सत्यजीत रेः महिलाएँ अधिक ईमानदार, साफगो और चरित्रवान होती हैं

Satyajit Ray with Ravi Sankar recording for Pather Panchali, filmbibo
पाथेर पंचाली (1955) के निर्माण के दौरान सत्यजीत रे (बाएं) और रविशंकर।

अनुवाद एवं प्रस्तुति : संदीप मुद्गल

महान फिल्मकार सत्यजीत रे ने फिल्में बनाने के अतिरिक्त खुद फिल्म निर्माण प्रक्रिया पर गहराई से विचार किया और लिखा भी है। मानवीय अंतर्संबंधों के मनोवैज्ञानिक पक्षों पर भी सत्यजीत रे की पकड़ अद्वितीय थी, इसके असंख्य प्रमाण उनकी फिल्मों और लेखन में स्पष्ट मिलते हैं। करीब चार दशक लंबे अपने फिल्म निर्माण करियर में उन्होंने अनेक साक्षात्कार भी दिए, जिनसे एक परिपक्व मानवीय सोच-समझ वाले व्यक्ति की झलक मिलती है। इतना ही नहीं, इन साक्षात्कारों का समग्र मूल्यांकन भी अपने आप में एक उच्चकोटि के रचनात्मक कार्य का रूप ले सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि प्रश्नोत्तर के दौरान रे अपने रचनात्मक पहलुओं की परतों को स्वयं एक-एक कर सामने रखते हैं और अन्य रचनाकारों की रचनाधर्मिता का गहरा सामाजिक-राजनीतिक-कलात्मक और मानवीय मूल्यांकन भी कर दिखाते हैं। कहना न होगा कि सत्यजीत रे एक लेखक, फिल्मकार, संगीतकार, चित्रकार होने के साथ-साथ एक गहरे और सकारात्मक आलोचक भी थे, जिनकी भारतीय और विदेशी लेखक और फिल्मकारों के कार्यों पर असाधारण पकड़ थी। कई वर्ष पहले पश्चिमी सिने पत्रिका ‘सिनेस्ट’ को दिए गए एक साक्षात्कार में उन्होंने अपनी सिनेमाई रचनाधर्मिता से जुड़े अनेक सवालों के जवाब दिए थे।
उसी साक्षात्कार का हिन्दी अनुवाद यहां दिया जा रहा है, जिसमें रे ने बेहद साफगोई से सवालों के जवाब देने के साथ-साथ अपने कार्य से जुड़े कई मिथकों का भी खंडन किया है। प्रस्तुत साक्षात्कार में यदि सत्यजीत रे के रचनात्मक प्रेरक तत्वों की झलक मिलती है तो वहीं उनके राजनीतिक विचारों से भी पाठक रू-ब-रू होता है। एक ओर यदि वह अपनी सीमाओं पर बात करते हैं तो दूसरी ओर कला के क्षेत्र में देशकाल की सीमाएं पाटने की बात भी कहते हैं। उम्मीद की जा सकती है कि यह साक्षात्कार सिने प्रेमियों को सिनेकला के बारे में सत्यजीत रे की अनुभवी दृष्टि से कुछ नए सूत्र उपलब्ध करा सकेगा।
 सिनेस्ट: पाथेर पांचाली ने आपको कैसे बदला। क्या उसके जरिए आपने बंगाल को नए सिरे से समझा था ?

सत्यजीत रे: इसमें दोराय नहीं कि मैंने पाथेर पांचाली के निर्माण के दौरान ग्रामीण जीवन के कई रूप समझे थे। मैं शहर में पला-बढ़ा था, इसीलिए गांव के जीवन का अनुभव मुझे नहीं था। ग्रामीण क्षेत्रों में लोकेशन तलाशने के दौरान और फिर स्थान मिलने के बाद मैंने गांव में अधिक समय बिताया और उसे समझने लगा था। लोगों से बात करना, उनके हाव-भाव, स्थानादि की ध्वनियों के साथ होने वाली क्रिया-प्रतिक्रिया ने हर तरह से मदद की। ऐसा नहीं है कि गांव में पला-बढ़ा व्यक्ति ही ग्रामीण जीवन के बारे में फिल्म बना सकता है, एक बाहरी व्यक्ति की दृष्टि भी उसे गहराई से जानने में सफल हो सकती है।

 सिनेस्ट: आपके कार्य पर अन्य प्रभाव किनका रहा ?

सत्यजीत रे: बिभूतिभूषण (अपु त्रयी और अशनि संकेत के लेखक) का मुझ पर बहुत गहरा असर रहा। दरअसल, मैं ग्रामीण जीवन को पाथेर पांचाली पढ़ने के बाद ही समझ सका था। मुझे उनके साथ, गांव और उनके गांव के प्रति व्यवहार के साथ एक तारतम्यता बनने का अहसास हुआ था, यही कारण है कि मैं सर्वप्रथम पाथेर पांचाली बनाना चाहता था। पुस्तक ने मुझ पर गहरा असर छोड़ा था।

इसके अलावा, मैं टैगोर के कार्यों से भी बहुत प्रेरित था जो आमतौर ग्रामीण परिवेश पर केंद्रित नहीं थे। यह भी है कि हमारी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, हमारा सांस्कृतिक स्वरूप, पूर्व और पश्चिम के मिलन का अपना अलग असर रहा था। ऐसा किसी भी उस व्यक्ति के साथ हो सकता था जो भारत के किसी भी शहर में शिक्षा प्राप्त हो और क्लासिकी पश्चिमी साहित्यिक कार्य पढ़ता रहा हो। आखिरकार, पश्चिम के प्रति हमारी समझ किसी भी पश्चिमी व्यक्ति की हमारे देश के प्रति समझ से अधिक गहरी है। हमने पश्चिमी अध्ययन शैली को आत्मसात किया है। पश्चिमी संगीत, कला, साहित्य का भारत में गहरा असर रहा है।

दूसरी ओर, फिल्म मुख्यत एक ऐसा माध्यम जिसका विकास पश्चिम में हुआ है। एक कलात्मक विधा के तौर पर इसकी अवधारणा पश्चिमी है, भारतीय नहीं। इसलिए सिनेमाई माध्यम को समझने के लिए जरूरी है कि पश्चिम और वहां की कला विधाओं को समझा जाए। एक बंगाली लोक कलाकार, या एक आदिवासी कलाकार, सिनेमाई कला विधा को नहीं समझ सकते। इसलिए जिस व्यक्ति का संबंध पश्चिमी शिक्षा से रहा है, वह इस मामले में कुछ आगे जरूर है।

 सिनेस्ट: भारतीय समीक्षकों का मत रहा है कि पाथेर पांचाली इस मायने में एक अतिवादी फिल्म रही है क्योंकि उसने भारतीय फिल्म के आर्थिक ढांचे को बदल के रख दिया था। उसने साबित कर दिया था कि बिना स्टूडियो आश्रय के भी फिल्में बनाई जा सकती हैं। क्या सचमुच फिल्म का इतना तात्कालिक प्रभाव रहा था ?

सत्यजीत रे: मुझे ऐसा नहीं लगता। हालांकि दर्शकों और समीक्षकों ने फिल्म को मील का पत्थर माना, लेकिन फिल्मकार उसकी शैली अपनाने को तैयार नहीं थे। ऐसा बहुत बाद में देखने को मिला था। गत कुछ वर्षों में पुणे फिल्म संस्थान से आने वाले फिल्मकारों ने कहा है कि वह पाथेर पांचाली से प्रेरित रहे हैं।

 सिनेस्ट: क्या देश से बाहर आपकी फिल्मों को मिली सकारात्मक प्राप्ति से आपको हैरानी हुई थी ?

सत्यजित रे: मैंने कभी सोचा भी नहीं था कि मेरी कोई भी फिल्म, विशेषकर पाथेर पांचाली, को देश या विदेशों में देखा भी जाएगा। सच तो यह है कि यदि आप वैश्विक मनोभावों, संबंधों, संवेदनाओं और चरित्रों को दिखाने में सफल रहते हैं तो आप कुछ हदबंदियों को तोड़कर अन्य लोगों तक पहुंचते हैं।

 सिनेस्ट: आपकी सबसे कमजोर फिल्म कौन सी रही है ? 
सत्यजित रे: सबसे कमजोर फिल्म ‘चिडि़याखाना’ को कहूंगा। पहली बात तो यह कि विषय मेरी पसंद का नहीं था और परिस्थितिवश मैं उसे बनाने को मजबूर हुआ था। मेरे कुछ सहयोगियों को वह फिल्म बनानी थी, परंतु अचानक उनमें आई आत्मविश्वास की कमी के कारण मुझे बीच में आना पड़ा था।
चिडि़याखाना एक रहस्यकथा (हू डन इट?) है और ऐसी कथाओं पर अच्छी फिल्में नहीं बनतीं। मैं ऐसी रोमांचक (थ्रिलर) फिल्म पसंद करता हूं जिसमें आपको खलनायक के बारे में शुरू से अंत तक पता रहता है। हू डन इट कथाओं में नायक गुप्तचर को अंतिम दृश्य में यह बताते हुए हमेशा ऐसी औपचारिकता से गुजरना पड़ता है कि दरअसल क्या हुआ था, कैसे उसे मुजरिम तक पहुंचने के सुराग मिले। यह एक ऐसी कथावस्तु होती है जिसमें मेरी अधिक रुचि नहीं है।

सिनेस्ट: आप अपनी सबसे सफल फिल्म किसे कहेंगे ?

सत्यजित रे: एक फिल्म जिसे मैं पुनः उसी तरह से बनाना चाहूंगा, वह है ‘चारुलता’। ‘अरण्येर दिनरात्रि’ भी एक ऐसी फिल्म है जो मुझे बहुत प्रिय है। बच्चों के लिए बनाई गई फिल्मों में ‘जय बाबा फेलुनाथ’ है। यह बहुत सफल कृति है, इसमें विट है, कुशल फिल्मी दृष्टि है, एक चेहरा है जो संतुष्टि का अहसास देता है और कुछ अच्छा अभिनय भी इसमें शामिल है। मैं संगीतमय फिल्में भी बनाना पसंद करता हूं क्योंकि यह मुझे संगीत रचने का मौका देती हैं। यह आर्थिक दृष्टि से भी सफल रहती हैं, आपको एक खास किस्म का संतोष भी देती हैं। मुझे ‘कंचनजंघा’ भी पसंद है। इसलिए क्योंकि वह मेरा पहला मौलिक स्क्रीनप्ले था और यह एक निजी फिल्म भी है। यह अपने समय से दस-पंद्रह वर्ष आगे की फिल्म थी।

 सिनेस्ट: इसकी कथावस्तु खंडित है।

सत्यजित रे: हां। हमारे दर्शकों को एक केंद्रीय चरित्र चाहिए होता है, या केंद्रीय चरित्रों का एक समूह जिसके साथ वह अपनी पहचान मिला सकें, साथ ही एक सीधी-सादी कथावस्तु भी। कंचनजंघा अनेक समूहों की कथा दिखाते हुए आगे-पीछे आती-जाती रहती है। आप समूह एक, दो, तीन, चार से मिलते हैं और फिर पुनः समूह एक, दो, तीन से रूबरू होते हैं। इसका ढांचा बहुत संगीतमय है, परंतु इसे पसंद नहीं किया गया था। इसे बहुत बचकाना प्रतिक्रियाएं मिली थीं। यहां तक कि इसकी समीक्षाएं भी हल्की रही थीं। परंतु अब मुड़कर देखते हुए यह मुझे एक बहुत रोचक फिल्म लगती है।

 सिनेस्ट: आपकी फिल्मों में महिला पात्र मजबूत, दृढ़ निश्चयी, परिस्थितिनुसार ढलने वाली और पुरुषों की अपेक्षा अधिक लचीली दिखती है। क्या यह बंगाली सामाजिक इतिहास का ही झरोखा है ?

सत्यजीत रे: ऐसा लेखक की रचना का प्रतिबिंब होता है, लेखक द्वारा पुस्तक में दिए गए विचारों का आईना जिस पर फिल्म आधारित होती है। टैगोर और बंकिमचंद्र के साहित्य में अनेक मजबूत महिला पात्र हैं। परंतु इसमें महिलाओं से जुड़े मेरे अनुभव और व्यवहार की भी झलक रहती है।

 सिनेस्ट: वह क्या है ?

सत्यजीत रे: यह कि वह बेशक शारीरिक दृष्टि से पुरुषों जितनी मजबूत न हों, परंतु प्रकृति ने महिलाओं को कुछ ऐसे गुण दिए हैं जो इस कमी की भरपाई करते हैं। वह अम मैं हरेक महिला की बात नहीं कर रहा हूं, परंतु केवल उनकी जो मुझे रोचक लगती हैं। जिस महिला को मैं अपनी फिल्मों में दिखाता हूं वह परिस्थितियों से जूझने में पुरुषों से अधिक क्षमतावान होती है।

सिनेस्ट: क्या चारुलता ऐसी ही आदर्श रे महिला है ?

सत्यजीत रे: हां।

सिनेस्ट: ‘जलसाघर’ से शुरू करके ‘शतरंज के खिलाड़ी’ तक आप नई और पुरानी संस्कृतियों के बीच आवागमन जारी रखते हैं, यानी पारंपरिक और आधुनिक के बीच। कई बार मुझे लगता है कि आपका पुरानी संस्कृति और परंपरा की ओर अधिक झुकाव है और नई के प्रति एक तरह का संदेह।

सत्यजीत रे: शतरंज के खिलाड़ी में क्या नया हो रहा है उसके प्रति मैं किसी शक में नहीं हूं। उसमें बहुत स्पष्टता से दिखाया गया है कि सामंती समाज अपने आस-पास की घटनाओं से बिल्कुल कटा हुआ है। हालांकि इन चरित्रों के प्रति मुझे संवेदना है, परंतु यह साफ है कि यह लोग किसी काम के नहीं। परंतु फिर भी मुझे उस जनजीवन और उसके नुमाइंदों को दर्शाने में अधिक रुचि है। आपको चेखव  के ‘चेरी का बगीचा’ में भी यही हालात दिखेंगे और वह मुझे बहुत पसंद है।

 बेशक आप सामंतवाद के मृत अश्व को पीटते हुए गालियां दे सकते हैं, परंतु फिल्म के उन चरित्रों के प्रति कुछ भावनाएं जरूर रखते हैं। वह कमजोर हैं, उन डायनासोरों की तरह जिन्हें अंदाजा नहीं कि वह समाप्त होते जा रहे हैं। इस विडंबना में भी कुछ विशेषताएं हैं जो मुझे रोचक लगती हैं।

सिनेस्ट: अधिकांश पश्चिमी समीक्षकों का मानना है कि आपकी छवियों में भारत अंधकारमय और नैराश्यपूर्ण है।

सत्यजीत रे: जन अरण्य एकमात्र फिल्म है जिसके बारे में यह कहा जा सकता है।

सिनेस्ट: परंतु कुछ अन्य को अरण्येर दिन रात्रि भी निराश फिल्म लगी थी।

 सत्यजीत रे: मैं उसे निराशा दर्शाने वाली फिल्म नहीं कहूंगा। उसमें कुछ अप्रिय सत्य जरूर चित्रित किए गए हैं, परंतु वह कहानी का अंश हैं, ऐसा सभी फिल्मों के बारे में कहा जा सकता है। आप किसी पश्चिमी फिल्म को पश्चिमी मूल्यों के विरुद्ध निराशा दर्शाने वाली भी कह सकते हैं। आप हमेशा खुशमिजाज फिल्में नहीं बना सकते।

यदि आप ऐसी समस्याओं के बारे में फिल्म बना रहे हैं जिनका समाधान आपके पास नहीं, तो उसमें निराशा की झलक जरूर आएगी। महानगर फिल्म में पति और पत्नी दोनों की नौकरी छूट जाती है। रोजगार है भी नहीं। वह एक दूसरे से दूर होने लगते हैं, दोनों के बीच गलतफहमी जन्म लेती हैं, और अंततः दोनों निकट आते हैं। फिर भी उनके पास नौकरियां नहीं हैं, और स्पष्ट है कि कुछ समय तक ऐसा ही चलेगा, ऐसे में कहीं निराशा की झलक नहीं दिखती।

 जन अरण्य मेरी बनाई एकमात्र फिल्म है जिसे कठोर कहा जा सकता है। इसमें दोराय नहीं है। मुझे चारों ओर भयावह भ्रष्टाचार नजर आ रहा था। कलकत्ता में लोग सब जगह उसी पर बात करते थे। सब जानते थे कि मार्ग और भूमिगत रेलमार्ग निर्माण के लिए लाया जाने वाला सीमेंट ठेकेदारों की जेबों में जा रहा था और वह उससे अपने घर बना रहे थे। जन अरण्य ऐसे ही भ्रष्टाचार के बारे में फिल्म है और जिसका समाधान मेरी समझ से बाहर था।

सिनेस्ट: आपने अक्सर कहा है कि आपकी राय में एक कलाकार का समाधान की तलाश या सही और गलत का निर्णय सुनाना उचित, महत्वपूर्ण या जरूरी नहीं होता। आपने स्वयं कोई बड़े बयान नहीं दिए।

 सत्यजीत रे: मैंने मृणाल सेन और अन्य किसी की भी तरह स्पष्ट राजनीतिक बयान दिए हैं। जन अरण्य में मैंने एक ऐसी बातचीत को रखा है जिसमें एक कांग्रेसी भविष्य की बात करता है। वह बेकार और झूठी बातें करता है, परंतु उसकी उपस्थिति अपने आप में महत्वपूर्ण है। यदि कोई अन्य निर्देशक वह फिल्म बनाता, तो उस दृश्य को अनुमति नहीं मिलती। परंतु एक निर्देशक क्या कहना चाहता है, इस पर सचमुच में कुछ पाबंदियां होती हैं। आप जानते हैं कि कुछ बयान और चरित्र चित्रणों को सेंसर कभी इजाजत नहीं देता, तो उन्हें क्यों बनाना ?

सिनेस्ट: देश के राजनीतिक हालात को देखते हुए, आपकी राय में एक फिल्मकार की भूमिका निष्क्रिय, दर्शक या एक्टिविस्ट में से क्या होनी चाहिए ?

 सत्यजीत रे: क्या आपने ‘हीरक राजार देशे’ देखी है ? उसमें एक दृश्य है जिसमें गरीब लोगों को स्थान खाली कराने के लिए खदेड़ा जाता है। यह उस सत्य का सीधा प्रतिबिंब है जो दिल्ली और अन्य शहरों में इंदिरा गांधी के आपातकाल के दौरान हुआ था। हीरक राजार देशे जैसी फंतासी रचना में आप सीधे-सीधे अपनी बात कह सकते हैं, परंतु यदि आप आधुनिक चरित्रों को उकेर रहे हों तो आपको सेंसर के कारण एक सीमा तक ही स्पष्ट बात कह सकते हैं। आप सत्तासीन दल पर सीधे उंगली नहीं उठा सकते। ‘द स्टोरी आॅफ ए चेयर’ (किस्सा कुर्सी का) नामक फिल्म में ऐसा प्रयास किया गया था और पूरी फिल्म नष्ट कर दी गई। तो आप क्या करेंगे? आपको समस्याओं का पता है और आप उनसे जूझते भी हैं, परंतु आपको सीमाओं का अंदाजा भी है, वह रुकावटें जिनके आगे आप नहीं जा सकते।

सिनेस्ट: कुछ लोग इसे एक फिल्मकार की सामजिक भूमिका का परित्याग भी कहते हैं। बंगाल के ही कई समीक्षक मानते हैं कि आप राजनीतिक विचारों से दूरी रखते हैं, वह मानते हैं कि आप कहीं आगे जा सकते हैं, लेकिन आपने अपनी सीमाओं को खंगाला नहीं है।

 सत्यजीत रे: नहीं, मुझे नहीं लगता कि मैं कहीं आगे जा सकता हूं। सत्ता जैसे लक्ष्यों पर निशाना साधना बहुत आसान होता है। यानी आप ऐसे लोगों पर निशाना साध रहे हैं जिन्हें इसकी परवाह नहीं है। सरकार पर आपकी बात का कोई असर नहीं होगा। तो क्या मतलब है इस काम का?  मुझे ऐसी फिल्म के बारे में बताइए जो समाज में किसी तरह के परिवर्तन का कारण बनी हो।

सिनेस्ट: लेनी राइफेन्स्टहाल जैसे फिल्मकारों के बारे में क्या कहेंगे जिसने नाजियों के आर्य मिथक को सामने रखा था, या सर्जेई आइजेंस्टीन जिन्होंने फिल्म को क्रांति के औजार के रूप में इस्तेमाल किया था ?

 सत्यजीत रे: आइजेंस्टीन ने ऐसी क्रांति को सहयोग दिया था जो पहले से ही जारी थी। एक क्रांतिकाल के मध्य एक फिल्मकार की भूमिका सकारात्मक हो जाती है, वह क्रांति में कुछ सहयोग कर सकता है। परंतु यदि क्रांति की सुगबुगाहट नहीं है तो आप कुछ नहीं कर सकते।

राइफेन्स्टहाल एक मिथक गढ़ने में मददगार थे, नाजी विचारधारा की, और नाजी उस समय बहुत मजबूत थे। उस शुरुआती फासीवादी समय में बौद्धिक वर्ग खुद उलझन में था। टैगोर को यह समझाने का प्रयास किया गया था कि मुसोलिनी कुछ बेहतर करने जा रहा है, उसकी भूमिका सकारात्मक है, परंतु जब तक कि रोम्या रोलां ने उन्हें नहीं बताया था, तब तक वह फासीवादी असर की गहराई नहीं समझ सके थे।

 सिनेस्ट: एक फिल्मकार के तौर पर आप अपनी क्या सामाजिक भूमिका देखते हैं ?

सत्यजीत रे: आप ‘प्रतिद्वंद्वी’ में मेरा विचार देख सकते हैं जो दो भाइयों की कहानी है। छोटा भाई नक्सलवादी है। इसमें शक नहीं कि बड़ा भाई छोटे की हिम्मत और विचारों का आदर करता है। फिल्म इस मुद्दे पर स्पष्ट है। परंतु एक फिल्मकार के तौर पर मुझे बड़े भाई में अधिक रुचि है क्योंकि वह अस्थिर चरित्र है। एक मनोवैज्ञानिक बिंदु, एक मनुष्य जो पसोपेश में है, वह मेरी राय में अधिक रुचिकर चरित्र है। छोटा भाई पहले ही अपने आपको एक मुद्दे से जोड़ चुका है। इससे वह एक पूर्णता को प्राप्त चरित्र है और लगभग गैरजरूरी हो गया है। नक्सलवादी मुहिम व्यापक है और एक व्यक्ति के तौर पर उसका अस्तित्व मुहिम में मिल चुका है।

सिनेस्ट: परंतु क्या आप वैचारिक और भावनात्मक व्यवहार के बीच ऐसा अंतर कर सकते हैं ? क्या एक वैचारिक व्यक्ति एक बौद्धिक नहीं होता ? ऐसा द्विभाजन आप किस तरह से करेंगे ?

सत्यजीत रे: इसे न करने की मुझे कोई वजह नजर नहीं आती। एक मुहिम से जुड़ा व्यक्ति उस मुहिम के शीर्षस्थों के निर्देशों पर आश्रित होता है। यदि आप उन शीर्षस्थ चरित्रों को दर्शाएंगे तो वह अधिक रोचक रहेगा। ऐसे में आप नक्सलवादी फिल्म को आइजेंस्टीन की क्रांतिकारी क्रिया स्वरूप दे सकेंगे। परंतु भारत में मौजूदा हालात में आप ऐसा नहीं कर सकते।

सिनेस्ट: ऐसा अनुभव करने वाला मैं एकमात्र व्यक्ति नहीं जो मानता है कि आपका जोर मनोभावों पर अधिक रहता है। राॅबिन वुड ने भी लिखा है कि आप विचारों से अधिक मनोभावों के अनुभवों को उकेरने में अधिक रुचि लेते हैं।

सत्यजीत रे: यह ठीक नहीं है। मेरी फिल्मों में एक मजबूत नैतिक व्यवहार की झलक स्पष्ट दिखनी चाहिए।

सिनेस्ट: क्या यह आपकी धार्मिक पृष्ठभूमि से संबद्ध है जो ब्राह्मो समाज से जुड़ी है ?

सत्यजीत रे: मुझे नहीं लगता। मुझे यह भी नहीं पता कि ब्राह्मो का मतलब क्या है। मैंने चैदह या पंद्रह वर्ष की आयु में ब्राह्मो समाज में जाना भी बंद कर दिया था। मैं यों भी धर्म के संगठित रूप में विश्वास नहीं रखता। धर्म निजी मुद्दा है। मेरे विचार में मेरी फिल्मों में मौजूद नैतिक तर्क उनमें दिखने वाले किसी भी राजनीतिक विचार से अधिक रोचक है।

 सिनेस्ट: क्या यह नैतिक विचार बहुत साधारण नहीं है ? ‘पीकू’ में आप बताते हैं कि स्वच्छंदता अनेक समस्याओं को जन्म दे सकती है, बदलते सामाजिक और यौन मूल्यों ने सामाजिक और पारिवारिक ताने-बाने को विछिन्न किया है।

सत्यजीत रे : पीकू एक बहुत जटिल फिल्म है। यह एक कविताई बयान है जिसे किसी ठोस आधार तक सीमित नहीं किया जा सकता। फिल्म का एक संदेश है कि यदि कोई महिला विवाहेत्तर संबंध रखती है तो उसका अपने बच्चों के लिए कोमल भावनाएं रखना उचित नहीं, जैसा कि फिल्म में उसके बेटे के लिए। यह दोनों भावनाएं एकसाथ नहीं चल सकतीं। उसे कठोर होना ही होगा। संभवतः यह महिला उतनी कठोर हृदय नहीं है। वह एक पूर्ण बंगाली महिला है। एक यूरोपियन महिला ऐसे मामले में उसके जैसा व्यवहार नहीं करेगी।

 सिनेस्ट: चारुलता विवाहेत्तर संबंधों की समस्या को कैसे सुलझाती है ? हमें दिखता है कि वह वापस लौटती है। क्या वह पति से संबंध से विमुख हो चुकी थी या दोनों के बीच फंसी थी…

सत्यजीत रे : वह संबंध से विमुख थी परंतु पसोपेश में भी थी क्योंकि उसका पति अच्छा इनसान था। चारुलता का नजरिया संभवतः सांत्वनापूर्ण था और वह हालात से समझौता करने का प्रयास कर रही थी। उसका पति भी देर से ही सही पर समझता है कि जो हुआ उसमें उसका भी दोष है। इसीलिए फिल्म के अंत में दिखाया जाता है िकवह साथ आएंगे, परंतु समझौता होने में अभी समय लगेगा।

 सिनेस्ट: आपके चरित्रों में स्वयं आपकी अपनी कितनी संवेदना निहित होती है ? अशनि संकेत के बारे में पाॅलीन केल ने कहा था, ‘रे ने अपना कुछ अंश गंगाचरण में उडे़ला है, कुछ अपना अपराध बोध, कमजोरी, प्रतिबद्धता।’ क्या यह सही है ?

सत्यजीत रे : समीक्षक यह भूल जाते हैं कि मैं फिल्म किसी के कार्य पर बना रहा हूं जो अन्य रूप में उपलब्ध है। अशनि संकेत में गंगाचरण बिभूतिभूषण के विचारों के निकट है। असली प्रश्न है कि क्या लेखक में अपना कुछ अपराधबोध और कमजोरी है। मैं कथा का रचयिता नहीं हूं। मुझे इसके बीच क्यों घसीटा जाए ?

 यह भी सच है कि मैंने उस चरित्र को कुछ ऐसे मूर्त रूप देने का प्रयास किया है जिसमें उसका अस्तित्व और समझ-बूझ उभर कर आती है। मैं गंगाचरण को, उसकी आकांक्षाओं को, उसके व्यवहार, उसकी प्रतिक्रियाओं को समझता हूं। मेरे लिए वह जीवंत, पूर्णतया ईमानदार है, और अंत में उसमें होने वाला परिवर्तन बहुत उद्वेलित करने वाला है, परंतु वह मेरा प्रतिबिंब नहीं है।
सिनेस्ट: क्या आपका मतलब है कि जो लोग उन किताबों को नहीं पढ़ते जिन पर आपकी फिल्में आधारित होती हैं, उन्हें आपकी फिल्मों को समझने या व्याख्या करने में कठिनाई होगी?
सत्यजीत रे: हां, यदि वह मूल लेखक की ओर बिल्कुल नहीं देखते तो। वह कथावस्तु को एक संपूर्ण कृति के रूप में देखते हैं, फिल्मकार के नजरिए से शुरू से अंत तक, और आमतौर पर यह सही नहीं होता। मैं किसी भी कहानी या उपन्यास का चुनाव ऐसे कुछ तत्वों के आधार पर करता हूं जो मुझे अपील करते हैं। स्क्रीनप्ले लिखते समय थीम में बेशक कुछ परिवर्तन हो, परंतु मूल तत्व वही रहता है। अक्सर स्क्रीनप्ले मूल कथा के आलोचना स्वरूप आकार लेता है। इसीलिए किसी कथा को कई बार पढ़ने के बाद आपको अहसास होता है कि कोई चरित्र विशेष उस तरह का व्यवहार नहीं करेगा जैसा कि लेखक ने चित्रित किया है, इसीलिए कुछ परिवर्तन किए जाते हैं। कहानी पढ़ने और समझने के बाद, मैं उसे छोड़कर आरंभ से शुरू करता हूं। अंत में, यदि मुझे लगता है कि कुछ परिवर्तन जायज हैं तो मैं उन्हें स्थान देता हूं और मूल रचना को भूल जाता हूं।
 सिनेस्ट: कुछ समीक्षकों का मानना है कि आप गरीबी का रूमानीकरण करते हैं, और यह भी कि आपकी फिल्मों में गरीबी और करुणा कभी बदसूरत नजर नहीं आती।
 सत्यजीत रे: मेरी राय में पाथेर पांचाली में दर्शाई गई गरीबी अपने आप में बहुत क्रूर है। चरित्रों का बर्ताव, उस महिला का वृद्धा से व्यवहार, बेहद बर्बर है। मुझे नहीं लगता कि किसी ने भी परिवार के वृद्धों के बारे में ऐसी बर्बरता दर्शाई है। अशनि संकेत का परिवेश बहुत सुंदर दिखता है और यह एक बिंदु है जो पाउलिन केल उठाती हैं, कि बबीता एक गुडि़या सरीखी दिखती है। दरअसल, उन्हें पता नहीं कि गांव की कुछ ब्राह्मण युवतियां सचमुच बहुत सुंदर थीं।
सिनेस्ट: क्या अशनि संकेत में पढ़ने वाले अकाल के संबंध में यह बिंदु भी नहीं दिखता कि उसमें चटखी धरती या भूखे चेहरे नजर नहीं आते ? 
सत्यजीत रे: हां, अकाल के समय ऐसा ही होता है। केवल शहरों में आने के बाद ही यह भी स्पष्ट हुआ था कि अच्छी फसल होने के बाद भी लोग भूख से मर सकते हैं। यही उस अकाल विशेष का बिंदु भी था। फिल्म को रंगीन छवि देने का मेरा मंतव्य भी सीधे लेखक के वर्णन से जुड़ा है – कि प्रकृति अपने में बहुत सुंदर है, भौतिक तौर पर हर वस्तु सुंदर नजर आती है, और, फिर भी, लोग भूख से मर रहे हैं।
सिनेस्ट: आप, फैल्लिनी, कुरोसावा और बर्गमेन ने लगभग एक ही समय फिल्में बनानी शुरू की थीं। कई समीक्षक मानते हैं कि आप पीछे रह गए हैं, यह भी कि आपने फैल्लिनी या बर्गमैन की तरह सौंदर्यबोधात्मक और कथावस्तु से जुड़े जोखिम नहीं लिए हैं। तीस वर्ष के फिल्म निर्माण जीवन के बाद आप अन्य की तुलना में अपने करियर को कहां पाते हैं ?
सत्यजीत रे : मैं सोचता हूं कि मैंने बहुत शुरुआत में ही मैच्योरिटी प्राप्त कर ली थी। एक महीन ढांचे की कथावस्तु के आधार पर अधिकाधिक घनत्व प्राप्त करना ही शुरुआत से मेरी मुख्य चिंता रही है। फिल्म बनाते समय मैं पश्चिमी दर्शकों को दिमाग में नहीं रखता। मैं बंगाल के दर्शकों के बारे में सोचता हूं। उन्हें साथ लेकर चलना ही मेरा प्रयास होता है और इसमें मैं सफल भी रहा हूं। यह जरूर है कि शुरुआत में यह दर्शक बहुत बेतरतीब थे। वह बेमतलब या बेढब बंगाली फिल्मों के जाल में फंसे थे। इसलिए आपको उनके साथ धीमी शुरुआत करनी होती है। कई बार ऐसा होता है कि आप कंचनजंघा या अरण्येर दिनरात्रि जैसी ऊंची छलांग लगाकर उन्हें खो देते हैं।
दर्शकों से जुड़े ऐसे जोखिम बर्गमैन या फैल्लिनी ने नहीं लिए हैं। बर्गमैन सरल हैं, हालांकि वह कभी-कभार बेहद संजीदा और सख्त भी हो जाते हैं और उन्हें कुछ बेहतरीन फोटोग्राफी का सहयोग भी मिलता है। दूसरी ओर लगता है कि फैल्लिनी एक ही फिल्म बार-बार बना रहे हैं। उनकी फिल्मों में एक विशिष्ट किस्म की भव्यता दिखती है, वह भी तब जबकि वह कहानी में उतनी रुचि नहीं दिखाते, और दर्शक उसी भव्यता को देखने जाते हैं।
मैं वैसा कार्य नहीं कर सकता जो बर्गमैन या फैल्लिनी करते हैं। मेरे पास उनके जैसे दर्शक नहीं हैं और उन संदर्भों में मैं काम भी नहीं करता। मुझे ऐसे दर्शक मिलते हैं जिन्हें व्यर्थ कार्य देखने को मिलते रहे हैं। मैंने तीस वर्षों तक भारतीय दर्शकों के लिए काम किया है और इस समय में सिनेमा के प्रति आम समझ नहीं बदली है। कम से कम बंगाल में तो नहीं। आपको ऐसे निर्देशक दिखेंगे जो बेहद मूर्ख, पिछड़े हुए और इतने बेकार है कि यह सोचना तक असहनीय होता है कि उनकी फिल्मों के साथ मेरी फिल्में दिखाई जाती हैं। परिस्थितियों की मजबूरी के कारण मुझे अपनी कहानियां सरल रखनी पड़ती हैं। हालांकि मैं इतना जरूर कर सकता हूं कि अपनी फिल्मों को कुछ नया अर्थ, मनोवैज्ञानिक सुर और आवरण दे सकूं ताकि उसका तैयार स्वरूप अनेक लोगों के लिए अलग-अलग अर्थ रख सके।