स्लूथ 1972: अमीर अ के पास गरीब ब को रास्ते से हटाने का एक ही रास्ता है

Sleuth 1972, Film Review, Joseph L Mankiewicz

 संदीप मुदगल

अ और ब इस भौतिकवादी जगत के देखे-भाले चरित्र हैं। परंतु दोनों में कुछ बुनियादी अंतर है। अ अमीर है और ब गरीब, अ अल्पसंख्यक है और ब बहुसंख्यक। इसलिए स्पष्ट है कि अ को ब फूटी आंख नहीं भाता, वह उसे समाप्त कर देना चाहता है, लेकिन मजबूर है, क्योंकि वह वृद्ध और शारीरिक दृष्टि से कमजोर है, जबकि ब युवा और बलिष्ठ है। कुछ और भी कारण हैं अ की इस नापसंदगी के जो सीधे उसके अहंकार से जुड़े हैं और इस अहंकार का कारण है उसकी भौतिक समृद्धि। लिहाजा अ के सामने अब एक ही रास्ता है – राजनीति। वह राजनीति के जरिए खेल खेलता है और अपनी नफरत को अंजाम देता है।

लेखक एंथनी शेफर ने एक नाटक लिखा था, स्लूथ। यह नाटक अपने आप में अनोखा है। समृद्ध और संघर्षशील का उपरोक्त दुनियावी टकराव इस नाटक का मूलाधार है। कहानी दो पात्रों की है और नाटक में दो ही पात्र नजर आते हैं, तीसरा नहीं। पहला पात्र धनी है, वह रोमांच कथाओं का एक सफल लेखक है, परंतु वृद्ध है। वहीं दूसरा पात्र एक संघर्षशील युवा है। वह धनी व्यक्ति की युवा पत्नी से प्रेम करता है, वह युवती भी उसे चाहती है (नाटक में युवती नहीं दिखाई जाती), इसकी जानकारी उसके पति को भी है। एक दिन धनी व्यक्ति उस संघर्षशील युवा को अपने यहां बुलाता है ताकि उसकी पत्नी के बाबत साफ बातें कर ली जाएं। वह युवा आता है और दोनों में लंबी बातचीत होती हैं। बातों-बातों में वह धनी लेखक युवा को उसकी गरीबी का अहसास कराता है और कहता है कि यदि वह उसकी पत्नी के साथ जिंदगी बसर करना चाहता है तो उसे चाहिए होगी बेहिसाब दौलत।

युवा उसकी बातों में आ जाता है। धनी उसे पैसा बनाने का एक आसान रास्ता बताते हुए कहता है कि वह उसके घर में भेस बदलकर चोरी करे! चोरी में घर में पड़े जेवरात जाएंगे और धनी व्यक्ति बाद में उन आभूषणों की बीमा राशि वसूल लेगा, इस तरह सब फायदे में रहेंगे। युवा ऐसा ही करता है, सबकुछ घर के मालिक यानी उस धनी व्यक्ति की आंखों के सामने होता है, एक झूठा लेकिन बेहद रोचक खेल! परंतु चोरी हो जाने के ऐन बाद धनी व्यक्ति युवा को उसकी औकात बताते हुए गोली मार देता है। यह नाटक का पहला हिस्सा है।

लेकिन वह युवा मरता नहीं, क्योंकि गोली नकली थी। और यह उस धनी व्यक्ति का ‘खेल’ था जो युवा को अपनी बराबरी पर किसी सूरत नहीं देख सकता था। बहरहाल, कुछ दिन बीतते हैं और एक उम्रदराज पुलिसवाला उस धनी लेखक के दरवाजे पर दस्तक देता है और कहता है कि वह युवा कुछ दिनों से गायब है और आखिरी बार उसे यहीं आते हुए देखा गया था। धनिक कुछ देर को तनाव में आता है, लेकिन अपने होश-हवास पर काबू रखते हुए सच-सच सारी कहानी पुलिसवाले को बता देता है, और उसका फैसला जानना चाहता है। अपनी तसल्ली के लिए पुलिसवाला घर की तलाशी लेता है और उसे वहां उस युवा के कपड़े और खून के निशान मिलते हैं। अब उस रईस की चालबाजी ठंडी पड़ती दिखती है, उसके पास अपने बचाव में सिवाय बातों के और कुछ नहीं है, जिन पर पुलिसवाले को यकीन नहीं होता और वह उसे गिरफ्तार करने का प्रयास करता है। यह देख रईस विरोध करता है परंतु हाथापाई के दौरान आसानी से काबू आ जाता है। उसके पसीने छूटता देख वह पुलिसवाला अपना असली रूप उसे दिखाता है……. दरअसल, यह इस खेल की दूसरी बाजी होती है जो प्राकृतिक तौर पर उस युवा के ही हाथ आनी चाहिए थी, लेकिन……

इसके बाद एक तीसरी बाजी खेली जाती है, यह भी बहुत लंबी होती है, जिसमें जीतने वाला हार भी सकता है और हारने वाला जीत सकता है! तो क्या होता है उस खेल का अंजाम ? बहुसंख्य सोच की दृष्टि से देखें तो वर्ग के आधार पर दो विपरीत ध्रुवों पर खड़े दो सर्वदा भिन्न तबियत वाले व्यक्तियों के बीच में अगर कोई संबंध हो भी सकता है तो वह मूल रूप से बिल्कुल ऐसा ही होगा! मानवीयता की दुहाई देकर बेशक कुछ लोग इस तथ्य से आंख मूंदना चाहें, लेकिन आर्थिक आधार पर बंटी इस दुनिया के मानवीय संबंधों का मूल कुछ ऐसी ही सच्चाई को हमारे सामने रखता है।

साथ ही मानव दर्शन की वाम शाखा का बुनियादी निचोड़ भी उपरोक्त शब्दों में निहित है। हैरानी नहीं कि वाम दर्शन का यह सच मूल रूप से किसी भी दक्षिणपंथी समाज का भी सच होता है क्योंकि अमीर-गरीब की लड़ाई हर कहीं नजर आती है, वह भारतीय समाज हो या मौजूदा कट्टरवादी ईरानी समाज, चीन का हल्का पड़ता वामपंथी साम्राज्य हो या पूंजीवादी अमेरिका का ऊपर से हरा-भरा दिखता रूप। दो सर्वदा विपरीत सोच वाले जीव भी अक्सर एक ही वस्तु के पीछे दौड़ते दिखते हैं, भौतिक सुख। आरामदेह जीवन की चाह किसे नहीं होती, लेकिन उसके लिए जुगाड़ आसानी से हासिल नहीं होता। कथित लोकतंत्र में समाज पर कानून का पहरा रहता है और उस कानून को बनाने वाला तेज-तर्रार जीव बातों का माहिर है, राजनीतिक अखाड़े में वह बुद्धिबल के सहारे टिका रहता है, चूंकि शिक्षा का ‘अधिकार’ भी उसी के पास है, उसके पास खबरी हैं, पूरा सरकारी अमला है, वह बड़ी योजनाओं का सिरमौर बना रहता है, इन्हीं योजनाओं के सहारे वह ‘हरे-भरे भविष्य’ की बात करता है। परंतु यह हरा-भरा भविष्य किसके हिस्से आता है ? आमजन का भी कुछेक प्रतिशत ही इस भविष्य का लाभ उठा पाता है, शेष के हाथ आती है केवल अंतहीन उम्मीद।

सन् 1972 में निर्मित फिल्म ‘स्लूथ’ का निर्देशन जोसेफ मैन्केविक्ज ने किया था। यह उनकी निर्देशित अंतिम फिल्म भी थी। वह इससे पूर्व कई ऐसी फिल्में बना चुके थे जिन्हें सिनेमाई नजरिए से बहुत आदर के साथ देखा जाता है। 1953 में निर्मित ‘जूलियस सीजर’ को उन्होंने एक बहुत गंभीर राजनीतिक चित्र के रूप में प्रस्तुत किया था। इस फिल्म की खासियत थी कि इसमें मुख्यतः शेक्सपियराना ब्रिटिश अभिनेताओं के बीच अमेरिकी अभिनेता और आधुनिक यथार्थवादी अभिनय के सम्राट मार्लन ब्रांडो को मार्क एंटनी के रूप में देखा जा सकता है। यह कास्टिंग इस दृष्टि से भी रोचक है क्योंकि ‘स्टार’ दर्जा प्राप्त कर चुके अभिनेता जूलियस सीजर पर निर्मित फिल्म या मंचित नाटकों में अधिकांशतः ब्रूटस का पात्र खेलना ही पसंद करते हैं। परंतु ब्रांडो ने मार्क एंटनी के पात्र को अमर कर दिया था।

बहरहाल, स्लूथ मेन्केविक्ज के फिल्म निर्माण करियर का ‘मैग्नम ओपस’ कही जा सकती है। इस नाटक की कथावस्तु ही कुछ ऐसी है कि वर्ग संघर्ष का पुराना और तनाव देने वाला विचार स्वतः ही सामने आ जाता है। दरअसल, इस नाटक को दो तरीकों से देखा जा सकता है। पहला, जो कि मूल कथानक है – दो व्यक्तियों के बीच का संघर्ष, जो दोनों के निजी स्वार्थ से जुड़ा है। दूसरा पक्ष है इसी संघर्ष को एक व्यापक फलक पर देखना। यदि ऐसा कोई संघर्ष किसी अंजान कारणवश दो असमान सैन्य ताकत वाले देशों के बीच हो तो उसकी परिणति क्या होगी ? जाहिर है कमजोर राष्ट्र छद्म युद्ध का सहारा लेते हुए एक बड़ा ‘विस्फोट’ करने की ताक में रहेगा। और उस विस्फोट की कल्पना ही की जा सकती है! नाटक के कथानक का मूल तत्व स्वार्थ आधारित है जो परोक्ष तौर पर एक औरत के कारण सामने आता है, परंतु इसके आर्थिक कारण भी स्पष्ट नजर आते हैं।

स्लूथ पर आज तक दो फिल्में बन चुकी हैं। यहां बात 1972 में बनी पहली फिल्म की हो रही है, जिसमें लाॅरेंस ओलिवियर और माइकल केन ने अभिनय किया था। लाॅरेंस ओलिवियर को अभिनय के इतिहास संभवतः सबसे बड़ा अभिनेता कहा गया है। कारण – वह शेक्सपियराना मंचीय शैली की सबसे बड़ी शख्सियतों में से एक थे। स्लूथ उनके फिल्मी अभिनय के सबसे बड़े प्रमाण में से एक है। फिल्म में उन्होंने बहुत हील-हुज्जत के बाद अभिनय किया था, लेकिन सबसे उम्दा संवाद और भाव-भंगिमाएं उनके हिस्से आई हैं। एक युवा को अपने जाल में फंसाते हुए उनके चेहरे के ‘अहंकारी’ भाव देखते ही बनते हैं। ऐसा लगता है कि इन भावों के मुखौटों को जल्दी-जल्दी बदलते हुए उन्हें कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता, क्योंकि अभिनय की पंक्ति उन्हीं से तो शुरू होती है। उनके मुकाबले खड़े माइकल केन को उस समय फिल्मी अभिनय करते हुए कुछ ही वर्ष हुए थे। फिल्म में उनके हिस्से अधिकांशतः मौन संवाद आए हैं। एक अपेक्षाकृत निम्न वर्गीय व्यक्ति जो एक रईस से मिलने उसके महलनुमा घर में आया है, को रास्ता तलाशने में ही समय लग जाता है। फिल्म की शुरुआत में निर्देशक धनी व्यक्ति के आलीशान बंगले के अहाते में निर्मित विशाल उद्यान में ऊंची-ऊंची करीनेदार झाड़ियों की भूलभुलैया में घूमते युवा को दिखाता है, जो रास्ता तलाश रहा है। यह निर्देशकीय कौशल का नमूना है। फिल्म की शुरुआत में ही भूलभुलैया के रूप में निर्देशक चेतावनी स्वरूप दर्शकों की ओर एक पहेली उछालता है।

माइकल केन का चरित्र धीरे-धीरे अपनी रफ्तार पकड़ते हुए अपनी मनःस्थिति और अपने साथ चली जा रही चालबाजियों के प्रति सचेत होता है। वह एक महलनुमा घर में कुछ उलझन में है, लेकिन उसका प्रतिद्वंद्वी शुरुआत में मैत्रीपूर्ण व्यवहार करता है, तो उसकी झिझक कुछ कम होती है। लेकिन वह अपने प्रतिद्वंद्वी के मुखौटे के पीछे के असली रूप को पहचान नहीं पाता और धीरे-धीरे उसकी साजिश का शिकार बनता जाता है।

फिल्म अभिनय की दृष्टि से भी देर तक याद रहती है। इसका कारण कथानक में दो ही चरित्रों की मौजूदगी है। केवल दो पात्र, जो एक दूसरे से पूरी रफ्तार से टकरा रहे हैं, स्थानाभाव (क्लास्ट्रोफोबिया) का डर अपने साथ-साथ दर्शक के अंदर भी उपजाते हैं। बेशक उनकी रंगभूमि एक विशालकाय बंगला है, जिसके अंदर-बाहर खूब जगह है, लेकिन वैचारिक और भौतिक टकराव के सामने एकड़ों जमीन भी कम पड़ती है। दो चरित्रों का इतना भीषण टकराव स्थानाभाव की ज़द में दर्शक को भी ला खड़ा करता है और उसे अपने कंधे दूसरे के साथ टकराते महसूस होते हैं।

फिल्म का कलापक्ष क्या है, यह एक जटिल प्रश्न है ? यूं तो दोनों प्रमुख पात्रों की टक्कर को ही फिल्म का कलापक्ष कहा जा सकता है, लेकिन निर्देशक अपनी ओर से दर्शकों को कुछ छूट भी देता है। रोमांच कथाओं के लेखक के बंगले की आंतरिक साज-सज्जा गैर-पारंपरिक है। उसकी बैठक में अजीबोगरीब किस्म के खिलौनेनुमा बुत खड़े हैं। दोनों पात्रों के बीच ज्यादातर बातचीत इसी बैठक में होती है, हालांकि पूरा घर उनके खूनी खेल का गवाह बनता है, लेकिन बैठक की बातचीत के दौरान आने वाले किसी भी जरूरी मोड़ पर एक पल को कैमरा किसी एक बुत की भंगिमा को पकड़ता है, जो खेल के तनाव में शामिल दिखता है। यह अतिश्योक्तिपूर्ण रोमांच भी खेल में रचा-पगा नजर आता है (जरूरत केवल दर्शक द्वारा ऐसे दृश्यों को अपनाए जाने की है)। यही अजीबोगरीब बुत फिल्म का कलापक्ष हैं, जिन्हें अंततः खेल की पहली बाजी का शिकार बने युवा को अपने पक्ष में करना पड़ता है! इनके अतिरिक्त कैमराग्राफी या छायांकन में ऐसा कुछ असाधारण नहीं है, जिस पर गहराई से बात हो। चारदीवारी में फिल्मायी गई अन्य फिल्मों सरीखा चुस्त कैमरावर्क यहां भी दिखता है। दरअसल, रोमांच कथाओं के धनी लेखक के बंगले में ऐसी ही अनोखी चीजों का जमावड़ा दिखाया गया है, जिसका मनोवैज्ञानिक आकलन दर्शक तो जल्दी से कर लेता है, परंतु उसका प्रतिद्वंद्वी इसमें चूक जाता है!

दूसरी ओर, फिल्म के कलापक्ष के नाम पर अभिनय को बेशक याद किया जा सकता है, जो अद्वितीय है। लाॅरेंस ओलिवियर का सहज और मंझा हुआ अभिनय और माइकल केन का हर तरह से नौसिखिए पात्र को उसी के रंग में उकेरने का प्रयास लाजवाब है। दोनों अभिनेताओं को उस वर्ष आॅस्कर के लिए भी नामांकित किया गया था। इसमें शक नहीं कि ओलिवियर ने अपने चरित्र को असाधारण गहराई दी है, वह फिल्म का प्रमुख पात्र होते हुए भी नकारात्मक है लेकिन नायक है। वह अपने निकट आने वाले हरेक व्यक्ति के साथ ‘खेल’ खेलता है। इस खेल में वह अपनी पत्नी के साथ भी उतना ही क्रूर रहता है, जिसका अंदाजा उसकी बातों से लगाया जा सकता है। उसके शौक भी उसके पेशे की तरह चालबाजियों से लबरेज हैं। वह भूलभुलैया में दूसरों को फंसाता है और जब खुद उसमें जा फंसता है तो गाली-गलौज पर उतर आता है। ओलिवियर का अभिनय यहां बेमिसाल है। पूरी फिल्म उनके कंधों पर टिकी है और माइकल केन अनेक दृश्यों में उनके सहयोगी के रूप में ही नजर आते हैं।

वर्ष 2007 में स्लूथ पुनः निर्मित की गई थी। इसमें स्वयं माइकल केन ने ओलिवियर का पात्र खेला था और ज्यूड लाॅ ने माइकल केन का। कहना न होगा कि यह फिल्म तकनीकी दृष्टि से उत्कृष्ट होते हुए भी उस श्रेणी को नहीं छू सकी थी, जहां 1972 का चलचित्र आज तक याद किया जाता है। माइकल केन दोनों फिल्मों में हैं, और उनका अभिनय दोनों फिल्मों में असाधारण है, लेकिन सिनेमाई परिपूर्णता की दृष्टि से पुरानी स्लूथ का स्थान लगभग किंवदंतीपूर्ण है।