मैं मिर्ज़ापुर बोल रहा हूँ

मैं मिर्ज़ापुर हूँ। मेरा सांस्कृतिक महत्त्व अद्वितीय है। मेरे वक्षस्थल पर पुराण-प्रसिद्ध विन्ध्याचल अवस्थित है। विन्ध्याचल को मैंने पाल-पोषकर बड़ा किया है। भूगर्भशास्त्री मेरे इस लाडले को पर्वतों का लकड़दादा मानते हैं। वस्तुतः विन्ध्य जैसे बेटे को प्राप्त मैं स्वयं धन्य हो गया हूँ। इसी लाडले लड़ैते के कारण मेरा एक नाम ‘विन्ध्यारण्य’ भी है। मेरे इस बेटे का स्थान बहुत ऊँचा है। इसकी महत्त्वाकांक्षाएँ इतनी बलवती थीं कि समस्त देवता इससे ईर्ष्या करने लगे थे। स्वयं भगवान् भुवन भास्कर मेरे बेटे की परिक्रमा किया करते थे। पुत्र का उत्कर्ष किसे अच्छा नहीं लगता। मैं आज भी हर्ष-पुलकित हो जाता हूँ। मेरे ही सुअंक में देवताओं को अभय प्रदान करनेवाली देवी विन्ध्यवासिनी विद्यमान हैं। जब मेरे महामनीषी पुत्र राजनाथ मिश्र ने ‘विन्ध्य गिरिराज पर राज गिरिनन्दिनी’ का उद्घोष किया था, तब मेरे हृदय से प्रसन्नता की सहस्र सहस्र धाराएँ फूट पड़ी थीं।

मैं वह मिर्ज़ापुर हूँ, जिसके सुअंक में देवी अष्टभुजा विद्यमान हैं। यशोदा-गर्भसम्भवा देवी अष्टभुजा मेरी स्नेहिल छाया में अनवरत विश्व का कल्याण कर रही हैं। यहीं महाकाली का दिव्य विग्रह है। मेरे ही वक्षस्थल पर वह त्रिकोण स्थित है, जिसकी सन्निधि प्राप्तकर साधारण मनुष्य भी महान् सिद्ध हो जाता है। मैं मिर्ज़ापुर हूँ। दया-करुणा-ममता मेरे स्थायी भाव हैं। जो भी मेरी गोद में बैठकर साधना करता है, उस पर मैं सिद्धियों की वृष्टि कर देता हूँ। मेरे पास जो भी याचक बनकर आया, उसे मैंने त्रिभुवन की निधि देने में भी संकोच नहीं किया। जब स्वयं अखिल ब्रह्माण्डनायक श्रीहरि विष्णु वामन रूप में भिक्षाटन करने निकले, तब उनका अन्तिम मनोरथ मेरे ही पृष्ठ को नापकर पूरा हुआ था। जब पण्डित परिषद् भगवान् वामन की वन्दना करते हुए कहती है-

अजिन दण्ड कमण्डलु मेखला
पतित पावन वामनमूर्त्तये।
मितजगत्त्रितयाय जितात्मने
निगमवाक्पटवे वटवे नमः।।

तब मेरा रोम रोम पुलकित हो उठता है। महाराज बलि के दान-धर्म की रक्षा मेरे ही अंचल में हुई। इसलिए मेरा एक नाम ‘धर्मारण्य’ भी है। भगवती भागीरथी गंगा के तट पर खड़ा चरणाद्रिगढ़ आज भी इस तथ्य का साक्षी है।

देवाधिदेव शिव के पुत्र कुमार कार्तिकेय की शौर्य-गाथा को सँजोये भगवान् तारकेश्वर का प्राचीन मन्दिर आज भी मेरे सुअंक में विद्यमान है। दक्ष प्रजापति की मखस्थली का पुरातन गौरव मेरे श्वास श्वास में बसा हुआ है। दक्ष की मखशाला का ‘गोपुरम्’ आज भले ही विकृत होकर ‘गैपुरा’ हो गया है, किन्तु उसके माहात्म्य का अनुगायन जब मेरे अंक में बैठकर कवि-शिरोमणि उशना ने ‘औशनसपुराण’ में किया था, तब मेरा हृदय हर्षविभोर हो गया था। शिवप्रिया सती की सुयश-वैजयन्ती आज भी छानबे क्षेत्र में स्थापित है।

मैं वह मिर्ज़ापुर हूँ, जिसके पुरातन स्वर्ण-वैभव के असंख्य आख्यान पुराणों में भरे पड़े हैं। जब त्रेतायुग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीराम अपने पूज्य पितृचरण चक्रवर्ती सम्राट् दशरथ का पिण्डदान करने मेरे घर पधारे, तब मेरा शिवपुर का वह स्थान ‘रामगया’ बन गया। आज भी रामेश्वर महादेव का भव्य मन्दिर भगवान् श्रीराम के प्रति मेरी अनन्य निष्ठा को व्यक्त करता है। शिवपुर का विख्यात तारापीठ मेरी तान्त्रिक शक्तियों का अक्षय केन्द्र है।

मैंने द्वापरयुग में धर्मराज युधिष्ठिर का सौष्ठव-पूजन करने का पुण्य-लाभ प्राप्त किया। आज भी पाण्डवगढ़ी मेरे बूढ़े वक्षस्थल पर विद्यमान है। मेरे सुदूर दक्षिणांचल में अर्जुन ने शक्ति-अर्जन हेतु तप किया था। ‘कोन’ की वह भूमि धन्य है, जहाँ अर्जुन ने किरात वेषधारी शिव से युद्ध किया था। अर्जुन को पाशुपतास्त्र की प्राप्ति मेरी विन्ध्याटवी में ही सम्भव हो सकी। महाकवि भारवि के ‘किरातार्जुनीयम्’ के कथा-वैभव की साक्षी पाण्डव नदी आज भी कोन क्षेत्र में प्रवाहित है।

मैं वही मिर्ज़ापुर हूँ, जिसने जरासन्ध द्वारा बन्दी बनाये गये असंख्य नरपतियों की पीड़ा को भोगा है। जब भीम ने जरासन्ध का वध कर मेरे चरणाद्रिगढ़ के कारागार से उन बन्दी नरेशों को मुक्त किया था, तब सर्वाधिक प्रसन्नता मुझे ही हुई थी।

मैंने आनन्दविभोर होकर महात्मा बुद्ध का भी स्वागत किया। मेरे ही कोकनद प्रासाद में बुद्ध ने वर्षावास किया था। सम्राट् अशोक के धम्मलेख आज भी मेरे हृदय-पटल पर अंकित हैं। अहिरौरा मेरा उरस्थल ही तो है। मैंने इतिहास के प्रत्येक पृष्ठ को जिया है। गुप्त सम्राटों का स्वर्ण वैभव भी मैंने देखा है। अनासक्त रूप से दशाश्वमेध करनेवाले भारशिव नरेशों की गौरव-गाथा मेरी ही ‘कान्तिपुरी’ में लिखी गयी। मेरी वह कान्तिपुरी ही आज दुर्दिन का शिकार होकर ‘कन्तित’ में परिवर्तित हो गयी है।

कन्तित-विजयपुर के गहरवार नरेशों की शौर्य-कथाएँ आज भी मुझे रोमांचित करती हैं। कन्तित नरेश युवराज सिंह की सर्वगुणसम्पन्ना सुता राजकुमारी कनक कुँवरि का स्मरण आते ही मुझे महामनीषी पण्डित राजनाथ मिश्र का यह छन्द याद आता है-

विन्ध्यगिरिराज की मनोरमा धरा में खिली,
चाँदनीलता की कलिता की छवि धारे थी।
कन्तित नरेश की दुलारी दुहिता ‘कनक’,
विन्ध्यवासिनी-कृपा-कटाक्ष को सँभारे थी।
दक्षजा सती के अनुराग में रँगी हुई-सी,
अनुसूया-सीता पर रोम रोम वारे थी।
प्राणवल्लभा थी ‘कीर्तिब्रह्म’ सेनानायक की,
‘राज’ दोनों कुल को सतीत्व से निखारे थी।।

निश्चय ही मैं पुरातन परम्पराओं का अक्षय केन्द्र रहा हूँ। मैं ऐतिह्यविदों की गुरु गम्भीर लेखनी से समर्चित आरण्यक संस्कृति का साक्षी हूँ। मैं महान् परम्पराओं का उन्नायक मिर्ज़ापुर हूँ। मेरी पौराणिक प्रतिष्ठा सर्वोपरि है। मेरा प्राचीन नाम ‘गिरिजापुर’ है। आज भी मैंने उन मन्दिरों का अस्तित्व बचाये रखा है, जिनके स्थापत्य-वैभव के साक्षी शिलापट्ट मेरे ‘गिरिजापुर’ नाम का गौरवाख्यान सुनाते हैं।

मुझे अपना वह पुत्र- राजा यवनारि उपाख्य ‘बन्नार’- कभी नहीं भूलता, जिसने मेरे षोडशोपचार पूजन किया। मेरा नाम गिरिजापुर रखा। मुझे गहरवार वंश का राजा गूदनदेव भी याद आता है, जिसने कज्जला देवी को प्रसन्न करने के लिए ‘कजली’ जैसे लोक-स्वर का सृजन किया।

गंगा की घाटी से दुद्धी तक, अहिरौरा से ड्रमण्डगंज तक कभी अभेद्य अरण्य हुआ करता था। मुग़ल शहंशाह बाबर ने मेरे आँगन में विशालकाय गैंडा देखकर आश्चर्य प्रकट किया था, किन्तु दुर्भाग्य से आज मेरे बेटों ने जंगल काट डाला। पहाड़ नंगे हो गये। पर्यावरण प्रदूषित हो गया।

मैं गिरिजापुर से मिर्ज़ापुर कैसे बना- इसकी एक करुण कहानी है। मुग़ल सरदार मिर्ज़ा बाक़ी बेग की सेना कन्तित में ठहरी हुई थी। उसके सैनिक गंगा को प्रदूषित कर रहे थे। भागीरथी गंगा को प्रदूषित करता कन्तित के ब्राह्मण ने मिर्ज़ा बाक़ी बेग का विरोध किया। गीता-गंगा-गायत्री की उपासना करनेवाले उस सनातनी ब्राह्मण का सिर काटकर मिर्ज़ा बाक़ी बेग ने मुहम्मदशाह रंगीला के पास दिल्ली भेज दिया। रंगीला ने मिर्ज़ा को इस क्षेत्र का सूबेदार बनाया। उसी मिर्ज़ा बाक़ी बेग का एक चाटुकार नन्दलाल उमर वैश्य था। उसने सन् 1720 ई. के आसपास मेरा नाम गिरिजापुर से बदलकर मिर्ज़ापुर कर दिया। एक मेरा वह बेटा था, जिसने गंगा की स्वच्छता के लिए अपना उत्सर्ग कर दिया। आज गंगा की सफ़ाई के लिए सरकार अरबों रुपये का बजट निर्धारित कर रही है। यदि सचमुच गंगा स्वच्छ हो जाँय तो यही मेरे उस शहीद बेटे के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

नन्दलाल उमर वैश्य भी मेरा ही बेटा था, किन्तु उसकी आँखों पर लोभ की पट्टी बँधी हुई थी। नन्दलाल की कुत्सित भावना के कारण मेरा अस्तित्व संकट में पड़ गया। गिरिजापुर की एक लम्बी विरासत क्षण मात्र में भूलुण्ठित हो गयी। मैं गिरिजापुर की जगह मिर्ज़ापुर हो गया। ‘तवारीख-ए-भदोही’ आज भी मेरे मिर्ज़ापुर नाम की कहानी को दुहराता है।

पहले मैं बनारस ज़िले का एक नगर हुआ करता था। धीरे धीरे मेरा व्यापारिक महत्त्व बढ़ने लगा। मेरे बहुत-से बेटे बड़े उद्यमी हो गये। कलकत्ता में उनकी व्यावसायिक कोठियाँ स्थापित हो गयीं। अंग्रेजों का ध्यान मेरी ओर आकृष्ट हुआ। वरिष्ठ आई.सी.एस. अधिकारी डगलस देवार की पुस्तक ‘A Hand-Book to the English Pre-Mutiny Records in the Government Record Rooms of United Provinces of Agra and Oudh’ के अनुसार 30 सितम्बर, सन् 1795 ई. को मुझे स्वतन्त्र ज़िला बना दिया गया। ज़िला बनने के बाद एम. आई. टायर्नी मेरा पहला कलेक्टर बनकर आया।

अंग्रेजों के शासनकाल में मुझे तरह तरह से प्रताड़ित किया गया। मेरे बेटों के सँग घोर अमानुषिक व्यवहार किया गया। मुझे उस समय हार्दिक प्रसन्नता हुई, जब भदोही के मौनस वीर उदवन्त सिंह एवं बाबू झूरी सिंह ने तथा विजयगढ़ के राजा लक्ष्मण सिंह ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये। 4 जुलाई, 1857 का वह दिन आज भी मुझे याद है, मेरे वीर पुत्र झूरी सिंह ने ज्वाइंट मजिस्ट्रेट विलियम मूर, ए. के. कैश एवं जाॅन एम. के. का सिर क़लम कर दिया था। उस दिन मारे गर्व के मेरी छाती फूलकर छप्पन गज की हो गयी थी।

सन् 1857 की क्रान्ति के बाद सन् 1880 ई. में जाॅन काॅकबर्न आया। पहले तो मैंने सोचा कि यह भी कोई स्वार्थी अंग्रेज है, किन्तु बाद में मुझे पता चला कि वह समर्पण भाव से मेरे जंगलों में घूम घूमकर शैलचित्रों का अन्वेषण कर रहा है। आदिमानवों द्वारा मेरी गुफाओं में बनाये गये असंख्य शैलचित्र अभी तक संसार की दृष्टि से ओझल थे। जाॅन काॅकबर्न ने विजयगढ़ से लेखनिया-राजपुर तक की गुफाओं को छान मारा। उसने 17 मार्च, 1883 ई. को विजयगढ़ दुर्ग से तीन मील दूर स्थित घोड़माँगर में चित्रित आखेट दृश्य में गैंडे का चित्र देखा। जाॅन काॅकबर्न को भी शहंशाह बाबर की तरह गैंडे का चित्र देखकर आश्चर्य हुआ था। काॅकबर्न ने तो केवल चित्र देखा था, जबकि बाबर ने चुनार में गैंडे को घूमते देखा। ‘तुज़्क-ए-बाबरी’ स्वयं इस तथ्य का साक्ष्य प्रस्तुत करती है। जाॅन काॅकबर्न ने मेरी गुफाओं के अद्वितीय चित्र-वैभव से विश्व को अवगत कराया। उसी समय आर्चिबाल्ड कार्लाइल भी आया। कार्लाइल ने भी गुफाचित्रों का अन्वेषण किया। मुझे इस बात पर गर्व है कि भारत में शैलचित्रों के अन्वेषण का कार्य सर्वप्रथम मेरे ही आँगन से प्रारम्भ हुआ। मैं बहुत आभारी हूँ उन दोनों अंग्रेजों का, जिन्होंने मेरी इस पुरातन पहचान को विश्व-पटल पर रखा।

मेरे आँगन में समय समय पर अनेक साहित्यकारों का जन्म हुआ। राम-भक्त पण्डित रामगुलाम द्विवेदी की साहित्य-सम्पदा भारतीय रामकथे की गौरवपूर्ण विरासत है। चौधरी पण्डित बदरीनारायण उपाध्याय ‘प्रेमघन’ और भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र की मैत्री जगत्प्रसिद्ध है। ‘आनन्द-कादम्बिनी’ का सम्पादन मेरे ही घर से हुआ करता था। मेरे ही घर में रहकर विलियम क्रुक ने अनेक सन्दर्भ-ग्रन्थों का प्रणयन किया। रेवरेण्ड एडविन ग्रीब्ज़ बड़ी विपन्नता में शरणागत होकर आया था। सन् 1881 से सन् 1892 ई. तक मेरे ही घर में रहकर ग्रीब्ज़ ने भारतीय भाषा और साहित्य का अध्ययन किया। जब 1918 में ग्रीब्ज़ की पुस्तक ‘A Sketch of Hindi Literature’ का प्रकाशन हुआ, तब मुझे आत्मिक प्रसन्नता हुई। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल को मैंने ही पालकर बड़ा किया था। मुझे गर्व है कि मेरे बेटे से बड़ा कोई दूसरा आलोचक हिन्दी-जगत् में आज तक पैदा नहीं हुआ।

साहित्य-जगत् जिसे ‘बंग महिला’ कहता है, वह राजेन्द्रीबाला घोष मेरी ही बेटी थी। पाण्डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’, सेठ महादेवप्रसाद ‘मतवाला’, केदारनाथ पाठक, डॉ. काशीप्रसाद जायसवाल, कुशवाहा कान्त, महामनीषी राजनाथ मिश्र, ब्रह्मदेव त्रिपाठी ‘ब्रह्मा’, सत्यदेव मिश्र ‘उपेन्द्र’, सोहर बाबा, पद्मभूषण पण्डित रामकिंकर उपाध्याय जैसे विद्वन्मनीषी मेरे ही लाडले थे। ‘आनन्द-कादम्बिनी’ से चलकर ‘टर्निंग इण्डिया’ तक मेरे बेटों की पत्रकारिता के अनेक पड़ाव हैं।

अब मेरी बूढ़ी हड्डियों में वह जोश नहीं है। मुझे बड़ी उम्मीद थी कि जब देश आज़ाद होगा, तब शायद कोई मेरा लायक बेटा मेरे पुराने नाम ‘गिरिजापुर’ को पुनः प्रचलित करने का प्रयत्न करेगा, किन्तु ऐसा नहीं हो सका। अब समय भी बदल गया है। छोटी छोटी बात को राजनीतिक लाभ-हानि से जोड़कर देखा जाने लगा है। वस्तुतः मैं वही गिरिजापुर ही हूँ। मिर्ज़ापुर मेरा सबसे नया और प्रचलित नाम है। गिरिजापुर और मिर्ज़ापुर को काशी और बनारस, प्रयागराज और इलाहाबाद की तरह ही देखा जाना चाहिए। जब भी मेरी सांस्कृतिक विरासत की चर्चा हो, तब मुझे गिरिजापुर अभिधान से सम्बोधित किया जाय। गिरिजापुर से मिर्ज़ापुर बनने तक की मेरी यही कथा है। आज भी महामाया विन्ध्यवासिनी और भगवती गंगा मेरी सांस्कृतिक पहचान हैं। मेरे घण्टाघर जैसा कोई दूसरा घण्टाघर नहीं है। मेरे आँगन में बसा शहीद उद्यान भले ही छोटा है, किन्तु उसकी महनीय विरासत के समान कोई दूसरा शहीद उद्यान भी नहीं है।

मैं वही पुराना मिर्ज़ापुर हूँ, जिसकी आत्मा गिरिजापुर में बसी है। मैं इस दौर में भी ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ का उद्घोष करता हूँ। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ मेरा एक मात्र ध्येय है। मुझे मेरे पुरखों ने आशावादी बनाया है। निश्चय ही एक दिन सब अच्छा होगा। मेरा ऐसा ही विश्वास है।