अंतरद्वंद्व: जहाँ जवान लड़कों का अपहरण करके बना लेते हैं दामाद

Antardwand film poster

अंतरद्वंद्व को सामाजिक विषय पर बनी हुई सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार (2009) मिला है. फ़िल्म का विषय है बिहार में लड़कों को जबरदस्ती पकड़कर उनकी शादी कर देना. यह ऐसा विषय है जिसमें किसी की भी रुचि होगी. हम बचपन से बिहार में लड़कों को पकड़कर शादी की बातें सुनते आ रहे हैं. कई बार तो लोग बच्चों को चिढ़ाने-डराने के लिए इस तरह की धर-पकड़ वाली शादी के एक से एक किस्से सुनाते थे.

हालात यह हो गई कि बिहार के बाहर के लोगों के लिए यह जानना मुश्किल हो गया कि इस तरह की शादियों के किस्सों में कितना सच है और कितनी कल्पना. लोगों की सुनी-सुनाई को मानें तो अब ऐसी शादियाँ होती भी नहीं. यह सब अब बीते जमाने की बातें हो गईं हैं.

बिहार में पले-बढ़े सुशील राजपाल ने इसी परिघटना पर यथार्थवादी ढंग से एक कहानी बुनी है. फ़िल्म का नायक एक मध्यवर्गीय बिहारी परिवार का प्रतिभाशाली नौजवान है. लोक सेवा आयोग की आईएएस की परीक्षा के मेन्स दे चुका है. उसे पूरी उम्मीद है कि उसे साक्षात्कार के लिए बुला लिया जाएगा. दिल्ली में एक लड़की से उसका प्रेम संबंध है. वो लिन-इन में रहते हैं. लड़की गर्भवती है. नायक अपने पिता से अपनी प्रेमिका से शादी की बात करने के लिए जाता है.

उधर घर पर उसके शादी के लिए एक से एक रिश्ते आ रहे हैं. उसके पिता अपने बेटे की शादी से यथासंभव लाभ कमा लेना चाहते हैं. नायक के माता-पिता को पता चल जाता है कि वो किसी और लड़की से प्यार करता है लेकिन वो इस रिश्ते को स्वीकार नहीं करते. नायक रूठ कर भोर में ही दिल्ली जाने के लिए घर से निकल पड़ता है. यहीं से कहानी में उसका पहला निर्णायक मोड़ आता है. उसका अपहरण हो जाता है.

यहाँ तक बहुत सामान्य प्रतीत होने वाली कहानी दर्शकों को चकित करते हुए ऐसे मोड़ लेती है कि उन्हें एक बार यकीन नहीं होगा कि यह सच है या झूठ. जो लोगों ने इस तरह की परिघटना से अंजान हैं उनके लिए तो यह पूरी फ़िल्म ही एक रहस्योद्घाटन  सरीखी होगी. जिन लोगों ने ऐसी बातों के बारे में पहले से सुन रखा होगा, जैसे कि मैं, उन्हें भी यह जानना की जिज्ञासा ज़रूर होगी कि आखिरी यह होता कैसे है ! और जो लोग ऐसी किसी घटना का किसी तरह का अनुभव रखते हैं उनकी जिज्ञासा के बारे में कहना ही क्या !

यह फ़िल्म आपको एक बार ज़रूर देखनी चाहिए. निर्देशक ने कहीं भी नमक-मसाला भरने की कोशिश नहीं कि है. फ़िल्म की पटकथा थोड़ी और चुस्त होती तो फ़िल्म के लिए बेहतर होता. फ़िल्म के संपादन में के लिए भी यही बात कही जा सकती है. फ़िल्म का तकनीकी पक्ष थोड़ा उन्नत होता तो यह फ़िल्म दर्शक बटोरने की क्षमता रखती थी. आज के दौर में जब हिन्दी सिनेमा के दर्शकों को ख़ान-कुमार मार्का फ़िल्मों की लत लगी हुई हो तो उनके लिए सरल-सपाट कहानी को स्वीकार करना कठिन हो जाता है.

फ़िल्म में मुख्य भूमिका निभाने वाले राज सिंह चौधरी ने सराहनीय काम किया है. विकिपीडिया के अनुसार राज सिंह चौधरी लेखक भी हैं. ब्लैक फ्राइडे, नो स्मोकिंग, गुलाल जैसी फ़िल्मों में वो लेखक के रूप में सहयोग कर चुके हैं. इस फ़िल्म को देखकर फ़िल्म के निर्देशक सुशील राजपाल और नायक राज सिंह चौधरी के उज्ज्वल भविष्य के प्रति आशावान हुआ जा सकता है. दर्शकों को बीच में फ़िल्म थोड़ी धीमी लग सकती है लेकिन धैर्य का फल मीठा होता है. पूरी फ़िल्म देखने के बाद आप अच्छा महसूस करेंगे. एक अछूते विषय को सीधे-सादे ढंग से सामने लाने के लिए इस फ़िल्म की पूरी टीम साधुवाद की पात्र है.