मंसूर उस्मानी : राहत साहब की शायरी और वो खुद हजारों लाखों दिलों में हमेशा के लिए महफूज रहेंगे

मंसूर उस्मानी ने राहत साहब को याद करते हुए कहा कि वे ऐसी शख्सियत थे जिन्हें समय और पीढ़ी में बांधा नहीं जा सकता है.

नहीं रहे राहत इंदौरी
नहीं रहे राहत इंदौरी

 “राहत साहब की शायरी और वो ख़ुद हज़ारों लाखों दिलों में हमेशा के लिए महफ़ूज़ रहेंगे”

लोगों के ख़यालों और जज़्बातों को शब्दों में बांध कर शायरी के जरिये पेश करने वाले, उर्दू शायरी के अज़ीमोशान फ़नकार राहत इंदौरी के निधन पर उन्हें याद करते हुए, राहत साहब के बेहद करीबी रहे लेखक और शायर मंसूर उस्मानी ने कही.

मशहूर शायर राहत इंदौरी ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया है. राहत साहब के बेहद करीबी रहे शायर मंसूर उस्मानी से पत्रकार अभिनव चौहान ने बात की.

मंसूर उस्मानी ने राहत साहब को याद करते हुए कहा कि वे ऐसी शख्सियत थे जिन्हें समय और पीढ़ी में बांधा नहीं जा सकता है.

आगे कहते है “राहत साहब के साथ मेरी बेशुमार यादें हैं. लेकिन इस समय उनके जाने का जो गम है उसने सारी यादों को पीछे छोड़ दिया है.”

उन्होंने बताया कि राहत इंदौरी साहब से उनके जाति ताल्लुकात थे. पारिवारिक ताल्लुकात भी थे. यूं कहें कि हर तरह के ताल्लुकात थे.

वे कहते है “राहत साहब के बिना मैं बहुत अधूरा-सा महसूस कर रहा हूँ, हमारा साथी शायर जो सबका अपनी नज़्मों से दिल जीत लिया करता था, शायरी से लोगों के जीवन में ख़ुशहाली ला देता था, आज वो ख़ुद से हार गया. लेकिन उनकी शायरी और वो ख़ुद हज़ारों लाखों दिलों में हमेशा के लिए महफ़ूज़ रहेंगे.”

बातचीत के दौरान उन्होंने राहत साहब और उनके मुलाकातों का जिक्र किया. मंसूर जी ने बताया कि  जब से मुरादाबाद में जिगर मंच बना तब से राहत साहब वहां मुशायरा सुनाने आते थे. सबसे पहले मंसूर जी ने ही राहत जी को दिसंबर 1980 में मुरादाबाद में हिंदू कॉलेज में बुलाया था. उस समय उस सम्मेलन के संयोजक आमोद कुमार थे.

आगे कहते है “वैसे राहत साहब से पहली बार  मुलाक़ात 1970 में हई थी. लेकिन धीरे-धीरे मुलाक़ातें बढ़ने लगीं. इससे हमारी दोस्ती गहरी होती चली गई. हमारे बीच कभी कोई दरार नहीं आया. मेरी उन्होंने कई जगहों पर तारीफ भी की हैं.ये उनका बड़प्पन था.”

वे कहते हैं “राहत जी मुझसे बड़े ही थे. हमारी पैदइशी में ज़्यादा अंतर नहीं है. मैं 1952 में पैदा हुआ था और वो 1950. मेरे उनके पारिवारिक रिश्ते काफ़ी मजबूत रहे. वो मेरे बच्चों के शादी में आए. मैं भी उनके बच्चों के शादी में गया था. जब भी उन्हें वक़्त मिलता तो वो मेरे घर आया करते थे.”

इसके अलावा साउदी अरब के सम्मेलनों में भी दोनों साथ जाते रहे हैं. कई बार हज भी साथ में अदा की हैं. दो-तीन बार उनकी पत्नी भी उनके साथ आई. जिससे उनके और मंसूर के पारिवारिक रिश्तों को और मजबूरी मिली.

मंसूर जी राहत के जाने के दुख में कहते है “आज मुझे ऐसा लग रहा है मेरे अंदर से कोई चीज़ कम हो गई है. राहत जो शायरी के रूप में ख़ुशबू की तरह फैलती रही पूरी दुनिया में, वो राहत अब उनके शेरों में ही ज़िंदा रहेगी. राहत को लोग आसानी से नहीं भूल पाएंगे और न ही उनकी शायरी को भूल पाएंगे. हमेशा हमारे दिलों में ज़िंदा रहेंगे.”

आगे कहते है “2020 ने दुनिया को बहुत दुःख दिए. बहुत सदमे दिए. बहुत ही मनहूस साल रहा है. बस खुदा से यही दुआ है कि अब रहम करें. ये जो नुक़सान हो रहा है इंसान का और समाज का इस पर रहम खाए खुदा. जो ज़िंदा हैं उनको ज़िंदगी जीने का हौंसला मिले, यही भगवान से विनती है.

बहरहाल राहत साहब जनता के हीरो थे, क्योंकि जो लोग किसी बात को लेकर अंदर ही अंदर घुटन से घटते जाते थे, उनके घुटन को शायरी से राहत साहब दूर कर देते थे.

आम जनता और पढ़े- लिखे सभी के हीरो थे. राहत इंदोरी सिर्फ़ मुशायरों के ही नहीं साहित्य के भी शायर थे.

शायरी की दुनिया में कदम रखने से पहले, इंदौरी एक चित्रकार और उर्दू के प्रोफेसर थे. उन्होंने हिन्दी फिल्मों के लिये गीत भी लिखे थे. दुनिया भर के मंचों पर काव्य पाठ किया था.

मंसूर जी राहत साहब को याद करते हुए भावुक हो गए. और कहा कि उनकी तबियत में आज से राहत की कमी हो गई है.