Thappad Review: ‘बस एक थप्पड़ लेकिन नहीं मार सकता’

थप्पड़! अगर आप इस फ़िल्म को स्त्री विमर्श की दृष्टि से देखेंगे बिना समझे तो यह फ़िल्म आपको बहुत अच्छी लग सकती है और लगनी भी चाहिए। लेकिन अगर आप थोड़ी भी सिनेमा और भारतीय समाज की समझ रखते हैं तो आपको यह फ़िल्म बहुत ज़्यादा प्रभावित नहीं कर सकती है।

फ़िल्म में सभी स्त्री पात्र अपने-अपने जीवन संघर्षों से उलझे हुए हैं जिसमें एक अमृता (तापसी पन्नू) भी है। अनुभव सिन्हा ने फिल्म में अमू का जीवन बिलकुल वैसे ही दिखाने की कोशिश की है जैसा कि किसी भी भारतीय स्त्री जो अपना घर संभालती है उसकी होती है।

इसे दिखाने के लिए अमू हर दिन एक ही रूटीन फॉलो करती है। उसके रोज़ के दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं है सुबह उठ कर घर कि खिड़की से लेमन ग्रास तोड़ अपने लिए चाय बनाने से लेकर रात को सोने तक में कुछ नया नहीं है सिवाय इसके कि वो अपने पड़ोस में एक सिंगल मदर शिवानी (दिया मिर्ज़ा) की बेटी को डांस सिखाती है। और उसके इस किरदार को देखकर समझ नहीं आता की अमृता किस जमाने की हाउसवाइफ़ है।

अमू ने शादी से पहले कभी नहीं सोचा था कि वो हाउसवाइफ़ बनेगी लेकिन उसने ये भी नहीं सोचा होता है कि अगर वो हाउसवाइफ़ नहीं बनेगी तो क्या बनेगी। अमू के जीवन में कोई सपने नहीं है जबकि वो एक पढ़े-लिखे घर से आती है उसके पिता हिंदी के प्रोफ़ेसर हैं, ऐसा एक सीन आता है जब वो दिनकर के रश्मीरथी के कुछ पंक्तियाँ कोट करते हैं।

पति की जिंदगी जीने वाली पत्नी

अमू अपने पति विक्रम (पवेल गुलाटी) को खुश रखना चाहती है विक्रम अपने घर के व्यवसाय को छोड़ एक कंपनी में नौकरी करता है और विदेश शिफ्ट होना चाहता है। वो अपने इस सपने को पूरा करने के लिए सालों से मेहनत कर रहा है और सफल भी हो जाता है। अपनी सफलता के लिए वह एक पार्टी भी रखता है और इसी बीच विक्रम अपने ऑफिस और काम के गुस्से में अमू पर हाथ उठा देता है जिसके बाद अमू को अपने साथ हुए सारी ग़लत चीज़ें नज़र आ जाती है। अमू को अपने पूरे जीवन में अगर कुछ समझ आता है तो वो भी एक थप्पड़ के बाद।

फिल्म में हर वर्ग को दिखाने की कोशिश की है और सभी में एक चीज़ कॉमन है वो है स्त्रियों की स्थिति। फिल्म में निम्न वर्ग से लेकर उच्च वर्ग तक सस्त्रियाँ प्रताड़ित हैं। ये सभी ज़रूरी किरदार हैं जो अपनी अलग-अलग समस्याओं को ले कर आते हैं जिसमें सबसे पहले अमू कि मेड सुनीता (गीतिका विद्या) का है जिसके लिए थप्पड़ या अपने पति से मार खाना बहुत ही आमबात है।

सुनीता हर दिन मार खा कर आती है और अमू को बताती है लेकिन अमू उससे ये कभी नहीं कहती की उसका पति ग़लत करता है। वहीं अमू की वकील नेत्रा जो की एक सफल स्त्री है लेकिन उसे उसके पति रोहित जयसिंह (मानव कौल) से उसकी महनत और लगन का कोई क्रेडिट नहीं मिलता बल्कि उसकी मेहनत का सारा क्रेडिट उसकी पति और ससुर (अनिल रस्तोगी) के नाम पर चला जाता है और न ही वो अपनी शादी-शुदा जीवन में खुश है।

एक थप्पड़

नेत्रा को सबसे ज़्यादा प्रभावित फिल्म में अमू करती है। दूसरी तरफ अमू की सास और उसकी माँ है जिन्होनें अपने घर को संभालने में कई समझौते किए हैं और 70 की दसक की माँ की तरह अपने बच्चों की परवरिश की है।

फिल्म में अमू के भाई की प्रेमिका और अमू के पिता सपोर्टिंग रोल में अच्छे से अपने किरदार को निभाती है और अमू के लिए लड़ती है। लेकिन फिल्म के सभी पुरुष पात्र पित्रसत्ता समाज के ही उपज है। लेकिन फिल्म के अंत तक आते आते कुछ बदलाव करते हैं।

फिल्म के कुछ डाइलॉग फिल्म की संवेदनशीलता को बचाए रखते हैं। जैसे कि ‘बस एक थप्पड़ लेकिन नहीं मार सकता’, ‘किसी भी रिश्ते में हम अपना इमोश्नल इनवेस्टमेंट करते हैं वो रिश्ता हुमें यूं ही नहीं मिलता’। थप्पड़ के बाद अमू की चुप्पी आपको थोड़ा परेशान कर सकती है क्योंकि उसके बाद फिल्म में 20 मिनट तक अमृता कुछ नहीं कहती है।

रिश्ते को निभाने में एफर्ट लगता है फिल्म में इस एफर्ट की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ अमू की सर पर दिखती है। विक्रम और अमू का ऐसा एक भी सीन नहीं है जब लगे की दोनों के बीच प्रेम है। अमू के पैर में कई दिनों से चोट है लेकिन वो दवा रात में अकेले लगाती है। अमू अपना पसंदीदा रंग भूल गयी है उसे अपने पति के साथ लंदन में नीले रंग का दरवाज़ा चाहिए जबकि उसका पसंदीदा रंग पीला है । फिल्म इस हद तक ये बताने में सफल साबित हुई है कि अगर इंसान पहले खुद से प्रेम न करे तो उससे कोई प्रेम नहीं कर पता। और एक दिन उसके हिस्से गुस्से में ही सही थप्पड़ आ जाता है।

अमू को थोड़ा खुद से प्रेम करना चाहिए…
लेमन ग्रास तोड़ते हुए खुद के लिए सोचना चाहिए…
बड़े घर कि बहू नहीं डांसर बनने का सोचना चाहिए…