क्लिंट ईस्टवुड का अंध-राष्ट्रवाद

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क्लिंट ईस्टवुड राष्ट्रवादी निर्देशक हैं शायद यही वजह है कि ये नहीं देख पाए कि इराक में अमेरिका एक घुसपैठिया देश था न कि मुक्तिदाता।

अमीरकन स्नाइपर एक असली स्नाइपर क्रिस काइले की कहानी है. मीडिया में काइले की ख्याति कथित तौर पर सबसे अधिक हत्याएँ करने वाले स्नाइपर के रूप में है. फ़िल्म का विषय निर्देशक क्लिंट ईस्टवुड के अनुकूल ही है. ईस्टवुड की ज़्यादातर सफल फ़िल्में किसी न किसी के जीवन-चरित्र पर आधारित हैं. उन्होंने मिस्टिक रीवर, इनविक्टस, ग्रैंड टॉरिनो, मिलियन डॉलर बेबी, चेंजलिंग जैसी सफल और संवेदनशील फ़िल्में बनाई हैं. लेकिन यह फ़िल्म एक ऐसे परिघटना के बारे में है जिसके हम सब गवाह रहे हैं. इसलिए इस फ़िल्म को देखकर इसकी पटकथा, अदाकारी, निर्देशन इत्यादि से ज़्यादा ज़हन में इसके एकांगी और छल भरे होने का अहसास होता है.

काइले इराक में अमरीकी हमले के दौरान इराकियों को मारते थे. काइले को लगता था कि वो अपने देश की इराक से रक्षा कर रहे हैं! काइले तो एक सैनिक थे उन्हें शायद नहीं पता रहा हो लेकिन र्ईस्टवुड जैसी संवदेनशील और राजनीतिक रूप से जागरूक फिल्मकार को ये याद रखना चाहिए था और दर्शकों को बताना चाहिए था कि इराक़ से अमरीका को कभी कोई ख़तरा नहीं था.

अमरीका ने यह कहकर इराक़ को एक ख़तरे के रूप में पेश किया कि इराक़ के पास व्यापक विनाश कर सकने वाले रासायनिक हथियार हैं. बाद में ये दावा झूठा निकला लेकिन तब तक इराक़ एक देश के रूप में धूलधूसरित हो चुका था. विभिन्न आंकड़ों के अनुसार डेढ़ से दो लाख इराक़ी अमरीकी हमले में मारे गए हैं. जिनमें आधे से ज़्यादा आम नागरिक थे. मरने वालों के अलावा अमरीकी हमलों के कारण लाखों लोगों को विकलांग, बेघर और बर्बाद होना पड़ा. लेकिन क्यों? इसका जवाब न काइले के पास है, न ही ईस्टवुड के पास.

अमरीकी विद्वान नॉम चॉमस्की ने अमरीकी मीडिया में इस फ़िल्म की वाहवाही की कड़ी आलोचना की है. चॉमस्की मानते हैं कि इराक़ पर अमरीका का हमला दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी हमला माना जा सकता है. चॉमस्की ने सही रेखांकित किया है कि यह अमरीकी प्रशासन की एक प्रोपगैंडा फ़िल्म है. हो सकता हो कि ईस्टवुड ने सीधे तौर पर ऐसा न किया हो लेकिन अब यह बात छिपी नहीं है कि सीआईए अमरीकी प्रोपगैंडा को बढ़ावा देने के लिए फ़िल्मों में पैसा लगाता रहा है.

अमरीकी स्नाइपर बार-बार इराक़ियों को सैवेज कहता है. शायद उसे पता ही नहीं कि जबकि अमरीका को कोई जानता नहीं था तब इराक़ी सभ्य थे. पूरी फ़िल्म में कहीं भी इस बात का ज़िक्र नहीं है कि जिन इराक़ियों की हत्या की जा रही है वो अपनी ज़मीन, अपने परिवार को बचाने के लिए लड़ रहे हैं. अगर इराक़ में कोई हमलावर है तो वो अमरीकी सैनिक हैं, न कि कोई इराक़ी. आश्चर्य नहीं कि ब्रितानी बिस्मिल, अशफ़ाक, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु जैसों को आतंकी कहते थे. जिसे भारतीय आज़ादी की पहली लड़ाई कहते हैं, उसे अंग्रज 1857 का विद्रोह कहते हैं.

फ़िल्म में अमरीकी स्नाइपर को एक बेहद संवेदनशील और पारिवारिक व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है. हो सकता है कि इसमें सच्चाई हो लेकिन फ़िल्म यह दिखाना भूल जाती है कि ये स्नाइपर दुनिया के सबसे ताक़तवर सेना के हमलावर दस्ते का एक अंग था. उसने दो सौ से ज़्यादा लोगों को चुन-चुन कर मारने का दावा किया है और वो उस हमले का साझेदार था जिसमें डेढ़ लाख से ज़्यादा लोग मारे गए और कई लाख विकलांग और बेघर हुए होंगे. स्नाइपर की पत्नी को इस बात का तनाव है कि उसके बच्चों को पिता के बिना बचपन गुजारना पड़ रहा है लेकिन ईस्टवुड को इस बात से जरा भी तनाव नहीं हुआ कि इस स्नाइपर और उसके सैनिक साथियों को वजह से लाखों इराक़ी बच्चों को आजीवन अपने माता-पिता के बग़ैर जीवन गुज़ारना पड़ेगा. वो भी ऐसे देश में जिसकी सभी बुनियादी सुविधाओं को अमरीकी ने बर्बाद कर दिया.

फ़िल्म में अमरीकी स्नाइपर ह्मूमनाइज(मानवीय) करने की बार-बार कोशिश की गई है. अमरीकी स्नाइपर एक बार एक बच्चे को महज इसलिए गोली मार देता है क्योंकि वो अमरीकी टैंक पर बम फेंकने की कोशिश करता है. स्नाइपर एक दूसरे बच्चे को गोली नहीं मारता है कि क्योंकि वो बच्चा अंतिम समय पर अमरीकी सैनिकों पर ताना हुआ रॉकेट फेंक कर भाग जाता है. ईस्टवुड ने स्थापित करने की कोशिश की है कि स्नाइफर बेहद मानवीय है और यह उसके काम की बाध्यता है कि उसे एक बच्चे को मारने पड़ता है, जो अमरीकी सैनिकों को लिए ख़तरा बन सकता था. लेकिन उसने उस बच्चे को नहीं मारा जो अमरीकी सैनिकों के लिए ‘ख़तरा’ नहीं बना. एक शर्मनाक स्थापना है. जो दर्शक अमरीकी नहीं होंगे और अपने दिमाग़ पर जरा भी जोर देंगे उन्हें दोनों बच्चे स्नाइपर से बहादुर प्रतीत होंगे. भारतीयों को ऐसे बच्चे खुदीराम बोस जैसे लगेंगे. जो बच्चे रोज अमरीक सैनिकों के हाथों अपने घर-परिवार, यार-दोस्तों, पास-पड़ोस के लोगों को मारे जाते देखेंगे क्या उनके मन में अमरीकी सेना के लिए बेइंतहा नफ़रत नहीं होगी!

ईस्टवुड अमरीका के हमलावर विदेश नीति के आलोचकों में माने जाते हैं लेकिन उन्होंने एक ऐसी फ़िल्म बनाई है जो उन सैकड़ों फ़िल्मों से बिल्कुल अलग नहीं है जिनमें अमरीकी अपराधों को महिमामंडित करके दिखाया जाता है. विभिन्न देशों में हुए तख्तापलटों में अमरीकी प्रशासन और ख़ुफ़िया एजेंसियों की खूनी भूमिका को छिपाया जाता है. दो देशों के बीच लड़ाई में एक देश का शहीद दूसरे देश का खलनायक हो सकता है लेकिन एक कलाकार से राजनीतिज्ञों से ज़्यादा नैतिक होने की उम्मीद की जाती है. अफ़सोस है कि ईस्टवुड इस उम्मीद पर खरे नहीं उतरे हैं.

इस फ़िल्म को 87वें एकैडमी अवार्ड में छह वर्गों में नामांकन मिला है. हॉलीवुड के प्यारे ‘अमरीकी हत्यारे’ को कितने ऑस्कर मिलेंगे ये तो अगले कुछ दिनों में पता चलेगा लेकिन अमरीकी जनता और मीडिया का दिल वो पहले ही जीत चुका है क्योंकि वो ‘मोस्ट लेथल स्नाइपर इन अमरीकन मिलिट्री हिस्ट्री’ है. अमरीकी मीडिया और जनता इस वक़्त इस्लामिक स्टेट की आतंकी कार्रवाइयों के प्रति हैरत और ग़ुस्सा जाहिर करने में व्यस्त है. लेकिन थोड़ी फुरसत निकालकर उसे यह भी सोचना चाहिए कि आख़िकार एक ऐसे व्यक्ति, जो घोषित तौर पर अमरीका के सैन्य इतिहास का सबसे जानलेवा हत्यारा कहा जा रहा है, उससे अमरीकी इतना प्यार क्यों करते हैं!