अभिजान 1962: सब साला बेईमान है…

Abhijan 1962 Satyajit Ray filmbibo

संदीप मुद्गल

अभिजान की कहानी को यदि एक वृताकार रूप में आभास करें तो उसके केंद्र में नायक नरसिंह (सौमित्र चटर्जी) है। इस तरह यदि नरसिंह यदि एक अणु है तो कथा के अन्य पात्र उसके चारों ओर इलेक्ट्राॅन-प्रोटोन की तरह घूमते हैं। नरसिंह का चरित्र एक कद्दावर व्यक्तित्व का मालिक लगता है। ऐसा है भी। वह एक राजपूत है और टैक्सी चलाता है। वह ईमानदार है, शायद जीवन संघर्षों के कारण या फिर अपनी शर्तों के अनुसार जीवन न जी पाने के कारण। इन्हीं कुछ कारणों से वह गुस्सैल है और अक्सर ंिहंसक भी हो उठता है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो ऐसे चरित्र विपरीत परिस्थितियों में खुद को हमेशा सही ठहराते हुए दुनिया को लताड़ते दिखते हैं। बेशक वह अपने हालात में सुधार के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर पाते, लेकिन ऐसे चरित्रों की असली रंगत तब पता चलती है जब उनकी दुनियावी परिस्थितियां उनके अनुसार ढलने लगती हैं।

ताराशंकर बंधोपाध्याय की कहानी पर आधारित सत्यजीत रे की फिल्म ‘अभिजान’ का केंद्रीय पात्र नरसिंह आमजन की शब्दावली में लगभग एक ‘बीमार’ मानसिकता का व्यक्ति कहा जा सकता है। दरअसल, अभिजान (अभियान) का समूचा कलेवर एक ‘थ्रिलर’ जैसा है। ऐसा नहीं कि सत्यजीत रे ने कभी रोमांचकारी फिल्में नहीं बनाईं। ‘सोनार केल्ला’, ‘जय बाबा फेलुनाथ’ आदि फिल्में उनके अपने जासूस चरित्र पर आधारित थीं, लेकिन अपने फिल्म निर्माण करियर के प्रथम दस वर्षों में ही उन्होंने एक ऐसी फिल्म बनाई जो कमर्शियल दायरे में एक सीमा तक फिट बैठती थी। 1950-60 के दशकों की बहुसंख्य बांग्ला फिल्में तात्कालिक हिन्दी फिल्मों से ही प्रेरित थीं। यह एक ऐसा सच है जो जग-जाहिर है। अभिजान इस पैराए में तो आती है, परंतु फिर भी वह एक पूर्णतया कमर्शियल चित्र नहीं है।

अभिजान एक मनोवैज्ञानिक चित्र है। यों सत्यजीत रे की सभी फिल्मों में मनोवैज्ञानिक तत्वों की भरमार है। या कहें कि वह मुख्यतः घटनाओं और पात्रों का मनोवैज्ञानिक चित्रण ही करते थे, तो गलत नहीं होगा। अभिजान का पहला दृश्य ही नरसिंह के मनस को पढ़ने का पहला पाठ बनता है। एक टूटे शीशे में दिखता उसका चेहरा और पर्दे पर मुख्य रूप में उससे बात करता एक अन्य व्यक्ति, जो नरसिंह की मजबूरी पर हंस रहा है। नरसिंह पूरी दुनिया से लड़ कर थका-मांदा बैठा शराब पी रहा है। इसी दृश्य के एक संवाद में वह ‘सब साला बेईमान’ तक कह डालता है। जाहिर सी बात है कि नरसिंह यदि क्रोधी स्वभाव का है तो वह अन्य व्यक्तियों पर भरोसा भी बहुत जल्दी कर लेता है। पहले दृश्य की समाप्ति पर वह बेशक उस मित्र का व्यावसायिक प्रस्ताव ठुकरा देता है, परंतु शीघ्र ही एक शातिर व्यापारी की मीठी बातों पर भरोसा कर बैठता है। वह व्यापारी उसे अपने यहां रहने, खाने, काम करने और गाड़ी ठीक कराने का प्रस्ताव देता है।

अभिजान की कई अंतर्कथाएं हैं। इन अंतर्कथाओं के केंद्र में भी नरसिंह है और वह कई नए पात्रों से मिलता है। अपने एक जानने वाले ड्राइवर के परिवार से भी वह मिलता है, जिसमें उस व्यक्ति की मां और बहन हैं। यह एक दलित-ईसाई परिवार है। नरसिंह अपने उस मित्र की बहन नीली (रुमा गुहा ठाकुरता) की ओर गहराई से आकृष्ट होता है। वह परिवार काफी हद तक समाज में किनारे पर पड़ा है। एक अन्य कहानी गुलाबी (वहीदा रहमान) की है। गुलाबी को नरसिंह का नया मालिक सेठ किसी गांव से बहला-फुसला कर लाया है। वह उसे अपने व्यावसासिक साथियों को मनोरंजन के लिए सौंपना चाहता है। गुलाबी एक अनोखा चरित्र है। वह अपनी इज्जत बचाने के लिए नरसिंह की ओर आकृष्ट होती है और उसे अपने जीवन की कहानी सुनाती है। इस तरह एक प्रेम त्रिकोण बनता है, जो कमर्शियल फिल्मी दायरे के लिए मुफीद है।

इसके अलावा, अभिजान एक अपराध कथा भी है। नरसिंह उस सेठ के यहां काम करना शुरू कर देता है। सेठ जरायमपेशा किरदार है। नरसिंह को भी उसी काम में लगना पड़ता है, जबकि इसी बीच उसकी प्रेम भावनाएं भी प्रबल हो उठती हैं। गुलाबी उसे वहां से निकल चलने को कहती है, लेकिन वह मजबूर है। नीली के एक अन्य व्यक्ति के प्रति चाहत का पता चलते ही उसका विचार कुछ बदलने लगता है।

फिल्म में बिहार और बंगाल की सीमा का परिवेश दिखाया गया है। खास बात यह है कि इसके चरित्र भी अपने आप में काफी रंग-बिरंगे दिखते हैं। यहां रंग-बिरंगे से तात्पर्य फिल्म में दिखाई देने वाली उनकी साज-सज्जा से न होकर उनके हाव-भाव और बोलचाल से है। फिल्म श्वेत-श्याम चित्र है। एक अन्य खास बात है फिल्म के संवाद, जो आंधे बांग्ला में हैं और शेष भोजपुरी व हिन्दी में। इस हिसाब से अभिजान का फलक कई संस्कृतियों को पाटता है। परंतु मूल में अभिजान एक सामाजिक कथा है और रे की अन्य फिल्मों की तरह इसमें भी कई स्थानों पर बिंब विधान प्रबलता से दिखता है। फर्क यह है कि यहां राय ने कुछ सीधे-सरल बिंब इस्तेमाल किए हैं। वह किसी दृश्य के बीच में या अंत में बात पूरी करने के लिए बिंब का सहारा यदा-कदा ही लेते हैं। उदाहरण के तौर पर दुबराजपुर की पहाड़ियां (विशालकाय पत्थर) फिल्म में अक्सर दिखाई पड़ते हैं। राय का कैमरा नरसिंह के मनोभावों के अनुसार उन पहाड़ियों को दिखाता है।

पहली बार वह पहाड़ियां तब दिखती हैं, जब नरसिंह सेठ और गुलाबी से रात गए पहली मुलाकात के बाद उन्हें गाड़ी में उनके ठिकाने तक पहुंचाता है। दृश्य में राय का कैमरा पहाड़ियों के फैलाव को सीधे-सीधे पीछे की ओर भागते दिखाता है। नरसिंह भी लगभग एक कौतुहलपूर्ण शून्य दृष्टि से पहाड़ियों को देखता आगे बढ़ जाता है। दूसरी बार यह पहाड़ियां तब आती हैं जब नरसिंह अपने ईसाई मित्र (जोसेफ) के साथ उन्हें खासतौर पर देखने जाता है। इस दृश्य में वह पहाड़ियों के बीचों-बीच खड़ा है, कुछ प्रसन्न, कुछ निराश, कुछ औचक और कुछ हद तक क्षणिक स्थायित्व सा महसूस करता हुआ! उन सूखे पत्थरों पर कई नाम भी गुदे हैं, जो उसका मित्र दिखाता है।

अभिजान का सामाजिक पक्ष ही उसका केंद्र बिंदु है। ऊपर से देखने में कहानी कुछ विरोधाभासी भी प्रतीत होती है। एक राजस्थानी राजपूत नरसिंह, जो बंगाल में रहता है और टैक्सी चलाता है और बहुत फर्राटेदार बांग्ला बोलता है। वह असामाजिक नहीं है, लेकिन अपनी अकड़ में रहता है। उसकी क्रिया-प्रतिक्रिया अक्सर बहुत उग्र रहती है। सत्यजीत राय के फिल्म संसार में नरसिंह जैसे उग्र चरित्र बहुत कम देखे गए हैं। हिंसा का स्थान अक्सर राय की फिल्मों में नहीं दिखता। ऐसा नहीं कि वह शारीरिक हिंसा दिखाने से बचना चाहते हैं, (अभिजान में शारीरिक हिंसा का दृश्य है जो राय की सभी फिल्मों में अपनी तरह का अकेला है) दरअसल, हिंसा का स्थान किसी भी विवाद को सुलझाने की क्रिया में सबसे अंतिम होता है, इसलिए मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता देने वाला रे जैसा रचनाकार हिंसा तक पहुंचने से पहले ही उसके अनेक पूर्ववर्ती परोक्ष रूप दिखा चुका होता है।

अभिजान में भावनाओं का तीव्र उद्वेलन है, विशेषकर नरसिंह के चरित्र में। नरसिंह अपनी पहचान पाने के लिए भटक रहा है। वह बड़े अफसरों की गाड़ियां चलाता रहा है और शायद यही कारण है कि अंग्रेजी भी सीखना चाहता है। यह उसकी हीन ग्रंथि भी है। अपनी असफल कोशिशों के बाद वह नीली से भी कुछ देर को अंग्रेजी सीखता है। नीली उससे आकर्षित नहीं है, उसका एक अपाहिज मित्र है, जिसे वह चाहती है, वह बौद्धिक तौर पर भी उसके समांतर है। वहीं नरसिंह की बौद्धिक समकक्ष गुलाबी है, जिसे उसको समझने में कुछ समय लगता है।

निर्देशक सत्यजीत रे यहां चरित्र की पहचान में हो जाने वाली भूल या देरी का भी खुलासा करते हैं। यही मानव मनोविज्ञान का वह रूप है जिसके लिए उनके जैसे निर्देशक जाने जाते हैं। वह इसे नितांत मानवीय सीमा के तौर पर दिखाते हैं। शायद यह कमी हरेक इनसान में होती है और अपने उस निकटस्थ को नहीं पहचान पाता जो उसका सबसे बड़ा हितैषी है! यही कारण है कि नरसिंह गुलाबी का प्यार न पहचान पाने के कारण यहां-वहां भटकता रहता है। एक रात उसके साथ बिताने के बाद और गुलाबी द्वारा सीधे-सीधे उसके साथ जीवन बिताने की बात कह देने के बाद भी वह अपने आर्थिक भविष्य की चिंता में डूबा रहता है। यहीं से नरसिंह के चरित्र में एक सौम्य बदलाव भी दिखता है। वह अंतिम बड़े फैसले के काफी निकट जा पहुंचता है।

अभिजान के कुछ अन्य प्रमुख पात्र भी हैं, जैसे नरसिंह का साथी और गाड़ी क्लीनर रामा (राबी घोष)। रामा को जब-तब कुछ मजाहिया दृश्यों के लिए रखा गया दिखता है। लेकिन साथ ही उसे अक्सर नरसिंह का कोपभाजन भी बनना पड़ता है। रामा नरसिंह को अच्छी सलाहें भी देता रहता है, लेकिन क्रुद्ध स्वभाव के कारण नरसिंह उसे अनसुना कर देता है। राबी घोष का अभिनय बेहतरीन है, वह मूलतः हास्य अभिनेता थे, लेकिन यहां उनका चरित्र हास्य प्रधान होते हुए भी गंभीर है। वहीं गुलाबी की भूमिका में वहीदा रहमान बहुत स्वाभाविक नजर आती हैं। गुलाबी से मिलना नरसिंह की प्राकृतिक परिणति भी रहती है। इसलिए कहना न होगा कि गुलाबी जैसे चरित्रों का नरसिंह सरीखे यायावर व्यक्तित्वों के जीवन में सही समय पर न आना उनके शीघ्र अंत का कारण भी बनता है।

अभिजान की तेज गति का सबसे बड़ा बिंब नायक नरसिंह की टैक्सी है। निर्देशक ने देहाती इलाके में दौड़ती टैक्सी के रूप 1930 के क्राइस्लर माॅडल का इस्तेमाल किया था। रे की अन्य शुरुआती फिल्मों में भी किसी एक स्थान या वस्तु विशेष को केंद्रीय पात्र के तौर पर दिखाया गया था – ‘पाथेर पांचाली’ में यदि खुद गांव एक चरित्र है तो ‘अपराजितो’ में बनारस। ‘जलसा घर’ में जमींदार की रंगशाला एक पात्र है तो ‘कंचनजंघा’ में खुद पर्वत और उसके टेढ़े-मेढ़े रास्ते मानव चरित्रों के साथ-साथ अपनी कहानी भी सुनाते हैं। इस तरह अभिजान की कहानी में टैक्सी भी एक चरित्र है। इस गाड़ी का सड़क पर दौड़ना ही फिल्म को स्वतः एक गति देता है। इसके अलावा, गरम मिजाज नायक नरसिंह की घोर असंतुष्टि और अंतद्र्वंद्व भी फिल्म को गति देते हैं। यही दो ‘तत्व’ अभिजान के कथानक के मूल में हैं। फिल्म की लोकेशन भी उसे गति देने में सहायक बनती है। यानी रे का चिर-परिचित कलात्मक स्वरूप अपने मूल में यहां कहीं दूर खड़ा दिखता है। वहीं ऐसा भी नहीं कि फिल्म की कलात्मकता के साथ कोई समझौता हुआ हो। अनेक दृश्य राय की निर्देशकीय कुशलता का प्रमाण हैं। साथ ही पाश्र्व संगीत अगर कुछ शुरुआती टैक्सी के दृश्यों में एक पल को गंभीर गूंज सुनाता है तो दूसरे ही पहल वह अनेक हास्य लहरियों में बदल जाता है, जिसे सहयोग देने के लिए निर्देशक कुछ ठेठ गंवई पात्रों का सहारा लेता है, जो टैक्सी में बैठे अपना राग अलाप रहे हैं।

दरअसल, ऐसी ही एक संगीतिक कलात्मकता का अद्भुत उदाहरण नरसिंह और नीली के दृश्य में आता है। रविवार की एक सुबह नीली गिरजा जा रही है और उसे रास्ते में नरसिंह मिलता है। गिरजे तक का पैदल रास्ता है जो खुले मैदान से होकर जाता है। दूर से नरसिंह और नीली का बातें करते हुए गिरजे की ओर चलते आने के पाश्र्व में वहां की घंटियों की आवाज लगातार सुनाई पड़ती है जो उनके आगे बढ़ते जाने के साथ धीरे-धीरे तेज होती जाती है। प्रार्थना स्थल के घंटों की एकरस आवाज का इतना कुशल और सुरीला इस्तेमाल पर्दे पर बहुत कम देखा गया है। दृश्य में नरसिंह और नीली के बीच अन्य बातों के अलावा सच-झूठ की समझ को लेकर भी बात होती है, जो नरसिंह के लिए एक इशारा होती है, जिसे वह समझ नहीं पाता। इसी दृश्य में दूर नरसिंह और नीली से कुछ आगे उसका अपाहिज मित्र भी बैसाखियों के सहारे चला जा रहा है। उसे भी निर्देशक कैमरे की जद में रखता है। गिरजा के काफी निकट पहुंचने, बातें समाप्त होने और नीली द्वारा विदा लेने के दौरान दूर चला जा रहा उसका मित्र दृश्य में साफ दिखता है। तकनीकी दृष्टि से ऐसे दृश्यों को ‘डीप फोकस’ की श्रेणी में रखा जाता है, लेकिन एक आम दर्शक के लिए वह दृश्य बहुत अधिक कुछ कह जाता है। इस दृश्य में रे की सिने कलात्मकता पूरे चरम पर होती है। लोकेशन, कैमरा, संवाद, अभिनय, पाश्र्व संगीत, मानवीय भंगिमाएं, प्रेमासक्ति (नरसिंह), तटस्थता (नीली), मजबूरी और वितृष्णा (नीली का अपाहिज मित्र) का अद्वितीय संगम है यह दृश्य।

नरसिंह के चरित्र में सौमित्र चटर्जी पर बात करनी सबसे जरूरी है। सौमित्र चटर्जी सत्यजीत रे के ‘रेगुलर’ थे। 1959 में ‘अपुर संसार’ से अपने फिल्म करियर की शुरुआत के बाद उन्होंने राय की कुल जमा चैदह फिल्मों में काम किया। इस ऋंखला में ‘अभिजान’ तीसरी फिल्म थी। अपने व्यक्तित्व में सौमित्र चटर्जी काफी कुछ सत्यजीत रे से मेल खाते हैं। लंबे, पतले, मृदुभाषी और साहित्य प्रेमी चटर्जी ने अपने अभिनय करियर में विविध चरित्र निभाए हैं, लेकिन नरंिसह जैसा किरदार उन सबमें अकेला है। नरसिंह लगभग एक प्रतिनायक है। सही और गलत के सदा से अनुत्तरित रहे दार्शनिक प्रश्न में उलझा हुआ, अपनी तलाश और उस मिथकीय स्थायित्व की तलाश में भटक रहा है!

सौमित्र चटर्जी ने नरसिंह का चरित्र अपनी ओर से कुशलता से निभाया है, लेकिन एक गरम मिजाज राजस्थानी राजपूत के चरित्र में पूरी तरह फिट नजर नहीं आते। उनको चरित्र निभाने के लिए दिया गया मेकअप भी कई बार नकली लगता है। दूसरे, चटर्जी की बाॅडी लैंग्वेज (देहभाषा) एक राजस्थानी राजपूत की देहभाषा के हिसाब से कमजोर दिखती है। यहां सोनार केल्ला का बलिष्ठ टैक्सी डाइवर अपने आप याद आ जाता है। फिल्म के लांग शाॅट्स में ऐसा ही लगता है। हालांकि क्लोजअप दृश्यों में वह अपने भावप्रवण चेहरे से सारी बात कह जाते हैं। उनके चेहरे पर उठते-गिरते भाव क्लोज शाॅट्स में बहुत खूबी से सामने आते हैं, लेकिन लांग शाॅट्स में यह प्रक्रिया कमजोर पड़ती दिखती है।

नरसिंह के चरित्र का दूसरा पक्ष है, उसका हुलिया, जिसे निर्देशक ने एक विशेष ‘लुक’ देने का प्रयास किया है। दाढ़ी-मूंछ और भारी भौहों के पीछे छुपा सौमित्र चटर्जी का मासूम चेहरा छुपाए नहीं छुपता। पहली बार अपने मित्र जोसेफ से मिलने पर और चाय पीते हुए उसके बारे में जानने पर चटर्जी की चिर-परिचित शर्मीली मुस्कान दाढ़ी के पीछे से उभर आती है। एक क्रुद्ध और नाराज मानसिकता का व्यक्ति अपने मूल में शर्मीला हो सकता है, लेकिन चटर्जी की अत्यधिक शर्मीली मुस्कान दृश्य को नुकसान पहुंचाती है। यह मुस्कान अधिक पल नहीं ठहरती, लेकिन पूरे दृश्य पर एक ऊपरी पैबंद सी लगती है। कुछ अन्य दृश्यों में भी ऐसी ही कमी झलकती है। किसी पुराने मित्र से विशेष मनःस्थितियों में मिलने पर प्रत्येक व्यक्ति की प्रतिक्रिया बेशक अपनी ही होगी, लेकिन एक कथित उग्र व्यक्तित्व की मुस्कान मात्र यहां पूरे दृश्य को डांवाडोल कर देती है। सौमित्र चटर्जी को नरसिंह की भूमिका देकर निर्देशक रे साहसिकता का परिचय देते हैं। उन्हें चटर्जी की अभिनय प्रतिभा पर अत्यधिक भरोसा था, और इसमें कोई शक भी नहीं कि चटर्जी असाधारण अभिनेता हैं। वह अपने ही शब्दों में ‘जीवन सदृश’ अभिनय करने का प्रयास करते रहे हैं। वह रोजमर्रा के चरित्रों का निरूपण कुशलता से करते हैं।

नरसिंह भी रोजमर्रा का पात्र है, असाधारण पात्र नहीं है। परंतु उसकी रोजाना की पहचान के पीछे छुपी है उसकी अहंकारिक गं्रथि, जिससे वह केवल अपने दम पर पार नहीं पा सकता! फिल्म के अधिकांश हिस्से में उसकी यही ग्रंथि अपने उग्र रूप में दिखती है, जिसे निबाहते समय अभिनेता चरित्र की भौतिक भंगिमा पर पूरी पकड़ नहीं रख पाता। यहां मुख्य कमी निर्देशकीय है। निर्देशक सत्यजीत रे को नरसिंह के चरित्र के लिए एक ऐसा अभिनेता चाहिए था जिसके व्यक्तित्व में दो विरोधी रूपों का समावेश हो। शारीरिक सौष्ठव और रूखा परंतु भावपूर्ण चेहरा! छोनों ही स्तरों पर चटर्जी असफल नजर आते हैं। कुछ दृश्यों में यदि कैमरा उनके चेहरे से मन की बात को सामने रखता भी है, तो अगले ही दृश्य में देहभाषा की कमजोरी फिर से झलक उठती है। यहां यह सोचना भी गलत न होगा कि चटर्जी के अतिरिक्त और कौन सा अभिनेता उस समय इस चरित्र को और बेहतरी से निभा सकता था ? यह देहभाषा की कमी ही कही जाएगी कि चटर्जी फिल्म के एक हिंसा प्रधान दृश्य में अपने विरोधी से कहीं कमजोर दिखते हैं, जो खुद शारीरिक तौर पर अधिक प्रभावशाली नहीं दिखता!

फिल्म में सत्यजीत रे ने लोकेशन का पूरा इस्तेमाल किया है। वह क्षेत्र विशेष के लैंडस्केप का व्यापक हिस्सा कैमरे की पकड़ में लाते थे। पात्रों की गहराई को स्थान के फैलाव के समकक्ष रखकर तौला जा सकता है। फिल्म की शुरुआत में कार और रेल की रेस का दृश्य यदि चरित्र चित्रण का एक गहरा पक्ष उजागर करता है तो दोनों गाड़ियों के बीच फैले खलिहान क्षेत्र की विशेषता को इंगित करने की निर्देशकीय मंशा को भी दर्शाते हैं। रे केवल पात्रों और कथानक के ही नहीं, अपने पात्रों की रंगभूमि बने स्थान विशेष के प्रति भी उतना ही गहरा चिंतन करते थे। इसके दृष्टांत उनकी फिल्मों में फैले हैं, फिर वह चाहे दूर-दराज के खुले मैदान हों या बड़े शहरों की संकरी और बजबजाती गलियां। राय घर और बाहर दोनों स्थानों की विशेषता के जरिए अपनी कहानी कहते हैं।

अभिजान सत्यजीत रे के फिल्म संसार में उनके मूल ‘सांस्कृतिक’ कलेवर से अलग हटकर नजर आती है। परिवेश की दृष्टि से अभिजान से गुजरना कस्बाई जीवन को निकट से देखना है। विशुद्ध कस्बाई छाप लिए हुए अनेक दृष्टांत फिल्म में हैं। नरसिंह और रामा का एक होटल में खाना खाने का दृश्य ऐसा ही है जिसके पाश्र्व में रेडियो पर चलने वाली लोक मिश्रित धुन का गीत उस पूरे सीक्वेंस को ठेठ कस्बाई माहौल में बदल देता है।

यह फिल्म सत्यजीत रे के फिल्म जगत में लीक से हटकर दिखती है। यह कहना गलत नहीं होगा कि ‘कलात्मकता’ और ‘शास्त्रीयता’ की पहचान सत्यजीत रे पर कुछ इतनी गहरी लगी थी कि वह अक्सर यथार्थवाद, वह भी शहरी या कस्बाई यथार्थवाद में कई लोगों की राय में ‘आउट आॅफ प्लेस’ दिखते थे। अभिजान के साथ-साथ उनकी कलकत्ता त्रयी में भी जब वह आजीविका संघर्ष की लगभग क्रूर और कभी न खत्म होने वाले बहाव को दिखाते हैं, तो उनसे ‘शास्त्रीयता’ की चाह रखने वाले दर्शक कई बार बौखला जाते थे। लेकिन एक कलाकार के तौर पर सत्यजीत रे की कला का दायरा इन फिल्मों से कहीं व्यापक फलक प्राप्त करता है और इसकी शुरुआत अभिजान से ही हुई थी।