मुकुंद लाठ: बहुमुखी प्रतिभा के धनी सच्चे महापुरुष

मुकुंद लाठ का छह अगस्त को जयपुर में निधन हो गया। नौ अक्टूबर 1937 को कोलकाता में जन्मे मुकंद लाठ भारतीय कला, संस्कृति और दर्शन के अग्रणी विद्वान थे।

Mukund Lath filmbibo
भारत सरकार ने साल 2010 में कला एवं संस्कृति में उनके योगदान के लिए मुकंद लाठ को पद्म श्री से सम्मानित किया था।

मुकुंद लाठ नहीं रहे। जयपुर में उनका निधन हो गया। वे कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे। अचानक चले गए। शायद अचानक नहीं भी।

मैंने बहुमुखी प्रतिभा के ऐसे सच्चे महापुरुष कम ही देखे होंगे। महापुरुष सोच-समझ कर कह रहा हूँ। वे विद्वान थे। मगर उनके ज्ञान में अहंकार नहीं था, जिसका विलय सिद्ध पुरुषों के ही बस में होता है। उनकी मुसकान दिव्य थी, कुछ पुलकित कुछ रुकी-रुकी सी। स्नेह और करुणा उनकी आँखें प्रकट करती थीं, शब्द नहीं। न उनमें स्वार्थ देखा, न उठक-पछाड़ भरी महत्त्वाकांक्षा।

मुकुंदजी के किन-किन पक्षों की बात करूँ। वे संस्कृत और प्राकृत के विद्वान थे। हिंदी के कवि थे। शिक्षक थे। विचारक थे। इतिहासकार थे। सौंदर्यशास्त्री थे। संगीतज्ञ थे। शास्त्रीय गायक थे। कला के पारखी थे। वस्त्रविन्यास में भी उनकी रुचि बड़ी प्रत्यक्ष थी।

उनका घर — घर का नाम उन्होंने ‘घर’ ही रखा था — कला का अनूठा संग्रहालय बन गया। यामिनी रॉय और गणेश पाइन के वे ख़ास मुरीद थे। दोनों की बेशुमार कृतियाँ उनके यहाँ शोभित थीं।

दिल्ली से जयपुर लौटा तो सबसे पहले उन्हीं से मिलने गया। पहले कभी प्रयाग शुक्ल — श्रीमती नीरजा लाठ उनकी सहपाठी रहीं — के साथ गया, तब वे किराए के घर में रहते थे। नया घर वास्तुशिल्प में अनूठा लगा। उसमें मुकुंदजी की छाप साफ़ पहचानी जा सकती थी।

उस रोज़ उनका बेटा भी कोलकाता से आया हुआ था। बेटा और पुत्रवधू आकार-प्रकार नाम से दिल्ली और कोलकाता में कलादीर्घा चलाते हैं। बेटे को मैंने कहा कि इतनी नायाब कलाकृतियाँ एक घर में पहले नहीं देखीं। बेटे का जवाब सुन तबीयत ख़ुश हुई; उसने कहा — हम पेंटिंग का व्यापार इसीलिए करते हैं कि अपने घर के लिए और पेंटिंग ख़रीद सकें।

एक दफ़ा मद्रास (अब चेन्नई) के पीपीएसटी न्यास से एवी बालासुब्रह्मनियन पत्र मुझे मिला। 1988 की बात है। पत्र में लिखा था कि जयपुर से श्री मुकुंद लाठ ने राजस्थान के पारम्परिक जलसंग्रह स्रोतों पर मेरा एक लेख (सीएसई फैलोशिप के तहत तैयार लिखा था) उन्हें भेजा है। मैं हैरान हुआ कि मुकुंदजी कहाँ-कहाँ की चीज़ें पढ़ लेते हैं।

दिल्ली से आए काग़ज़ों में चेन्नई वाला वह पत्र निकला तो मुकुंदजी को भेज दिया, बताने को कि देखिए आपके ज़िक्र भर को मैंने कितना संभाल कर रखा है। उन्होंने (बदले में!) मेरा एक पत्र मुझे भेज दिया, जो मैंने उन्हें कई वर्ष पहले लिखा था!

उन्होंने बहुत किताबें लिखीं। मुझे नामदेव की पदावली और एक व्यवसायी की आत्मकथा की विवेचनात्मक प्रस्तुति “अर्धकथानक” बहुत भाई। “अर्धकथानक” की रूपसज्जा भी अद्भुत थी, जिसे विनय जैन ने अंजाम दिया था (जिन्होंने बाद में हमारे विश्वविद्यालय का प्रतीकचिह्न भी बनाया)। दार्शनिक दयाकृष्ण जी के साथ मुकुंदजी के लम्बे वार्तालाप का भी स्मरण है।

मुकुंदजी छोटी-छोटी कविताएँ मुझे बहुत पसंद रहीं। संस्कृत काव्य के हिंदी रूपांतर भी। सात साल पहले 75 साल की उम्र में उनका पहला कविता संग्रह “अनरहनी रहने दो” आया, जिस पर जयपुर लिटरेचर फ़ेस्टिवल में अशोक वाजपेयी जी के साथ बात अपनी बात कहने का मौक़ा मुझे भी मिला।

इसी साल आठ फ़रवरी को जयपुर के सेंट्रल पार्क में पंडित जसराज का गायन था। मुकुंदजी अक्सर उनके साथ संगत करते थे। उस रोज़ पंडितजी ने सामने की पंक्ति में किसी को देख हथेली आँखों पर की और बोले: “मुकुंद बाबू आए हैं क्या?” फिर कहा — “शायद वे नहीं हैं। अच्छा ही किया। कितनी ठंड है।”

मुकुंदजी के नासाज़ स्वास्थ्य के बारे में उन्हें मालूम रहा होगा। लेकिन इतने पुराने शागिर्द की याद अचानक उमड़ आना अस्वाभाविक नहीं था।

काश मुकुंदजी और जीते। भले वे चले गए। पर पंडित जसराज की तरह रह-रह कर यह अहसास हमें भी झकझोरता रहेगा कि वे हमारे बीच हैं न?