नामवर सिंह जातिवादी थे, रामविलास शर्मा सुपारी किलर!

रामविलास शर्मा के बारे में उनके विरोधी रहे मुक्तिबोध ने सन 60 के आसपास ही लिखा था कि अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद रामविलास जी ने अकेले एक संस्था के बराबर काम किया है।

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(बाएं से दाएं) आलोचक रामविलास शर्मा, आलोचक नामवर सिंह और लेखक फणीश्वर नाथ रेणु।

सिर्फ राजनीतिक पार्टियों में ही संबित पात्रा नहीं हैं। साहित्य की गली गली में भी ऐसी धूम मची है। दुनिया सचमुच कचरे का ढेर हो चुकी है। हर मुर्गा भांग धतूरा चर कर कुछ का कुछ बांग दे रहा।सबके पास अच्छे खासे फालोवर हैं। कहीं कोई जवाबदेही भी नहीं है।

सच्चाई तो यही है कि रामविलास शर्मा ‘मैला आँचल’ नहीं लिख सकते। ‘मैला आँचल’ तो कालिदास या तुलसीदास भी नहीं लिख सकते थे। क्या इसी मात्र से रेणु तुलसी कालिदास या राम विलास शर्मा के बराबर हो जाएंगे। रामविलास जी के बारे में उनके विरोधी रहे मुक्तिबोध ने सन 60 के आसपास ही लिखा था कि अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद रामविलास जी ने अकेले एक संस्था के बराबर काम किया है।

रामविलास जी मुक्तिबोध के उस कथन के बाद भी तीन दशक अनवरत लिखते रहे। वे एक मामूली डिग्री कॉलेज में लेक्चरर थे। आज हम सब जिनकी चौखट पर हाथ जोड़े कृतज्ञ भाव से रिरियाते गिड़गिड़ाते हैं, वे हिंदी के बड़े बड़े प्रकाशन संस्थान रामविलास शर्मा के सामने हाथ बांधे कृपाकांक्षी भाव से पड़े रहते थे। यह थी हमारे हिंदी वाले रामविलास जी की ठसक। इसलिए कि उनके पास हिंदी का विशालतम पाठक समुदाय था। महान रेणु हों या हम सरीखे पिद्दी बड़बोले हजारों कहानीकार एक बार निराला की साहित्य साधना भाग 1 भर पढ़ लें तो सारी औकात पता लग जायेगी।

nirala ki sahitya sadhana by ramvilas sharma
‘निराला की साहित्य साधना’ को हिन्दी आलोचना की क्लासिक आलोचना पुस्तकों में शुमार किया जाता है।

केवल जलती मशाल रामविलास शर्मा 

5- 5 हजार के मामूली पुरस्कारों के लिए जीभ निपोरते हम क्या रामविलास जी का इतना महत्त्व भी नहीं जान सकते कि आज से 40 साल पहले लगभग 16 लाख रुपये के अलग अलग तीन चार पुरस्कारों को उन्होंने मात्र यह कहकर छोड़ दिया कि इस राशि को हिंदी के प्रचार प्रसार में लगा दिया जाय।

नामवर जी ने आलोचना की सम्पादकीय लिखते हुए उनके बारे में लिखा था-केवल जलती मशाल। अपनी जाति बिरादरी वाले राही मासूम रजा का उपन्यास ‘आधा गांव’ पहली बार सागर विश्वविद्यालय के कोर्स में लगवाकर नामवर सिंह ने हिंदी विभागों से जो शत्रुता मोल ले ली थी, अपनी उसी पुरानी आदत का परिणाम उनकी लंबी बेरोजगारी रही। उन्होंने ‘जातिवाद’ किया और जेएनयू के हिंदी विभाग को रसातल कर डाला था।अब वर्तमान में उसका मुलायमी ढांचे पर समाजवादी और जातिविहीन परिष्कार किया जा रहा है।

असल में हमारी चिंता बिल्कुल दूसरी है। हम चाहते हैं कि नामवर सिंह हों या रामविलास शर्मा अपना सारा काम छोड़कर हमें दुनिया का अनोखा और पहला सबसे बड़ा कथाकार लिखें, वरना हम उन्हें जातिवादी कहते रहेंगे।हम उन्हें ओबीसी विरोधी और सुपारी किलर कहते रहेंगे।

हम अपने योगदान पर इतने मुग्ध हैं कि हमें किसी का अवदान दिखाई ही नहीं देता। आलोचकों से कथाकारों की अतिशय अपेक्षा ने उन्हें बड़बोला बना दिया है। हमें कभी नहीं भूलना चाहिए कि हिंदी के ये दोनों दिग्गज गांव की पाठशाला से पढ़े किसान परिवार के थे। नामवर जी तो बड़े सत्ता प्रतिष्ठान से जूझे भी और बाद में जुड़े भी।

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फणीश्वर नाथ रेणु का उपन्यास ‘मैला आंचल’ हिन्दी साहित्य के क्लासिक नॉवेल में शुमार किया जाता है।

रामविलास जी का बेदाग जीवन

रामविलास जी का जीवन बेदाग और आद्योपांत निर्मल रहा है। जब हम उनकी स्थापनाओं से असहमत भी होते हैं तब भी वे हमें अपनी तर्कपरकता और नई-नई सूचनाओं से समृद्ध करते चलते हैं। आप वेदों के विरोध में या पक्ष में कुछ भी बोलने के लिए,कालिदास,भवभूति, वाल्मीकि, नाथ, सिद्ध साहित्य के पक्ष विपक्ष में भक्तिकाल के पक्ष या विपक्ष में जब भी अपनी राय रखना चाहेंगे, ‘मैला आँचल’ कोई काम न देगा। वहां सिर्फ रामबिलास शर्मा ही याद आएंगे। उन्हें चुनाव थोड़े लड़ना है कि आपको हर बात से सहमत करते चलें।

फिराक बड़े रचनाकार थे उनका बड़बोलापन भी जग जाहिर था, सबकी चड्ढी उतारने का शौक था उन्हें। उनके ज्ञानंदम्भ का हालचाल लेते हुए मात्र एक लेख लिखा रामबिलास जी ने। बताने वाले कहते हैं कि बवासीर का घाव इतना बढ़ गया कि फिराक साहब हमेशा हमेशा के लिए एकांत में चले गए। साहित्य पथ पर चुनौती बनी बड़ी और कड़ी सुपारी की ढेर को रामविलास जी ने दांतों से तोड़ा है। वे सुपारी किलर क्यों होने लगे।

सवर्ण या दलित परिवार में आपकी पैदाइस आपके निर्णय के अधीन न होती। इसका अहंकार या इसकी कुंठा आपके लेखन में दिखे तो आपकी जिम्मेदारी होगी। सुपारी खा खिला कर अपने ऊपर पत्रिकाओं के विशेषांक प्रायोजित करना ,अपने ऊपर लेख लिखवाना ही असल में साहित्य का सुपारीकिलर होना है।