सही वक़्त पर सही फ़ैसले का नाम है महेंद्र सिंह धोनी

करियर के ढलान पर भी अगर महेंद्र सिंह धोनी ने रिटायरमेंट की घोषणा नहीं की है, इसका मतलब है कि उनके तरकश में कोई दिव्यास्त्र तो बचा है

हेलीकॉप्टर मैन
क्या रिटायर होंगे धोनी!

यह बात और है कि हम भारतीय पर्याप्त नाशुक़रे हैं और अपने नायकों को तभी तक याद रखते हैं जब तक उनमें चमक रहती है. लेकिन कुछ ग़लती तो हमारे इन नायकों की भी रही ही है. सौरभ गांगुली हों या कपिल देव या फिर कोई भी और मिसाल ले लीजिए, उन्होंने तब तक संन्यास की घोषणा नहीं की, जब तक उनका करिअर घिसता रहा. पर धोनी अब तक तो अपवादों की मिसाल रहे हैं. करियर के ढलान पर अगर उन्होंने रिटायरमेंट की घोषणा नहीं की है, इसका मतलब है कि उनके तरकश में कोई दिव्यास्त्र तो बचा है

पहले एक किस्साः एक दफा धोनी नए खिलाड़ियों को क्रिकेट प्रशिक्षक एम.पी. सिंह से बल्लेबाजी के गुर सीखता देख रहे थे कि कैसे बैकलिफ्ट, पैरों का इस्तेमाल और डिफेंस करना है. सत्र के बाद उन्होंने क्रिकेट प्रशिक्षक एम पी सिंह से कहा कि वे दोबारा उन्हें वह सब सिखाएं. सिंह अकचका गए. उन्होंने कहा, ”तुम इंडिया के खिलाड़ी हो, शतक मार चुके हो और ये सब अब सीखना चाहते हो? धोनी ने सहजता से कहा, ”सीखना जरूरी है, कभी भी हो.” जाहिर है, खेल धोनी के स्वभाव में है और क्रिकेट उनके लिए पैदाइशी बात है.

फिल्म धोनी- द अनटोल्ड स्टोरी का वह दृश्य याद करिए, जब अपनी मोटरसाइकिलों की देख-रेख करते वक्त धोनी वह चीज हासिल कर लेते हैं, जो उनको कामयाब होने से रोक रही थी. धोनी रक्षात्मक खेल के लिए नहीं बने हैं. यही बात फिल्म में भी उनसे कही गई थी, और यही बात शायद धोनी ने इस बार समझ भी ली, पर इस दफा तरीका अलहदा है. और यह उनके बरताव से भी झलकता है.

अपने खेल करियर के उतरार्ध में बढ़ती उम्र का तकाजा था कि धोनी अपनी टाइमिंग पर काम करें. धोनी ने अपने बल्लों (वह अमूमन अपनी पारियों में दो वजन के अलग-अलग बल्लों का इस्तेमाल करते हैं) के वजन को कम कर लिया है. इसी से कप्तानी से हटने के बाद, भले ही वह चापड़ (कसाई वाला बड़ा कटार) न चला रहे हों, पर कमजोर गेंदों पर नजाकत से नश्तर फेरते थे. उनकी टाइमिंग बेहतर हो गई और शायद इस वजह से धोनी वही शॉटस् लगा पा रहे थे, जिसके मुरीद हम सभी रहे हैं.

आपको 2004 के अप्रैल में पाकिस्तान के खिलाफ विशाखापत्तनम के मैच की याद है? नवागंतुक और कंधे तक लंबे बालों वाले विकेट कीपर बल्लेबाज महेंद्र सिंह धोनी ने पाकिस्तानियों को वॉशिंग पाउडर से रगड़-रगड़कर धोया और 123 गेंदों में 148 रन कूट दिए थे. फिर तो आपको 2005 के अक्तूबर में जयपुर वनडे की भी याद होगी, जब श्रीलंका के खिलाफ धोनी ने 145 गेंदों में नाबाद 183 रन बनाए थे. पाकिस्तान के खिलाफ 2006 की फरवरी में लाहौर में नाबाद 72 रन की पारी हो, या फिर कराची में 56 गेंदों में नाबाद 77 रन.

यहां तक कि 2011 विश्व कप फाइनल में भी आखिरी छक्का उड़ाते धोनी का भावहीन चेहरा आपके चेहरे पर मुस्कुराहट ला देता होगा, जब 91 रन की नाबाद पारी के लिए धोनी ने महज 79 गेंदो का सामना किया था. क्या हम उस महेंद्र सिंह धोनी को मिस नहीं कर रहे? क्या आपको लगता है कि मौजूद टीम इंडिया में किसी में इतना सरिया है कि वह धोनी की जगह ले सके?

राजा कोई भी बन सकता है, पर सम्राट के सिंहासन पर बैठने के लिए और उसका ताज पहनने के लिए वैसी शख्सियत और वैसा ही सर चाहिए होता है.

हमने वर्ल्ड कप में दो इंच से चूककर रन आउट होने (यह भी गजब ही था, धोनी विकेटों के बीच गजब के धावक रहे हैं) के बाद मैदान पर उन्हें नहीं देखा. हमने फील्ड (मैदान) की बजाए एक वीडियो में उन्हें दूसरे ही फील्ड (खेत) में नई शुरुआत करते देखा है. पर विश्व कप से पहले हमने जिस धोनी को देखा था, उसका किरदार भी थोड़ा बदला हुआ था. वह तब भी धुनाई के उस्ताद थे, लेकिन कुटाई करारी नहीं थी. अब वह कसाई की तरह चापड़ (बड़ा चाकू) नहीं चला रहे थे, बल्कि अब शल्य चिकित्सक की तरह नजाकत से नश्तर फेर रहे थे.

तब उनका बल्ला ऐसे चल रहा था जैसे चित्रकार कैनवास पर कूची फेर रहा हो. वही धोनी, जिसके लिए हम उनकी कद्र करते आ रहे हैं. धोनी वही माही नजर आ रहे थे, जिसे बरसों पहले हमने देखा था, तब, जब उनके बाल कंधों तक आते थे और थोड़े बरगैंडी कलर में रंगे होते थे. तब धोनी नौजवान थे.

पर साल भर पहले भी हमने यही देखा कि उम्र के चौथे दशक में चल रहे अधेड़ धोनी के हाथों में हरक्यूलीज वाली ताकत बरकरार थी. और धोनी उस ताकत का बखूबी इस्तेमाल कर रहे थे. बस आप ऑस्ट्रेलिया सीरीज के दूसरे वनडे के आखिरी और तीसरे वनडे के 49वें ओवर में उड़े छक्के और चौके में लगी ताकत को याद भर कर लीजिए.

जीत के बाद भी सामान्य बने रहने में धोनी को अगर कोई टक्कर दे सकता है तो वह इकलौता भारतीय है अभिनव बिंद्रा. क्रिकेट में शांत बने रहने की जरूरत नहीं होती, उसके बावजूद धोनी ने अपने धैर्य से अपनी शख्सियत को और आभा ही बख्शी है. यह एक परिपक्व और स्थिर मस्तिष्क का संकेत है, जो इस बात को समझता है कि कामयाबी कोई एक बार में बहक जाने वाली चीज नहीं, इसे लगातार बनाए रखना पड़ता है. ऐसे लोग अतिउत्साहित नहीं होते. वे अपनी खुशी को अपने तक रखते हैं, इस तरह औसत लोगों से ज्यादा उपलब्धियां हासिल करते हैं.

उन्होंने हमेशा आलोचकों का मुंह बंद किया है और सीनियर खिलाड़ियों से अपनी बात मनवाई है. उन्होंने छोटे शहरों की एक समूची पीढ़ी के लिए प्रेरणा का काम किया है. धोनी की कहानी शब्दों में बयां करना आसान नहीं. उनकी पारी अब भी जारी है.

हेलीकॉप्टर शॉट लगाने वाले धोनी ने खुद को कप्तानी छोड़ने के बाद वाली पारी में भी रॉकेट की तरह स्थापित किया था. छक्के लग रहे थे पर गगनचुंबी नहीं थे. पर क्या फर्क पड़ता है ज्यादा जोर से मारो तो भी बाउंड्री के बाहर गिरती गेंद कितनी भी दूर जाए, रन तो छह ही मिलते हैं. सनसनाते चौकों की बरसात से गेंदों के धागे खुलते देख रहे थे. कमेंटेटर उनकी तेज नजर को धोनी रिव्यू सिस्टम कहकर हैरतजदा होते रहे. तो कभी धन धनाधन धोनी कहकर मुंह बाए दे रहे थे. कभी उनको तंज से महेंद्र बाहुबली कहने वाले सहवाग जैसे कमेंटेटर भी खामोश हो गए.

आजतक धोनी ने हमेशा जवाब खामोशी से दिया है. और अब, करीबन साल भर से वह फिर खामोश हैं. मीडिया से दूर. चहल-पहल से दूर. बुरा हो कोरोना का, वरना हम कम से कम आइपीएल में जलवाफरोश धोनी को देख पाते. पर हां, अब धोनी के बोलते बल्ले से शायद जैज़ नहीं, शास्त्रीय संगीत के सुर निकला करते.

हो सकता है आने वाले कुछ महीनों में आइपीएल शुरू हो तो शायद हमें वह धोनी वापस मिल जाए जिसका बल्ला, बल्ला नहीं तोप था, और जिसकी धमक से गेंदबाज़ों के पसीने छूट जाते थे. पैरलल छक्के, और शानदार चौकों (हेलिकॉप्टर शॉट तो बहुत चर्चा में हैं, तो वह तो उम्मीदों की लिस्ट में है ही) की बरसात एक बार फिर शुरू हो, यह दर्शक भी चाहेंगे और खुद धोनी भी.

वक्त के साथ, नायक बदल जाते हैं, बस ईश्वर नहीं बदलते. सचिन की जगह कोई नहीं ले सकता, लेकिन धोनी ने सचिन का नायकों वाला रुतबा हासिल कर लिया था.

हमें याद रहना चाहिए कि जब भी टीम मुसीबत में होती थी तो धोनी बल्ला थामकर आते थे और जब वह वापस पवेलियन लौट रहे होते तो चेहरे पर विजयी मुस्कान चस्पां होती थी.

महेंद्र सिंह धोनी भले ही खेल के लिहाज से उम्रदराज हो गए हों, पर हमें मुस्कुराने के, राष्ट्रीय जश्न मनाने के ढेर सारे मौके उनने दिए हैं. क्या देश इतना नाशुकरा है कि अपने इस नायक को इतनी सम्मानजनक विदाई दे जितना ऑस्ट्रेलिया ने स्टीव वॉ को दिया था?