हिन्दी ग़ज़ल, दुष्यंत कुमार की परंपरा और आलोक श्रीवास्तव का सृजन

Dushyant Kumar
दुष्यंत कुमार का गजल संग्रह 'साये में धूप' काफी चर्चित है।

साल 2020 में दुनिया ने रिश्तों को हर एहसास से जिया, इंसानियत को मरते और जन्म लेते देखा है। इस साल के जाने में जब कुछ घंटे बाकी हैं तब एक तारिख पर खड़े होकर मैं इस पूरे साल के एहसासों को लफ्जों में जीना चाहता हूँ। लफ्ज़ जो अकेलेपन में मेरे, आपके हम सबके साथी रहे। जब हम लॉक डाउन में तन्हा थे यही अल्फ़ाज़, शेर, ग़ज़ल थे जो हमे हौसला देते रहे। इस तारीख के साथ तो ये इत्तेफाक है की इस दिन तो ऐसे शख्स अपनी आमद और रवानगी दर्ज कराते हैं जिनको रिश्तों का शायर कहा जाता है। वो शख्स हैं – दुष्यंत और आलोक।

30 दिसंबर को हिंदी ग़ज़ल को नया मुकाम और नया रूप देने वाले दुष्यंत गोलोकवासी हो गए। इसी तारीख को ग़ज़ल का नया नाम ज़मीन पर उतरा वो था आलोक। ये इत्तेफाक है कि रिश्तों को संभालने और अपनी ग़ज़लों से दुनिया को आईना दिखाने वाले ग़ज़लकार दुष्यंत कुमार का जाना और रिश्तों के शायर का खिताब पा चुके आलोक श्रीवास्तव का इस दुनिया में आना एक ही तारीख को हुआ। लेकिन संयोग केवल इतना भर नहीं है। नामवर सिंह ने यूं ही नहीं कहा होगा कि आलोक श्रीवास्तव दुष्यंत की परंपरा के शायर हैं। बल्कि उनकी शायरी में वो दर्द, टीस और संदेश दिखाई भी देते हैं जो विरासत में दुष्यंत उन जैसे तमाम शायरों के लिए छोड़ गए हैं।

मैं दुष्यंत को इसलिए याद करता हूँ कि वो मूलतः मेरे ही गृह जनपद मुरादाबाद के पास बिजनौर जिले के थे। बिजनौर की जमीन अपने बलिदानी तेवर के लिए जानी जाती है। इसका इतिहास गवाह रहा कि उसने हमेशा गलत के खिलाफ आवाज उठाई। ऐसे जमीन का सुपूत होने के नाते दुष्यंत की ग़ज़लों में ये तेवर बोलना लाजमी था। एक और रिश्ता दुष्यंत से यूं जुड़ता है कि वह मेरे शहर मुरादाबाद के ही तत्कालीन हिस्सा रहे चंदौसी में पढ़े-पले-बढ़े। उनकी शायरी का सफर चंदौसी से शुरू हुआ। दुष्यंत के जिक्र के वक्त हम चंदौसी को कम ही याद करते हैं। लेकिन यहां बताना जरूरी है कि चंदौसी के एसएम इंटर कॉलेज से उन्होंने अपनी माध्यमिक शिक्षा पूरी की। 1950-54 तक वह चंदौसी में।रहे। सितंबर 1949 को यहीं राजेश्वरी जी से उनका विवाह हो गया। दुष्यंत कॉलेज मैगजीन में उर्दू नाम से लिखा करते थे। उसके बाद उन्हें मैगजीन का संपादन करने की जिम्मेदारी दे दी गई। चंदौसी पहली बार तभी उनकी ग़ज़लों से परिचित हुआ। जिस मशहूर शेर को दुनिया गुनगुना रही है वो चंदौसी के इसी एसएम कॉलेज की मैगजीन में सबसे पहले प्रकाशित हुआ।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरा मकसद है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

इसके बाद दुष्यंत जी ने मुरादाबाद से बीएड किया। किरतपुर में पहली नौकरी की। फिर कुछ समय मुरादाबाद में रहने के बाद आकाशवाणी दिल्ली में नौकरी की।

ये तो रही दुष्यंत से करीबी रिश्ते की बात। अब बात करेंगे उनकी काव्य परंपरा की। दुष्यंत का तेवर केवल दर्द को नहीं गाता, अंगार उगलता है। दुष्यंत का मतलब उस हर दुख को बयान करना है जो समाज में किसी भी स्तर पर है। वो चाहें व्यवस्‍था हो, समाज हो, परिवार हो या व्यक्तिगत तृष्‍णाएं।

यहाँ तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा

और

कई फ़ाक़े बिता कर मर गया, जो उसके बारे में
वो सब कहते हैं अब, ऐसा नहीं, ऐसा हुआ होगा

दुष्यंत जिन दिनों अपना काव्य सृजन कर रहे थे उन दिनों देश कई महत्वपूर्ण मसलों से गुजर रहा था। भारत की आजादी को उन्होंने अपने पूरे होश में देखा। उसके बाद साम्यवाद की चाटुकारिता, ईमानदारी की हत्या और नए भारत में मरती भारत की पुरानी परंपराएं। जो वादे आम आदमी से किए गए थे, वो पूरे नहीं हुए थे। यही वजह थी कि यत्र-तत्र उनकी शायरी में विद्रोह देखने को मिलता है।

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिए
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए

लेकिन जब ये न हो सका तो दुष्यंत ने कहा –

हो गई है पीर पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
आज ये दीवार पर्दों की तरह हिलने लगी
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए
हर सड़क पर हर गली में हर नगर हर गाँव में
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना मिरा मक़्सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए

इत्तेफाक रहा कि दुष्यंत 30 दिसंबर को उस वर्ष इस दुनिया से चले गए जब देश ने इमरजेंसी के दौर को देखना शुरू किया। यदि दुष्यंत और जीते तो मुमकिन था ऐसे मुद्दे पर उनका और मुखर चेहरा दुनिया को और खासकर हिंदुस्तान के हुकमरानों को देखने को मिलता।

मैंने पहले ही लिखा 30 दिसंबर एक तारीख है जहां ग़ज़ल चलती रही। दुष्यंत अपने आखिरी वक्त में मध्यप्रदेश के भोपाल में जा बसे थे। ये वो शहर था जहां राजा भोज और चंद्रगुप्त विक्रमादित्य न्याय करते रहे। इस शहर से कुछ दूर विदिशा जैसे सांस्कृतिक थाती वाले शहर में 1971 को एक किरन आलोकित हुई जिसे नाम दिया गया आलोक।

जाहिर है दुष्यंत भोपाल में हों और उनके तेवर फिजा में बहकर दूसरों पर असर न डालें ये मुमकिन नहीं हैं। उनके जाने और आलोक के आने के बीच चार साल का वक्त ऐसा रहा जब दुष्यंत के शब्द आलोक जैसे रचनाकरों को बचपन में अपना आशीष दे रहे थे। आलोक श्रीवास्तव ने जब अपना रचनाकर्म शुरू किया जब बेशक दुष्यंत उनके आसपास नहीं थे। लेकिन दुष्यंत की रूह आलोक की लेखनी को तेवर और तरीका दोनों अता कर रहीं थीं। वहीं रहमतें थी जो आलोक की लेखनी से ऐसे शेर फूटे –

ग़नीमत है नगर वालों, लुटेरों से लुटे हो तुम,
हमें तो गांव में अक्सर, दरोगा लूट जाता है।

और

ये नफरतों की सदाएं, वतन का क्या होगा,
हवा में आग बही तो चमन का क्या होगा।
मिटा तो देंगे ये उम्मीद की लकीर मगर,
मेरी जमीन तुम्हारे गगन का क्या होगा।

ग़ज़ल की ये परंपरा अब भी मुतबातिर चल रही है। आलोक अपनी विरासत को बढ़ा रहे हैं। विदिशा का ये कवि हिंदी ग़ज़ल को नई दिशाएं दे रहा है। इसलिए नामवर सिंह ने लिखा कि आलोक दुष्यंत की परंपरा के शायर हैं। मैंने यूं ही नहीं कहा है कि 30 दिसंबर एक तारीख है जिस पर ग़ज़ल चलती रही। इस तारीख से दुनिया को दो तेवर मिले – दुष्यंत और आलोक।

एक रिश्ता है मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश का। एक रिश्ता है एहसास का, एक रिश्ता जो दुष्यंत की शायरी में जीया, एक रिश्ता जो आलोक की शायरी ने दिया। दुष्यंत तुमने जिम्मेदारी दी है कि ग़लत को स्वीकार न करें और स्वर को धीमा न पड़ने दें, तो जहां कहीं से भी तुम्हारी रूह इस पीढ़ी को देख रही है वो महसूस करे कि जिस दौर में मंचों पर कलंदरी, ग़ज़ल के नाम पर कसीदेकारी और नौटंकियां हो रही हैं। वहां आज भी तुम, तुम्हारी परंपरा और तेवर को जिंदा रखने वाले लोग जिंदा हैं। और तुम्हारी परम्परा को आलोकित कर रहे हैं।

हर वक़्त फ़िज़ाओं में, महसूस करोगे तुम,
मैं प्यार की ख़ुशबू हूँ, महकूंगा ज़मानों तक।