाँ सिर्फ बाजार है, समाज लगभग लुप्त है।

समाज और बाजार एक दूसरे से जुड़े हैं। बाजार समाज का ही एक अंग है। बाजार भी हमें चाहिए। आज का आधुनिक समाज ऐसा है, जिसके बाजार में सब कुछ बिक रहा है। अभी समाज में बाजार के प्रति आकर्षण बढ़ा रहा है। आधुनिक समाज में मैटेरियलइज्म बढ़ रहा है। लोगों को समझ नहीं आ रहा है कि क्या करें। यह अच्छा है या बुरा, हमें तय करना है। हमारे पास ऐसी कसौटी भी होनी चाहिए, जिसके आधार पर हम मैटैरियलिइज्म का मूल्यांकन कर सकें और उसी के आधार पर उसका विरोध भी। हिन्दी सिनेमा के पास न तो कोई कसौटी है और न ही इस प्रवृत्ति के खिलाफ कोई कुछ कर रहा है। हिन्दुस्तान में अभी जितनी भी फिल्में बन रही हैं, उनका 95 प्रतिशत समाज के लिए कुछ नहीं कर रही हैं।

फिल्म बनाने वालों को सोचना चाहिए कि वह सृजनशील व्यक्ति है, वह कलाकार है। कलाकार का काम है कि लोगों की पसंद को बदले, बनाए और इसके स्तर को ऊँचा उठाए। कालाकर को हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि वह एक कलाकार है। उसके पास बहुत कुछ है कहने के लिए। कलाकार का अर्थ ही है पथ-प्रदर्शक। जो कलाकार यह सोचे कि जनता जो पसंद करती है, वही उसे दे,तो वह कलाकार नहीं है। कलाकार को हमेशा समाज के प्रति जिम्मेदार होना चाहिए। आजकल केवल पाँच प्रतिशत ऐसे कलाकार है। जो समाज को अपनी फिल्मों से जोड़ते हैं।

हिन्दी सिनेमा अपने मूक चरण में दृश्य स्तर पर बहुत साफ हुआ करता था। आवाज के प्रवेश के साथ लोगों में एक नयी उत्सुकता जगी। यह चालीस के दशक की बात है। इस काल में जितनी फिल्में बनीं,उनमें से अधिकांश अच्छे विषय पर बनीं। विषय समाज से लिए गए,जैसे अछूत कन्या। इस काल की फिल्में समाज से, इतिहास से कहानी पेश करती थीं। जनता को जागरुक बनाती थीं। इस दशक के अंत में ही स्टारडम की शुरुआत होती है,  लेकिन विषय नहीं छूटा,बचा हुआ था। स्टारडम की वजह से हीरो और हीरोइन अकेले ही सब कुछ संभालते थे,मगर फिल्म ऊँचे स्तर की होती थी। मसलन गुरु दत्त, राज कपूर और महबूब खान की फिल्में।

गुरु दत्त की सी.आई.डी. एक अलग किस्म की फिल्म है,मगर उसमें भी विषय है। कागज के फूल,साहब बीबी और गुलाम तथा प्यास ऐसी फिल्में हैं जो एक व्यक्ति पर बनीं और एक व्यक्ति के दृष्टिकोण से बनी हैं। लेकिन विषय से जुड़ी हुई हैं। इसीलिए वहाँ व्यक्ति होने के साथ-साथ समाज भी है। इन फिल्मों के चरित्रों के आपसी संबंधों को जनता पहचान सकती है। इनकी फिल्मों में समाज हमेशा मौजूद है। साहब, बीबी और गुलाम में मीना कुमारी और भूतनाथ का संबंध। भूतनाथ को खुदाई के समय जब छोटी बहु का नरकंकाल दिखता है तो वह अपने संबंध को फिर से याद करता है। उसकी याद में खो जाता है। यह मानवीयता है। गुरु दत्त की फिल्मों में विचार तत्व है और रिश्तों की व्याख्या भी है।

बावजूद इसके कि राज कपूर ने राम तेरी गंगा मैली जैसी फिल्म बनाईं, वे सिनेमा माध्यम का बहुत सम्मान करते थे। उनके पचास के दशक की फिल्मों में विषय है। साठ के दशक में उन्होंने वैयक्तिक अनुभूतियों की फिल्में बनाईं। पर इस दशक में ही हिन्दी सिनेमा विषय से बाहर निकल आता है और व्यक्तिगत कहानी उभर कर सामने आती है। व्यक्तिगत कहानी का अर्थ है व्यक्तिगत रिश्ते-माँ-बाप,भाई-बहन। यहीं से विशुद्ध प्रेम कहानी की शुरुआत होती है,जो आजकल देखने को मिलती है, और फिल्मों से समाज गायब हो जाता है। सत्तर तक कुछ हद तक तार्किकता बची हुई थी। सत्तर के बाद हिन्दी सिनेमा से समाज और तार्किकता दोनों खत्म हो जाती है।