मनोरंजन के बरक्स खड़े समानांतर सिनेमा की कहानी

इंडियन पैरेलल सिनेमा यानी जिसे हम भारतीय समानांतर सिनेमा भी कहते हैं. ये सिनेमा निर्माण की वो विधा थी, जो अंतरराष्ट्रीय सिनेमा खासकर इटैलियन न्यू रियलिज्म, फ्रांस के फ्रेंच न्यू वेव और जापान के न्यू वेव सिनेमा से खासा प्रभावित था.

भारत में सिनेमा का पदार्पण 7 जुलाई 1896 को हुआ. जब बंबई के काला घोड़ा के वाटसन होटल में लुमियर ब्रदर्स ने अपनी पहली फिल्म दिखाई, जो कि मात्र 45 सेकेंड की थी. इसके बाद तो हरिशचंद्र सखाराम भाटवडेकर (सावे दादा), दादा साहब फाल्के, जितिन बोस, धीरेन्द्र गांगुली और जेएफ मदान ने भारतीय सिनेमा को विकसित किया. जेएफ मदान
भारत के पहले सिनेमा थियेटर निर्माता था. इन्होंने साल 1907 में कलकत्ता में एलफिंस्टन पिक्चर पैलेस बनाया था.

13 मई 1913 को दादा साहब फाल्के ने भारत की पहली फिल्म राजा हरिशचंद्र बनाकर इस दिशा में पहला कदम रखा और सिनेमा धीरे-धीरे विकास की रफ्तार पकड़ने लगा. वहीं दूसरी तऱफ भारत भी अंग्रेजों की गुलामी से निजाद पाने के लिए अपना अंतिम संघर्ष कर रहा था.

भारतीय सिनेमा में यथार्थवादी परख की झलक उसी समय देखने को मिलने लगी थी, जब साल 1925 में निर्देशक बाबूराव पेंटर ने अपनी मूक फिल्म ‘सावकारी पाश’ बनाई. इस फ़िल्म में जानेमाने अभिनेता और निर्देशक वी शांताराम ने एक गरीब किसान का किरदार निभाया था. फिल्म में दिखाया गया है कि किसान बने वी शांताराम मजबूरी में अपनी जमीन एक लालची साहूकार को देने के लिए मजबूर हो जाते हैं और गांव छोड़कर शहर की ओर पलायन करके एक मिल में मजदूर बन जाते हैं. इस फिल्म को भारत का पहला यथार्थवादी सिनेमा माना जाता है.

15 अगस्त साल 1947 में देश आजाद होता है. एक तरफ लोग उम्मीदों के सपने बुने रहे थे तो दूसरी तरफ देश
बंटवारे की आग में झुलस रहा था. नेहरूवाद यानी आशा के किरण में धर्म के नाम मची मारकाट ने लोगों को निराश कर दिया. इसी समय सिनेमा जगत में कुछ ऐसे निर्देशक थे, जिन्होने लेंस से व्यवसायिक नजरिये को छोड़कर समाज को उस नजर से देखा, जहां सच की खाई बहुत बड़ी नजर आ रही थी.

आज़ादी के बाद 50 और 60 के दशक में सिनेमा साफ़ तौर पर दो विपरीत धाराओं में बांटता चला गया. एक धारा वह थी जिसमें मुख्य तौर पर सामजिक सरोकार के चिंतन को स्थान दिया गया. दूसरी धारा वह थी जिसमें मुख्य तौर पर मनोरंजन प्रधान सिनेमा को स्थान दिया गया. इसे मुख्य धारा का सिनेमा कहा गया. दूसरी तरफ कुछ ऐसे फिल्मकार थे, जो जिंदगी के यथार्थ को अपनी फिल्मों का विषय बनाते रहे.

दर्शकों ने समानांतर सिनेमा को व्यावसायिक सिनेमा से इतर हटकर एक नए विकल्प के रूप में देखा. यह भारतीय सिनेमा का एक नया आंदोलन है, जिसे गंभीर विषय, वास्तविकता और नैसर्गिकता के साथ जोड़कर पिरोया गया था. साल 1940 के अंत से और साल 1980 के अंत तक समानांतर सिनेमा आंदोलन चला. जिसे सत्यजीत रे, ऋत्विक घटक, बिमल
रॉय, मृणाल सेन, तपन सिन्हा, ख़्वाजा अहमद अब्बास, श्याम बेनेगल, अदूर गोपालकृष्णन और गिरीश कासारावल्ली जैसे फिल्म निर्देशकों ने दिशा प्रदान की.

सत्यजीत रे ने साल 1955 में फिल्म ‘पथेर पांचाली’ बनाई, जिसे आधिकारिक तौर पर समानांतर सिनेमा की पहली फिल्म का दर्जा प्राप्त है. अगर हम बात सत्यजित रे की करें तो विश्व सिनेमा में कोई सानी नहीं है. उनकी कालजयी फिल्में ‘पथेर पांचाली’, ‘अपराजितो’, ‘जलसाघर’, ‘कंचनजंघा’, ‘चारुलता’, ‘अशनि संकेत’, ‘घरे बाइरे’, ‘पारस पाथर’, ‘देवी’, ‘तीन कन्या’, ‘प्रतिद्वंद्वी’, ‘गणशत्रु’ और ‘आगंतुक’ को देखकर आज भी बहुत कुछ सीखा जा सकता है. सत्यजीत रे ने हिंदी में भी दो फिल्में बनाई थीं. एक ‘शतरंज के खिलाड़ी’ और दूसरी थी ‘सद्गति’.

सत्यजित रे के समकालीन ऋत्विक घटक की पहली फिल्म ‘नागरिक’ 1952 में ही बन गई थी किंतु उनके जीवनकाल में प्रदर्शित नहीं हो पाई थी. घटक ने साल 1956 में ‘बाड़ी थेके पालिए’, साल 1958 में ‘अजांत्रिक’, साल 1960 में ‘मेघे ढाका तारा’, ‘कोमल गांधार’ और सुबर्ण रेखा जैसी फिल्मों का निर्माण कर समानांतर सिनेमा को एक नई पहचान दी.

उसी दौर में बिमल रॉय ने साल 1953 में फिल्म बनाई ‘दो बीघा ज़मीन’, जिसने बेहद हलचल मचाई. फिल्म ‘दो बीघा ज़मीन’ को साल 1954 में कॉन फेस्टिवल में अंतर्राष्ट्रीय सम्मान भी मिला. इसके बाद बिमल रॉय ने ‘बिराज बहू’, ‘देवदास’, ‘सुजाता’ और ‘बंदिनी’ जैसी संवेदनशील और तथ्यपरख फिल्में बनायीं.

वहीं दूसरी तरफ दक्षिण भारतीय निर्देशक भी समानांतर सिनेमा को गंभीरता ले रहे थे और एक से एक फिल्मों का निर्माण कर रहे थे. दक्षिण के फिल्मकारों में प्रमुख नाम है अदूर गोपालकृष्णन का, जिन्होंने साल 1972 में अपनी पहली मलयालम फिल्म ‘स्वयंवरम’ का निर्माण किया. इस फिल्म को दक्षिण में न्यू वेव का पहला फिल्म माना जाता है.इसी साल कुमार साहनी ने साहित्यकार निर्मल वर्मा के उपन्यास ‘माया दर्पण’ पर उसी नाम से हिंदी में एक सार्थक फिल्म का निर्माण किया.

सत्यजित रे, ऋत्विक घटक औऱ बिमल रॉय के समकालीन थे मृणाल सेन. हिंदी में समानांतर सिनेमा की शुरुआत साल 1969 में माना जात है, जब मृणाल सेन की फिल्म ‘भुवन सोम’, मणी कौल की ‘उसकी रोटी’ और बासु चटर्जी की ‘सारा आकाश’ रिलीज हुई. ये तीने फिल्में नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के सहयोग से बनाई गई थीं. साल 1976 में मृणाल सेन ने फिल्म बनाई ‘मृगया’. यह मिथुन चक्रवर्ती की पहली फिल्म थी. इसमें ‘मृगया’ बने मिथुन ने एक आदिवासी क्रांतिकारी का किरदार निभाया था, जो अंग्रेजी हूकुमत द्वारा अपनी पत्नी के यौन शोषण के खिलाफ आवाज उठाता है. फिल्म ‘मृगया’ के लिए मिथुन चक्रवर्ती को बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड मिला.

समानांतर फिल्मों में मुख्यतौर पर जमींदार या पूंजीपतियों द्वारा शोषण, अंधविश्वास और धार्मिक पाखंड पर चोट करने, युवा वर्ग के असंतोष, महिलाओं पर अत्याचार, भेदभाव और ऐसे कई सामाजिक मुद्दे प्रमुख होते थे, जिसका समाज से सीधा सरोकार था.

बाद के वर्षों में समानांतर सिनेमा के प्रमुख हस्ताक्षर रहे श्याम बेनेगल. श्याम बेनेगल ने साल 1973 में अपनी पहली फिल्म बनाई ‘अंकुर’. गांवों में शहरी घुसपैठ के बुरे नतीजों पर आधारित यह फिल्म बेहद कामयाब रही. ‘अंकुर’ ने कुल 42 अवॉर्ड जीते, जिनमें तीन नेशनल अवॉर्ड भी शामिल हैं. इसके बाद श्याम बेनेगल ने साल 1975 में ‘निशांत’, और साल 1976 में फिल्म ‘मंथन’ बनाई. बेनेगल की फिल्म ‘मंथन’ को भी नेशनल अवॉर्ड मिला.

श्याम बेनेगल की ‘मंडी’, ‘कलियुग’ और ‘जुनून’ जैसी फ़िल्में भी बेहद चर्चित रही. इसी दौर में शबाना आज़मी, स्मिता पाटिल, अमोल पालेकर, ओम पुरी, नसीरुद्दीन शाह, कुलभूषण खरबंदा, पंकज कपूर, दीप्ति नवल, फारुख शेख और अनुपम खेर को एक नई पहचान मिली.

साल 1974 में श्याम बेनेगल के साथ जुड़े गोविन्द निहलानी भी बेनेगल के रास्ते पर बढ़े और कई उम्दा फिल्में बनाई. निहलानी की पहली फिल्म साल 1981 में आई ‘आक्रोश’. इस फिल्म को दर्शकों और फिल्म आलोचकों की काफी सराहना मिली. कुछ समय बाद निहलानी ने पुलिस की विवशता पर ‘अर्ध्यसत्य’, वायुसेना पर ‘विजेता’, मालिक-मजदूर संघर्ष पर ‘आघात’, नवधनाढ्य वर्ग के खोखलेपन पर ‘पार्टी’ और आतंकवाद पर ‘द्रोहकाल’ जैसी फ़िल्में बनाई.

साल 1980 में मणि कौल ने साहित्यकार गजानन माधव मुक्तिबोध की रचना पर फिल्म ‘सतह से उठता आदमी’ का निर्माण किया. साल 1983 में कुंदन शाह ने क्लासिक कल्ट ‘जाने भी दो यारों’ बनाई. इस फिल्म में नसीरूद्दीन शाह, सतीश शाह और नीना गुप्ता थे. साल 1984 में फिल्म निर्देशक सईद अख्तर मिर्जा ने ‘मोहन जोशी हाजिर हो’ बनाकर सिनेमा को नया आयाम दिया. इस फिल्म से पहले मिर्जा ‘अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है’ बना चुके थे.