आलम आराः क्या आपको याद भी है, भारत की पहली बोलती फिल्म की…

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भारत की पहली बोलती फिल्म आलम आरा का एक दृश्य। फिल्म १९३१ में आयी थी और इसके निर्देशन आर्देशन ईरानी ने किया था।

स्वप्निल तिवारी

हर शुक्रवार एक फिल्म रिलीज़ होती है, हम जाते हैं, देखते हैं, (किसी किसी फिल्म को छोड़ कर जिन्हें कोई नहीं देखता),  फिल्म में किरदार इधर उधर दौड़ते नाचते-गाते हैं, लड़ते झगड़ते हैं, प्यार मुहब्बत की बातें करते हैं, आज कल गाली-गलौज (कुत्ते-कमीने मैं तेरा खून पी जाऊंगा वाली गालियों से अलग) भी करते हैं और फिर एक सुखद, दुखद या मिश्रित अंत के साथ फिल्म खत्म हो जाती है.

इस बीच हमें शायद ही ध्यान आता है कि फ़िल्में कभी बिना आवाज़ के भी होती थीं। कैमरे में जो कुछ भी फिल्माया जाता उसमें दिखने वाली भाव भंगिमाओं के सहारे ही हमें फिल्म में घटित होने वाले घटनाक्रम का अंदाज़ा लगाना पड़ता था, ऐसा मान लीजिए कि कैमरा चुपचाप होते हुए भी इतना बोलता था कि दर्शकों को फिल्म को समझने में कोई कठिनाई नहीं आती थी और इसी तरह से फ़िल्में देखी जाती थीं। लेकिन कैमरा कितना भी बोले आवाज़ की कमी तो कहीं न कहीं खलती होगी और इसी वजह से बोलता हुआ सिनेमा बनाने का सपना देखा गया होगा.

भारतीय जनता के सामने यह सपना 86 साल पहले यानि 14 मार्च 1931 को साकार हो कर मुंबई के मैजेस्टिक थियेटर में “आलम आरा” के रूप में आया। इस फिल्म के निर्माता थे इम्पीरियल मूवीटोन और इसका निर्देशन किया था अर्देशिर इरानी नें, फिल्म में मुख्य भूमिकाएँ निभाई मास्टर विट्ठल, जुबैदा, जिल्लू, सुशीला और पृथ्वी राज कपूर नें थीं। यह फिल्म एक जिप्सी लड़की और एक राजकुमार की प्रेम कहानी थी जिसकी पृष्ठभूमि में अपने भीतर ही हुए षड्यंत्रों का शिकार एक राजपरिवार था।

एक बच्चा जैसे अपना खोया हुआ झुनझुना मिल जाने पर उसे जी भर के बजाता है, उसी तरह जब भारतीय सिनेमा को आलम-आरा के जरिये जब आवाज़ मिली तो उसने उस आवाज़ का सबसे खूबसूरत प्रयोग जी भर कर किया और वह प्रयोग हमारे सामने आलम आरा के सुखद संगीत के रूप में था। प्रख्यात निर्देशक श्याम बेनेगल नें आलम-आरा के बारे में कहा था कि “यह सिर्फ टाकी नहीं थी बल्कि बातचीत करने वाली और गाने वाली ऐसी फिल्म थी जिसमें गाने अधिक थे और बातचीत कम थी”। भारत की पहली ही बोलती फिल्म नें एक ये मानक तय कर दिया कि भई अगर अब हिंदुस्तान में सिनेमा बनेगा तो उसमें गीत-संगीत अनिवार्य रूप से रहेंगे.

आज भी हमारी फ़िल्में गीत संगीत भरपूर होती हैं,  बहुत बार तो ऐसा हुआ है कि फिल्म पिट गयी है लेकिन उसके गीत संगीत नें लोगों के दिलों पर राज किया है। आलम आरा के गीत “दे दे खुदा के नाम पे प्यारे”  को भारतीय सिनेमा का पहला गीत माना जाता है जिसे गाया था फिल्म में फ़कीर का किरदार अदा करने वाले अभिनेता वज़ीर मोहम्मद खान नें, चूँकि उस समय पार्श्व गायन की तकनीक नहीं आई थी इसलिए खुद अभिनेता नें ही गीत गाया था.

आपको यह भी बताता चलूं कि पूरी फिल्म की शूटिंग रात में की गयी थी क्यूंकि दिन में शूटिंग के वक्त अभिनेताओं के आस पास छिपा कर रखे गए माइक्रो फोन (जिससे उनकी आवाज़ रिकॉर्ड हुई थी) के द्वारा आस पास के शोर के भी रिकॉर्ड हो जाने का खतरा था। गीत के मुखड़े और इस बात से कि इसे एक फकीर नें गाया था यह बात पता चल जाती है कि यह एक सूफियाना गीत था, दुखद तो यह है कि अब इस गीत के सिर्फ मुखड़े ही उपलब्ध हैं वो भी सिर्फ लिखित इसका संगीतबद्ध रूप नष्ट हो चुका है। 2003 में पुणे स्थित National film archiev of India में आग लग जाने की वजह से राजा हरिश्चंद्र तथा अछूत कन्या जैसी फिल्मों के साथ आलम आरा का आखिरी प्रिंट भी नष्ट चुका है और हमारे सिने इतिहास का पहला ही पन्ना गायब हो चुका है। फिल्म की महत्ता को देखते हुए भारत भर में इसके एक प्रिंट के लिए काफी खोज बीन की गयी लेकिन कोई सफलता हाथ नहीं लगी.

आज आलम आरा की अस्सीवीं वर्षगाँठ पर हम उसके साक्षी नहीं बन सकते। दर असल यह हमारी धरोहरों की प्रति हमारी उदासीनता का प्रतीक है और जब तक हम हमारी ये उदासीनता नहीं छोड़ेंगे तब तक ऐसे ही अपनी धरोहरों से हाथ धोते रहेंगे। आकाईव में रख कर फिल्मों को सड़ाने (बेहतर शब्द जलाने) से बेहतर ये होगा कि उनको संरक्षित करने के दूसरे तरीके अपनाए जाएँ ताकि हम अपने इतिहास के गवाह बन सकें।