द स्पाई हू केम इन फ्रॉम द कोल्डः लेफ्ट और राइट विंग की कोल्ड वार के दरम्यान…

The Spy Who Came in From The Cold, filmbibo
"द स्पाई हू केम इन फ्रॉम द कोल्ड" शीत युद्ध के दौरान पश्चिमी जगत के दो खेमों में बन जाने वास्तविक कहानी है।

संदीप मुदगल

गत सदी शीत युद्ध के नाम थी। दुनिया के पूंजीवादी और वामवादी धड़ों में द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद से जो खींचतान देखने को मिली थी, उसका अस्तित्व सोवियत संघ के विघटन तक रहा था। वैसे चीन जैसी महाशक्ति, वियतनाम, क्यूबा और उत्तर कोरिया में आज तक वाम सरकारों का राज है जो पूंजीवादी विश्व की आंखों की किरकिरी हैं।

बीसवीं सदी में पश्चिम के उन्मुक्त समाज में शीत युद्ध पर लिखने वाले लेखकों की भी बाढ़ सी आ गई थी, जिनकी अधिकांश किताबों में पश्चिम का मुक्त समाज सौ फीसदी सही और कम्युनिस्ट जगत सौ फीसदी गलत होता था। इसी बीच एक लेखक और आए, जॉन ली कैर्र। एक जमाने में वह इंग्लैंड की गुप्तचर एजेंसी एमआई-6 के एजेंट हुआ करते थे और यह वही वक्त था जब एक रूसी एजेंट किम फिल्बी एमआई-6 के शीर्षस्थ अधिकारी की कुर्सी पर जा बैठा था। बरसों उसके इस पद पर रहने के बाद जब इस राज का खुलासा हुआ तो फिल्बी रातोंरात रूस पलायन कर गया था और इंग्लैंड सहित समूचा पश्चिमी जगत रूस के इस पैंतरे पर सन्न रह गया था!

कैर्र ने फिल्बी के अधीन काम किया था। अपने तमाम साथियों की तरह वह भी इस घटना के बाद सकते की हालत में थे! बरसों बाद जब कैर्र की ख्याति एक विश्व प्रसिद्ध लेखक की बनी तो फिल्बी ने उन्हें अपने यहां आने का न्योता भी दिया था, लेकिन कैर्र ने उसे ठुकरा दिया था।

बहरहाल, अपने लेखकीय जीवन की शुरुआत में  जॉन ली कैर्र ने शीत युद्ध को केंद्र में रखकर कलम चलाई थी। उनमें और अन्य थ्रिलर लेखकों में बुनियादी फर्क यह है कि वह तटस्थ दृष्टि से शीत युद्ध का ब्योरा देते रहे हैं और बड़ी बात यह है कि आज उम्र के आठवें दशक में भी वह रचनारत हैं। ‘द स्पाई हू केम इन फ्रॉम द कोल्ड’ उनका शुरुआती उपन्यास था जिसके आते ही उन्होंने जासूसी जीवन को अलविदा कहा और लेखन में रम गए थे।

कैर्र की लेखन कला से जुड़ी एक और खास बात यह भी है कि वह अन्य थ्रिलर लेखकों से इतर, बहुत इत्मीनान से कहानी कहते हैं। घटनाओं को प्रेषित करते हुए वह रोमांचकारी मानदंडों के अनुसार भागते नहीं। उनके कथा लेखन में शास्त्रीयता का ठहराव जैसा है। घटनाएं अपनी गति से आगे बढ़ती हैं। ‘द स्पाई हू केम इन फ्रॉम द कोल्ड’ इसी शैली का उपन्यास है, जिसमें एक तरह से समूचे शीतयुद्ध का विवेचन भी दिखता है। इसका कारण यह कि यह लेखक का पहला उपन्यास था और उससे पूर्व लेखक जासूसी के क्षेत्र में तमाम तरह का ‘फील्ड वर्क’ कर चुका था, वही अनुभव कथा रचना समय उसके काम आया था।

‘द स्पाई हू केम इन फ्रॉम द कोल्ड’ एक ऐसे जासूस की कहानी है जो जीवन की अधेड़ावस्था में प्रवेश कर चुका है और अपने देश (इंग्लैंड) के लिए आज भी पूर्वी जर्मनी (तात्कालिक कम्युनिस्ट राज्य) के खिलाफ जोड़-तोड़ में व्यस्त है। कथानक से पूर्व मुख्य भूमिका में महान अभिनेता रिचर्ड बर्टन पर कुछ शब्द। समीक्षकों के अनुसार एलेक लीमस की भूमिका बर्टन के सबसे बेहतरीन सिनेमाई अभिनय में से है। बर्टन शेक्सपीयराना अभिनय शैली के सबसे बड़े नामों में से एक थे।  लौरेंस  ओलिवियर,  जॉन गीलगुड, एलेक गिनिस और पाॅल स्कोफील्ड के साथ उनके नाम का शुमार होता है। यह सभी अभिनेता मूलतः रंगमंच प्रेमी थे और सिनेमा अभिनय को, ओलिवियर के शब्दों में जब तब ‘आवश्यक बुराई’ सरीखी संज्ञाएं देते रहते थे!

बर्टन संभवतः इनमें कुछ अलग थे। वह एक असाधारण अभिनेता के साथ सिनेमा के सुपरस्टार साबित हुए थे। एलिजाबेथ टेलर के साथ उनका रोमांस और दो बार विवाह सुर्खियां बने। स्वयं टेलर उन्हें शेक्सपीयर का सिनात्रा (मशहूर गायक-अभिनेता फ्रेंक सिनात्रा की तर्ज पर) कहती थीं। बर्टन कुल जमा एक ऐसे स्टार-अभिनेता थे जिन्होंने बहुत दुर्लभ सीमाएं लांघी थी, और कहना न होगा कि अपने सिनेमाई अभिनय जीवन के शीर्ष पर ही उन्होंने जीवन रूपी रंगमच से भी विदा ली थी।

तो ‘द स्पाई…’ एक ऐसी फिल्म है जिसमें राजनीतिक तौर पर सही और गलत की व्याख्या को सापेक्षिक नजरिए से देखा-परखा गया है। फिल्म पर बात करते हुए इसके कथानक की जानकारी देनी जरूरी हो जाती है। एलेक लीमस ब्रिटिश इंटेलिजेंस का जासूस है और पहले दृश्य में वह कड़कती ठंडाती रात में (शीतलहर कथा का एक भी चरित्र है) पूर्वी जर्मनी की सीमा के बाहर अपने एक खबरी का इंतजार कर रहा है। वह खबरी पूर्वी जर्मनी से आएगा और लीमस को कुछ जरूरी सूचना देगा। खबरी आता है और उसके सीमा पार करने से कुछ ही पहले सायरन की जोरदार आवाज होती है और पूर्वी जर्मनी के सिपाही गोलियां चलाकर उसकी जीवनलीला समाप्त कर देते हैं। लीमस सीमा के उस पार सन्न खड़ा यह देखता रहता है और कुछ नहीं कर पाता।

लीमस को लंदन वापस बुलाया जाता है जहां ‘कंट्रोल’ (गुप्तचर विभाग में लीमस का शीर्ष अधिकारी) उससे तमाम बातें करता है और कहता है कि शीत युद्ध के इस खेल में सबके हाथ खून से सने हैं, चाहे वह पूंजीवादी समाज हो या वामवादी। इसके बाद लीमस अब एक बेरोजगार व्यक्ति है और वह रोजगार कार्यालय के चक्कर काटता रहता है। आखिरकार उसे एक पुस्तकालय में नौकरी मिलती है, जहां काम करने वाली एक युवती से उसका गहरा लगाव हो जाता है। वह युवती एक वामपंथी कार्यकर्ता भी रही है और युद्ध विरोधी अभियानों में शिरकत कर चुकी है। दोनों की बातों-मुलाकातों में लीमस इस विषय पर तटस्थ सा रहते हुए कहता है कि पूंजीवादी समाज हो या वामवादी, खामियाजा हमेशा मजबूरों और बेबस लोगों को ही भुगतना पड़ता है।

नई महिला मित्र के संसर्ग के बावजूद लीमस व्यथित है, कुछ न कर पाने की मजबूरी से। वह सौदा खरीदते समय एक दुकानदार को पीट देता है और जेल जाता है, जहां से उसकी महिला मित्र उसे छुड़ाती है। वह फिर बेकार है और ऐसे में एक व्यक्ति उसे मिलता है और कहता है कि वह बेकारों की एक संस्था का प्रतिनिधि है और उसका एक मित्र लीमस से मिलना चाहता है। लीमस उसकी बुलाई जगह जाता है। उससे मिलने की इच्छा दर्शाने वाला व्यक्ति एक न्यूज एजेंसी का मालिक है जो उससे कुछ दिनों के लिए विदेश जाने के नाम पर कुछ पैसा देने का वादा करता है। लीमस शर्त कबूल कर लेता है।

यह सब जानकारी कंट्रोल को है और लीमस उससे एक अन्य जासूस के घर मिलता है। कंट्रोल कहता है कि मुंड्ट (पूर्वी जर्मनी का एक शीर्ष गुप्तचर अधिकारी) अपना जाल फेंक चुका है और लीमस को उसे खत्म करना होगा। इस काम के लिए उसे पूर्वी जर्मनी जाना होगा, जहां एक शीर्ष गुप्तचर यहूदी अधिकारी फीडलर उसकी मदद करेगा। लेकिन इससे पूर्व लीमस न्यूज एजेंसी के मालिक (मुंड्ट के एजेंट) की ओर से हाॅलैंड जाता है और उसकी नजरों में धूल झोंकने के लिए कुछ तैयारियां करता है। इसके बाद अब लीमस पूर्वी जर्मनी में है, मुंड्ट का सिर कलम करने के लिए। फीडलर उसके साथ हरदम रहता है और उससे कई जानकारियों का आदान-प्रदान करता है। एक रात दोनों के अपने क्वार्टर लौटने पर मुंड्ट वहां पहले से मौजूद रहता है और लीमस पर जोरदार वार करता है। होश आने पर लीमस खुद को बेड़ियों में जकड़ा हुआ पाता है और अब वह मुंड्ट के रहमोकरम पर है। लीमस एक विदेशी जासूस है, वह मुंड्ट पर ‘डबल एजेंट’ (ब्रिटेन और जर्मनी दोनों के लिए जासूसी करने वाला) होने का आरोप लगाता है। इस तथ्य की पैरवी के लिए एक गुप्त अदालत बैठती है। लीमस की पैरवी फीडलर करता है और मुंड्ट अपना बचाव खुद करता है।

अदालती बहस लीमस के लंदन में बेकारी के दिनों तक जा पहुंचती है, जब उसे बमुश्किल पुस्तकालय की नौकरी मिली थी। लीमस सभी आरोपों से इनकार करता है, तो मुंड्ट उसकी पुस्तकालय वाली महिला मित्र को सामने लाकर खड़ा कर देता है। अब लीमस को अपने सभी गुनाह कबूलने पड़ते हैं। उसकी मदद करने के आरोप में फीडलर को भी जेल होती है। लीमस जेल में है, लेकिन उस रात उसकी कोठरी का दरवाजा खुला होने पर वह भाग निकलता है। बाहर पहुंचने पर मुंड्ट उसे मिलता है और उसके साथ होती है वह लड़की। मुंड्ट कहता है कि वह सचमुच डबल एजेंट है, और लीमस से बंदूकधारी पहरेदारों से बचकर बर्लिन की दीवार लांघ जाने को कहता है। लेकिन क्या लीमस और उसकी महिला मित्र बर्लिन की दीवार लांघ कर सुरक्षित पश्चिम जर्मनी लौट पाते हैं….?

पुराना कथन  है कि जासूसी की दुनिया में कोई किसी का नहीं होता। आधुनिक राष्ट्र राज्यों की इस दुनिया में तो इस कथन का दायरा और भी विस्तृत हो चुका है। राजनीतिक गठजोड़ के ढकोसले भी इस कड़वे सच से बहुत दूर रहते हैं। कहने को शीत युद्ध के कितने ही तथ्य अभी तक उजागर नहीं किए गए हैं जहां पूंजीवादी देशों ने अपने मित्र राष्ट्रों या वामवादी देशों ने अन्य वामराज्यों के खिलाफ जासूसी मोर्चे खोले थे। राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में इस तथ्य पर विश्वास करना बहुत कठिन होता है, परंतु मुंड्ट के खिलाफ अदालती नौटंकी आखिरकार किसलिए रची जाती है ? पूर्वी जर्मनी में भी मुंड्ट पर एक व्यक्ति को डबल एजेंट होने का शक है, जिसका खुलासा लीमस अपनी महिला मित्र को पलायन के दौरान करता है। वह कहता है कि जासूस उसके जैसे ही थके-मांदे और मजबूर लोग होते हैं। फीडलर को मुंड्ट के दोहरे चरित्र पर शक हो गया था और लीमस को असल में फीडलर की ही बलि दिलाने के लिए पूर्वी जर्मनी भेजा गया था, ताकि मुंड्ट के जरिए पूर्वी जर्मनी प्रशासन में ब्रिटिश गुप्त सूचना प्राप्ति का कार्य व्यापार यथावत चलता रहे। स्पष्ट है कोई बदनाम व्यक्ति (यदि वह अपने पक्ष में है) भी तब तक पाकसाफ है जब तक वह काम आ रहा है। यही है अंतरराष्ट्रीय जासूसी की दुनिया का नंगा सच!!!

जॉन ली कैर्र के कथानक में ऐसा एक भी अंश नहीं जिस पर यकीन न किया जा सके!! शायद जिंदा मौत के ऐसे  तांडव के वह चश्मदीद गवाह रहे हों!!! हकीकत जो भी हो, फिल्म जितने बड़े सच को दर्शाती है, उससे भी अधिक यथार्थवादी शैली से इसका निर्माण किया गया है। मार्टिन रिट्ट को एक समय अमेरिका के सबसे प्रतिभाशाली निर्देशकों में शामिल किया गया था। उनकी बनाई लगभग अधिकांश फिल्मों का मूल तत्व – बड़ी ताकतों के समक्ष छोटे-छोटे चरित्रों का सघन संघर्ष रहा है। इसका भी एक कारण है।

मार्टिन रिट्ट एक बहुत सुशिक्षित व्यक्ति थे। अपनी युवावस्था के दिनों में उनका रुझान वामपंथ की तरफ हुआ था। हाॅलीवुड की 1940 के दशक की प्रगतिशील ‘राजनीति’ में उनकी कुछ शिरकत रही थी, जिसका खामियाजा उन्हें 1950 में गति पकड़ने वाले मैकार्थीवाद के दौरान चुकाना पड़ा था। उस समय समूचे अमेरिका के बौद्धिक वर्ग में से चुन-चुनकर वाम रुझानों वाले व्यक्तियों को हाशिए पर लाया गया था। उनकी नौकरियां छीनकर उन्हें बेघर कर दिया गया था। हाॅलीवुड के कई लेखक, निर्देशक और कुछ अभिनेता भी इस शिकंजे में आए थे। रिट्ट हालांकि उस समय युवावस्था में थे, लेकिन उन्हें भी ‘सीलिंग’ का शिकार होना पड़ा था। निर्देशक के तौर पर उनकी पारी पचास के दशक के अंतिम वर्षों में ही शुरू हो सकी थी, जब मैकार्थीवाद का जोर कम पड़ने लगा था। फिर भी रिट्ट ने मुख्यधारा सिनेमा में रहते हुए कई ऐसी फिल्मों का निर्माण किया था जो शोषक-शोषित वर्गों के खूनी संघर्ष को स्पष्ट दिखाती थीं।

‘एज्ज आॅफ द सिटी’ उनकी पहली फिल्म थी। इसका नायक भी बहुत कुछ लीमस की तरह का है। वह माता-पिता का घर छोड़ चुका है और अपनी पहचान की तलाश में भटक रहा है। एक बंदरगाह में वह मजदूरी करने लगता है। वहां उसकी दोस्ती एक अन्य मजदूर से होती है। उस मजदूर की दुश्मनी एक अन्य व्यक्ति से है, जो अंततः उसे मार डालता है। अपने दोस्त की मौत का बदला लेने के लिए नायक अंत में उस व्यक्ति से भिड़ जाता है। कथानक बेहद सरल है, और पूरी तरह मजदूर वर्ग पर केंद्रित है, लेकिन खलनायक बंदरगाह माफिया और मालिकों का एजेंट है, जिसके साथ अंत में नायक की दहला देने वाली मारपीट होती है। रिट्ट की फिल्में और उनमें से झांकती उनकी आत्मा, पूर्णतः शोषित वर्ग के पक्ष में खड़ी रहती हैं।

‘द स्पाई…’ के मूल कथ्य में बेशक रिट्ट का निर्देशक (बौद्धिक) कुछ तटस्थ भूमिका लिए नजर आता है। फिल्म का नायक लीमस बेशक सबसे बड़े दुनियावी राजनीतिक खेल का एक मामूली सा प्यादा है, परंतु अपने और इस दुनिया के बारे में कुछ निर्णय ले चुका है। उसे इसी दुनिया (राजनीतिक जासूसी) में रहना है, और वह जानता है कि इस दुनिया में सही या गलत जैसा कुछ भी नहीं है, जो कुछ हो रहा है वह एक निरंतर चल रही प्रक्रिया का बेहद छोटा सा हिस्सा है। वह यह भी जानता है कि दुनिया की धुरी तय कर रही राजनीति (राजनेताओं) का असली मकसद अपने हित साधना होता है, फिर चाहे इस राह में उन्हें कितने ही सिर कलम करने पड़ें! लीमस अपनी इस मजबूरी से अच्छी तरह से वाकिफ है और वह अपना अंजाम भी जानता है, इसके बावजूद, वह जब-तब कथित सभ्य समाज के सीमा में रहने वाले कानून तोड़ता रहता है और उसकी सजाएं भुगतता रहता है। इसलिए जीवन में प्रेम की आकांक्षा और मृत्यु के डर से वह एक तरह से ऊपर उठ चुका है। फिर भी अचानक मिलने वाला प्रेम उसे अपनी ओर खींचता है, जिसे वह ठुकरा नहीं पाता। वहीं उसकी प्राथमिकता भी उसके सामने खड़ी है, जिसे अंजाम देने के लिए वह आगे बढ़ता है, और जब उस अंधेरे रास्ते का घना साया उसके प्रेम पर भी पड़ता है तो उसकी रक्षा के लिए वह पूरी ईमानदारी से खड़ा हो जाता है। लीमस का चरित्र कोई अबूझ पहेली नहीं है, वह सबकी तरह अपने हालात का शिकार है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसके हालात ने उसकी भावनाओं को ठंड की घनी चादर में कैद कर दिया है। बर्टन का लगभग चेतनाहीन बर्फीला चेहरा फिल्म की धुरी है, लेकिन मौत को करीब आता देख कुछ पल ऐसे भी होते हैं जब यही चेहरा हर तरह के भावों की उठापटक करने वाले मुखौटों की अंतहीन श्रंखला बन जाता है।

मार्टिन रिट्ट के निर्देशन पर कुछ शब्द कहे बिना बात पूरी नहीं हो सकती। फिल्म श्वेत-श्याम चित्र है। बतौर निर्देशक रिट्ट ने कभी अपनी एक विशिष्ट शैली विकसित नहीं की थी। उनकी फिल्मों में कैमरा सीधे-सीधे कहानी कहता है। उनकी फिल्मों में छायांकन जैसे तकनीकी अवयवों का इस्तेमाल बहुत न्यूनतम होता दिखता है। वह पात्रों और कथानक को उकेरने वाले निर्देशक रहे हैं। इस दृष्टि से कोई भी निर्देशक रहा हो, वह यदि अपने पात्रों और कथानक के प्रति उदासीनता दिखाता है तो उसका सिनेमाई प्रयास हमेशा असफल रहता है। दुनिया के सभी बड़े फिल्म निर्देशक मानवीय संवेदनाओं के छोटे-बड़े तूफानों से जूझते रहे हैं। रिट्ट का भी यही प्रयास रहता था। कुछ सबसे कठिन समीक्षकों (उदाहरणार्थ एंड्रयू सैरिस) ने रिट्ट को अमेरिका के सबसे होनहार निर्देशकों में शुमार किया था। कारण…, वह रिट्ट की फिल्मों के ‘गहरे कथातत्व’ को पसंद करते थे। रिट्ट अपने प्रमुख पात्रों (कुछ सहायक पात्रों की भी) की चारित्रिक जटिलताओं को कथानक के बहाव में बहुत खूबी से दर्शा ले जाते थे। उनका सिनेमा हमेशा राजनीतिक छटा लिए रहा। गुरु गंभीर विषय उनकी फिल्मों की पहचान थे। संभवतः उनका व्यक्तित्व भी कुछ ऐसा ही था। अपने कथानायकों और नायिकाओं के लिए वह एक ओर असीम सांत्वना का माहौल भी गढ़ते थे, जिससे कोई भी संवेदनशील दर्शक अलग नहीं रह सकता था।

रिट्ट के निर्देशकीय कौशल की दूसरी खासियत यह है कि वह स्त्री-पुरुष के संबंधों की भी गहरी पड़ताल करते थे। चूंकि वह अधिकांशतः निम्न मध्यवर्ग को अपने कथानकों में उकेरते हैं, इसलिए उनकी कथानायिकाएं भी हाड़तोड़ संघर्ष करती दिखती हैं। उनकी एक फिल्म ‘नाॅर्मा रे’ (शीर्षक चरित्र में सैली फील्ड का आॅस्कर पुरस्कार विजित अभिनय) की नायिका छोटे से कस्बे की फैक्टरी मजदूर है जो अपने परिवार का पेट पालने के लिए कभी-कभार वेश्यावृत्ति भी करती है। जाहिर है स्त्री हो या पुरुष निर्देशक रिट्ट दोनों को समाज में आजीविका कमाने के जघन्य संघर्ष का अटूट अंश मानते थे। दोनों वर्ग विभेद झेल रहे हैं। उनकी फिल्मों में हिंसात्मक दृश्यों में भी स्त्रियां पीछे नहीं रहतीं। वह अगर हिंसा सहित सबकुछ झेलती हैं तो कुछ दृश्यों में शोषक के तौर पर भी दिखती हैं। सत्ता के इस क्रूर सत्य को दिखाने में रिट्ट कभी पीछे नहीं रहे। अपने महिला पात्रों के प्रति वह बेवजह कोमल भावनाएं नहीं रखते, वह उन्हें जीवनसंघर्ष में पिसते हुए देखना अधिक पसंद करते हैं।

‘साउंडर’ जैसी फिल्म में अधिकांश पात्र समाज के सबसे निचले दर्जे की नीग्रो महिलाएं हैं। इसके कथानक में महिलाएं ही ‘पुरुष’ भी हैं, यहां तक कि फिल्म में पुरुष पात्र की जरूरत भी नहीं दिखती। कहना न होगा कि रिट्ट के सिनेजगत में महिलाएं भी पुरुषों की तरह अपने विरोधाभासों से जूझती दिखती हैं। वह रूमानी भावों को उकेरने वाले फिल्मकारों की नायिकाओं की तरह नायक के जख्मों पर जब-तब मरहम रखती नहीं दिखतीं, बल्कि जरूरत पड़ने पर उसे दुत्कार भी देती हैं या उस पर गोली भी चला देती हैं। रिट्ट का यथार्थवादी निर्देशक ऐसे दृश्यों में अपने चरम पर होता है। वह तब एक अन्य कड़वी सच्चाई दिखाता है जब उसका नायक या कोई अन्य पुरुष उसके महिला पात्रों को दिल खोलकर अपशब्द कहता है। ‘नाॅर्मा रे’ के कुछ दृश्य इसकी पैरवी करते हैं। ऐसे दृश्यों मे निर्देशक रिट्ट के कैमरे के स्थान पर दर्शक खुद को वह दृश्य साक्षात देखता हुआ महसूस करता है।

मार्टिन रिट्ट ठोस यथार्थवादी निर्देशक रहे हैं। उनके सिनेमा के समग्र आकलन पर उनकी राजनीतिक सोच में धीरे-धीरे आती जा रही परिपक्वता का भी आभास होता है। ‘द स्पाई…’ तक उनका विचारक फिल्मकार एक सापेक्ष नजरिए से राजनीति का आकलन करता दिखता है, हालांकि वह उसके बाद अपनी प्राथमिकताओं से कभी विमुख नहीं होता। वह सही और गलत का भी फैसला नहीं करता क्योंकि यह फैसला करने का अधिकार किसी के पास नहीं है। ऐसा इसलिए क्योंकि राजनीतिक जगत में सही और गलत के मानदंड हमेशा तात्कालिक होते हैं, उनके अमल में आने के साथ ही उन पर नए सिरे से बहस की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। ‘द स्पाई…’ की निर्देशकीय शैली बेशक यथार्थवादी है और इसमें कुछेक ही पात्रों को गहराई से उकेरने की जरूरत महसूस होती है। कहना न होगा कि शायद यही कारण था जिसके चलते एंड्रयू सैरिस जैसे प्रबुद्ध समीक्षकों ‘द स्पाई…’ को एक कमजोर निर्देशित फिल्म कहा था। इसके अतिरिक्त निर्देशकीय दृष्टि के एक दूसरे कोण से फिल्म की पटकथा और पात्रों का उभार समांतर रेखा में नजर आता है।

वर्ष 1990 में मृत्यु से एक वर्ष पूर्व तक रिट्ट कार्यरत रहे थे। अंतिम फिल्म ‘स्टैनले एंड आइरिस’ में वह एक बार फिर निम्न मध्यवर्ग के संघर्षशील पात्रों के पास लौटते हैं और बहुत ही संवेदनशील ढंग से उनके भीतर पछाड़ें मार रही सुसुप्त भावनाओं को पर्दे पर दिखाते हैं। अकारण नहीं कि उनकी सिनेमाई कथा कहने की खूबी के कारण पिछले दिनों उनकी फिल्मों पर पुनः विवेचन शुरू किया गया था। इसी श्रंखला में रिट्ट के सिनेमा पर उनके चाहने वालों ने एक पुस्तक प्रकाशित की है जिसे पाठक गूगलबुक्स पर पढ़ सकते हैं।

फिल्म ‘द स्पाई हू केम इन फ्रॉम द कोल्ड’ में रिट्ट ने अगर एक बार फिर राजनीतिक धरातल को परखा था तो वहीं वह राजनीतिक जगत के छुपे हुए खेल पर से भी एक ही बार में पर्दा खींचकर उसका असली चेहरा दिखा देते हैं। फिल्म जहां एक ओर जीवन का यथार्थवादी दस्तावेज है, तो दूसरी ओर वह राजनीतिक जगत का कच्चा चिट्ठा भी है।