कमलेश्वर (1932-2007): हिन्दी का हरफनमौला लेखक

कमलेश्वर ने नई कहानी आंदोलन के प्रमुख सूत्रधार, कहानीकार, सारिका के संपादक, आंधी, मौसम और अमानुष जैसी फिल्मों के लेखक, चंद्रकांता टीवी सीरियस के लेखक, दूरदर्शन के महानिदेशक जैसे विभिन्न रोलों को सफलतापूर्व निभाया था।

कमलेश्वर, Kamleshwar
कमलेश्वर सिनेमा, टीवी, पत्रकारिता और कथा साहित्य में सफल लेखक के रूप में जाने गये।

”मेरे लिए कहानी निंरतर परिवर्तित होते रहनेवाली एक निर्णय-केन्द्रित प्रक्रिया है. मैं मनुष्य के लिए राजनीति में विश्वास करता हूं। राजनीति के लिए मनुष्य में नहीं. यह दोनों स्थितियां उतनी विरोधी नही हैं जितनी कि आज के समय-संर्दभ में बन गई हैं और जो स्थिति आज है वही यर्थाथ है. अतंत: सब ठीक साबित हो सकता है पर मनुष्य को कितना छला जाता है, यह नजरअंदाज नही किया जा सकता है. यातनाओं के जंगल से गुजरते मनुष्य की इस यात्राओं के जंगल से गुजरते मनुष्य की इस महायात्रा का जो सहयात्री है वही आज का लेखक है. सह और समान्तर जीनेवाला सामान्य आदमी के साथ.” 
– कमलेश्वर

‘गैरों से मिलना तो खैर मुमकिन है, अपनी हस्ती से मुलाकात बुहत मुश्किल है’. ये बात कमलेश्वर ही कह सकते हैं. कमलेश्वर का आज जन्मदिन है. 6 जनवरी 1932 में पैदा हुए कमलेश्वर के बिना आधुनिक हिंदी साहित्य का परिचय अधूरा मालूम पड़ता है.

आजादी के बाद देश में शुरू हुए नई कहानी आंदोलन में कमलेश्वर सबसे आगे खडे़ नजर आते हैं. उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जनपद में जन्मे कमलेश्वर के लिए कहानियां एक निर्णय-केन्द्रित प्रक्रिया थी. यही वजह है कि उनकी कहानियों के किरदार कल्पना की दुनिया से नहीं, हकीकत की दुनिया से निकले अधिक नजर आते हैं. मैनपुरी में आज भी उनका पुराना मकान मौजूद है. जहां कमलेश्वर ने कहानियां लिखना आरंभ किया. मकान का ऊपरी कमरा मानो आज भी कमलेश्वर की मौजूदगी का अहसास कराता है. कमलेश्वर ने अपनी कहानियों के अनगिनत किरदार इसी मकान में सोचे थे, जिन्हे बाद में उन्होने पन्नों पर दर्ज कर दिया.

कमलेश्वर के बचपन की बात करें तो उनके पिता की मौत तभी हो गई थी जब वह तीन साल के थे. वे सात भाई बहन थे. जिनमें से पांच की मौत हो गई. मैनपुरी में वे जिस मोहल्ले में रहते थे उसका नाम कटरा मोहल्ला था. कटरे मोहल्ले के इसी मकान में वे अपनी मां के साथ ही रहते थे. उनका बचपन बड़ा ही सूना था. शायद इसी सूनेपन ने उन्हें कहानीकार बनने पर मजबूर कर दिया था.

कमलेश्वर जब 10 में वीं कक्षा में थे, तो देश में भारत छोड़ो आंदोलन ने उनके जीवन पर बड़ा असर डाला. वे उस समय के क्रांतिकारी समाजवादी पार्टी के नेताओं के संपर्क में आ गए और उनकी चिट्टियों को लाने ले जाने का काम करने लगे. 1946 में उन्होने अपनी पहली कहानी लिखी. मैनपुरी के बाद इलाहाबाद शहर ही था जो उन्हे सबसे प्यारा था. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिंदी से एमए की पढ़ाई पूरी और यहीं से वे नई कहानी आंदोलन से जुड़े.

कमलेश्वर की कहानियों की खास बात ये थी कि उनकी कहानियों के पात्र आम आदमी से जुडे़ थे जो यर्थाथ के बेहद करीब नजर आते हैं. मैनपुरी में बिताए अपने दिनों को वे कभी नहीं भूल पाए. यही कारण रहा कि उनके सभी सफल उपन्यास और कहानियों में मैनपुरी का जिक्र जरूर आता है.

कमलेश्वर कहानीकार तो बड़े थे ही, लेकिन इसके साथ वे संचार की हर विधा के मर्मज्ञ थे. देश में टेलीविजन को एक सार्थक दिशा देने का काम कमलेश्वर ने किया.

इसके साथ ही कमलेश्वर ‘सारिका’, ‘धर्मयुग’, ‘जागरण’ और ‘दैनिक भास्कर’ के संपादक भी रहे. कमलेश्वर ने 12 उपन्यास, 17 कहानी संग्रह लिखे. उन्होंने कई फिल्मों के लिए भी पटकथा और कहानियां भी लिखीं. इसके साथ ही ‘चंद्रकांता’ जैसे सफल धारावाहिक भी लिखे, कमलेश्वर ने साहित्य की हर विधा पर काम किया और सफल भी हुए.