रंगून: ऐसी फिल्में बनाकर विशाल भारद्वाज अपनी छवि खुद मिट्टी में मिला देंगे

विशाल भारद्वाज ने ब्लू अम्ब्रेला, मकबूल, ओमकारा जैसी फिल्मों से जो हिन्दी फिल्म प्रेमियों की नजर में जो छवि बनायी थी उसे वो सात खून माफ, मटरू की बिजली का मनडोला और रंगून जैसी फिल्मों से खत्म करने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। विशाल भारद्वाज की फिल्मों का कैनवास जितना बड़ा होता जा रहा है उनका क्राफ्ट उतना ही छोटा होता जा रहा है। रंगून के ट्रेलर और पीआर एजेंसियों द्वारा मीडिया में प्लांट की गयी खबरों की वजह से दर्शकों को इस फिल्म काफी उम्मीद थी जो हाल में जाने के कुछ ही देर बाद टूट जाती है। आपने ऐसी फिल्में कम ही देखी होंगी जिनमें आपको सभी एक्टरों की एक्टिंग अच्छी लगी लेकिन फिल्म आपको चाट जाए। ऐसी फिल्म न देखी हो तो रंगून जरूर देखें।

रंगून बॉक्स ऑफिस पर औसत कमायी ही कर पा रही है। फिल्म शुक्रवार (24 फरवरी) को रिलीज हुई और रविवार तक सिनेमा हाल आधे से ज्यादा खाली नजर आने लगे। फिल्म रिलीज होने के बाद पहले ही सन्डे सिनेमाघरों का खालीपन बगैर कहानी की फिल्म बनाने का जोखिम लेने के नतीजा है। फिल्म की दूसरी बड़ी कमजोरी इसका लचर गीत-संगीत है। फिल्म के ज्यादातर गाने गुलजार ने लिखे हैं, संगीत खुद विशाल ने दिया है। गुलजार और विशाल की जोड़ी से जनता को इससे बेहतर गीत-संगीत की उम्मीद होती है। लेकिन रंगून का कोई भी गाना दो मिनट से ज्यादा जहन में नहीं टिक पाता।

कंगना रनौत, शाहिद कपूर और सैफ अली खान ने फिल्म में अच्छा अभिनय किया है। या ये कह लें कि विशाल ने अपनी हर फिल्म की तरह रंगून में भी सभी कलाकारों से अच्छा काम कराया है लेकिन व्यर्थ। रंगून की बे-सिर-पैर की कहानी बीच में थोड़ी देर के लिए उठती है लेकिन क्लाइमेक्स आते-आते इस स्तर तक गिर जाती है कि बहुत ही सीरियस अंत भी हास्यास्पद लगने लगता है।

विशाल भारद्वाज ने अपने प्रशंसकों के साथ ही आजाद हिन्द फौज (इंडियन नेशनल आर्मी) के साथ भी नाइंसाफी की है। आजाद हिन्द फौज को लेकर विशाल ने जो काल्पनिक कहानी बुनी है वो काफी भौंडी है। इस कहानी से न तो सुभाष चंद्र बोस और न ही उनकी सेना का कुछ लेना-देना है। फिल्म के रिलीज से पहले कंगना के एक्शन हिरोइन की भूमिका को नाडिया हंटरवाली से प्रेरित बताया जा रहा था। अगर ये सच भी है तो इस प्रेरणा का भी काफी छिछला हश्र हुआ है। विशाल की फिल्म से बस इतना ही साबित होता है कि हिन्दी सिनेमा के पास अभी ऐसा कोई निर्देशक नहीं है जो ऐतिहासिक पृष्ठभूमि वाली कोई फिल्म बना सके।